NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कश्मीरः राधा कुमार-मदन लोकुर की रिपोर्ट क्या कहती है
फ़ोरम ने अपनी इस रिपोर्ट में ज़ोर देकर कहा है केंद्र की सरकार से कश्मीर घाटी की जनता का ‘लगभग पूरा अलगाव’ हो गया है। इस अलगाव को दूर करने के लिए केंद्र की कोई पहल नहीं दिखायी देती।
अजय सिंह
31 Mar 2021
Kashmir
तस्वीर केवल प्रतीकात्मक प्रयोग के लिए। साभार: The Hindu

जम्मू-कश्मीर के हालात के बारे में पिछले दिनों एक मानवाधिकार समूह की ओर से जारी की गयी रिपोर्ट लगभग अनदेखी रह गयी और इस पर चर्चा नहीं हुई। फ़रवरी 2021 में जारी की गयी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर में विद्रोह व चरमपंथ का मुक़ाबला करने की चिंता सरकार की प्राथमिकता बन गयी है और सार्वजनिक, नागरिक व मानव सुरक्षा का सवाल उसकी (सरकार की) चिंता व सरोकार के दायरे से बाहर हो गया है। राज्य में मानवाधिकारों का उल्लंघन आम बात बन गयी है। कश्मीर घाटी पर ख़ास फ़ोकस किया गया है।

जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार फ़ोरम (फ़ोरम फॉर ह्यूमन राइट्स इन जम्मू ऐंड कश्मीर) ने यह रिपोर्ट जारी की है। इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व जज मदन बी लोकुर और स्त्रीवादी विचारक व लेखक राधाकुमार हैं। राधाकुमार 2010-11 में केंद्र सरकार द्वारा गठित जम्मू-कश्मीर वार्ताकार समूह की सदस्य रह चुकी हैं। तब केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी।

फ़ोरम ने अपनी दूसरी रिपोर्ट इस साल फ़रवरी में जारी की। पहली रिपोर्ट उसने पिछले साल (2020) में जारी की थी। अपनी ताज़ा रिपोर्ट में फ़ोरम ने कहा है कि 5 अगस्त 2019 से 18 महीनों तक की अवधि में मनमानी गिरफ़्तारियां जारी रही हैं, आपराधिक दंड संहिता 1973 की धारा 144 के तहत सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगी हुई है, और छोटे बच्चों व जम्मू-कश्मीर के निर्वाचित विधायकों-समेत सैकड़ों लोगों को निवारक नज़रबंदी में रखा गया है।

यहां बता दिया जाये कि 5 अगस्त 2019 को केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य की हैसियत देने वाले संवैधानिक अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर दिया और राज्य को दो केंद्र शासित क्षेत्रों—जम्मू-कश्मीर व लद्दाख—में बांट दिया। इस तरह पूर्ण राज्य के तौर पर जम्मू-कश्मीर का अस्तित्व ख़त्म कर दिया गया।

जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार फ़ोरम ने अपनी दूसरी रिपोर्ट में कहा है कि जम्मू-कश्मीर में जनता से जुड़े विभिन्न मसलों—जैसेः मानवाधिकार, महिला व बाल अधिकार, भ्रष्टाचार-विरोध, सूचना का अधिकार—की सुनवाई और समाधान के लिए स्वतंत्र संवैधानिक व क़ानूनी संस्थाओं की बहाली अभी तक नहीं हुई है, जबकि केंद्र-शासित क्षेत्र ऐसी संस्थाओं के लिए अधिकृत है।

फ़ोरम ने अपनी इस रिपोर्ट में ज़ोर देकर कहा है केंद्र की सरकार से कश्मीर घाटी  की जनता का ‘लगभग पूरा अलगाव’ हो गया है। इस अलगाव को दूर करने के लिए केंद्र की कोई पहल नहीं दिखायी देती। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि जम्मू की जनता का अलगाव इस स्तर पर नहीं है, लेकिन वह भी आर्थिक व शैक्षिक नुकसानों को लेकर चिंतित है। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लिए जो नयी आवास नीति व नयी ज़मीन नीति लागू की है, उसे लेकर जम्मू के बाशिंदों में भी चिंता है।

फ़ोरम ने मानवाधिकार, स्वास्थ्य, समाचार माध्यम व नागरिक सुरक्षा को लेकर और महिलाओं व बच्चों की स्थिति पर गहरी चिंता जतायी है, और सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग की है। फ़ोरम ने बहुत सख़्त जन सुरक्षा क़ानून (पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट) को ख़त्म करने की मांग की है।

फ़ोरम ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से कहा है कि वह भारतीय सेना के कैप्टन भूपेंद्र व उसके दो सहयोगियों पर हत्या का मुक़दमा चलाने के लिए अनुमति दे। इन तीनों पर जुलाई 2020 में शोपियां में तीन नौजवान मज़दूरों को फ़र्जी मुठभेड़ में मार डालने का आरोप है।

फ़ोरम की यह रिपोर्ट, उसकी पिछली रिपोर्ट की तरह, जम्मू-कश्मीर—ख़ासकर कश्मीर घाटी—के बारे में उन्हीं तल्ख़ सच्चाइयों को हमारे सामने एक बार फिर लाती है, जिनसे हममें से कई लोग आम तौर पर परिचित रहे हैं। लेकिन ऐसी रिपोर्ट का, थोड़े-थोड़े अंतराल पर सामने आना बहुत ज़रूरी है, ताकि कश्मीर हमारे दिमागी मानचित्र से ग़ायब न हो जाये। कश्मीर के बारे में केंद्र की हिंदुत्ववादी सरकार के आख्यान (नैरेटिव) की काट पेश करना हमारी लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी है।

(लेखक वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Jammu and Kashmir
Central Government
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल


बाकी खबरें

  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    एसकेएम का सरकार को अल्टीमेटम, कोरोना अपडेट और अन्य ख़बरें
    07 Oct 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार को दिया अल्टीमेटम और अन्य ख़बरों पर।
  • Supreme Court Asks: Why no Arrest in Lakhimpur Killings?
    न्यूज़क्लिक टीम
    सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: लखीमपुर में गिरफ्तारी क्यों नहीं ?
    07 Oct 2021
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे के इस कार्यक्रम में अभिसार शर्मा लखीमपुर मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बारे में बात कर रहे हैं, और बात कर रहे हैं कि किस तरह बीजेपी के प्रवक्ता लगतार किसानों को टारगेट कर…
  • Tribal Settlement Near Tamil Nadu Temple Uprooted
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: उजाड़ दी गईं मंदिर से सटी आदिवासी बस्तियां 
    07 Oct 2021
    11 इरुलर आदिवासी परिवारों ने आरोप लगाया है कि यह जगह उन्हें स्थायी रिहाइश के लिए जमीन के पट्टे दिए जाने तक रहने के लिए दी गई थी।
  • SC
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर नरसंहार: न्यायालय ने उप्र सरकार से पूछा क्या आरोपी गिरफ़्तार किए गए हैं?
    07 Oct 2021
    प्रधान न्यायाधीश एन वी रमणा, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए वकील को इस बारे में स्थिति रिपोर्ट में जानकारी देने का निर्देश दिया।
  • delhi violence
    सबरंग इंडिया
    दिल्ली हिंसा मामले में पुलिस की जांच की आलोचना करने वाले जज का ट्रांसफर
    07 Oct 2021
    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने पिछले कुछ महीनों में दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों को फटकार लगाई थी, और कुछ मामलों में पुलिस गवाहों की विश्वसनीयता पर संदेह करते हुए जमानत भी दे दी थी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License