NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कर्नाटक: वंचित समुदाय के लोगों ने मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों, सूदखोरी और बच्चों के अनिश्चित भविष्य पर अपने बयान दर्ज कराये
झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे कई बच्चों ने महामारी की वजह से अपने दो साल गँवा दिए हैं और वे आज भी स्कूल में पढ़ पाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। 
निखिल करिअप्पा
24 Mar 2022
Karnataka
एक सभा को संबोधित करतीं कविता और गायत्री 

बेंगलुरु में रहने वाली राजेश्वरी ने रोते हुए बताया कि उनकी बेटी के स्कूल वाले उनके बच्चे का स्थानांतरण प्रमाणपत्र जारी करने से इंकार कर रहे हैं। वे शहर में एक दिहाड़ी मजदूर के बतौर काम करती हैं और लॉकडाउन के दौरान उन्होंने अपनी आजीविका का स्रोत खो दिया था। इसके परिणामस्वरूप, वे अपनी बच्ची की फीस नहीं चुका पाई, जो अब 50,000 रूपये से अधिक हो चुकी है। उनकी 14 साल की बेटी, अक्षया इन दो वर्षों के दौरान स्कूल नहीं जा पाई और इसकी वजह से उसे अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ रहा है। 

22 मार्च को एक्शन ऐड एवं झुग्गी-झोपड़ी महिला संगठन के द्वारा बेंगुलुरु में एक जन सुनवाई का आयोजन किया गया था, जिसमें सरकारी अधिकारियों को उन विभिन्न बच्चों की दुर्दशा के बारे में अवगत कराया गया था, जिन्हें कोविड-19 महामारी की वजह से अपने दो साल की पढ़ाई को गंवा दिया है। एकल माताओं और अनाथ बच्चों ने भी राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के समक्ष अपने बयान दर्ज कराये। कर्नाटक के कम से कम चार जिलों के लोग अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए उपस्थित हुए थे। उपस्थित लोगों में से अधिकांश लोग दलित और मुस्लिम थे।  

सुनवाई के दौरान एक संबंधित अभिभावक बोलते हुए 

महामारी के दौरान मानसिक विकार से पीड़ित होने की विभिन्न रिपोर्टों की सूचना प्राप्त हुई थी। स्कूल न जा पाने के कारण कई बच्चे भी इससे बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। महामारी से पहले कविता और उनके पति मैसूर में गारमेंट सेक्टर में काम कर रहे थे। लॉकडाउन के दौरान उन दोनों को अपनी आजीविका के स्रोत से हाथ धोना पड़ा था और उन्हें अपने बेटे, शरत को स्कूल से बाहर निकालने के लिए मजबूर होना पड़ा था। कायदे से उसे आज सातवीं कक्षा में होना चाहिए था, लेकिन वह अभी भी चौथी कक्षा में है क्योंकि पिछले दो साल से भी अधिक समय से वह स्कूल से बाहर है। वे कहती हैं कि घर पर रहने से उसके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा, “मेरे तीन बच्चे हैं, और मैं यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि मेरे बेटे को अंग्रेजी-माध्यम में शिक्षा मिल जाये। लेकिन लॉकडाउन के बाद, हमारी रोजी-रोटी छिन गई और हमारे पास उसकी फीस चुका पाने की हमारी सामर्थ्य नहीं रह गई थी। मेरे बेटे को परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया क्योंकि स्कूल ने हमसे पहले सारे बकाये को चुकता करने की शर्त रखी थी। चूँकि हम उस समय पैसे की व्यवस्था नहीं कर पाए, इसलिए स्कूल ने हमें उसका स्थानांतरण प्रमाणपत्र भी देने से इंकार कर दिया। कभी-कभी घर पर वह मानसिक रोगी के तौर पर व्यवहार करने लगता है। इसलिए मैंने उकसे लिए ट्यूशन का इंतजाम करा दिया, लेकिन वहां पर वह कुछ भी सीख नहीं पा रहा है।”

कुछ महिलाओं ने खुद के लुटेरी कर्ज के चंगुल में फंसे होने के बारे में गवाही दी। 

बेंगलुरु की गायत्री कहती हैं कि उन्होंने घर के खर्चों को चुकता करने के लिए 30,000 रूपये के दो ऋण 120% के सालाना ब्याज की दर पर लिए। 

उन्होंने बताया, “चूँकि हमारे पास फोन नहीं था, ऐसे में मेरे तीनों बच्चों में से एक भी लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल नहीं हो सका। हालाँकि, जब कक्षाएं दुबारा से शुरू हुईं तो स्कूल ने पिछले दो शैक्षणिक वर्षों के लिए भी फीस को चुकता करने की मांग की। चूँकि हम इतनी बड़ी राशि का भुगतान कर पाने में असमर्थ थे, तो उन्होंने मेरी बेटी को परीक्षा में शामिल होने की इजाजत नहीं दी। उसने मुझे स्कूल से बताया कि सिर्फ उसे ही परीक्षा में शामिल होने से रोका जा रहा है, और अन्य बच्चे उस पर हंस रहे हैं। जब हमने स्कूल से टीसी की मांग की, तो उन्होंने वह भी देने से साफ़ इंकार कर दिया और कहा कि जब तक हम सारी बकाया राशि चुका नहीं देते, वे टीसी जारी नहीं करेंगे।”

अब जबकि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में स्थानांतरित करने के लिए तैयार हैं, तो उनके बच्चे इससे खुश नहीं हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कन्नड़ माध्यम से पढ़ाई करने में उन्हें जूझना पड़ेगा। गायत्री और उनके बच्चे तमिल भाषी हैं और कन्नड़ में उनका हाथ उतना साफ़ नहीं है। सरकार से उनकी दरख्वास्त है कि और अधिक अंग्रेजी माध्यम के सरकारी स्कूलों को स्थापित करे। 

अस्मा बानो का बेटा सैय्यद फैज़ान 13 साल का है और उसे सीखने की अक्षमता के बीच से गुजरना पड़ रहा है। वह बेंगलुरु के एक अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल से पढ़ाई कर रहा था, लेकिन उसे इसे छोड़ने के मजबूर होना पड़ा।

अस्मा ने बताया, “मेरे पति एक दिहाड़ी मजदूर हैं और रोजाना तकरीबन 400-500 रूपये की कमाई कर लेते हैं। लॉकडाउन के दौरान हमने अपनी सारी जमापूंजी खत्म कर दी थी, और जिंदा रहने के लिए हमारे पास जो कुछ भी था उसे बेचने के लिए हमें मजबूर होना पड़ा। मेरा बेटा प्रतिक्रिया देने में थोड़ा धीमा है और उसे थायराइड की भी समस्या है। वह हमसे खुद को स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए पूछता रहता है, लेकिन हम उसकी फीस चुका पाने में असमर्थ हैं।”

बेलागवी और बगलकोट से आये दलित युवकों ने भी सुनवाई के दौरान अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने अपनी गवाही में बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में खराब बस कनेक्टिविटी और शौचालयों के अभाव के कारण बच्चे स्कूल जा पाने में असमर्थ हैं। 

राज्य प्रशासन की ओर से इसमें तीन प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। उनमें से एक प्राथमिक शिक्षा विभाग के निदेशक, नरसिमैया थे। उन्होंने बताया कि निजी स्कूलों को इस विषय में एक सर्कुलर जारी किया गया था, जिसमें उन्हें सूचित किया गया था कि वे बच्चों का स्थानांतरण प्रमाणपत्र देने से इंकार नहीं कर सकते हैं, भले ही उनकी फीस बकाया ही क्यों न हो। उन्होंने उन परिवारों से अनुरोध किया कि वे उनके विभाग से संपर्क करें और उन्होंने इस बारे में आश्वस्त किया कि उनके लिए स्थानांतरण प्रमाणपत्र को जारी करने की व्यवस्था की जाएगी।

समाज कल्याण विभाग के संयुक्त निदेशक, डॉ. देवराज ने परिवारों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को एससी/एसटी के बच्चों के लिए स्थापित किये गए आवासीय विद्यालयों में नामांकित करायें। 

उन्होंने कहा, “ज्यादातर आईएएस एवं केएएस अधिकारी सरकारी स्कूलों से ही पढ़कर आते हैं। इसलिए कृपया अपने बच्चों को वहां पर दाखिले में संकोच न करें। इन स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से भी शिक्षा प्रदान की जाती है।”

कर्नाटक अल्पसंख्यक विकास निगम की महाप्रबंधक, डॉ. अंजुम नफीस ने सरकारी योजनाओं से लाभ न उठाने के लिए अभिभावकों को इसका दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय का प्रबंध है और बिना आय वाले माता-पिताओं के लिए स्वरोजगार की योजनायें उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि अभिभावकों को अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की वेबसाइट पर जाना चाहिए और इन योजनाओं के बारे में जानकारी हासिल करनी चाहिए। इस बिंदु पर, कुछ अभिभावकों ने बताया कि वे अशिक्षित हैं और इस जानकारी तक उनकी पहुँच नहीं है। इस पर डॉ. नफीस ने विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में और अधिक जानकारी एकत्र करने के लिए अभिभावकों को एक टोल-फ्री नंबर उपलब्ध कराया।  

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Karnataka: Marginalised Communities Testify About Mental Health Issues, Usury, and an Uncertain Future for Children

education
COVID-19
Marginalised Communities
karnataka
Bangalore
Karnataka state government
education Department
Dalit families
COVID lockdowns

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

कर्नाटक पाठ्यपुस्तक संशोधन और कुवेम्पु के अपमान के विरोध में लेखकों का इस्तीफ़ा

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस

बच्चे नहीं, शिक्षकों का मूल्यांकन करें तो पता चलेगा शिक्षा का स्तर

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

कर्नाटक: स्कूली किताबों में जोड़ा गया हेडगेवार का भाषण, भाजपा पर लगा शिक्षा के भगवाकरण का आरोप

शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का ज़रूरी मोर्चा

नई शिक्षा नीति बनाने वालों को शिक्षा की समझ नहीं - अनिता रामपाल

कोरोना लॉकडाउन के दो वर्ष, बिहार के प्रवासी मज़दूरों के बच्चे और उम्मीदों के स्कूल

बिहारः प्राइवेट स्कूलों और प्राइवेट आईटीआई में शिक्षा महंगी, अभिभावकों को ख़र्च करने होंगे ज़्यादा पैसे


बाकी खबरें

  • लाल बहादुर सिंह
    सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 
    26 Mar 2022
    कारपोरेटपरस्त कृषि-सुधार की जारी सरकारी मुहिम का आईना है उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित कमेटी की रिपोर्ट। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने तो सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन इसके सदस्य घनवट ने स्वयं ही रिपोर्ट को…
  • भरत डोगरा
    जब तक भारत समावेशी रास्ता नहीं अपनाएगा तब तक आर्थिक रिकवरी एक मिथक बनी रहेगी
    26 Mar 2022
    यदि सरकार गरीब समर्थक आर्थिक एजेंड़े को लागू करने में विफल रहती है, तो विपक्ष को गरीब समर्थक एजेंडे के प्रस्ताव को तैयार करने में एकजुट हो जाना चाहिए। क्योंकि असमानता भारत की अर्थव्यवस्था की तरक्की…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,660 नए मामले, संशोधित आंकड़ों के अनुसार 4,100 मरीज़ों की मौत
    26 Mar 2022
    बीते दिन कोरोना से 4,100 मरीज़ों की मौत के मामले सामने आए हैं | जिनमें से महाराष्ट्र में 4,005 मरीज़ों की मौत के संशोधित आंकड़ों को जोड़ा गया है, और केरल में 79 मरीज़ों की मौत के संशोधित आंकड़ों को जोड़ा…
  • अफ़ज़ल इमाम
    सामाजिक न्याय का नारा तैयार करेगा नया विकल्प !
    26 Mar 2022
    सामाजिक न्याय के मुद्दे को नए सिरे से और पूरी शिद्दत के साथ राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने के लिए विपक्षी पार्टियों के भीतर चिंतन भी शुरू हो गया है।
  • सबरंग इंडिया
    कश्मीर फाइल्स हेट प्रोजेक्ट: लोगों को कट्टरपंथी बनाने वाला शो?
    26 Mar 2022
    फिल्म द कश्मीर फाइल्स की स्क्रीनिंग से पहले और बाद में मुस्लिम विरोधी नफरत पूरे देश में स्पष्ट रूप से प्रकट हुई है और उनके बहिष्कार, हेट स्पीच, नारे के रूप में सबसे अधिक दिखाई देती है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License