NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
केजरीवाल का पाखंड: अनुच्छेद 370 हटाए जाने का समर्थन किया, अब एमसीडी चुनाव पर हायतौबा मचा रहे हैं
जब आम आदमी पार्टी की नेता आतिशी कहती हैं कि लोकतंत्र ख़तरे में है, तब भी इसमें पाखंड की बू आती है।
एजाज़ अशरफ़
01 Apr 2022
kejriwal

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के चुनाव आगे बढ़ाए जाने के खिलाफ़ लगातार विरोध कर रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर लोकतंत्र का दमन करने का आरोप लगाते हुए कहा कि चुनावों को आगे बढ़ाया जाना अशुभ है। लेकिन इसमें पाखंड की बू आती है।
 
निश्चित तौर पर केजरीवाल का आरोप सही है, आखिर जब एमसीडी चुनाव के एक महीने ही बचे थे, तभी मोदी सरकार ने 25 मार्च को दिल्ली नगर निगम (संशोधन) विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया। इस विधेयक के ज़रिए दिल्ली के तीनों नगर निगमों को एक किया जा रहा है और एकीकृत एमसीडी को चलाने के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रबंध किया जाएगा। विधेयक के ज़रिए दिल्ली में कुल 272 वार्डों को घटाकर 250 किया जा रहा है। इसके चलते एमसीडी चुनावों को आगे बढ़ाया जाना ज़रूरी हो गया।
 
लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है जब भारतीय लोकतंत्र का दमन किया गया हो। बल्कि, 5 अगस्त, 2019 को पूरे जश्न के साथ ऐसा किया गया था। उस दिन अनुच्छेद 370 को हटाया गया था और लद्दाख क्षेत्र को जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था।
 
इसी दिन एक बजकर पांच मिनट पर केजरीवाल ने ट्वीट करते हुए कहा था, "हम जम्मू-कश्मीर पर सरकार के फ़ैसले की प्रशंसा करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि इससे राज्य में शांति और विकास आएगा।" कश्मीर में बंदूक की नोक पर शांति लाने की कोशिश की गई, जो इस तथ्य से साफ़ था कि लोकसभा में विधेयक रखने के पहले ही राज्य में लॉकडाउन लगा दिया गया था। आम आदमी पार्टी ने इस विधेयक के पक्ष में मतदान किया था।
 
केजरीवाल ने जम्मू-कश्मीर की विशेष पहचान को छीनने वाले केंद्र सरकार के फ़ैसले का समर्थन किया। यह विशेष दर्जा जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल होने के दौरान वहां के लोगों को दिया गया था। जब लेफ्टिनेंट गवर्नर जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश पर शासन कर रहा हो और वहां के विधानसभा चुनाव दो साल से लंबित हों, क्या तब हमें केजरीवाल से नहीं पूछना चाहिए: एमसीडी चुनावों के आगे बढ़ने पर क्यों परेशान हो रहे हैं?

दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल ने बताया कि ऐसा क्यों होना चाहिए। आम आदमी पार्टी की विद्वान नेता और विधायक आतिशी ने भी इंडियन एक्सप्रेस के लिए लिखे अपने एक लेख में अरविंद केजीवाल के तर्कों जैसी ही बात लिखी। उन्होंने लिखा, “आज एमसीडी चुनावों को आगे बढ़ाया जा रहा है। कल को अगर दिसंबर में होने वाले चुनावों में बीजेपी गुजरात चुनावों को हारती हुई दिखाई देती है, तो क्या वे गुजरात और महाराष्ट्र को एक करने वाला विधेयक लाकर चुनाव आगे नहीं बढ़वा सकते?”

आतिशी ने आगे तर्क दिया कि बीजेपी जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तक में फेरबदल कर सकती है और पूरे देश को एक गैर-लोकतांत्रिक नामित प्रशासक के अंतर्गत ला सकती है। यही बातें उन्हें केजरीवाल से तब कहनी थीं, जब केजरीवाल ने अनुच्छेद 370 पर केंद्र सरकार के पक्ष में मतदान करने का फ़ैसला किया था। लेकिन क्या उन्होंने ऐसा किया?

हालांकि, सोशल मीडिया यूजर्स ने ऐसा किया और केजरीवाल को कश्मीर के फ़ैसले पर उनकी गलती याद दिलाई। जैसे, नितिन चवन ने केजरीवाल को जवाब में ट्वीट करते हुए लिखा, “अगर वे जम्मू-कश्मीर का दर्जा एक नगर-निगम का कर सकते हैं, तो निश्चित ही वे दिल्ली का दर्जा बिना विधानसभा का कर सकते हैं। वे प्रतिनिधित लोकतंत्र के आधार पर समर्थन की मांग नहीं करते।”
निश्चित ही केजरीवाल और आतिशी ने हमारे समर्थन की मांग नहीं की है, लेकिन वे हमारे मन में हमारे लोकतांत्रिक भविष्य को लेकर डर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

लोकतंत्र के लिए केजरीवाल की चिंता की बात नैतिक तौर पर खोखली हो चुकी है, यह आतिशी जैसी उनकी पार्टी की सदस्य के बारे में है। जून, 2018 में केजरीवाल लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल के कार्यालय में 9 दिन के उपवास पर बैठे थे, उन्होंने दावा किया था कि दिल्ली प्रशासन के आईएएस अधिकारी बैजल और केंद्र सरकार के निर्देश पर हड़ताल पर गए हैं। उस दौरान चार गैर बीजेपी मुख्यमंत्री- पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी, कर्नाटक से एच डी कुमारस्वामी, केरल से पिनराई विजयन और आंध्र प्रदेश से एन चंद्रबाबू नायडू उनसे मिलने आए थे, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं दी गई।
 
वे केजरीवाल से मिलने, सिर्फ़ उन्हें समर्थन जताने के लिए नहीं आए थे, बल्कि वो इसलिए भी आए थे, क्योंकि वे देख पा रहे थे कि मोदी सरकार संविधान में उल्लेखित संघीय सिद्धांतों का खात्मा कर रही है। एक ऐसा व्यक्ति जो दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग करता आया है, उसे अनुच्छेद 370 पर केंद्र सरकार के पक्ष में मतदान करते देखना अजीब था, जिससे पाखंड झलक रहा था।
 
इसके उलट जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को देखिए। जब लोकसभा में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (संशोधन) विधेयक, 2021 पेश किया जा रहा था, जिससे लेफ्टिनेंट गवर्नर को ज़्यादा ताकत दी जा रही थी, तब मार्च, 2021 में उमर अब्दुल्ला ने लोकसभा में कहा था, “2019 में जम्मू-कश्मीर का  दर्जा छीनने के कदम का आम आदमी पार्टी द्वारा समर्थन किए जाने के बावजूद, हम दिल्ली की चुनी हुई सरकार की शक्तियों पर इस हमले का विरोध करते हैं।”

लेकिन कश्मीर मुद्दा ही सिर्फ़ केजरीवाल की राजनीतिक अनैतिकता का एकमात्र उदाहरण नहीं है। 2019 लोकसभा चुनाव के नतीज़ों के ऐलान के पहले केजरीवाल ने एक अख़बार से कहा कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में नहीं जीतेगी, क्योंकि मुस्लिमों ने उनकी पार्टी को छोड़कर कांग्रेस को वोट दिया।
 
केजरीवाल ने कहा, “48 घंटे पहले तक लग रहा था कि सभी सातों सीटों पर आम आदमी पार्टी की जीत होगी। लेकिन आखिरी मौके पर मुस्लिम वोट कांग्रेस के पास चले गए। हम अब भी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि हुआ क्या था।”

उनकी हताशा को समझा जा सकता है, लेकिन नतीज़ों ने बताया कि यह अनुमान कितने गलत थे। बीजेपी ने दिल्ली की सभी सातों सीटें जीत लीं और कुल मतदान का 56.86 फ़ीसदी मत हासिल किया। 

प्रभावी तौर पर इसका मतलब हुआ कि अगर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने गठबंधन कर लिया होता और सभी मुस्लिमों ने उन्हें वोट दिया होता, जो दिल्ली की आबादी का 12-13 फ़ीसदी हिस्सा हैं, तो भी बीजेपी ने सभी सातों सीट जीत ली होतीं।

स्वाभाविक तौर पर केजरीवाल ने 2019 चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए मुस्लिमों को जिम्मेदार बताने पर कभी माफ़ी नहीं मांगी। यह उनकी प्रवृत्ति बताता है कि वे कभी अपनी जाति- बनिया पर चांदनी चौक में करारी हार के लिए दोष नहीं लगाते, इस सीट पर उनकी जाति काफ़ी प्रभावशाली है। वहां आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी पंकज कुमार गुप्ता को बीजेपी प्रत्याशी से चार लाख से भी ज़्यादा वोटों से हार मिली।
 
कई दूसरे लोगों की तरह 2019 के चुनावों ने केजरीवाल को सार्वजनिक तौर पर अपने हिंदु होने को दिखाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने हनुमान को अपना आदर्श बताना और मंदिर में सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज कराना शुरू कर दिया। यह उनका अधिकार है। लेकिन ठीक इसी दौरान उन्होंने मुस्लिमों की असुरक्षा और डर पर भी बोलना बंद कर दिया। लेकिन हिंदुओं के लिए उनके तमाम जुनून के बजाए, कश्मीर फाइल्स फिल्म के मुद्दे पर उनके घर पर हमला हुआ।
 
शाहीन बाग में जहां नए नागरिकता कानून के खिलाफ़ मुस्लिम महिलाएं अनिश्चित काल का धरना दे रही थीं, वहां केजरीवाल नहीं पहुंचे। प्रदर्शनकारी केजरीवाल की विडंबना समझ रहे थे, वे जानते थे कि अगर केजरीवाल शाहीन बाग आते हैं, तो इसका पूरा फायदा बीजेपी वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए उठाएगी। लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि दिल्ली चुनाव जीतने के बावजूद केजरीवाल शाहीन बाग से दूरी क्यों बनाए रहे।
 
अनुच्छेद 370 को समर्थन देने के केजरीवाल के फ़ैसले को उनके हिंदू दक्षिणपंथी खेमे में जाने की पृष्ठभूमि में देखना होगा। और आतिशी, आप की हिंदुवादी दक्षिणपंथी राजनीति का लक्षण बन चुकी हैं।

आतिशी स्प्रिंगडेल्स स्कूल, सेंट स्टीफेन्स कॉलेज और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ीं, लेकिन आतिशी का राजनीतिक बदलाव बताता है कि शिक्षा किसी व्यक्ति की नैतिक दृढ़ता में जरूरी तौर पर इज़ाफा नहीं करती। आतिशी ने अपना उपनाम मार्लेना हटा दिया है, जो उन्हें उनके माता-पिता ने मार्क्स और लेनिन को श्रद्धांजलि देने के लिए दिया था। 

ऐसा दावा किया गया कि आतिशी ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि बीजेपी उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में ईसाई के तौर पर प्रचारित कर रही थी। 2020 में वे आतिशी सिंह हो गईं, इस तरह वे अपनी राजपूत पहचान प्रदर्शित करने लगीं।
 
2021 में आतिशी की नैतिकता नए पतन पर पहुंची। भारत-पाकिस्तान के टी-20 वर्ल्ड कप मैच से कुछ दिन पहले उन्होंने कहा, “हम कश्मीर में लोगों पर हमले हुए देखते हैं। मैं पक्का कह सकती हूं कि प्रधानमंत्री भी मैच कराने के पक्ष में नहीं होंगे, क्योंकि जब वे विपक्ष में थे, तो सवाल पूछते हुए कहते थे कि जब राज्य प्रायोजित आतंकवाद जारी है, तो हमें उनके साथ क्रिकेट क्यों खेलना चाहिए?”

आतिशी का वक्तव्य बताता है कि जहां तक पाकिस्तान की बात है, तो वे और उनके नेता बीजेपी के नेताओं से ज़्यादा हिंदू हैं। आश्चर्य होता है कि उनके मार्क्सवादी-लेनिनवादी माता-पिता, बीजेपी को निशाना बनाने के लिए आतिशी द्वारा इस्तेमाल किए गए इस ज़रिए पर क्या सोचते होंगे!

इंडियन एक्सप्रेस के लिए आतिशी ने आगे लिखा, “दिल्ली नगर-निगम (संशोधन) अधिनियम, केंद्र सरकार द्वारा शक्तियों के गलत इस्तेमाल के एक नए कुचक्र की शुरुआत हो सकती है, जिसे अगर नहीं रोका गया, तो यह देश ऐसी स्थिति में पहुंच जाएगा, जहां भारत में चुनाव सिर्फ़ सत्ताधारी पार्टी की इच्छा पर होंगे।”

नहीं मैडम, यह “कुचक्र” तो 5 अगस्त 2019 को ही शुरू हो गया था।

अगर केजरीवाल और आतिशी में थोड़ी भी नैतिक दृढ़ता है, तो उन्हें अनुच्छेद 370 को हटाने को समर्थन देने के लिए खेद व्यक्त करना चाहिए। जब केजरीवाल ड्रग के धंधे में शामिल होने के आरोप लगाने के लिए अकाली दल के बिक्रम सिंह मजीठिया से माफ़ी मांग सकते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए उनके और आतिशी के लिए तो यह आसान होना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Kejriwal’s Hypocrisy: Voted to Scrap Art 370, now Cribs About MCD Election

Delhi MCD elections
Delhi MCD unification
Arvind Kejriwal
Atishi AAP
aam aadmi party
Delhi statehood
Kashmir
Article 370
Muslim voters
Shaheen Bagh
BJP
Narendra modi
Pinarayi Vijayan
mamata banerjee
Hindu Right
Kashmir Files

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • JNU
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जेएनयू में छात्रा से छेड़छाड़ के मामले में एक व्यक्ति गिरफ़्तार, GSCASH बहाली की मांग
    24 Jan 2022
    जेएनयू की पीएचडी छात्रा के साथ विश्वविद्यालय परिसर में छेड़छाड़ की घटना घटी थी जिसने जेएनयू प्रशासन और दिल्ली की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। घटना के 100 से अधिक घंटे के बाद रविवार को 27…
  • slaughter house
    सौरभ शर्मा
    अवैध बूचड़खानों पर योगी सरकार के प्रतिबंध से ख़त्म हुई बहराइच के मीट व्यापारियों की आजीविका 
    24 Jan 2022
    साल 2017 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मांस के कारोबार में शामिल हजारों लोगों के जीवन और उनकी आजीविका पर काफी बुरा असर पड़ा…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3 लाख से ज़्यादा नए मामले, 439 मरीज़ों की मौत
    24 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 3,06,064 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 5.69 फ़ीसदी यानी 22 लाख 49 हज़ार 335 हो गयी है।
  • hum bharat ke log
    शंभूनाथ शुक्ल
    हम भारत के लोग: झूठी आज़ादी का गणतंत्र!
    24 Jan 2022
    दरअसल सरकारें ग़रीब आदमी की बजाय पूंजीपतियों के हाथ में खेलती हैं इसलिए ग़रीबों का हक़ मारकर उनका पैसा अमीरों, दलालों, सत्तासीन वर्गों के पास चला जाता है। जब तक इस पर अंकुश नहीं लगेगा तब तक यह आज़ादी…
  • sulli deals
    प्रबीर पुरकायस्थ
    सुल्ली डील्स और बुल्ली बाई: एप्स बने नफ़रत के नए हथियार
    23 Jan 2022
    यह हमला, ऑनलाइन दुव्र्यवहार को हथियार बनाने वाला हमला है, जो अपने निशाने पर आने वाले अल्पसंख्यकों–धार्मिक अल्पसंख्यकों, उत्पीडि़त जातियों तथा महिलाओं–के खिलाफ अपने झूठ के प्रचार को बहुगणित करने के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License