NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
भारत
राजनीति
सुस्पष्ट भाजपा विरोधी राजनैतिक दिशा के साथ किसान-आंदोलन अगले चरण में
तीन महीने से जारी किसान आंदोलन स्थायित्व ग्रहण कर चुका है, और एक नए चरण में प्रवेश के संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक ओर आंदोलन अधिक गहराई और विस्तार में जा रहा है, दूसरी ओर सरकार पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी है।

लाल बहादुर सिंह
03 Mar 2021
सुस्पष्ट भाजपा विरोधी राजनैतिक दिशा के साथ किसान-आंदोलन अगले चरण में

आंदोलन के 97वें दिन संयुक्त किसान मोर्चा ने 2 मार्च  की अपनी बैठक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण  एलान करते हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ राजनैतिक मोर्चा खोल दिया है और विधानसभा चुनावों में जनता से उसे दंडित करने की अपील  की है :

"जिन राज्यों में अभी चुनाव होने वाले है, उन राज्यों में संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) भारतीय जनता पार्टी (BJP) की किसान-विरोधी, गरीब-विरोधी नीतियों को दंडित करने के लिए जनता से अपील करेगा। एसकेएम के प्रतिनिधि भी इस उद्देश्य के लिए इन राज्यों का दौरा करेंगे और विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेंगे।"

बेशक, इस घोषणा के साथ सुस्पष्ट भाजपा विरोधी राजनैतिक दिशा लेकर किसान-आंदोलन अगले चरण में प्रवेश कर गया है। इसका देश की आने वाले दिनों की राजनीति पर दूरगामी असर पड़ेगा।

वैसी ही दूरगामी  महत्व की दूसरी घोषणा के अनुसार किसान और मजदूर मिलकर 15 मार्च को पूरे देश में "कॉरपोरेट विरोधी दिवस" और "निजीकरण विरोधी दिवस" मनाएंगे। 26-27  नवम्बर की संयुक्त कार्रवाई के बाद, जिस दिन किसानों ने राजधानी दिल्ली में दस्तक दी थी, यह किसानों और मजदूरों के कारपोरेट विरोधी ज्वाइंट एक्शन का अगला चरण होगा :

"केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर 15 मार्च 2021 को 'निजीकरण विरोधी दिवस' का समर्थन करते हुए सयुंक्त किसान मोर्चा द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। एसकेएम इस दिन को 'कॉरपोरेट विरोधी' दिवस के रूप में देखते हुए ट्रेड यूनियनों के इस आह्वान का समर्थन करेगा, और एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।"

जाहिर है, यह किसान आंदोलन और सेंट्रल ट्रेड यूनियनों द्वारा 3 कृषि कानूनों,  MSP की कानूनी गारंटी, बिजली बिल, लेबर कोड की वापसी और सार्वजनिक उद्यमों के निजीकरण के विरुद्ध संयुक्त लड़ाई का एलान है। 

देश में आज एक ओर  अमित शाह के बेटे के नेतृत्व में अहमदाबाद का नरेंद्र मोदी स्टेडियम अम्बानी-अडानी छोर के बीच शतको के लिए तैयार किया गया है, दूसरी ओर, उसके बरअक्स राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर 6 मार्च को किसानों के बेटे अपने आंदोलन का शतक पूरा करने जा रहे हैं। इन दो शतकीय मैदानों की कहानी आज भारत मे जो महाभारत लड़ा जा रहा है, उसका रूपक है। ये आज के भारत को परिभाषित करने वाले दो सबसे ताकतवर प्रतीक हैं।

पौराणिक महाभारत के कुरुक्षेत्र के निकट, राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर, जो नये महाभारत का महाकाव्य रचा जा रहा है, उसमें अनगिनत गाथाएं हैं, शौर्य की-धैर्य की, दमन की-प्रतिरोध की, गहन निराशा और उद्दाम आशा की, साजिश के ध्वंस की, साहसपूर्ण सृजन की...!  300 के आसपास शहादतें हो चुकी हैं, जेल, मुकदमे, यातना-प्रताड़ना की तो कोई गिनती नहीं। इस सबका कुल नतीजा यह है कि आंदोलन लहरों में बढ़ता पूरे देश को अपने आगोश में लेता जा रहा है। आंदोलन के विविध आयाम उभर रहे हैं।

3 महीने से जारी किसान आंदोलन स्थायित्व ग्रहण कर चुका है, और एक नए चरण में प्रवेश के संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक ओर आंदोलन अधिक गहराई और विस्तार में जा रहा है, दूसरी ओर सरकार पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी है। खेती का समय होने के कारण किसान अब आंदोलन और खेती के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं तो सरकार सामने खड़े महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव और आंदोलन के बीच संतुलन बैठाने में।

इसी बीच डीजल,पेट्रोल, गैस के तेजी से बढ़ रहे दाम, बढ़ती मंहगाई आग में घी का काम कर रहे हैं और बेरोजगारी टॉप ट्रेंड कर रही है। पिछले दिनों GST के खिलाफ उसे काला कानून करार देते हुए व्यापारियों का राष्ट्रव्यापी बंद हुआ। बैंक कर्मियों की हड़ताल हुई। 

1 मार्च को बिहार की राजधानी पटना में 19 लाख नौकरियों के नीतीश सरकार के वायदे को पूरा करने की मांग लेकर AISA-RYA के नेतृत्व में छात्र-युवाओं का जुझारू मार्च हुआ, जिसका नेतृत्व और समर्थन करते हुए कई युवा, भाकपा (माले) विधायक भी घायल हुए। इसी बीच इलाहाबाद जो देश में प्रतियोगी छात्रों का प्रमुख केंद्र है, वहाँ हजारों प्रतियोगी युवक-युवतियों के प्रदर्शन पर योगी सरकार की पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया और उनके नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इलाहाबाद युवाओं का सुसाइड ज़ोन बनता जा रहा है, जहां एक महीने के अंदर 10 के आसपास युवक-युवतियां बेरोजगारी के भयानक दबाव में खुदकशी कर चुके हैं। ठीक इसी तरह BHU के छात्रों को गिरफ्तार किया गया जो विश्वविद्यालय खोलने और पढ़ाई की मांग कर रहे थे। खतरनाक आयाम ग्रहण करती बेरोजगारी के खिलाफ देश में बड़े छात्र-युवा आंदोलन की सुगबुगाहट है। ये युवक-युवतियां किसान आंदोलन का समर्थन कर रही हैं क्योंकि इन सबका निशाना एक ही है- मोदी राज की कॉरपोरेटपरस्त नीतियां जो सारे संकटों के मूल में हैं।

समाज के सभी तबके आज ऐतिहासिक किसान आंदोलन से प्रेरणा लेकर अपने अपने सवालों पर  आंदोलन की राह पर बढ़ते जा रहे हैं और इनके बीच एक लड़ाकू एकता उभर रही है, जो आने वाले दिनों में नई उम्मीदों के द्वार खोल सकती है। 

किसान आंदोलन की राजनैतिक सम्भावनाओं को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

किसान आंदोलन से सहानुभूति रखने वाले कुछ बुद्धिजीवी सशंकित हैं कि  इस आंदोलन से मोदी को फायदा होगा। उनका यह अनुमान इस मूल्यांकन पर आधारित है कि यह धनी और जाट किसानों का आंदोलन है, इनके खिलाफ ग्रामीण समाज के अन्य तबके मोदी-भाजपा के साथ गोलबंद हो जाएंगे और इससे उनका नेट फायदा होगा। 

पर यह निष्कर्ष superficial है और अंकगणितीय समझ पर आधारित है, जो गहराई में आंदोलन के प्रभाव और उसके रसायन-शास्त्र को न समझने से पैदा होता है। सच्चाई यह है कि आंदोलन के गढ़ों में  सभी किसानों की यह आम अनुभूति बन चुकी है, चाहे वे जिस भी श्रेणी या समुदाय के हों, कि ये कानून मोदी सरकार कॉरपोरेट के फायदे के लिए ले आयी है और हमारी जमीन खतरे में है, वह छिन जाएगी। जिन्हें अब तक सरकारी मंडी में MSP पर खरीद का लाभ मिला है, उनके अंदर यह भय है कि इससे अब वे वंचित हो जाएंगे और मध्य उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल या देश के जिन इलाकों के किसान अब तक MSP से वंचित हैं, उनके अंदर पंजाब-हरियाणा के किसानों की समृद्धि से यह आकर्षण पैदा हुआ है कि MSP को कानूनी दर्जा मिल जाय तो उनकी भी स्थिति बेहतर हो जाएगी।

बाराबंकी जैसे जिले के कुर्मी किसान बहुल इलाके में किसान पंचायत की सफलता ने यह साफ संकेत दिया है तमाम कृषक जातियां जो पिछले दिनों भाजपा के साथ चली गयी थीं, वे किसान-आंदोलन के प्रवाह में उससे दूर छिटक सकती हैं। सच तो यह है कि पहचान-आधारित (Identity- based) जो वैमनस्य ग्रामीण समाज में हाल के वर्षों में मौजूद थे, उदाहरण के लिए पश्चिम उत्तर प्रदेश में हिन्दू व मुस्लिम समुदाय के बीच, उनको किसान आंदोलन ने मिटाने का काम किया है।

किसानों की सभी श्रेणियों को तो जाति-समुदाय की पहचान के पार इस आंदोलन ने एकताबद्ध किया ही है, ग्रामीण समाज में मजदूरों, व्यापारियों, नौकरीपेशा लोगों को भी प्रभावित किया है, जिनका जीवन अनेक रूपों में कृषि-अर्थव्यवस्था  से जुड़ा रहता है। यहाँ तक कि शहरी मजदूरों, गरीबों, मध्यवर्ग के संवेदनशील हिस्सों तक यह संदेश पहुंचता जा रहा है कि चंद कॉरपोरेट घरानों के हाथ खाद्यान्न के असीमित भंडारण की इजारेदारी (monopoly ) कायम होने के बाद मंहगाई आसमान छूने लगेगी।

कुछ बुद्धिजीवियों का यह सुझाव है कि आंदोलन को खुलकर राजनीतिक स्वरूप में सामने आना चाहिए, वरना इसका कोई सार्थक राजनीतिक प्रतिफलन नहीं होगा। आंदोलन या तो विपक्ष की राजनीति के साथ खुलकर खड़ा हो अथवा किसान आंदोलन स्वयं एक भाजपा-विरोधी राजनीतिक मंच का एलान करे। दरअसल, ऐसा कहने वालों के मन में अतीत के आंदोलनों, विशेषकर 74 के जेपी आंदोलन या फिर अन्ना आंदोलन जैसे मॉडल हैं, जब छात्रों-युवाओं के सवालों से शुरू हुए आंदोलनों  या भ्रष्टाचार, तानाशाही, लोकपाल के लिए कानून जैसे मुद्दों से शुरू हुए आंदोलनों से विपक्षी दल जुड़ गए, नए दलों का जन्म हुआ और आंदोलन का अंत सत्ता परिवर्तन में हो गया।

पर, अतीत के  बड़े आंदोलनों से, जो सत्ता परिवर्तन तक गए, इस आंदोलन का एक बुनियादी फर्क है। यह पहली बार हो रहा है कि उत्पादन के बुनियादी ढांचे और उस पर मालिकाने का प्रश्न,  बेसिक स्ट्रक्चर का सवाल इस  आंदोलन की चिंताओं के केंद्र में है। इसके पहले के बड़े आंदोलन हमेशा superstructural सवालों पर, भ्रष्टाचार जैसे  सवाल पर, या फिर नए कानून बनाने के लिए, मसलन लोकपाल के लिए हुए।

किसान नेताओं की समझ बिल्कुल सही है कि आंदोलन के बुनियादी ढांचागत और नीतिगत सवालों को विपक्षी पार्टियों के भरोसे, उनके ऊपर दांव लगा कर बिल्कुल नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि वे सब मूलतः उन्हीं नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के समर्थक हैं, जिनसे ये कृषि कानून निकले हैं, वरना सत्ता परिवर्तन हो जाय तब भी,  उनके आंदोलन का वही हश्र होगा जो अतीत के ऐसे आंदोलनों का हुआ था। बेशक, आंदोलन की राजनीतिक परिणति होनी चाहिए, सत्ता परिवर्तन जिसका एक परिणाम होगा, पर उसके साथ ही आर्थिक नीतियों में रैडिकल बदलाव होना चाहिए और किसान की खुशहाली, रोजगार, आमदनी को केंद्र में रखकर कृषि-विकास का नया नीतिगत ढांचा सामने आना चाहिए। विपक्ष किसान-आंदोलन के साथ खड़ा हो रहा है, सत्ता के दमन का विरोध कर रहा है,यह स्वागतयोग्य है और स्वाभाविक है, पर इसका लक्ष्य राजनैतिक लाभ और सत्ता परिवर्तन के लिए आंदोलन के उपयोग तक सीमित हो सकता है। जबकि किसान आंदोलन का लक्ष्य इसके आगे तक जाता है, वह नीतिगत बदलाव के बिना अधूरा है।

इसीलिए इस बार यह जनांदोलन एक नए गतिपथ पर बढ़ रहा है, इससे अतीत के किसी मॉडल का अनुकरण करने की मांग करना अनैतिहासिक होगा और इसके साथ अन्याय होगा। इस पर कृत्रिम ढंग से अतीत का कोई मॉडल impose करना इसके स्वाभाविक विकासक्रम को बाधित करेगा और काउंटर-प्रोडक्टिव साबित हो सकता है। 

दरअसल, आंदोलन का स्वाभाविक विकास हो रहा है। कृषि-क्षेत्र पर कॉरपोरेट कब्जे के खिलाफ खुला वर्गीय टकराव तो पहले से आंदोलन की मूल अन्तर्वस्तु है ही, अब यह क्रमशः मोदी-भाजपा सरकार के विरुद्ध अधिकाधिक खुली राजनैतिक दिशा की ओर बढ़ता जा रहा है।

जाहिर है, कृषि के कारपोरेटीकरण  पर मोदी सरकार ने जिस तरह दांव लगा दिया है और किसानों के आक्रोश और नफरत का जिस तरह अब यह निशाना बना चुकी है, कृषि कानूनों को hold कर अथवा वापस कर ज्यादा से ज्यादा वह और अधिक टकराव से किसी तरह बच सकती है, पर किसानों का विश्वास पुनः हासिल कर पाना उसके लिए लगभग असंभव है। किसान-पक्षीय नई नीतियों की इससे उम्मीद तो किसान पहले ही छोड़ चुके हैं। जाहिर है, किसानों के प्रबल समर्थन से देश राजनैतिक सत्ता परिवर्तन की तरफ बढ़ता जाएगा, जिसकी मुखर शुरुआत उप्र के चुनाव परिणाम से हो सकती है, इसका ripple effect मार्च-अप्रैल में होने वाले बंगाल असम, तमिलनाडु, केरल आदि चुनावों में भी पड़ना तय है।

पर यह आंदोलन यहीं रुकेगा नहीं। यह अन्य संघर्षरत तबकों के साथ मिलकर वैकल्पिक अर्थनीति और राजनीति की ओर बढ़ने का potential अपने अंदर समेटे हुए है।

किसान-आंदोलन कॉरपोरेट अर्थनीति के बरअक्स केवल जनपक्षीय, किसान-पक्षीय नई अर्थनीति के लिए ही नहीं लड़ रहा है, वरन बहुलतावादी मूल्यों और साझे संघर्षों पर आधारित समावेशी राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्र के नए मॉडल के साथ एक नए राजनीतिक तंत्र (polity) के लिए भी लड़ रहा है, जहां राष्ट्र का अर्थ जनता होगा, जहां विरोध और असहमति का अधिकार non-negotiable होगा, जहां नीति निर्माण का आधार जनता के गरिमामय, आजीविका सम्पन्न जीवन के लिए environment-friendly, sustainable विकास होगा, न कि कॉरपोरेट मुनाफाखोरी।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Kisan agitation
anti-BJP
farmers protest
trade unions
kisan
BJP

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दक्षिण अफ्रीका में सिबन्ये स्टिलवाटर्स की सोने की खदानों में श्रमिक 70 दिनों से अधिक समय से हड़ताल पर हैं 

मुंडका अग्निकांड: सरकारी लापरवाही का आरोप लगाते हुए ट्रेड यूनियनों ने डिप्टी सीएम सिसोदिया के इस्तीफे की मांग उठाई

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता: किस चीज़ से डरते हैं वे?
    09 Jan 2022
    गोरख पाण्डेय ने 43 साल पहले देश के हाकिमों से पूछा था कि “किस चीज़ से डरते हैं वे/तमाम धन-दौलत/ गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद?”, आज भी ये सवाल मौज़ू है और साथ ही उसका जवाब भी।
  • UP
    असद रिज़वी
    यूपी चुनाव हलचल: गठबंधन के सहारे नैया पार लगाने की कोशिश करतीं सपा-भाजपा
    09 Jan 2022
    यूपी में चुनावों का ऐलान हो चुका है, सबकी नज़र सपा और भाजपा पर है, बसपा, रालोद और कांग्रेस भी चुनावी गणित में अपना अपना हिस्सा लेने की आस लगाए बैठी हैं। आइए गठबंधनों के लिए अंदर ही अंदर चल रही हलचल…
  • omicron
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: ओमीक्रॉन आला रे...
    09 Jan 2022
    हम तो हर मेहमान का स्वागत करते हैं। आखिर 'अतिथि देवो भव', यही हमारी सभ्यता है। और अगर मेहमान विदेशी हो तो कहना ही क्या! विदेशी अतिथि तो हमें बहुत ही पसंद हैं। क्या पता, निवेश करने ही आया हो।
  • पीएम सुरक्षा चूक पर धुंध, चन्नी की चमक और सूबाई चुनाव
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    पीएम सुरक्षा चूक पर धुंध, चन्नी की चमक और सूबाई चुनाव
    08 Jan 2022
    पंजाब और पंजाबियत के बचाव में पुरजोर ढंग से बोलकर क्या मुख्यमंत्री चन्नी ने अपने सूबे में अपनी हैसियत मजबूत कर ली है? #HafteKiBaat के नये एपिसोड में इन सवालों के अलावा पांच राज्यों में चुनाव की…
  • संभावित लॉकडाउन के ख़तरे के बीच बिहार-यूपी लौटने लगे प्रवासी श्रमिक !
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    संभावित लॉकडाउन के ख़तरे के बीच बिहार-यूपी लौटने लगे प्रवासी श्रमिक !
    08 Jan 2022
    घर लौटने को लेकर मुंबई में अफरातफरी का माहौल सामने आया है। मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर इन श्रमिकों की भीड़ देखी गई। घर पहुंचने के लिए बिहार-उत्तरप्रदेश के इन श्रमिकों को ट्रेन में जगह नहीं मिल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License