NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
नहीं पढ़ने का अधिकार
नफ़रत और कट्टरता से भरी बातों को पढ़ने से इनकार कर के कन्नूर विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस सिलेबस की समीक्षा करने और इसके ज़रिये शासन की विस्तारात्मक नीति का  विरोध कर अहम राजनीतिक कार्य को अंजाम दिया है।
सुचिंतन दास
25 Sep 2021
Kannur University
Image Courtesy: Deccan Chronicle

कन्नूर विश्वविद्यालय में एमए के ‘गवर्नेंस एंड पॉलिटिक्स’ सिलेबस के संशोधन को लेकर हाल ही में एक विवाद छिड़ गया है। यह कोर्स केरल के थालास्सेरी ज़िला स्थित सिर्फ़ ब्रेनन कॉलेज में ही पढ़ाया जाता है। ग़ौरतलब है कि केरल एकमात्र ऐसा भारतीय राज्य है, जहां वामपंथ का शासन है।

भारतीय राजनीतिक विचार पर वी.डी. सावरकर, एम.एस. गोलवलकर, बलराज मधोक और दीन दयाल उपाध्याय की लिखी हिंदुत्व से जुड़ी किताबों के सार को अनिवार्य रूप से शामिल करने के प्रस्ताव का कन्नूर विश्वविद्यालय के छात्रों ने विरोध किया है। विरोध करने वाले छात्र केरल स्टूडेंट्स यूनियन (KSU), मुस्लिम स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन और स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (SFI) सहित कई और छात्र संगठनों से जुड़े हैं।

कन्नूर के इन छात्रों ने विश्वविद्यालय पर कोर्स का भगवाकरण करने का आरोप लगाया है। हालांकि, कुलपति रवींद्रन गोपीनाथ ने इस आरोप को सिरे से ख़ारिज कर दिया था और मामले को एक विशेषज्ञ समिति को भेज दिया था। इस विशेष समिति में जे.प्रभाष (केरल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख), के.एस. पवित्रन (कालीकट विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के पूर्व प्रोफ़ेसर) और ए.साबू (कन्नूर विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर) थे। इस समिति ने इस कोर्स की समीक्षा करने के बाद रिपोर्ट सौंप दी है और इसमें कहा गया है कि हिंदुत्व से जुड़े इन किताबों को भारतीय राजनीतिक विचार खंड में अनुचित ही प्रमुखता दी गयी और आगे कहा गया कि पाठ्यक्रम को इतना तो संतुलित होना ही चाहिए कि इसमें 'भारतीय राजनीतिक विचार और विचारधारा का बहुलतावाद' ठीक से परिलक्षित हो।

इसे लेकर बहुत से जाने-माने उदार टिप्पणीकारों की ओर से ज़बरदस्त आलोचना की गयी है। इन्होंने आरोप लगाया है कि सम्बन्धित विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में हिंदुत्व से जुड़ी इन किताबों को शामिल नहीं किये जाने से असहिष्णुता की बू आती है। लगता है कि वे ऐसा कहते हुए एक अहम बिंदु पर ध्यान देने से चूक कर गये हैं। मुद्दा यह नहीं है कि सावरकर, गोलवलकर, उपाध्याय और मधोक की किताबों को पढ़ने से छात्रों को रोका जाना चाहिए या नहीं, यानी कि इन किताबों पर प्रतिबंध लगा देना और इन किताबों को जलाना फ़ासीवादी रणनीति है और सही मायने में इससे कोई मक़सद भी पूरा नहीं होता है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या उन्हें एक ऐसे कोर्स में गौरवपूर्ण जगह हासिल होनी चाहिए, जिसे उस निर्वाचित निरंकुशता के तहत संशोधित किया जा रहा है, जो ख़ुद को एक जातीय-फ़ासीवादी राज्य घोषित करने के कगार पर है। उनका मानना है कि भारतीय विश्वविद्यालय आज विचारों का एक ऐसा बाज़ार बना हुआ है, जहां सभी विचारों और मूल्यों को समान रूप से सामने रखने से ही सत्य की जीत होगी।

हालांकि, आज के भारत में कोर्स को तैयार करना शायद ही एक ऐसी सहज प्रक्रिया रह गयी हो, जिसके तहत सैकड़ों विचारधाराओं को संघर्ष करने दिया जाता हो। आदर्श रूप से उसे ऐसा होने देना चाहिए, लेकिन असल में ऐसा है नहीं।

कोर्स को तैयार करना सही मायने में किन चीज़ों को बाहर रखना है और किन चीज़ों को अंदर रखना है, इसी की एक सियासी क़वायद होती है। परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच निष्पक्ष निर्णायक के रूप में कोर्स को तैयार करने की यह उदार धारणा कहीं ज़्यादा मामसूम है। यह काम कभी भी और किसी भी लिहाज़ से संदर्भ से अलग नहीं होता और हमेशा सभी तरह की समस्याओं से भरा होता है। इसमें किसे या क्या शामिल किये जायें या किसे और क्या अलग रखे जायें और ऐसा कब किया जाये, ये सवाल उतने ही अहम हैं, जितना कि क्यों का सवाल है। इस तरह के सवाल कोर्स से परे पठन-पाठन को बिना किसी पर थोपे गये पठन-पाठन और सभी छात्रों का अधिकार बना देता है। इसका मतलब यह भी है कि छात्रों को यह अधिकार है कि अगर ये किताबें नफ़रत और कट्टरता को भड़काने में सक्षम हैं, तो उन्हें पाठ्यक्रम में उन पर थोपे गये इन पाठों को नहीं पढ़ने का भी अधिकार है।

दलील दी गयी है कि हमें उस तरह के 'समालोचनात्मक पठन' की ज़रूरत है, जो पाठकों को नफ़रत और कट्टरता से बचाये। यह सब बहुत अच्छा है, लेकिन दो मामलों में नाकाम रहता है। सबसे पहली बात तो यह है कि किसी पाठ को समालोचनात्मक रूप से पढ़ने के लिए किसी को इसे कोर्स के हिस्से के रूप में पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। असल में पाठ्यक्रम में निर्धारित पाठ को न पढ़ने का अधिकार की मांग उन लोगों की तरफ़ से ज़्यादा तत्परता से की जाती है, जो पहले से ही सम्बन्धित किताबों को गंभीरता के साथ पढ़ चुके होते हैं और जो व्यवहार में सम्बन्धित पाठ की राजनीति से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं। दूसरी बात कि यह तबका इस बात पर विचार करने से भी इंकार कर देता है कि किन राजनीतिक परिस्थितियों में कुछ पाठों को पाठ्यक्रम में रखा जा रहा है।

डर और संदेह, पाखंड और असहिष्णुता के इस माहौल में विश्वविद्यालय के कोर्स के हिस्से के रूप में इस तरह की चीज़ों को नहीं पढ़ना दरअस्ल कोर्स की समीक्षा करने और शासन के विस्तार को लेकर अहम राजनीतिक कार्य तो है। भारत में कोर्स में किन्हीं किताबों को शामिल करने को अक्सर राज्य की मौन स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाता है: राजनीतिक वैधता को लेकर यह लड़ाई हमेशा शिक्षा के मैदान पर ही लड़ी जाती है। पाठ्यक्रम तैयार करने का कोई वस्तुनिष्ठ तरीक़ा तो होता नहीं है, बस उसे संतुलित करने का एक तरीक़ा ज़रूर होता है,यानी कि प्रतिस्पर्धी नज़रियों के बीच ऊपर-नीचे होने वाला यह कोई खेल नहीं है, बल्कि यह संदर्भगत संवेदनशीलता का एक ऐसा खुला संवाद होता है, जो इन कोर्सों को पढ़ाने वालों और उनके छात्रों, दोनों को ही समृद्ध करता है, और जिनके नहीं पढ़ने का अधिकार उनके आलोचनात्मक रूप से पढ़ने के अधिकार से ही मिलता है।

पहले कन्नूर विश्वविद्यालय के एमए के “गवर्नेंस एंड पॉलिटिक्स” कोर्स में हिंदुत्व के विचारकों की किताबों का इतना ज़्यादा प्रतिनिधित्व नहीं था। उन्हें अब इस कोर्स में शामिल करने की कोशिश की जा रही है, जब हिंदुत्व के प्रयोग से देश में राजनीतिक माहौल को गहराई से ध्रुवीकरण किया जा रहा है।

दूसरे युद्ध के बाद जर्मन स्कूलों में मेन कैम्फ़ के साथ आलोचनात्मक रूप से आकर्षित होने वालों के साथ इन उदार टिप्पणीकार की समानता भी ठीक नहीं है, क्योंकि कन्नूर विश्वविद्यालय के कोर्स का यह संशोधन हिंदुत्व के बाद के भारत में तो बिल्कुल नहीं हो रहा है। हम अभी दंडात्मक सुलह के उस चरण में नहीं पहुंचे हैं। भारत में अभी नूर्नबर्ग सुनवाई (1945 और 1949 के बीच हुई सुनवाई की श्रृंखला, जिसमें मित्र राष्ट्रों ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान किये गये अपराधों के लिए जर्मन सैन्य नेताओं, राजनीतिक अधिकारियों, उद्योगपतियों और फ़ाइनेंसरों पर मुकदमें चलाये थे) की तरह कोई वाक़या नहीं हुआ है। बाबरी के अपराधी ही इस समय देश चला रहे हैं। यह तो 1930 के दशक में मेन कैम्फ़ को जर्मन छात्रों के लिए अनिवार्य रूप से पढ़ाये जाने के समान है और इसीलिए, उन्हें नहीं पढ़ने के अधिकार की मांग करते हुए कन्नूर के छात्र हिंदुत्व की भयानक राजनीतिक परियोजना का ही तो विरोध कर रहे हैं और उसे नकार भी रहे हैं।

ये टिप्पणीकार जिन बातों का ज़िक़्र नहीं कर पाते, वह यह है कि मेन कैम्फ़ के किसी भी नये संस्करण को आज जर्मनी में क़ानूनी रूप से प्रकाशित कराये जाने के लिए इसकी पार्श्व टिप्पणी करनी होगी,यानी कि उसका मायने समझाना होगा। अगर ऐसा नहीं हो पाता है,तो प्रकाशक को नस्लीय नफ़रत भड़काने के आरोपों का सामना करना होगा। इस समय भारत में हिंदुत्व से जुड़ी किताबों के साथ ऐसा कर पाना बिल्कुल अकल्पनीय है। ऐसे में दोनों के बीच किसी तरह की तुलना ठीक नहीं है। जर्मनी में मेन कैम्फ़ के एक समालोचनात्मक संस्करण के प्रकाशित होने से पहले वह संस्करण सात दशकों से ज़्यादा समय तक प्रिंट से बाहर था। लेकिन, निश्चित रूप से हिंदुत्व से जुड़ी किताबों के सिलसिले में यह सच नहीं है।

इसके अलावा, यह तर्क वास्तव में हास्यास्पद है कि मुसोलिनी या हिटलर को पढ़े बिना कोई फ़ासीवाद को नहीं समझ सकता, ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों में से किसी ने भी फ़ासीवाद का सिद्धांत नहीं दिया है। फ़ासीवाद कभी भी सिद्धांत-केंद्रित विचारधारा नहीं रहा है। इसका मूल सिद्धांत बौद्धिकता विरोधी रहा है और इसलिए यह अपने ख़ुद के भी बौद्धिक मूल को गंभीरता से नहीं लेता। 1930 के दशक में जर्मनों को पता था कि नाज़ीवाद है क्या और इसका मतलब मेन कैम्फ़ से नहीं, बल्कि नाज़ी शासन के अधीन रहने के उनके तजुर्बे से था। जैसा कि कहा जाता है कि ज्ञान से जुड़े दावे के लिए 'मूल ग्रंथों' को पढ़ना दरअस्ल जीवंत अनुभवों की तरह मान्य प्रस्थान बिंदु के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है। इसके अलावा यहां इस बात को फिर से कहना ज़रूरी है कि सवाल यह नहीं है कि क्या पढ़ा जा रहा है, बल्कि सवाल तो यह है  कि क्या तय किया जा रहा है, कौन तय कर रहा है, कहां और कब तय तिया जा रहा है, और ऐसे में किन चीज़ों को नहीं पढ़ा जाय, इसकी पड़ताल ज़रूरी हो जाती है।

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश इस देश में अपने विचारों को खुलकर रखने के चलते ही तो मारे गये हैं। विशिष्ट समुदायों और क्षेत्रों के लोगों की छवि को बहुत बुरा बताकर जनसंचार माध्यमों में दिखाया जाता है और वे लगातार भीड़ से बेरहमी से पीट-पीटकर मारे जाने के डर में जीते हैं। यह सब राजनीतिक रूप से हिंदुत्व के नज़रिये के अनुरूप ही तो हो रहा है।

हिंसा और भेदभाव का वास्तविक खामियाजा भुगतने वालों के लिए इन किताबों में वह सबकुछ निर्धारित हैं, जो इस बात को गंभीरता के साथ बताते हैं कि हमें कैसा होना चाहिए या हमारी राष्ट्रीयता किस आधार पर तय होनी हैं।यह कुछ-कुछ वैसा ही, जैसा कि किसी यहूदी, कम्युनिस्ट, या समलैंगिक को ऑशविट्ज़ (बंदी शिविर) ले जाते हुए गंभीरता के साथ मेन कैम्फ़ के साथ जुड़ने के लिए कहा जाता था। इस समय भारत में किसी को भी सावरकर और गोलवलकर को इसलिए पढ़ने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह महसूस किया जा सके कि उनका नफ़रत भरा नज़रिया उनके वजूद और भारतीय समाज, दोनों के लिए ख़तरा है। हो सकता है कि इनमें से कुछ उदारवादी टिप्पणीकार ऐसा करते हों, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि यह ख़तरा उनके लिए उतना स्पष्ट नहीं है, जितना कि आम लोगों और ख़ासकर अल्पसंख्यक समुदायों के लिए है।

इस समय विश्वविद्यालय के कोर्स में हिंदुत्व के इन विचारकों को शामिल नहीं करना असहिष्णुता तो बिल्कुल ही नहीं है। सच्चाई तो यह है कि ऐसा करना इस विश्वविद्यालय और इससे जुड़े उन लोगों की रक्षा करने जैसा है, जो ख़ास तौर पर हिंदुत्व की ज़बरदस्त ताक़त के राजनीतिक निशाने के तौर पर संकट में हैं। हिंदुत्व के इस नज़रिये के ख़िलाफ़ एक मज़बूत क़िला बनाने वाला यह एक ज़रूरी काम है। इसमें एक पक्ष को चुनना शामिल है। विरोध करने वाले छात्रों ने एक तरह से यही चुनाव तो किया है, जो कि हमारे उदार टिप्पणीकार नहीं कर पाये हैं।

भारत के बहुलवादी लोकाचार और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई साहित्य समारोहों (इस तरह के समारोह अहम और आनंददायक तो होते हैं, मगर राजनीतिक रूप से खोखले होते हैं) में नहीं लड़ी जायेगी, जहां वे सहिष्णुता पर लिखी किताबों का विमोचन करते हैं, बल्कि उन विश्वविद्यालयों में लड़ी जायेगी, जहां छात्र भारत को लेकर अपने उन विचारों की रक्षा करेंगे, जो आज हर तरफ़ से घिरे हुए हैं। कन्नूर विश्वविद्यालय के इन छात्रों ने हिंदुत्व के विचारकों को पढ़ने से इनकार करके एक रास्ता दिखा दिया है। सवाल तो बस इतना है कि हम उनके साथ खड़े हैं या नहीं?

सुचिंतन दास भारत के रोड्स स्कॉलर हैं। इस समय ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में ‘ग्लोबल एंड इंपेरियल हिस्ट्री’ की पढ़ाई कर रहे हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

The Right to Not Read

syllabus
Student Protests
SFI
Hindutva
Hindutva Texts
Fascism
Liberal Commentators
Savarkar
Kannur University

Related Stories

लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी

इफ़्तार को मुद्दा बनाने वाले बीएचयू को क्यों बनाना चाहते हैं सांप्रदायिकता की फैक्ट्री?

बैठक में नहीं पहुंचे अधिकारी, छात्र बोले- जेएनयू प्रशासन का रवैया पक्षपात भरा है

ऑस्ट्रेलिया-इंडिया इंस्टीट्यूट (AII) के 13 अध्येताओं ने मोदी सरकार पर हस्तक्षेप का इल्ज़ाम लगाते हुए इस्तीफा दिया

‘जेएनयू छात्रों पर हिंसा बर्दाश्त नहीं, पुलिस फ़ौरन कार्रवाई करे’ बोले DU, AUD के छात्र

JNU: मांस परोसने को लेकर बवाल, ABVP कठघरे में !

उत्तराखंड : हिमालयन इंस्टीट्यूट के सैकड़ों मेडिकल छात्रों का भविष्य संकट में

दिल्ली में गूंजा छात्रों का नारा— हिजाब हो या न हो, शिक्षा हमारा अधिकार है!

SFI ने किया चक्का जाम, अब होगी "सड़क पर कक्षा": एसएफआई

यूपी चुनाव : छात्र संगठनों का आरोप, कॉलेज यूनियन चुनाव में देरी के पीछे योगी सरकार का 'दबाव'


बाकी खबरें

  • Sitaram Yechury
    संदीप चक्रवर्ती
    स्वतंत्रता दिवस को कमज़ोर करने एवं हिंदू राष्ट्र को नए सिरे से आगे बढ़ाने की संघ परिवार की योजना को विफल करें: येचुरी 
    25 Feb 2022
    माकपा महासचिव ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार का “फोकस 5 अगस्त को देश की वास्तविक स्वतंत्रता की तारीख के रूप में बढ़ावा देने पर है।"  
  • russia ukrain
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूक्रेन पर रूस के हमले से जुड़ा अहम घटनाक्रम
    25 Feb 2022
    यूरोपीय संघ रूस पर और आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंध लगाने को सहमत। तो वहीं संयुक्त राष्ट्र ने यूक्रेन में मानवीय सहायता के लिए दो करोड़ डॉलर देने की घोषणा की।
  • ASHA Workers
    अनिल अंशुमन
    बिहार : आशा वर्कर्स 11 मार्च को विधानसभा के बाहर करेंगी प्रदर्शन
    25 Feb 2022
    आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिहार सरकार हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने में भी टाल मटोल कर रही है। कार्यकर्ताओं ने ‘भूखे रहकर अब और नहीं करेंगी बेगारी’ का ऐलान किया है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 13 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 302 मरीज़ों की मौत
    25 Feb 2022
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 94 हज़ार 345 हो गयी है।
  • up elections
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव : अयोध्या के प्रस्तावित  सौंदर्यीकरण में छोटे व्यापारियों की नहीं है कोई जगह
    25 Feb 2022
    अयोध्या के व्यापारियों ने आरोप लगाया है कि प्रस्तावित लेआउट के परिणामस्वरूप दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बड़े पैमाने पर ध्वस्त या उन दुकानों का ज़्यादातर हिस्सा तोड़ दिया जाएगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License