NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
राज्यसभा के लिए जस्टिस गोगोई का मनोनयन एक बड़े ख़तरे की आहट है!
न्यायपालिका को लेकर जो आशंकाएं जताई जाती हैं, जस्टिस रंजन गोगोई का राज्यसभा के लिए मनोनयन उस आशंका की प्रतिनिधि मिसाल है। मौजूदा हालात देखते हुए कहा नहीं जा सकता कि अभी ऐसी और कितनी ख़तरनाक मिसालें देखने को मिलेंगी।
अनिल जैन
18 Mar 2020
Ranjan Gogoi

भारतीय जनता पार्टी के दिवंगत नेता अरुण जेटली ने 30 सितंबर, 2012 को दिल्ली में वकीलों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए टिप्पणी की थी, ''हमारे देश में दो तरह के जज होते हैं- एक वे जो कानून जानते हैं और दूसरे वे जो कानून मंत्री को जानते हैं। दूसरी तरह के जज रिटायर नहीं होना चाहते, इसलिए रिटायर होने से पहले दिए गए उनके फैसले रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले काम से प्रभावित होते हैं।’’

जिस समय अरुण जेटली ने यह टिप्पणी की थी तब वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता हुआ करते थे और उसके एक दशक पहले देश के कानून मंत्री भी रह चुके थे। जेटली राजनेता होने के साथ ही एक जाने-माने वकील भी थे, लिहाजा वे जजों के काम करने के तौर तरीकों को भी बहुत अच्छी तरह जानते-समझते थे। इसलिए अगर उनकी उपरोक्त टिप्पणी की रोशनी में राज्यसभा के लिए जस्टिस रंजन गोगोई के मनोनयन को देखा जाए तो सब कुछ साफ हो जाता है। जस्टिस रंजन गोगोई ने देश के प्रधान न्यायाधीश के रूप में अपने 13 महीने के कार्यकाल के दौरान कई मामलों में सरकार के मनमाफिक फैसले दिए हैं। उनके इन फैसलों की न्यायिक निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे हैं और न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर देश के आम आदमी का भरोसा डिगा है। इसीलिए अब अगर राज्यसभा में उनके मनोनयन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, तो ऐसा होना स्वाभाविक ही है।

ऐसा नहीं है कि जस्टिस गोगोई पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें सरकार के मनमाफिक फैसले देने के बदले सेवानिवृत्ति के बाद पुरस्कृत किया गया है। इससे पहले भी ऐसे कई उदाहरण हैं। छह वर्ष पहले पूर्व प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम को भी मोदी सरकार ने केरल का राज्यपाल बनाया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि जस्टिस सदाशिवम को यह पद मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह को आपराधिक मामलों में बरी करने के बदले पुरस्कार स्वरूप मिला था। इससे पहले कांग्रेस के शासनकाल में भी सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को उपकृत करने के कई उदाहरण मौजूद हैं।

सरकार और न्यायपालिका के इसी नापाक गठजोड़ के चलते न्यायतंत्र पर मंडराते विश्वसनीयता के संकट ने ही करीब एक दशक पहले देश के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एस.एच. कापड़िया को यह कहने के लिए मजबूर कर दिया था कि जजों को आत्म-संयम बरतते हुए राजनेताओं, मंत्रियों और वकीलों के संपर्क में रहने और निचली अदालतों के प्रशासनिक कामकाज में दखलंदाजी से बचना चाहिए।

16 अप्रैल 2011 को एमसी सीतलवाड़ स्मृति व्याख्यान देते हुए न्यायमूर्ति कापड़िया ने कहा था कि जजों को सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति के लोभ से भी बचना चाहिए, क्योंकि नियुक्ति देने वाला बदले में उनसे अपने फायदे के लिए निश्चित ही कोई काम करवाना चाहेगा। उन्होंने जजों के समक्ष उनके रिश्तेदार वकीलों के पेश होने की प्रवृत्ति पर भी प्रहार किया था और कहा था कि इससे जनता में गलत संदेश जाता है और न्यायपालिका जैसे सत्यनिष्ठ संस्थान की छवि मलिन होती है।

जो बात जस्टिस कापड़िया ने कही थी, उसे खुद जस्टिस गोगोई भी महसूस करते रहे हैं। इसीलिए उन्होंने प्रधान न्यायाधीश बनने के कुछ दिनों बाद ही 27 मार्च, 2019 को अर्ध-न्यायिक ट्रिब्यूनलों से जुडें कानूनों से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान जजों की सेवानिवृत्ति के बाद होने वाली नियुक्तियों पर सवाल उठाए थे। जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की संविधान पीठ ने कहा था, ''एक दृष्टिकोण है कि सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक धब्बा है। आप इसे कैसे संभालेंगे?’’

अपनी ही इस तल्ख टिप्पणी को बिसरा कर सेवानिवृत्ति के महज तीन महीने बाद अब रंजन गोगोई राज्यसभा के सदस्य हो गए हैं। राष्ट्रपति ने उन्हें सरकार की सिफारिश पर संसद के उच्च सदन का सदस्य मनोनीत किया है। उनके इस मनोनयन पर राजनीतिक दलों के नेता ही नहीं बल्कि न्यायिक क्षेत्र से जुड़ी बड़ी हस्तियां भी सवाल उठा रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट में रंजन गोगोई के ही समकक्ष रहे सेवानिवृत्त जस्टिस मदन बी. लोकुर ने एक अंग्रेजी अखबार को दी अपनी प्रतिक्रिया में कहा है, ''कुछ समय से अटकलें लगाई जा रही थीं कि जस्टिस गोगोई को क्या पुरस्कार मिलेगा, इसलिए राज्यसभा के लिए उनका मनोनयन आश्चर्यजनक नहीं है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यह फैसला इतनी जल्दी आ गया। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और अखंडता को फिर से परिभाषित करता है। क्या लोकतंत्र का आखिरी पिलर भी ढह गया?’’

जस्टिस गोगोई के राज्यसभा में मनोनयन के संदर्भ में न्यायपालिका की इसी स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर सोशल मीडिया पर भी लोग सवाल और शंकाएं उठा रहे हैं। ऐसी ही शंकाएं तब भी उठी थीं जब करीब दो साल पहले 2 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने एक प्रेस कांफ्रेन्स के माध्यम से उस समय के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन चार जजों में जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस लोकुर भी शामिल थे। दो अन्य जज थे जस्टिस जे. चेलमेश्वर और जस्टिस कुरियन जोसेफ।

चारों जजों ने अप्रत्याशित और अभूतपूर्व कदम उठाते हुए कहा था कि प्रधान न्यायाधीश द्वारा महत्वपूर्ण मामलों का आबंटन सही तरीके से नहीं किया जा रहा है। उन्होंने देश के लोकतंत्र को खतरे में बताते हुए कहा था कि कुछ मामलों में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को कोई व्यक्ति बाहर से नियंत्रित कर रहा है। ऐसे मामलों में जज ब्रजगोपाल लोया की कथित संदिग्ध मौत की जांच का मामला भी शामिल था। चारों जजों का परोक्ष इशारा सरकार और प्रधान न्यायाधीश के रिश्तों की ओर था।

जस्टिस गोगोई का उस प्रेस कांफ्रेन्स में शामिल होने का फैसला चौंकाने वाला था, क्योंकि अगले प्रधान न्यायाधीश के लिए वरीयता क्रम में उन्हीं का नाम था। ऐसे में उनका तीन अन्य जजों के साथ मिलकर ऐसे सवाल उठाना लोगों को जोखिम भरा लगा था। इसी वजह से जब जस्टिस गोगोई से लोगों ने बडी उम्मीदें बांध ली थीं। कुछ समय बाद जब वे प्रधान न्यायाधीश बने तो लगा कि न्यायपालिका में काफी कुछ बदलने वाला है।

मीडिया से मुखातिब चारों जजों ने यद्यपि सरकार को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की थी, लेकिन सरकार और सत्तारुढ दल के प्रवक्ताओं ने उन चार जजों के बयान पर जिस आक्रामकता के साथ प्रतिक्रिया जताई थी और प्रधान न्यायाधीश का बचाव किया था, वह भी न्यायपालिका की पूरी कलंक-कथा को उजागर करने वाला था। उस समय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पीवी सावंत ने एक टीवी इंटरव्यू में चारों जजों के बयान को देशहित में बताते हुए कहा था कि देश की जनता यह समझ लेना चाहिए कि कोई भी न्यायाधीश भगवान नहीं होता। न्यायपालिका के रवैये पर कठोर टिप्पणी करते हुए उन्होंने दो टूक कहा था कि अदालतों में अब आमतौर पर फैसले होते हैं, यह जरूरी नहीं कि वहां न्याय हो।

ऐसा भी नहीं है कि सारे ही जज अपनी सेवानिवृत्ति के बाद सरकार से उपकृत होने के लिए तैयार बैठे रहते हों। कई उदाहरण हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीशों और न्यायाधीशों ने अपनी सेवानिवृत्ति की बाद अन्यत्र नियुक्ति की सरकार की पेशकश को ठुकराया है। इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रहे जस्टिस जगदीश शरण वर्मा और जस्टिस वीएन खरे को भी उनकी सेवानिवृत्ति के बाद तत्कालीन सरकारों की ओर से अन्यत्र नियुक्ति की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था। इसी तरह की पेशकश जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस कुरियन जोसेफ को भी की गई थी लेकिन दोनों ने ही यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि इससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर लोगों में गलत संदेश जाएगा।

राज्यसभा के लिए जस्टिस गोगोई के मनोनयन पर जस्टिस जोसेफ ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता से आम जनता का भरोसा हिल गया है। उन्होंने कहा, ''दो साल पहले जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस गोगोई, जस्टिस लोकुर और मैंने जिस खतरे से देश को आगाह किया था, वह ख़तरा अब और गहरा गया है।’’

जस्टिस जोसेफ एक साल पहले ही सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले ही एक इंटरव्यू में देश की न्यायपालिका की मौजूदा हालत को लेकर चेतावनी दे दी थी। उन्होंने कहा था कि मौजूदा स्थिति को देखते आने वाले समय में माहौल और खराब हो सकता है। आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट से सेवानिवृत्त होने वाले जज भविष्य में किसी नई नियुक्ति की प्रत्याशा में सरकार को अप्रिय लगने वाली बातें बोलने से बचते हैं, लेकिन न्यायमूर्ति जोसेफ ने जो बात कही थी, उससे जाहिर है कि ऐसी कोई प्रत्याशा उन्होंने नहीं पाल रखी थी।

उन्होंने जो आशंका जताई थी, वह उनकी सेवानिवृत्ति के बाद से लगातार सच साबित हो रही है। जस्टिस रंजन गोगोई का राज्यसभा के लिए मनोनयन उस आशंका की प्रतिनिधि मिसाल है। मौजूदा हालात देखते हुए कहा नहीं जा सकता कि ऐसी और कितनी ख़तरनाक मिसालें देखने को मिलेंगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

Justice Ranjan Gogoi
Rajya Sabha
BJP
Arun Jatley
Congress
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • BIRBHUMI
    रबीन्द्र नाथ सिन्हा
    टीएमसी नेताओं ने माना कि रामपुरहाट की घटना ने पार्टी को दाग़दार बना दिया है
    30 Mar 2022
    शायद पहली बार टीएमसी नेताओं ने निजी चर्चा में स्वीकार किया कि बोगटुई की घटना से पार्टी की छवि को झटका लगा है और नरसंहार पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री के लिए बेहद शर्मनाक साबित हो रहा है।
  • Bharat Bandh
    न्यूज़क्लिक टीम
    देशव्यापी हड़ताल: दिल्ली में भी देखने को मिला व्यापक असर
    29 Mar 2022
    केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के द्वारा आवाह्न पर किए गए दो दिवसीय आम हड़ताल के दूसरे दिन 29 मार्च को देश भर में जहां औद्दोगिक क्षेत्रों में मज़दूरों की हड़ताल हुई, वहीं दिल्ली के सरकारी कर्मचारी और…
  • IPTA
    रवि शंकर दुबे
    देशव्यापी हड़ताल को मिला कलाकारों का समर्थन, इप्टा ने दिखाया सरकारी 'मकड़जाल'
    29 Mar 2022
    किसानों और मज़दूरों के संगठनों ने पूरे देश में दो दिवसीय हड़ताल की। जिसका मुद्दा मंगलवार को राज्यसभा में गूंजा। वहीं हड़ताल के समर्थन में कई नाटक मंडलियों ने नुक्कड़ नाटक खेलकर जनता को जागरुक किया।
  • विजय विनीत
    सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी
    29 Mar 2022
    "मोदी सरकार एलआईसी का बंटाधार करने पर उतारू है। वह इस वित्तीय संस्था को पूंजीपतियों के हवाले करना चाहती है। कारपोरेट घरानों को मुनाफा पहुंचाने के लिए अब एलआईसी में आईपीओ लाया जा रहा है, ताकि आसानी से…
  • एम. के. भद्रकुमार
    अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई
    29 Mar 2022
    इज़रायली विदेश मंत्री याइर लापिड द्वारा दक्षिणी नेगेव के रेगिस्तान में आयोजित अरब राजनयिकों का शिखर सम्मेलन एक ऐतिहासिक परिघटना है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License