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राजनीति
नहीं पढ़ने का अधिकार
नफ़रत और कट्टरता से भरी बातों को पढ़ने से इनकार कर के कन्नूर विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस सिलेबस की समीक्षा करने और इसके ज़रिये शासन की विस्तारात्मक नीति का  विरोध कर अहम राजनीतिक कार्य को अंजाम दिया है।
सुचिंतन दास
25 Sep 2021
Kannur University
Image Courtesy: Deccan Chronicle

कन्नूर विश्वविद्यालय में एमए के ‘गवर्नेंस एंड पॉलिटिक्स’ सिलेबस के संशोधन को लेकर हाल ही में एक विवाद छिड़ गया है। यह कोर्स केरल के थालास्सेरी ज़िला स्थित सिर्फ़ ब्रेनन कॉलेज में ही पढ़ाया जाता है। ग़ौरतलब है कि केरल एकमात्र ऐसा भारतीय राज्य है, जहां वामपंथ का शासन है।

भारतीय राजनीतिक विचार पर वी.डी. सावरकर, एम.एस. गोलवलकर, बलराज मधोक और दीन दयाल उपाध्याय की लिखी हिंदुत्व से जुड़ी किताबों के सार को अनिवार्य रूप से शामिल करने के प्रस्ताव का कन्नूर विश्वविद्यालय के छात्रों ने विरोध किया है। विरोध करने वाले छात्र केरल स्टूडेंट्स यूनियन (KSU), मुस्लिम स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन और स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (SFI) सहित कई और छात्र संगठनों से जुड़े हैं।

कन्नूर के इन छात्रों ने विश्वविद्यालय पर कोर्स का भगवाकरण करने का आरोप लगाया है। हालांकि, कुलपति रवींद्रन गोपीनाथ ने इस आरोप को सिरे से ख़ारिज कर दिया था और मामले को एक विशेषज्ञ समिति को भेज दिया था। इस विशेष समिति में जे.प्रभाष (केरल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख), के.एस. पवित्रन (कालीकट विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के पूर्व प्रोफ़ेसर) और ए.साबू (कन्नूर विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर) थे। इस समिति ने इस कोर्स की समीक्षा करने के बाद रिपोर्ट सौंप दी है और इसमें कहा गया है कि हिंदुत्व से जुड़े इन किताबों को भारतीय राजनीतिक विचार खंड में अनुचित ही प्रमुखता दी गयी और आगे कहा गया कि पाठ्यक्रम को इतना तो संतुलित होना ही चाहिए कि इसमें 'भारतीय राजनीतिक विचार और विचारधारा का बहुलतावाद' ठीक से परिलक्षित हो।

इसे लेकर बहुत से जाने-माने उदार टिप्पणीकारों की ओर से ज़बरदस्त आलोचना की गयी है। इन्होंने आरोप लगाया है कि सम्बन्धित विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में हिंदुत्व से जुड़ी इन किताबों को शामिल नहीं किये जाने से असहिष्णुता की बू आती है। लगता है कि वे ऐसा कहते हुए एक अहम बिंदु पर ध्यान देने से चूक कर गये हैं। मुद्दा यह नहीं है कि सावरकर, गोलवलकर, उपाध्याय और मधोक की किताबों को पढ़ने से छात्रों को रोका जाना चाहिए या नहीं, यानी कि इन किताबों पर प्रतिबंध लगा देना और इन किताबों को जलाना फ़ासीवादी रणनीति है और सही मायने में इससे कोई मक़सद भी पूरा नहीं होता है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या उन्हें एक ऐसे कोर्स में गौरवपूर्ण जगह हासिल होनी चाहिए, जिसे उस निर्वाचित निरंकुशता के तहत संशोधित किया जा रहा है, जो ख़ुद को एक जातीय-फ़ासीवादी राज्य घोषित करने के कगार पर है। उनका मानना है कि भारतीय विश्वविद्यालय आज विचारों का एक ऐसा बाज़ार बना हुआ है, जहां सभी विचारों और मूल्यों को समान रूप से सामने रखने से ही सत्य की जीत होगी।

हालांकि, आज के भारत में कोर्स को तैयार करना शायद ही एक ऐसी सहज प्रक्रिया रह गयी हो, जिसके तहत सैकड़ों विचारधाराओं को संघर्ष करने दिया जाता हो। आदर्श रूप से उसे ऐसा होने देना चाहिए, लेकिन असल में ऐसा है नहीं।

कोर्स को तैयार करना सही मायने में किन चीज़ों को बाहर रखना है और किन चीज़ों को अंदर रखना है, इसी की एक सियासी क़वायद होती है। परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच निष्पक्ष निर्णायक के रूप में कोर्स को तैयार करने की यह उदार धारणा कहीं ज़्यादा मामसूम है। यह काम कभी भी और किसी भी लिहाज़ से संदर्भ से अलग नहीं होता और हमेशा सभी तरह की समस्याओं से भरा होता है। इसमें किसे या क्या शामिल किये जायें या किसे और क्या अलग रखे जायें और ऐसा कब किया जाये, ये सवाल उतने ही अहम हैं, जितना कि क्यों का सवाल है। इस तरह के सवाल कोर्स से परे पठन-पाठन को बिना किसी पर थोपे गये पठन-पाठन और सभी छात्रों का अधिकार बना देता है। इसका मतलब यह भी है कि छात्रों को यह अधिकार है कि अगर ये किताबें नफ़रत और कट्टरता को भड़काने में सक्षम हैं, तो उन्हें पाठ्यक्रम में उन पर थोपे गये इन पाठों को नहीं पढ़ने का भी अधिकार है।

दलील दी गयी है कि हमें उस तरह के 'समालोचनात्मक पठन' की ज़रूरत है, जो पाठकों को नफ़रत और कट्टरता से बचाये। यह सब बहुत अच्छा है, लेकिन दो मामलों में नाकाम रहता है। सबसे पहली बात तो यह है कि किसी पाठ को समालोचनात्मक रूप से पढ़ने के लिए किसी को इसे कोर्स के हिस्से के रूप में पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। असल में पाठ्यक्रम में निर्धारित पाठ को न पढ़ने का अधिकार की मांग उन लोगों की तरफ़ से ज़्यादा तत्परता से की जाती है, जो पहले से ही सम्बन्धित किताबों को गंभीरता के साथ पढ़ चुके होते हैं और जो व्यवहार में सम्बन्धित पाठ की राजनीति से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं। दूसरी बात कि यह तबका इस बात पर विचार करने से भी इंकार कर देता है कि किन राजनीतिक परिस्थितियों में कुछ पाठों को पाठ्यक्रम में रखा जा रहा है।

डर और संदेह, पाखंड और असहिष्णुता के इस माहौल में विश्वविद्यालय के कोर्स के हिस्से के रूप में इस तरह की चीज़ों को नहीं पढ़ना दरअस्ल कोर्स की समीक्षा करने और शासन के विस्तार को लेकर अहम राजनीतिक कार्य तो है। भारत में कोर्स में किन्हीं किताबों को शामिल करने को अक्सर राज्य की मौन स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाता है: राजनीतिक वैधता को लेकर यह लड़ाई हमेशा शिक्षा के मैदान पर ही लड़ी जाती है। पाठ्यक्रम तैयार करने का कोई वस्तुनिष्ठ तरीक़ा तो होता नहीं है, बस उसे संतुलित करने का एक तरीक़ा ज़रूर होता है,यानी कि प्रतिस्पर्धी नज़रियों के बीच ऊपर-नीचे होने वाला यह कोई खेल नहीं है, बल्कि यह संदर्भगत संवेदनशीलता का एक ऐसा खुला संवाद होता है, जो इन कोर्सों को पढ़ाने वालों और उनके छात्रों, दोनों को ही समृद्ध करता है, और जिनके नहीं पढ़ने का अधिकार उनके आलोचनात्मक रूप से पढ़ने के अधिकार से ही मिलता है।

पहले कन्नूर विश्वविद्यालय के एमए के “गवर्नेंस एंड पॉलिटिक्स” कोर्स में हिंदुत्व के विचारकों की किताबों का इतना ज़्यादा प्रतिनिधित्व नहीं था। उन्हें अब इस कोर्स में शामिल करने की कोशिश की जा रही है, जब हिंदुत्व के प्रयोग से देश में राजनीतिक माहौल को गहराई से ध्रुवीकरण किया जा रहा है।

दूसरे युद्ध के बाद जर्मन स्कूलों में मेन कैम्फ़ के साथ आलोचनात्मक रूप से आकर्षित होने वालों के साथ इन उदार टिप्पणीकार की समानता भी ठीक नहीं है, क्योंकि कन्नूर विश्वविद्यालय के कोर्स का यह संशोधन हिंदुत्व के बाद के भारत में तो बिल्कुल नहीं हो रहा है। हम अभी दंडात्मक सुलह के उस चरण में नहीं पहुंचे हैं। भारत में अभी नूर्नबर्ग सुनवाई (1945 और 1949 के बीच हुई सुनवाई की श्रृंखला, जिसमें मित्र राष्ट्रों ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान किये गये अपराधों के लिए जर्मन सैन्य नेताओं, राजनीतिक अधिकारियों, उद्योगपतियों और फ़ाइनेंसरों पर मुकदमें चलाये थे) की तरह कोई वाक़या नहीं हुआ है। बाबरी के अपराधी ही इस समय देश चला रहे हैं। यह तो 1930 के दशक में मेन कैम्फ़ को जर्मन छात्रों के लिए अनिवार्य रूप से पढ़ाये जाने के समान है और इसीलिए, उन्हें नहीं पढ़ने के अधिकार की मांग करते हुए कन्नूर के छात्र हिंदुत्व की भयानक राजनीतिक परियोजना का ही तो विरोध कर रहे हैं और उसे नकार भी रहे हैं।

ये टिप्पणीकार जिन बातों का ज़िक़्र नहीं कर पाते, वह यह है कि मेन कैम्फ़ के किसी भी नये संस्करण को आज जर्मनी में क़ानूनी रूप से प्रकाशित कराये जाने के लिए इसकी पार्श्व टिप्पणी करनी होगी,यानी कि उसका मायने समझाना होगा। अगर ऐसा नहीं हो पाता है,तो प्रकाशक को नस्लीय नफ़रत भड़काने के आरोपों का सामना करना होगा। इस समय भारत में हिंदुत्व से जुड़ी किताबों के साथ ऐसा कर पाना बिल्कुल अकल्पनीय है। ऐसे में दोनों के बीच किसी तरह की तुलना ठीक नहीं है। जर्मनी में मेन कैम्फ़ के एक समालोचनात्मक संस्करण के प्रकाशित होने से पहले वह संस्करण सात दशकों से ज़्यादा समय तक प्रिंट से बाहर था। लेकिन, निश्चित रूप से हिंदुत्व से जुड़ी किताबों के सिलसिले में यह सच नहीं है।

इसके अलावा, यह तर्क वास्तव में हास्यास्पद है कि मुसोलिनी या हिटलर को पढ़े बिना कोई फ़ासीवाद को नहीं समझ सकता, ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों में से किसी ने भी फ़ासीवाद का सिद्धांत नहीं दिया है। फ़ासीवाद कभी भी सिद्धांत-केंद्रित विचारधारा नहीं रहा है। इसका मूल सिद्धांत बौद्धिकता विरोधी रहा है और इसलिए यह अपने ख़ुद के भी बौद्धिक मूल को गंभीरता से नहीं लेता। 1930 के दशक में जर्मनों को पता था कि नाज़ीवाद है क्या और इसका मतलब मेन कैम्फ़ से नहीं, बल्कि नाज़ी शासन के अधीन रहने के उनके तजुर्बे से था। जैसा कि कहा जाता है कि ज्ञान से जुड़े दावे के लिए 'मूल ग्रंथों' को पढ़ना दरअस्ल जीवंत अनुभवों की तरह मान्य प्रस्थान बिंदु के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है। इसके अलावा यहां इस बात को फिर से कहना ज़रूरी है कि सवाल यह नहीं है कि क्या पढ़ा जा रहा है, बल्कि सवाल तो यह है  कि क्या तय किया जा रहा है, कौन तय कर रहा है, कहां और कब तय तिया जा रहा है, और ऐसे में किन चीज़ों को नहीं पढ़ा जाय, इसकी पड़ताल ज़रूरी हो जाती है।

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश इस देश में अपने विचारों को खुलकर रखने के चलते ही तो मारे गये हैं। विशिष्ट समुदायों और क्षेत्रों के लोगों की छवि को बहुत बुरा बताकर जनसंचार माध्यमों में दिखाया जाता है और वे लगातार भीड़ से बेरहमी से पीट-पीटकर मारे जाने के डर में जीते हैं। यह सब राजनीतिक रूप से हिंदुत्व के नज़रिये के अनुरूप ही तो हो रहा है।

हिंसा और भेदभाव का वास्तविक खामियाजा भुगतने वालों के लिए इन किताबों में वह सबकुछ निर्धारित हैं, जो इस बात को गंभीरता के साथ बताते हैं कि हमें कैसा होना चाहिए या हमारी राष्ट्रीयता किस आधार पर तय होनी हैं।यह कुछ-कुछ वैसा ही, जैसा कि किसी यहूदी, कम्युनिस्ट, या समलैंगिक को ऑशविट्ज़ (बंदी शिविर) ले जाते हुए गंभीरता के साथ मेन कैम्फ़ के साथ जुड़ने के लिए कहा जाता था। इस समय भारत में किसी को भी सावरकर और गोलवलकर को इसलिए पढ़ने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह महसूस किया जा सके कि उनका नफ़रत भरा नज़रिया उनके वजूद और भारतीय समाज, दोनों के लिए ख़तरा है। हो सकता है कि इनमें से कुछ उदारवादी टिप्पणीकार ऐसा करते हों, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि यह ख़तरा उनके लिए उतना स्पष्ट नहीं है, जितना कि आम लोगों और ख़ासकर अल्पसंख्यक समुदायों के लिए है।

इस समय विश्वविद्यालय के कोर्स में हिंदुत्व के इन विचारकों को शामिल नहीं करना असहिष्णुता तो बिल्कुल ही नहीं है। सच्चाई तो यह है कि ऐसा करना इस विश्वविद्यालय और इससे जुड़े उन लोगों की रक्षा करने जैसा है, जो ख़ास तौर पर हिंदुत्व की ज़बरदस्त ताक़त के राजनीतिक निशाने के तौर पर संकट में हैं। हिंदुत्व के इस नज़रिये के ख़िलाफ़ एक मज़बूत क़िला बनाने वाला यह एक ज़रूरी काम है। इसमें एक पक्ष को चुनना शामिल है। विरोध करने वाले छात्रों ने एक तरह से यही चुनाव तो किया है, जो कि हमारे उदार टिप्पणीकार नहीं कर पाये हैं।

भारत के बहुलवादी लोकाचार और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई साहित्य समारोहों (इस तरह के समारोह अहम और आनंददायक तो होते हैं, मगर राजनीतिक रूप से खोखले होते हैं) में नहीं लड़ी जायेगी, जहां वे सहिष्णुता पर लिखी किताबों का विमोचन करते हैं, बल्कि उन विश्वविद्यालयों में लड़ी जायेगी, जहां छात्र भारत को लेकर अपने उन विचारों की रक्षा करेंगे, जो आज हर तरफ़ से घिरे हुए हैं। कन्नूर विश्वविद्यालय के इन छात्रों ने हिंदुत्व के विचारकों को पढ़ने से इनकार करके एक रास्ता दिखा दिया है। सवाल तो बस इतना है कि हम उनके साथ खड़े हैं या नहीं?

सुचिंतन दास भारत के रोड्स स्कॉलर हैं। इस समय ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में ‘ग्लोबल एंड इंपेरियल हिस्ट्री’ की पढ़ाई कर रहे हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

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