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झारखंड सरकार ने निजी कंपनियों से किया एमओयू करार, उठ रहे हैं कई बड़े सवाल
दिल्ली के होटल ताज़ में दो दिनों तक चले इस निवेश सम्मलेन के आखिरी दिन देश की कई दिग्गज निजी कंपनियों के साथ 10 हज़ार करोड़ निवेश पर सहमति बनी।
अनिल अंशुमन
30 Aug 2021
झारखंड सरकार ने निजी कंपनियों से किया एमओयू करार, उठ रहे हैं कई बड़े सवाल

हमारे देश की सियासत में अब यह स्थायी रिवाज़ ही बन गया है कि कोई सत्ताधारी दल जब विपक्ष में बैठा होता है तो वो जिस मुद्दे के विरोध का झंडा बुलंद किए रहता है, सत्तासीन होते ही उसी एजेंडे को लागू करने को अपना राजधर्म बना लेता है।

28 अगस्त को देश की राजधानी में स्थित होटल ताज़ में हेमंत सोरेन सरकार ने महत्वाकांक्षी ‘निवेशक सम्मलेन’ (इन्वेस्टर समिट) का आयोजन किया। जिसमें मुख्यमंत्री ने ‘झारखण्ड की औद्योगिक एवं निवेश प्रोत्साहन नीति 2021’ को जारी करते हुए, कई निजी कंपनियों के साथ दर्जनों एमओयू करार किये, जिसे लेकर सरकार को समर्थन दे रहे नागरिक समाज ने विरोध शुरू कर दिया है।

सनद हो कि ये वही हेमंत सोरेन हैं जो विपक्ष में रहते हुए पूर्व की सरकारों द्वारा निजी कंपनियों से किये गए एमओयू का मुखर विरोध किया करते थे। तब वे इसे प्रदेश के आदिवासियों के जल, जंगल, ज़मीन की लूट की साजिश बताया करते थे और, सारे एमओयू रद्द करने की मांग किया करते थे। लेकिन आज वही हेमंत सोरेन बड़ी निजी कंपनियों से हाथ मिला रहे हैं।

इसी निवेशक सम्मेलन में डालमिया कंपनी के साथ हुए एमओयू के पश्चात् मुख्यमंत्री कार्यालय ने अपने ट्वीट में कहा “जैसे हमारे बीच टाटा स्टील समूह के लोग हैं, डालमिया ग्रुप भी हमारे लिए नया नहीं है. आप सभी झारखंड परिवार का हिस्सा हैं. हम चाहते हैं कि हमारा परिवार और आगे बढ़े ताकि राज्य की समृद्धशाली पहचान देश दुनिया के सामने आये.” इसी कंपनी के ख़िलाफ़ कुछ ही दिन पहले झामुमो की उड़ीसा इकाई ने आदिवासियों को समर्थन दिया था।

उड़ीसा के सुन्दरगढ़ जिला स्थित राजगांगपुर में इसी कंपनी की सीमेंट फैक्ट्री के विस्तारीकरण के लिए ज़मीन अधिग्रहण किया जा रहा है। जिसका विरोध वहाँ के आदिवासी समुदाय कर रहे हैं, संघर्षरत आदिवासियों को  झामुमो का पुरज़ोर समर्थन मिला हुआ है।

इस ज़मीन अधिग्रहण के लिए प्रशासन द्वारा बुलायी गई जन सुनवाई के विरोध में आदिवासी-मूलवासियों का साथ देने के लिए उनकी पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष व बहन भी पहुंची थीं, लेकिन उन्हें, कई पार्टी नेताओं के साथ होटल में नज़रबंद कर दिया गया था, जिसका विरोध खुद हेमंत सोरेन ने भी किया था। लेकिन वे अब उसी डालमिया कंपनी को झारखंड के लिए बुला रहे हैं।

संभवतः यह पहला मौक़ा है जब मीडिया ने हेमंत सोरेन सरकार द्वारा निजी कॉर्पोरेट कंपनियों से किए गए एमओयू करार करने पर इतना पुलकित होकर तारीफों के पुल बांधे हैं। होटल ताज़ में दो दिनों तक चले इस निवेश सम्मलेन के आखिरी दिन शनिवार को देश की कई दिग्गज निजी कंपनियों के साथ 10 हज़ार करोड़ निवेश पर सहमति बनी।

हेमंत सोरेन ने यह भी दावा किया कि इससे प्रदेश के 20 हज़ार युवाओं को प्रत्यक्ष और एक से डेढ़ लाख लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार मिलेगा। साथ ही उन्होंने औद्योगिक घरानों का आभार जताते हुए यह भी कहा कि आपके ही सुझाव से झारखण्ड में उद्योग को लेकर अपग्रेडेड इंडस्ट्रियल पॉलिसी बनी है।

दो दिवसीय मीट के आयोजन के पहले ही दिन हेमंत सोरेन ने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि “हम माइंस और मिनरल से आगे सोचना चाहते हैं। झारखण्ड में ज़मीन की कमी नहीं है लेकिन दुर्भाग्य से हमें सिर्फ खनन, कोयला और लौह अयस्क वाला ही राज्य समझा गया. पिछले 20 वर्षों में पूर्व की सरकारों ने भी इसी के इर्द गिर्द अपनी सारी नीतियां बनायीं हैं.”

इसे लेकर अब प्रदेश में अन्दर ही अन्दर सियासी सरगर्मी और चर्चाएँ शुरू हो गयी हैं लेकिन अभी तक विपक्षी दल भाजपा के किसी नेता या प्रवक्ता की कोई टिप्पणी या प्रतिक्रिया नहीं आई है। हां, सरकार को समर्थन दे रहे नागरिक समाज के वरिष्ठ जन, झारखंडी मामलों के जानकारों और आदिवासी बुद्धिजीवियों में प्रतिक्रिया के स्वर बढ़ने लगे हैं।

जाने-माने अर्थशास्त्री डा. रमेश शरण ने झारखण्ड सरकार के इस क़दम को झारखंडी जनआकांक्षाओं के विपरीत बताते हुए कहा “प्रदेश में विकास के नाम पर पिछली सरकारों वाली गलती ही फिर से दुहरायी जा रही है. ज़रूरत है कि राज्य में बंद पड़ीं सैंकड़ों छोटे-उद्योग की ईकाइयों को फिर से खड़ा किया जाए और  राज्य की अपनी आय व्यवस्था को पटरी पर लाया जाए। ना कि निजी कंपनियों को ही मुनाफा कराने को प्रमुखता दी जाए। इसके पूर्व की सरकारों ने भी इसी प्रकार से मनमाने सैकड़ों एमओयू किये लेकिन उनमें से एक को भी अमली जामा नहीं पहनाया जा सका।

डा. रामदयाल मुंडा समेत कई विशेषज्ञों द्वारा प्रदेश में सम्यक विकास को लेकर बार-बार सुझाव दिया जाता रहा है कि झारखंड में वनोत्पाद से जुड़े लघु-कुटीर उद्योगों का जाल बिछाने जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी जाए। जिससे यहां की वन-संपदाओं का सही उपयोग के साथ-साथ अनेकों लोगों के लिए स्थायी स्वरोजगार के अवसर भी पैदा किये जा सकते हैं।

निवेश के नाम पर निजी कंपनियों को लाना, जिनका लक्ष्य ही होता है कम से कम श्रमशक्ति लगाकर अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना, उनसे रोज़गार के अवसर पैदा करने मामला कब का दिवास्वप्न साबित हो चुका है।

झारखंड मामलों के विशेषज्ञ और हेमंत सोरेन सरकार के पैरोकार रहे वरिष्ठ एडवोकेट रश्मि कात्यायन ने कहा कि दिल्ली ताज़ होटल में राजकीय समारोह कर निजी उद्योग घरानों और कॉर्पोरेट कंपनियों के एमओयू करार की पूरी कवायद ‘पुरानी शराब की बोतल पर नया लेबल’ लगाने जैसा ही है।

यह झारखंड का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पिछली सरकारों की तर्ज़ पर ही हेमंत सोरेन सरकार भी झारखंडी आत्मा से कटे हुए नौकरशाहों की चौकड़ी के चश्मे से विकास का काम करना चाह रही है. जबकि हेमंत सोरेन ये भली भांति जानते हैं कि जिस झारखण्ड राज्य के गठन की लड़ाई में उनके पिता को अगुवा नायकत्व का दर्जा हासिल है, उसमें जल,जंगल, ज़मीन और खनिज प्राकृतिक संसाधनों की संगठित लूट और दोहन पर रोक का मुद्दा केंद्रीय सवालों में रहा है।

पिछली सरकारों द्वारा किये गए सभी एमओयू करार से यहाँ के लोगों को विस्थापित होने का जो खतरा दिख रहा था, अब वही ख़तरा फिर से लोगों की परेशानी का कारण बनेगा। वैसे भी हेमंत सोरेन सरकार की अब तक की भूमिका से लोग काफी क्षुब्ध हो रहे हैं, कहीं ऐसा न हो कि सरकार का यह नया क़दम लोगों के भरोसे को और अधिक कमज़ोर बना दे।

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