NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
'कश्मीर में नागरिकों की हत्याओं का मक़सद भारत की सामान्य स्थिति की धारणा को धूमिल करना है'—मिलिट्री थिंक-टैंक के निदेशक
मौजूदा हालात सीपीओ (केंद्रीय पुलिस संगठन) बलों के लिए और ज़्यादा समस्यायें पैदा करने वाले इसलिए हैं क्योंकि अब सेना को उन इलाक़ों में तैनात नहीं किया जाता है, जिन इलाक़ों में इमारतें हैं या घनी आबादी है।
जसविंदर सिद्धू
20 Oct 2021
J&K

सिख लाइट इन्फ़ैंट्री ने मेजर जनरल बीके शर्मा (सेवानिवृत्त) एवीएसएम, एसएम की अगुवाई में जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद से लड़ाई लड़ी है। शर्मा इस समय भारत के सबसे पुराने मिलिट्री थिंक टैंक, यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंडिया (USI) के निदेशक हैं। जसविंदर सिद्धू ने घाटी में ग़ैर-कश्मीरियों की हुई हालिया हत्याओं पर उनके साथ बातचीत की है। मेजर जनरल शर्मा कश्मीर की मौजूदा स्थिति को लेकर बहुत साफ़ और यहां तक कि बेलाग जवाब देते हैं। उनके मुताबिक़, इन हमलों ने डर और एक ऐसी राजनीतिक समस्या पैदा कर दी है, जिसे सरकार को हल करना चाहिए, क्योंकि जम्मू और कश्मीर राज्यपाल शासन के अधीन है। उनका कहना है कि ये हमले "भारत सरकार की शांति और सामान्य स्थिति के बहाल होने की धारणा को ख़त्म करने" की कोशिश हैं। उनका यह भी कहना है कि कश्मीर की स्थिति चिंताजनक भी नहीं है।

क्या आपको कश्मीर में हाल ही में हुई नागरिकों की हत्याओं में कोई संदेश नज़र आता है ?

बिल्कुल नज़र आता है। इसमें भारत की सरकार के लिए एक संदेश है। संदेश एकदम साफ़ है कि ख़्वाबों में मत जियो और यह मत सोचो कि कश्मीर स्थिर हो गया है। बहुत सारी चीज़ें हो रही हैं। संदेश यह भी है कि हम (आतंकवादियो) में जब चाहें, आम लोगों को निशाने बनाकर प्रहार करने की क्षमता रखते है, और इसीलिए, कश्मीरी पंडितों को घाटी में लाने और दुनिया को यह बताने की व्यापक योजना कि (अनुच्छेद के निरस्त किये जाने) के बाद कश्मीर में स्थिरता वापस आ गयी है। दरअस्ल एक मिथक है। इस तरह, ये हमले भारत सरकार की घाटी में शांति और सामान्य स्थिति बहाल किये जाने की धारणा को खारिज करने के लिहाज़ से किये जा रहे हैं।

तो क्या हम कह सकते हैं कि ये हमले लोगों के मुक़ाबले 'सामान्य स्थिति' की धारणाओं के ख़िलाफ़ हैं?

हां, वे सामान्य स्थिति की धारणा को चुनौती दे रहे हैं। वे दुनिया, भारत सरकार और बाक़ी सभी लोगों को यह बता देने के लिए सनसनीख़ेज़ हमले कर रहे हैं कि कश्मीर उतना ही अस्थिर और ख़तरनाक बना हुआ है, जितना कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने से पहले था। वे संदेश दे रहे हैं कि वे अपनी मर्ज़ी से जब चाहें हमला कर सकते हैं। इस तरह, इसका मक़सद सिर्फ़ भारत सरकार और सुरक्षा बलों की छवि को ख़राब दिखाना है। कुछ सांकेतिक कामयाबी भी उग्रवादी तबकों के मनोबल को बढ़ाती है और उन्हें मज़बूत करती है। क्योंकि जब तक एक डर का मनोविज्ञान बना हुआ है, तबतक उनको तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उन्होंने किसी कमांडो या शीर्ष पुलिस अधिकारी को मार डाला है  और आप इसका मीडिया में प्रचार भी करते हैं, जिससे उनका भौतिक मक़सद पूरा होता है।

साफ़-साफ़ बतायें कि ये संदेश आख़िर लोग, सेना या सरकार में से किसके लिए है ?

चूंकि जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन है, इसलिए सरकार को ही इन हमलों से पैदा होने वाले डर के बाद प्रतिक्रिया देनी चाहिए। अगर जम्मू का कोई सरकारी कर्मचारी कश्मीर में काम करने से मना करता है, ऐसे में तो यह संदेश सरकार के लिए ही है कि वह इसे लेकर कोई कार्रवाई करे। अगर ऐसे मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी पड़ती है, तो नाराज़गी का एक और चक्र चलेगा, जिससे कि असंतोष पैदा होगा। यह तो किसी सामाजिक और सुरक्षा समस्या से कहीं ज़्यादा बड़ी समस्या होगी। ऐसे में सरकार से कोई भी पूछ सकता है, 'आपने तो कहा था कि आप कश्मीरी पंडितों को वहां फिर से बसायेंगे, लेकिन आप तो उन लोगों को भी नहीं बचा पा रहे हैं, जो इस समय घाटी में रहते हैं!' ऐसे में राज्यपाल और प्रशासन के लिए ज़्यादा परेशानी पैदा करने वाली स्थिति होगी।

बतौर यूएसआई निदेशक, कश्मीर की मौजूदा स्थिति के बारे में आपका क्या आकलन है ?

हमने तो सबसे ख़राब वक़्त देखा है, अगर उससे तुलना करें, तो यह कुछ भी नहीं है। मैंने जम्मू-कश्मीर में काम किया है, मैंने वहां सिख बटालियन की कमान संभाली है और हमने सबसे ख़राब हालात देखे हैं। मौजूदा हालात सीपीओ (केंद्रीय पुलिस संगठन) बलों के लिए और ज़्यादा समस्यायें पैदा करने वाले इसलिए हैं क्योंकि आज तो सेना को उन इलाक़ों में तैनात भी नहीं किया जाता है, जिन इलाक़ों में इमारतें हैं या घनी आबादी है। सेना ज़्यादातर नियंत्रण रेखा (LoC) और अपनी तैनाती वाले दूर-दराज़ इलाक़ों में है। यह सरकार के लिए और ज़्यादा चुनौतियां पैदा कर रहा है।

घाटी में तैनात सुरक्षा बलों के लिए ये हमले कितने ख़तरनाक़ हैं?

सुरक्षा बल इस तरह की हत्याओं से पूरी तरह सुरक्षित हैं....मैंने डोडा ज़िले में उन तीन रिश्तेदारों को खोया है, जो सशस्त्र बलों में थे...लेकिन निश्चित रूप से इन हमलों ने एक डर और एक राजनीतिक समस्या तो पैदा कर ही दी है। मसलन, कश्मीर में तैनात जम्मू के शिक्षकों जैसे सभी कर्मचारी भी लौट रहे हैं। कुछ ऐसे कश्मीरी पंडित जो घाटी में रह गये थे, वे भी यहां से जा रहे हैं। सिखों ने सद्भाव से रहना सीख लिया था और एक तरह की निश्चिंतता की स्थिति में पहुंच गये थे, लेकिन महिला प्रधानाध्यापक की हत्या के बाद तो वे भी डरे हुए हैं।

ग़ैर-कश्मीरियों की हत्या की ज़िम्मेदारी रेसिस्टेंस फ़्रंट (TRF) ने ली थी। क्या टीआरएफ़ इस इलाक़े के लिए एक नया ख़तरा है?

यह घाटी का एक असंगठित बल है। वहां बच गया उग्रवाद या आतंकवाद है, जो ऐसे लोगों से बना है, जिनके पास हथियार नहीं हैं या जिनके पास गोले-बारूद की कमी है। इस समय उनके पास गोला-बारूद भी नहीं है। यह एक तरह का डर पैदा करने वाला एक जैसे-तैसे ख़ुद को बनाये रखने वाला ख़तरा है। इसलिए, मुझे नहीं लगता कि यह बाहर आयेगा या कोई बड़ा उथल-पुथल कर पायेगा।

क्या तालिबान की सत्ता में वापसी कश्मीर के लिए नया ख़तरा है?

मुझे तो नहीं लगता कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति चिंताजनक है।1996 से 2001 के बीच बहुत सारे बदलाव हो चुके हैं। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के पहली बार सत्ता में आने के बाद का समय तो जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद और सीमा पार आतंकवाद के लिए चरम का समय था। तब हम इससे बड़े पैमाने पर जूझ रहे थे। तब से सीमा पार के आतंकवाद से लड़ने के हमारे तौर-तरीक़े में काफ़ी मज़बूती आ चुकी है। इसलिए, मुझे लगता है कि हमें अनावश्यक रूप से चिंतित नहीं होना चाहिए। मैं कहूंगा कि यह खतरा सनसनी पैदा करने वाला और ख़ुद को साबित करने वाले ऐसे छिटपुट हमलों के तौर पर सामने आयेगा, जो कोई भी कर सकता है। मगर,हां इसके लिए अफ़ग़ानिस्तान फ़ैक्टर को तो ज़िम्मेदार ठहराया ही जा सकता है, क्योंकि दोनों तरफ़ के कट्टरपंथी तत्व चाहते हैं कि यह इस तरह के हमले होते रहें।

(जसविंदर सिद्धू एक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

https://www.newsclick.in/Kashmir-Civilian-Killings-Aim-Debunk-India-Normalcy-Narrative-Director-Military-Think-Tank

J&K Article 370
Terrorism
Insurgency
Jammu & Kashmir
Kashmir conflict

Related Stories

जब ‘हाउडी मोदी’ का मतलब हो गया ‘हाउडी ट्रंप’

जम्मू-कश्मीर के लोगों के नागरिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए

मोदी vs ट्रंप: कौन है बड़ा झूठा? भारत एक मौज

मानव ढाल बनाए गए डार भाइयों के पिता की तकलीफ़ कौन सुनेगा?

तो मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी तय करेंगे ‘शहीद’ और ‘शहादत’!


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License