NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
हड़ताल-आंदोलन की धार कुंद नहीं पड़ी
एक ज़माने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे।
शंभूनाथ शुक्ल
28 Nov 2021
kisan andolan
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

बहुत वर्षों बाद कोई भी संगठित आंदोलन सत्ता को झुकाने में सफल रहा है। जिस तरह से किसानों ने केंद्र सरकार को विवश किया है, कि वे उनकी माँगें मानें उससे यह तो लगा ही है कि चाहे जितनी निरंकुश सत्ता हो अगर कोई सशक्त आंदोलन खड़ा होता है, तो सत्ता को हथियार डालने ही पड़ते हैं। कम से कम इकोनॉमिक लिबरलाइज़ेशन के बाद एक आंदोलन ने सत्ता की चूलें हिला दी हैं।

एक जमाने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे। कोई भी मालिक अपने मज़दूरों से उम्मीद करता है, कि वे काम तो खूब करें लेकिन वेतन कम लें। उदारीकरण के दौर में सरकार भी उन्हीं मालिकों के साथ खड़ी हो जाती थी। नतीजा मज़दूरों को मालिक की शर्तों पर काम करना पड़ता था।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने कोरोना काल के बहाने मज़दूरों, किसानों और अन्य कामगार लोगों के साथ हर तरह के उत्पीड़न किए। मध्य वर्ग की नौकरियाँ गईं, उनके वेतन में 40 से लेकर 70 प्रतिशत तक कटौती हुई किंतु सरकार मध्य वर्ग की मदद के लिए कभी आगे नहीं आई। उलटे हर तरह के करों का बोझ उन पर डाला, नतीजा है बेलगाम बढ़ती महंगाई।

‘हर जोर-जुल्म के टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’, एक जमाने में यह वाक्य अक्सर उन इलाकों में सुना जाता था जहां औद्योगिक मजदूरों की बहुतायत होती थी और मजदूर अपनी मांगों को मनवाने के लिए काम बंद की चेतावनी दिया करते थे। एक तरह से हड़ताल ब्लू कालर वर्कर्स का हथियार माना जाता था और ऐसा कारगर हथियार जिसका असर पड़ता था और अक्सर प्रबंधन उनकी मांगों के समक्ष झुका करता था। मगर धीरे-धीरे हड़ताल व्हाइट कालर वर्कर ने भी उठा लिया और वे कर्मी भी हड़ताल करने लगे जिनको तब तक प्रबंधन का आदमी समझा जाता था। सरकारी प्रतिष्ठानों में भी आफिसर्स एसोसिएशन्स ने हड़तालें कीं। यह हड़ताल के मौलिक अधिकार का मजाक हो गया। हर वह आदमी जो पीड़ित था हड़ताल का अपना एकमात्र हक भी खो बैठा।

चूंकि हड़ताल एक संगठन की मांग करता है और उसके लिए कुछ नीति नियामक सिद्धांतों की भी। हड़ताल कौन कर सकता है और किसकी सेवाएं अपरिहार्य मानी जाएंगीं, यह भी तय किया जाता था। अक्सर हड़ताल में मिलों व कारखानों का वाच-एन-वार्ड स्टाफ शरीक नहीं होता था पर उसे हड़ताल के बाद मानी गई मांगों का हितलाभ मिला करता था। क्योंकि वह स्टाफ भी मजदूर ही माना जाता था। जब हड़ताल विफल हुई तो मजदूरों का हड़ताल के दिनों का पैसा कटता भी था और अगर मांगें मानी गईं तो भी अक्सर पैसा काट लिया जाता था और मजदूर इसके लिए तैयार रहता था। पर व्हाइट कालर वर्कर अक्सर इस कटौती से बच जाता क्योंकि प्रबंधन का हिस्सा होने के कारण वह अपने दबाव के हथियार का इस्तेमाल करता और कोई भी प्रशासनिक कार्रवाई अपने ऊपर होने से बचा लेता। यानी हड़ताल एक तरह से दबाव का हथियार बन गया। इसका नतीजा यह निकला कि हड़ताल का मतलब दबाव की रणनीति हो गई और धीरे-धीरे हड़ताल ने अपनी धार खो दी।

पहले हड़ताल कारखाना मालिक और प्रबंधन को दबाव में लेने के लिए की जाती थी और इसके लिए सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाता था। मजदूर आमतौर पर मिल के आगे धरना देते पर पब्लिक को तंग नहीं करते थे। मगर हड़ताल को जब व्हाइट कालर वालों ने अपना लिया तो वे दबाव के लिए सार्वजनिक संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाने लगे। यही नहीं वे लोग भी हड़ताल करने लगे जिनकी सेवाएं अपरिहार्य सेवाओं में मानी जाती थीं। डॉक्टर, वकील और पुलिस वाले भी हड़ताल करने लगे। एक डॉक्टर का काम मरीज को बचाना होता है मगर आपरेशन थियेटर में लेटे मरीज को वीतरागी भाव से छोड़कर डॉक्टर चले गए और मुकदमें की तारीख के बावजूद वकील। इससे हड़ताल के प्रति आम लोगों में वितृष्णा जागी और उन्हें  लगा कि हड़ताल का मतलब आम लोगों की जिंदगी में खलल।

हड़ताल के प्रति यह रवैया मीडिया ने भी फैलाया और उन लोगों ने भी जो हड़ताल को अपनी कामचोरी अथवा निजी हितों की पूर्ति के लिए दबाव का हथियार बना रहे थे। मजदूरों की हड़ताल का वह इतिहास है कि कैसे मजदूरों ने हड़ताल के बूते ही अमानुषिक नियमों को मानवीय बनाया। एक जमाना था जब अमेरिका व यूरोप सरीखे सभ्य देशों में भी मजदूरों को दिन-रात काम करना पड़ता था और उनकी पगार उतनी ही होती थी जिससे किसी तरह उनका पेट भरा रहे ताकि वे काम करते रहें। बच्चों और स्त्रियों के साथ तो और भी यंत्रणाएं थीं उन्हें पैसा कम मिलता था और काम ज्यादा लिया जाता है। यह मजदूरों ने अपनी हड़तालों और संगठनों के बूते मजदूरी कराने के कुछ नियम बनाए और जिससे उन्हें इन अमानुषिक अत्याचारों से मुक्ति मिली। पर इसके लिए उन्होंने पब्लिक को तंग नहीं किया न सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाई।

किसानों के आंदोलन की जीत इसलिए भी हुई क्योंकि उन्होंने पब्लिक को तंग नहीं किया इसलिए कमोबेश आम लोगों की सहानुभूति उनके साथ रही। उन्होंने दिल्ली को घेरा ज़रूर पर राजधानी को आने वाली सड़क को सिर्फ़ एक तरफ़ से। अर्थात् आवाजाही यथावत रही। इसके अलावा किसानों ने अपने असीम धैर्य का भी परिचय दिया। पिछले साल 26 नवंबर से शुरू हुआ उनका आंदोलन आज तक जारी है। सरकार ने तीनों कृषि क़ानून ही नहीं वापस किए बल्कि एमएसपी पर भी उसे विचार करना होगा। किसानों ने, ख़ासकर हरियाणा और पंजाब के एक काम से लोग बहुत खुश थे और वह था, इन राज्यों में सरकार के उच्च पथों (हाई-वेज) पर लिया जाने वाला टोल किसानों ने बंद करवा दिया था। इसलिए इन प्रदेशों का शहरी मध्य वर्ग भी इनके साथ था।

अब भले क़ानून वापसी को चुनावी चाल कहा जाए, किंतु यह तो साबित हुआ ही कि सरकार को यह महसूस तो हुआ कि चाहे जितना धर्म और जाति के आधार पर लोगों को बाँटो, रोटी के सवाल पर ये सब खाई पट जाती है। यानी रोज़ी-रोटी की लड़ाई सबसे महत्वपूर्ण है। “भूखे भजन न होय गोपाला!” यह सर्वविदित उक्ति है। धर्म हमें कितना भी संकीर्ण बनाये मगर वह पेट के ऊपर नहीं हो सकता। इसीलिए किसान एकजुट हुए और पहली लड़ाई उन्होंने जीत ली है। अब यदि कामगार वर्ग भी अपनी लड़ाई के लिए सड़क पर आ जाए तो कोई शुबहा नहीं कि सरकार माँगें न माने। हर सरकार को वोट भी तो चाहिए इसलिए उसे झुकना पड़ेगा। अलबत्ता वोटर धर्म और सांप्रदायिकता के फेर में न पड़े तो कोई भी सरकार निरंकुश नहीं हो सकती और उसे जनोन्मुखी क़ानून बनाने ही पड़ेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

kisan andolan
Kisan Mazdur Andolan
workers movement
Anti government protest
Modi government

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन

मोदी सरकार की वादाख़िलाफ़ी पर आंदोलन को नए सिरे से धार देने में जुटे पूर्वांचल के किसान

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

ट्रेड यूनियनों की 28-29 मार्च को देशव्यापी हड़ताल, पंजाब, यूपी, बिहार-झारखंड में प्रचार-प्रसार 

आंगनवाड़ी की महिलाएं बार-बार सड़कों पर उतरने को क्यों हैं मजबूर?

केंद्र सरकार को अपना वायदा याद दिलाने के लिए देशभर में सड़कों पर उतरे किसान

देश बड़े छात्र-युवा उभार और राष्ट्रीय आंदोलन की ओर बढ़ रहा है

रेलवे भर्ती मामला: बर्बर पुलिसया हमलों के ख़िलाफ़ देशभर में आंदोलनकारी छात्रों का प्रदर्शन, पुलिस ने कोचिंग संचालकों पर कसा शिकंजा

रेलवे भर्ती मामला: बिहार से लेकर यूपी तक छात्र युवाओं का गुस्सा फूटा, पुलिस ने दिखाई बर्बरता


बाकी खबरें

  • bihar
    अनिल अंशुमन
    बिहार शेल्टर होम कांड-2’: मामले को रफ़ा-दफ़ा करता प्रशासन, हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
    05 Feb 2022
    गत 1 फ़रवरी को सोशल मीडिया में वायरल हुए एक वीडियो ने बिहार की राजनीति में खलबली मचाई हुई है, इस वीडियो पर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान ले लिया है। इस वीडियो में एक पीड़िता शेल्टर होम में होने वाली…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    सत्ता में आते ही पाक साफ हो गए सीएम और डिप्टी सीएम, राजनीतिक दलों में ‘धन कुबेरों’ का बोलबाला
    05 Feb 2022
    राजनीतिक दल और नेता अपने वादे के मुताबिक भले ही जनता की गरीबी खत्म न कर सके हों लेकिन अपनी जेबें खूब भरी हैं, इसके अलावा किसानों के मुकदमे हटे हो न हटे हों लेकिन अपना रिकॉर्ड पूरी तरह से साफ कर लिया…
  • beijing
    चार्ल्स जू
    2022 बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक के ‘राजनयिक बहिष्कार’ के पीछे का पाखंड
    05 Feb 2022
    राजनीति को खेलों से ऊपर रखने के लिए वो कौन सा मानवाधिकार का मुद्दा है जो काफ़ी अहम है? दशकों से अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने अपनी सुविधा के मुताबिक इसका उत्तर तय किया है।
  • karnataka
    सोनिया यादव
    कर्नाटक: हिजाब पहना तो नहीं मिलेगी शिक्षा, कितना सही कितना गलत?
    05 Feb 2022
    हमारे देश में शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, फिर भी लड़कियां बड़ी मेहनत और मुश्किलों से शिक्षा की दहलीज़ तक पहुंचती हैं। ऐसे में पहनावे के चलते लड़कियों को शिक्षा से दूर रखना बिल्कुल भी जायज नहीं है।
  • Hindutva
    सुभाष गाताडे
    एक काल्पनिक अतीत के लिए हिंदुत्व की अंतहीन खोज
    05 Feb 2022
    केंद्र सरकार आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार को समर्पित करने के लिए  सत्याग्रह पर एक संग्रहालय की योजना बना रही है। इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के उसके ऐसे प्रयासों का देश के लोगों को विरोध…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License