NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
नज़रिया
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
झारखंड: निजीकरण के ख़िलाफ़ असरदार रही बैंक हड़ताल, समर्थन में केंद्रीय ट्रेड यूनियनें भी उतरीं!
बैंक–बीमा क्षेत्र कर्मियों की इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल के सक्रिय समर्थन में सभी राष्ट्रीय वामपंथी ट्रेड यूनियों के संयुक्त आह्वान पर, सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के खिलाफ अभियान के तहत रेलवे स्टेशनों पर मार्च निकाल कर सभाएं की गईं।
अनिल अंशुमन
17 Mar 2021
bank strike
फ़ाइल फ़ोटो

यह हड़ताल बैंककर्मियों की वेतन बढ़ोत्तरी या सेवाशर्तों की मांगों के लिए नहीं बल्कि निजीकरण के विरोध में है। केंद्र की मौजूदा सरकार आम जनता की गाढ़ी कमाई पूंजी को बैंकों के निजीकरण के जरिए कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में बेचने की साजिश कर रही है। सबसे भयंकर यह कि जिन कॉर्पोरेट घरानों ने बैंकों का पैसा डुबोकर हड़प लिया है, मोदी सरकार द्वारा उन्हें ही बैंक सौंपने की तैयारी की जा रही है। लगभग इसी तरह की बातें प्रायः सभी जगहों पर हड़ताली बैंककर्मियों ने कही। 

मोदी सरकार द्वारा देश के सरकारी बैंकों के निजीकरण के फैसले के खिलाफ यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स के आह्वान पर हुए 15 व 16 मार्च की बैंक हड़ताल झारखंड में काफी असरदार रही। राज्य के ग्रामीण बैंक समेत 12 सरकारी बैंकों की 8000 शाखाओं में हड़ताल का सीधा असर हुआ और बैंकिंग से जुड़े सभी काम लगभग ठप्प रहे हैं। बैंक यूनियनों ने इस हड़ताल में 45 हज़ार बैंक कर्मचारी व अधिकारियों के शामिल होने का दावा किया है।

राजधानी रांची—ज़िला क्षेत्र, कोयलाञ्चल के धनबाद-बोकारो, कोल्हान (जमशेदपुर-दक्षिण छोटानागपुर ), पलामू प्रमंडल के सभी जिलों, उत्तरी छोटानागपुर के रामगढ़, हजारीबाग–गिरिडीह व कोडरमा समेत सभी जिलों में कतिपय निजी बैंकों को छोड़ शेष सभी बैंको में शत प्रतिशत हड़ताल रही। जिसमें आम बैंक कर्मचारियों के अलावा महिला बैंककर्मी व अधिकारियों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 

राजधानी रांची से लेकर सभी क्षेत्रों के मंडलीय व क्षेत्रीय बैंक मुख्यालयों के समक्ष बड़ी संख्या में इकट्ठे होकर बैंककर्मियों ने मोदी सरकार विरोधी नारे लगाते हुए केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते किया और मार्च निकालकर सभाएं भी कीं। 

ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कंफ़ेड्रेशन (एआईबीओसी) के महासचिव सुनील लकड़ा ने अपने सम्बोधन में कहा कि सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण का फैसला एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। जिससे बैंकों का स्वामित्व और ऋण बांटने का अधिकार कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा। देश में बैंकों के 7.56 लाख करोड़ रुपये एनपीए में फंसा हुआ है। जिसका 80% एनपीए कॉर्पोरेट घरानों से ही जुड़ा हुआ है। जिनके लिए सरकार ने 1.15 लाख करोड़ 2020–21 के वित्तीय वर्ष में राइट ऑफ कर दिया। यह स्थिति न सिर्फ बैंकों के लिए बल्कि देश की आम जनता के लिए भी चिंता का विषय है। क्योंकि आम जनता से कोई रियायत नहीं होती है। 

एनसीबीई के महासचिव ने कहा कि निजी बैंक केवल अपने मालिक के हितों की ही चिंता करते हैं। पिछले वर्ष जिस तरह से आईसीआईसी आई, येस बैंक, एक्सिस और लक्ष्मी किसान बैंकों में हुईं गड़बड़ियाँ सामने आयीं उससे यह यह तर्क बेमानी साबित होता है कि निजी बैंकों में काम बेहतर होता है।

यूएफबीयू झारखंड के संयुक्त संयोजक ने कहा कि बैंकों के निजीकरन का फैसला न सिर्फ कर्मचारियों के लिए बल्कि देश की आम गरीब जनता के लिए भी खतरनाक है। यूनियन के ही एक अन्य नेता ने कहा कि आज जब सरकारी बैंकों को मजबूत करके देश की गिरती अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार लाने की जिम्मेदारी सौंपने की ज़रूरत है तो मोदी सरकार उल्टे रास्ते पर चलकर बैंकों का ही निजीकरण कर रही है।

आंदोलनकारी बैंककर्मियों ने मोदी सरकार पर खुलकर आरोप लगाते हुए कहा कि जिन कॉर्पोरेट घरानों पर आज देश के बैंको पर हजारों करोड़ रुपयों की एनपीए देनदारी है, अब उन्हीं के हाथों में सब कुछ चला जाएगा। जो देश की अर्थव्यवस्था के बेहद घातक साबित होगा।

आंकड़े पेश करते हुए यह भी कहा कि जिन निजी–कॉर्पोरेट घरानों ने सरकारी बैंकों का पैसा डुबोया है अब उन्हीं के हाथों में मोदी सरकार बैंकों को सौंपने की तैयारी कर रही है। जबकि कोई भी राष्ट्रीयकृत बैंक सकल घाटे में नहीं है।

एक ओर, सरकार लगातार दुष्प्रचार कर रही है कि सरकारी बैंक घाटे में चल रहें हैं। वहीं, जनधन जैसी योजनाओं में जनता को ऋण देने को बाध्य कर के बैंकों को लगातार घाटा में पहुंचाया और अब खुद ही उनकी छवि खराब कर रही है।

निजी हाथों में बैंकों के चले जाने से होने वाले संकटों की चर्चा करते हुए बताया कि इससे जनता की बची-खुची पूंजी पर भी बड़े कॉर्पोरेट घरानों का कब्जा हो जाएगा। तमाम ग्रामीण शाखाएं बंद हो जाएंगी और कृषि व छात्रों के ऋणों में भी काफी कमी आ जाएगी। बुनियादी ढांचे और सभी विकास योजनाओं के लिए मिलनेवाली ऋणों में भी कमी आने के साथ-साथ बैंकिंग–बीमा क्षेत्र में युवाओं के रोजगार के भी अवसर घट जाएगा। दूसरी ओर, तमाम ग्राहकों पर सेवा शुल्क के नाम पर हर दिन बोझ बढ़ा दिया जाएगा।

यह भी चेतावनी दी कि सरकार यदि अपना फैसला नहीं लेती है तो मजबूरन हमें अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाना पड़ सकता है जिसकी जवाबदेह सरकार होगी।

बैंक–बीमा क्षेत्र के कर्मियों की इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल के सक्रिय समर्थन में सभी राष्ट्रीय वामपंथी ट्रेड यूनियों के संयुक्त आह्वान पर सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के खिलाफ अभियान के तहत रेलवे स्टेशनों पर मार्च निकाल कर सभाएं की गईं।

रांची व धनबाद मण्डल के कई रेल स्टेशनों पर मोदी सरकार द्वारा लाये गए नए श्रम व कृषि क़ानूनों का कड़ा विरोध करते हुए सीटू, एक्टू, एटक व इंटक समेत कई अन्य वाम ट्रेड यूनियनों के केंद्रीय नेताओं ने देश के किसानों की भांति मजदूर आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया।

गोदी मीडिया द्वारा देश के अन्य हिस्सों में जिस तरह से 15–16 व 17 मार्च को हुई अभूतपूर्व हड़ताल की खबरों को नकारात्मक बनाकर प्रसारित किया गया, झारखंड में भी इस हड़ताल से करोड़ों रुपयों का कारोबार नुकसान की खबर को प्रमुखता दी गयी। 

गौरतलब यह भी रहा कि अब तक होने वाली बैंक हड़तालों को लेकर आम जनता का जो नकारात्मक भाव दिखता था, कई स्थानों पर इस बार वैसा नहीं दिखा। रांची व कई जगहों पर नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने हड़ताली बैंक कर्मियों को अपना समर्थन व्यक्त किया। जो सरकार भक्तों और गोदी मीडिया द्वारा आंदोलनकारी बैंककर्मियों के खिलाफ किए जा रहे दुष्प्रचारों का प्रतीकार भी कहा जा सकता है।

All India bank strike
Two-Day Bank Strike
Jharkhand
trade unions

Related Stories

दक्षिण अफ्रीका में सिबन्ये स्टिलवाटर्स की सोने की खदानों में श्रमिक 70 दिनों से अधिक समय से हड़ताल पर हैं 

मुंडका अग्निकांड: सरकारी लापरवाही का आरोप लगाते हुए ट्रेड यूनियनों ने डिप्टी सीएम सिसोदिया के इस्तीफे की मांग उठाई

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

झारखंड: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन सत्याग्रह जारी, संकल्प दिवस में शामिल हुए राकेश टिकैत

ट्रेड यूनियनों की 28-29 मार्च को देशव्यापी हड़ताल, पंजाब, यूपी, बिहार-झारखंड में प्रचार-प्रसार 

झारखंड: हेमंत सरकार की वादाख़िलाफ़ी के विरोध में, भूख हड़ताल पर पोषण सखी

झारखंड: राज्य के युवा मांग रहे स्थानीय नीति और रोज़गार, सियासी दलों को वोट बैंक की दरकार

झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License