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कानपुर : इंसाफ़ का इंतज़ार, लेकिन पुलिस की नज़र में पीड़ित ही मुजरिम हैं!
ग्राउंड रिपोर्ट : सीएए-एनआरसी के विरोध की कानपुर ने भी बड़ी कीमत चुकाई। 20 दिसंबर की हिंसा में किसी के बुढ़ापे की लाठी टूटी तो किसी की दुनिया उजड़ गई। यहां तीन लोगों ने जान गंवाई, लेकिन किसी के भी परिवार को आज तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक नहीं मिली।
मीरा जाटव, रिज़वाना तबस्सुम
07 Jan 2020
अपने घर के बाहर रईस के पिता

कानपुर : नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी को लेकर देश भर में लगातार विरोध हो रहे हैं। विरोध के बीच में कुछ जगह हिंसा भी हुई। ख़ासतौर से 19 और 20 दिसंबर को। इस दौरान उत्तर प्रदेश के लखनऊ, बिजनौर, मुजफ्फरनगर में तो कई लोगों की जान भी गई। इन्हीं में से एक है कानपुर। कानपुर 19 दिसंबर को बिलकुल शांत था। उसके अगले दिन शुक्रवार यानी 20 दिसंबर की दोपहर तक भी माहौल शांत था, लेकिन थोड़ी देर बाद ऐसी हिंसा भड़की कि इसे संभालना मुश्किल हो गया।

20 दिसंबर को कानपुर में हिंसक प्रदर्शन के दौरान कथित रूप से पुलिस की लाठी और गोली से कई लोग घायल हुए हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके बाबूपुरवा, बेगमपुरवा, और मुंशीपुरवा हैं। दरअसल, बाबूपुरवा स्थित ईदगाह की मस्जिद में ही बेगमपुरवा, अजीतनगर और मुंशीपुरवा के लोग भी शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने आते हैं। इस मस्जिद के पास ही ईदगाह भी है। बाबूपुरवा के ईदगाह मैदान में प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई थी। जिसमें चार मोटरसाइकिलों को आग के हवाले कर दिया गया था और दर्जनों वाहनों में तोड़फोड़ हुई थी। बाबूपुरवा में कथित रूप से पुलिस द्वारा की गई हिंसा के दौरान तीन लोगों की मौत हुई थी। इसके साथ ही 15 से अधिक लोग घायल हो गए थे।

उत्तर प्रदेश पुलिस की स्थिति तो ये है कि मरने के कई दिन के बाद परिवार वालों की लाश नहीं दी गई, लाश दी भी गई तो पुलिस ने शर्त रखी कि जल्द से जल्द जनाजे को दफना दिया जाय। रिश्तेदार को बताया भी नहीं जा सका। पुलिस ने मना कर दिया था। इतना ही नहीं कुछ जगह पर पुलिस खुद ही अंतिम संस्कार कर दी।

अब जब पंद्रह दिन से ज़्यादा इस घटना को हो चुके हैं, उसके बाद भी अभी तक मृतकों के परिवारजनों को पोस्टमार्टम की रिपोर्ट नहीं मिली है। इतनी ही नहीं, मृतकों के परिवारजनों का आरोप है कि अस्पताल में घायल से मिलने भी नहीं दिया गया, न ही ठीक से इलाज किया गया और न ही घायल का ध्यान रखा गया। घायल की मौत हो गई, घरवाले कहते रहे कि पुलिस की गोली लगने से मौत हुई है लेकिन ये बात पुलिस वाले लगातार मना करते रहे। घटना के इतने दिन बाद भी अभी तक कानपुर में सन्नाटा छाया हुआ है। कानपुर की दुकानें ठीक से नहीं खुल रही हैं, लोग आजीविका को लेकर चिंतित हैं। कारोबारियों का कारोबार बिलकुल ठप पड़ा हुआ है। यहाँ के लोगों में भय का माहौल है।

20 दिसंबर की हुई घटना के बाद एक तरफ जहां प्रदर्शन बंद है वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम जनता में खामोशी है, खामोशी की वजह पता करने पर मालूम चलता है कि, पुलिसिया हिंसा में मरने वाले लोग मुस्लिम हैं, सबसे ज्यादा दिक्कतें मुसलमानों को ही हो रही है। ज्यादातर घायल भी मुस्लिम हैं, पुलिस गिरफ़्तार भी मुस्लिमों को ही कर रही है। मुसलमानों में डर इस तरह से भर गया है कि वो रो-रोकर वक्त काट रहे हैं, लेकिन उनके ऊपर हुई ज्यादती के ख़िलाफ़ वो आवाज़ नहीं उठा पा रहे हैं। कानपुर के कुछ हिस्सों बेगमपुरवा, बाबूपुरवा, मुंशीपुरवा में आज भी सन्नाटा छाया हुआ है, लोगों की आंखों में डर साफ नज़र आ रहा है, लोग बोलने से डर रहे हैं और ख़ामोश रहना पसंद कर रहे हैं।

किसी के बुढ़ापे की लाठी टूटी तो किसी की दुनिया उजड़ी

"जुमे का दिन था, मेरा बच्चा नमाज़ पढ़कर आया और कहा, 'अम्मी रोटी पका दो।' हम उससे कहे बेटा! 'नमाज़ पढ़कर फिर पका देते हैं, जाओ तब तक जहां काम किए हो वहाँ से पैसे लेते आओ।' बस वो पैसे लेने गया, थोड़ी देर में वहाँ लड़ाई होने लगी, बस उसी में पुलिस वालों ने उसे गोली मार दी। क्योंकि जब अस्पताल पहुंचा तो वो जिंदा था, हम अपने बच्चे से पूछे, बेटा! किसने मारा? उसने कहा- पुलिस वाले ने।"

अपनी आँखों की आँसू पोछते हुए नजमा बानो कहती हैं कि, 'अस्पताल की तरफ से कुछ भी मदद नहीं की गई ना तो प्रशासन की तरफ से की गई। मेरा बेटा 23 साल का था और पीओपी का काम करता था, वो कोई दंगा करने वाला नहीं था।

पुलिसिया दमन को लेकर नज़मा कहती हैं कि, 'बस सामने आ जाओ, मारो या मर जाओ।' नज़मा रोते हुए कहती हैं कि जहां बच्चे नहीं हैं वहाँ माँ जीकर क्या करेगी। नज़मा के सात बच्चे हैं। अफताब आलम परिवार का खर्च चलाते थे, उनके पिता का छह साल पहले ही देहांत हो चुका है।

नज़मा कहती हैं कि, हमारे सामने करीब 14 ऐसे बच्चे अस्पताल में आए थे जिन्हें गोली लगी थी, किसी को सिर में गोली लगी थी किसी को पैर में लगी थी, मेरे बेटे आफ़ताब आलम को सीने में बाईं तरफ गोली लगी थी।

नज़मा बानों, आफताब की माँ.jpg

"मेरा नाम मोहम्मद शरीफ है। मेरे बच्चे का नाम मोहम्मद रईस है। हमारा बच्चा पापड़ बेचता, हमारा बच्चा झूठे बर्तन धोता था शादी-ब्याह में। यही काम करता था इसी से हमारा गुजारा होता था, मेरे दो बच्चे और हैं उनसे कोई मतलब नहीं है, यही बच्चा हमारे साथ में रहता था। यही बच्चा हमको कमा की खिलाता था", इतना कहते ही मोहम्मद शरीफ अपनी आँखों से बह रहे आँसू को बड़े मुश्किल से संभालते हुए कहते हैं, इसके अलावा हमारा कोई सहारा नहीं है। मकान की तरफ देखते हुए हैं, 'मकान हमारा किराये का है।'

मोहम्मद शरीफ, रईस के पिता.jpg

"हम गरीब आदमी, बीमार आदमी, किस तरह से गुजारा करेंगे? क्या करेंगे हम? मेरे ऊपर जो बीत रही है वो हम कैसे बताएं? सरकार की तरफ से भी हमें कोई मदद नहीं मिली है।" शरीफ कहते हैं कि, 'मेरा बच्चा बर्तन धुल रहा था, तभी भगदड़ हुई, लोग भागने लगे, मेरे बच्चे से भी जाने के लिए कहे, जब तक मेरा बच्चा वहाँ से भाग पाता, पुलिस वालों ने मेरे बेटे को गोली मार दी।

कानपुर में हुई हिंसा में एक अन्य मृतक सैफ़ की माँ कमरजहाँ का रो-रो कर बुरा हाल है, वह चिल्ला चिल्ला कर कह रही हैं कि इस सरकार को हटाना है यह सरकार हम लोगों के साथ बहुत अत्याचार कर रही है। हमें देश से निकलने में लगी है, हमने क्या बिगाड़ा हैं? जिस तरह से मेरे बेटे को गोली मारी है पुलिस वालों ने। उसी तरह से उनके ऊपर भी कारवाई होनी चाहिए। रोते हुए कमरजहां कह रही हैं कि, मेरी गोद सूनी की है तो उनका भी भला नहीं होगा। मेरा बेटा सैफ़ तो अपने भाई को खाना देने जा रहा था हमें क्या मालूम की वह कभी वापस नहीं आयेगा, नहीं तो हम जाने ही नहीं देते। सरकार से सवाल करते हुए कमरजहां कहती हैं कि क्या सरकार मेरा बेटा लौटा सकती हैं? मौत के बाद कोई यह भी देखने नहीं आया की हम कैसे जी रहे हैं?

अस्पताल में ठीक से नहीं हुआ इलाज

हिंसा में मारे गए रईस के पड़ोसी मोहम्मद परवेज़ बताते हैं कि, 'जुमे का दिन था, हम सब लोग जुमा पढ़कर आकर बैठे थे, तब तक मालूम चला कि रईस को गोली लग गई है, हम सब लोग उसे अस्पताल लेकर गए, अस्पताल में उसे भर्ती तो कर लिया लेकिन उसकी देखभाल नहीं की। ऑपरेशन होगा ऑपरेशन होगा... कहते रहे लेकिन ऑपरेशन नहीं हुआ। दो दिन तक ऐसे ही रखे रहे, और वो खत्म हो गया। रईस को हम लोगों को देखने नहीं दिया गया, जब हम देखने के लिए जाते तो बाहर निकाल देता। उसके माँ-बाप कितनी बार गए लेकिन नहीं देखने दिया।

रईस की बहन नफीसा बताती हैं कि, 'अपने भाई को लेकर अस्पताल में थी तो पर मुझे मिलने नहीं दिया गया जब वह मर गया तभी बताया की लाश पोस्मार्टम के लिए भेज दिया है चीर घर वहां से लाश ले सकते हो मेरे भाई को मरे 15 दिन हो रहे हैं पर अभी तक पोस्मार्टम की रिपोर्ट नहीं दी है जिसके आधार पर हम कुछ काम करवा सकें। आज तक सरकार की तरफ से हमारे यहाँ कोई हाल भी पूछने नहीं आया हैं मेरे बूढ़े माँ बाप का अब कोई सहारा नहीं है |

रईस की माँ कहती हैं कि मेरा बेटा काम पर गया था, वहाँ पर भगदड़ हुई, मेरा बेटा भी भागने लगा, इतने में पुलिस वाले ने गोली चला दी, मेरे बेटे को लग गई वहीं पर वो गिर गया, कुछ लोग उसको अस्पताल लेकर गए, अस्पताल में उसका ठीक से इलाज नहीं हुआ और मेरा बेटा खत्म हो गया। पुलिस वाले मुझे बताए भी नहीं और मेरे बेटे की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए, हम पुलिस वाले से पूछे भी कि, एक बारे मुझे मेरे बेटे को दिखा तो देते, इतना कहते ही वो फफक कर रोने लगती हैं।

इस्मदून निशा, रईस की माँ.jpg

एक अन्य मृतक की माँ कहती हैं कि मेरा बेटा तड़प रहा था लेकिन उसका इलाज ठीक से नहीं किया गया। सिर्फ मेरे बेटे की ही नहीं, वहाँ पर जितने भी लोग आ रहे थे उन लोगों का ठीक से इलाज नहीं किया जा रहा था।

पुलिस की बर्बरता!, महिलाओं को बाल पकड़कर घसीटा

बेगमपुरवा की कुछ महिलाओं का कहना था कि पुलिसवालों ने औरतों को और बच्चों को भी बहुत मारा-पीटा और घरों के दरवाज़े तक तोड़ दिए। महिला कहती है कि पुलिस वाले ने महिलाओं को बाल पकड़कर घसीटे, छोटे-छोटे बच्चों को भी खूब मारा है। इस तरह से अत्याचार किया गया है। ये सब अत्याचार नहीं तो क्या है। घर में घुसकर औरतों को गाली देना, उन्हें मारना ये सब क्या है। ये सरकार मुस्लिमों के पीछे पड़ गई है। ये सरकार अब नहीं रहनी चाहिए।

यहाँ की महिला इस्मदून निशा कहती हैं कि पुलिस वाले सीढ़ी लगाकर लोगों के घर में घुस गए, कुछ घरों का दरवाजा भी तोड़ दिए। औरतों को मारे, बच्चों की पिटाई की।इस्मदून निशा बताती हैं कि, लोगों को गुंडा बोलकर पुलिस ने खूब पिटाई की। आगे बताते हुए कहती हैं कि, 'आज भी पुलिस वाले मुस्लिम क्षेत्र में पहरा दे रहे हैं ताकि हम दहशत में रहें, बाहर न निकल सकें, अपनी बात न कह सकें।

इस क्षेत्र की एक महिला कहने लगीं, "बेगमपुरवा की तमाम महिलाएं पीछे मस्जिद में जाकर रुकी हुई हैं क्योंकि उनके भीतर शनिवार रात को हुई घटना का ख़ौफ़ है। पुलिस वाले बिना समझे-बूझे पीट रहे थे औरतों को जबकि उनके साथ कोई महिला पुलिसकर्मी भी नहीं थी। जान और इज़्ज़त बचाने के लिए औरतें घरों को छोड़कर मस्जिद में चली गई हैं।"

इसी क्षेत्र के अर्जुन पाण्डेय बताते हैं कि, ' पुलिस का रवैया खराब था जबरन जुलुस के साथ मार पिटाई की है और बेकसूर लोगों को जेल में डाला दिया है। 15 लोगों को पकड़ा गया था फिर एक हफ्ते बाद छोड़ दिया है पर चार लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा लिख जेल भेज दिया है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अर्जुन कहते हैं कि, 'मुस्लिमों का कहना था की अगर यह नागरिकता बिल लागू हो जायेगा तो हम कहाँ से अपना रिकॉर्ड आदि दिखाएंगे? इस बात को लेकर सब परेशान हैं पर पुलिस प्रशासन और शासन आज तक मरने वालों के परिवार से मिलने तक नही गए हैं।

ठीक से इलाज न किए जाने के बारे में जब अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर से बात करने की कोशिश की गई तो बात करने से मना कर दिया गया।
इसके बारे में जब पुलिस से बात की गई तो पुलिस की कार्रवाई मृतकों और घायलों के ही ख़िलाफ़ होती दिखी।

पुलिस उप महानिरीक्षक( डीआईजी ) अनंत देव तिवारी ने घायलों और मृतकों को ही दोषी बता दिया। उन्होंने कहा कि, 'जिस वक्त इलाके में हिंसा फैला थी ये सभी लोग (घायल और मृतक) मौके पर मौजूद थे। हिंसा के दौरान इनके घायल होने से यह साफ है कि वह उसमें शामिल थे। आरोपी बनाने के लिए यह साक्ष्य काफी है। इसलिए अन्य उपद्रवियों के साथ इनपर भी केस दर्ज किया गया है। इनमें से तीन लोगों की मौत हो गई थी।' डीआईजी यही नहीं रुकते हैं। आगे वे बताते हैं कि क्रॉस फायरिंग में तीन लोगों की मौत हो गई थी, इसलिए कुछ लोगों पर उनकी हत्या का मुकदमा भी चलेगा। इस पूरे मामले की जांच एसआईटी कर रही है। बाकी एसआईटी की जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उस आधार पर कार्रवाई की जाएगी।

आपको बता दें कि बाबूपुरवा में हुई हिंसा में गोली लगने से घायल दस प्रदर्शनकारियों को एसआईटी ने नामज़द आरोपी बनाया है। एसआईटी ने जांच के दौरान इन सभी के नाम केस डायरी में दर्ज कर लिए हैं। इनमें मृतक मोहम्मद सैफ़ (23), आफ़ताब आलम (22) और रईस खान(30) का नाम भी शामिल है।

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