NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
कॉर्पोरेट-हिंदुत्व ’राष्ट्रवाद’ का जवाब बनता किसान आंदोलन
किसानों के आंदोलन के जरिए उठाए जा रहे नारे और इस्तेमाल किए जा रहे प्रतीकों ने उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष को रेखांकित किया है, जिसने वास्तविक राष्ट्रवाद की धारणा को ऊपरी सतह पर लाकर खड़ा कर दिया है वो राष्ट्रवाद जो आज़ाद भारत की नींव बना था। 
प्रभात पटनायक
19 Dec 2020
Translated by महेश कुमार
 किसान आंदोलन

किसान आंदोलन एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) या कृषि को कॉर्पोरेट के हाथों सौंपने के खिलाफ लड़ाई से आगे बढ़ गया है। आंदोलन ने अपनी प्रथा को निभाते हुए उस कहानी को रास्ते पर ला दिया है जो नव-उदारवाद के अधिपत्य की प्रचारित कहानी के विपरीत है। और जैसा कि आने वाले दिनों में नरेंद्र मोदी सरकार आंदोलन को तोड़ने के लिए छल-कपट का इस्तेमाल बढ़ाने वाली है, तो इससे वापसी और अधिक विस्तृत, स्पष्ट, और प्रतिरोधी होती जाएगी। 'राष्ट्र' के बारे में जो कहानी है,उस पर यहाँ उदाहरण देकर स्पष्ट करना चाहता हूं।

’राष्ट्र’ की अवधारणा 17 वीं शताब्दी में यूरोप में पूंजीपति वर्ग के उदय के साथ स्पष्ट हुई थी और 19 वीं शताब्दी के अंत में वित्त पूंजी के उदय से यह विशेष रूप से प्रमुख हो गई थी।  रुडोल्फ हिल्फर्डिंग ने नोट किया था कि वित्त पूंजी की विचारधारा ‘राष्ट्रीय विचार’ या राष्ट्र के विचार की महिमा है।

वित्त पूंजी ने ’राष्ट्र’ का महिमामंडन किया क्योंकि यह एक साथ इस दृष्टिकोण को प्रचारित करता है कि राष्ट्र ’खुद’ इसका पर्याय है, कि, राष्ट्र के हित वित्त पूंजी के हित के समान हैं। इस प्रकार, ‘राष्ट्र’ के महिमामंडन के साथ-साथ उसकी वित्त पूंजी को ‘राष्ट्र’ की पहचान माना जाने लगा, जिसे बाद में अन्य देशों की वित्तीय पूंजी के खिलाफ संघर्ष में इस्तेमाल किया गया, जो कि अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता की अवधि के दौरान हुआ था।

इस पहचान का परिणाम लोगों को 'राष्ट्र' से अलग करना था। ‘’राष्ट्र’ लोगों के ऊपर एक बड़ी भारी संस्था बन गया, जिसके लिए लोगों ने केवल बड़े बलिदान दिए, लेकिन जो विशेष रूप से आम लोगों के सांसारिक और व्यावहारिक मुद्दों से संबंधित नहीं थे, जैसे लोगों के भौतिक जीवन की स्थिति आदि। इसकी यानि राष्ट्र की चिंता केवल सत्ता और महिमा से थी, न कि लोगों के कैलोरी सेवन करने या उनके स्वास्थ्य से थी।

यह अवधारणा औपनिवेशिक संघर्ष के दौरान तीसरी दुनिया में उभरी ‘राष्ट्र’ की अवधारणा से पूरी तरह अलग थी। उपनिवेशवाद ‘राष्ट्र’ के लिए दमनकारी था क्योंकि इसने लोगों पर अत्याचार किया; इस लिए लोगों ने 'राष्ट्र' की पहचान के साथ अपने को जोड़ा था। भारत में 1931 के कराची कांग्रेस प्रस्ताव में ‘राष्ट्रीय’ मुक्ति’ के एजेंडे की व्याख्या की गई थी और अन्य देशों में इसी तरह के दस्तावेज तैयार किए गए जिनमें मुख्य बात आम लोगों के जीवन में  सुधार लाने पर ज़ोर दिया गया था। 

यूरोपीय ‘राष्ट्रवाद’ से इस अंतर का मुख्य कारण इस तथ्य में मौजूद है कि उसे अपने-अपने देशों में नियंत्रित मीडिया के माध्यम से अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता में लगी वित्त पूंजी ने चैंपियन किया और उनका प्रचार किया था, जबकि इसके विपरीत भारत जैसे देशों में औपनिवेशिक विरोधी संघर्ष का वर्गीय आधार था जिसने इस सामाजिक संघर्ष में बड़े पूँजीपतियों के अलावा मज़दूर, किसान, छोटे उत्पादक और छोटे पूँजीपतियों को भी शामिल का लिया था,  जिनहोने खुद को औपनिवेशिक निज़ाम के तहत अधीन भी महसूस किया था।

यद्द्पि, नव-उदारवाद के आने से हमारे यहाँ एक वैचारिक प्रति-क्रांति हो गई है। यूरोपीय प्रकार के ‘राष्ट्रवाद’ का गुणगान जहां राष्ट्र को लोगों के ऊपर माना गया था, और उसे कॉर्पोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र के समान बनाया गया था, उसे भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों में नव-उदारवादी पूंजीवादी निज़ाम के युग में पदोन्नत किया गया था। यह सच है कि इस दौरान अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता शांत हो गई थी, लेकिन यूरोपीय शैली का 'राष्ट्रवाद' अभी भी वित्त पूंजी के हितों के लिए उपयोगी है। 

मूल रूप से ’राष्ट्र’ और कॉरपोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र के बीच की पहचान को बढ़ावा देते हुए मूल रूप से यह दिखावा करने की कोशिश की गई कि कुलीन वर्ग की आर्थिक विकास के बारे में चिंता सबको लाभ पहुंचाने के लिए है। और जब इस दावे की पोल नव-उदारवादी पूंजीवाद के संकट के कारण खुलने लगी, तो फिर इस दावे को सिरे लगाए बिना, इसकी पहचान को फिर से स्थापित करने का एक नया तरीका खोजा गया। यह एक वैकल्पिक आध्यात्मिक यानि गूढ अवधारणा, 'हिंदू राष्ट्र', की अवधारणा है जिसे फिर से लोगों के ऊपर खड़ा कर दिया गया है, और इसे लागू करने के लिए लोगों को फिर से बलिदान करने के लिए कहा जा रहा है, और जिनकी नज़रों में फिर से लोगों के ज़िंदा रहने के हालात का मामूली महत्व है ।

पिछले छह वर्षों की यही एक प्रमुख कहानी रही है, जिसे हिंदुत्व की वकालत करने वालों ने जमकर उछाला और यह नव-उदारवादी पूंजीवादी के संकट दौरान की अवधि में अस्तित्व में आया जो कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठबंधन की चढ़ाई को दर्शाता है।

मोदी इस बात को लेकर किसी को भी संदेह नहीं रखना चाहते है कि ‘राष्ट्र’ से उनका तात्पर्य क्या है क्योंकि वे खुद कॉरपोरेट-वित्तीय कुलीन वर्ग को राष्ट्र का धन ‘निर्माता’ कहते हैं। इससे उनका साफ मतलब ये है कि यदि 'राष्ट्र' को समृद्ध करना है, तो इन 'धन सृजनकर्ताओं' को खुश रखना होगा। संक्षेप में मोदी जी का कहने का अर्थ ये हाकी कि देश का हित, इस कुलीन वर्ग के हित के समान है। आरएसएस द्वारा प्रस्तावित तथाकथित हिंदू राष्ट्र वास्तव में कॉर्पोरेट-वित्तीय कुलीनतंत्र की एक तानाशाही है, और यहां तक कि उसमें भी मुट्ठी भर कुलीन वर्ग, विशेष रूप से उनके हित में काम करने वाले। 

एकात्मक राष्ट्र की ओर बढ़ते कदम इस एजेंडे का हिस्सा है। एक संघीय राष्ट्र में जहाँ राज्य सरकारों के पास महत्वपूर्ण संसाधन और निर्णय लेने की शक्तियाँ होती हैं, जैसे छोटे स्थानीय बुर्जुआ, छोटी घरेलू इकाइयों या यहाँ तक कि राज्य सरकार के उद्यमों के साथ कुछ बिखरे विकास की गुंजाइश होती है, और ये सब बड़े कॉर्पोरेट-वित्तीय कुलीन वर्ग के स्वामित्व वाली बड़ी इकाइयों के साथ विकसित होता है। लेकिन, अगर संसाधनों और निर्णय लेने की शक्ति को केंद्रीकृत किया जाता है, तो ऐसे बिखरे हुए विकास की गुंजाइश तेजी घट जाती है।

मुट्ठी भर कॉरपोरेट-वित्तीय कुलीन वर्गों के सदस्यों ने केंद्र सरकार का पक्ष लिया है क्योंकि वे इसके वित्तीय समर्थक हैं, जिन्हे इस समर्थन के एवज़ में अपनी मर्ज़ी हाँकने की छूट मिलती हैं, जैसा कि 1930 के दशक में जापान में शिंको ज़ाइबात्सु के साथ हुआ था। मोदी के अधीन संसाधनों और शक्तियों का अपार केंद्रीकरण हो रहा है और वे इजारेदार पूंजीपति घरानों के प्रभुत्व को बनाने में उनके सहयोगी है। और अब इजारेदारी पूंजी के प्रभुत्व को पूरा करने के लिए किसानों की बलि दी जा रही है।

लेकिन यहाँ केंद्रीकरण का मतलब केवल राज्य सरकारों के खिलाफ केंद्र सरकार की मजबूती नहीं है। इसका अर्थ केंद्र सरकार के भीतर भी एक केंद्रीकरण से है, जहाँ सारी शक्ति एक "नेता" के हाथों में केंद्रित हो जाती है, जो वह शक्तिशाली/तानाशाह बन जाता है, जो हमेशा ऐसा संकेत देता है कि वह जानता है कि लोगों के लिए क्या अच्छा है, और क्या गलत है। कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ का ‘राष्ट्रवाद’ ‘नेता’ को राष्ट्र के प्रतीक के रूप में परिभाषित करता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि राज्य के अंग, जैसे कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी, मोदी के किसी भी विरोधी को 'राष्ट्र-विरोधी' मानती हैं, और इसलिए उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता हैं।

किसान आंदोलन की प्रथा ने न केवल ‘राष्ट्र’ की इस अवधारणा पर सवाल उठाया है, बल्कि कामकाजी लोगों के साथ पहचान वाली वैकल्पिक राष्ट्र की अवधारणा को मुख्य केंद्र ला दिया है। मोदी के इस दावे को खारिज करने के बाद कि विवादित तीन कृषि-कानून उनके पक्ष में हैं, मोदी की उस धारणा को भी बड़ा झटका है कि, नेता को सबसे अच्छा पता है, जो कॉर्पोरेट-हिंदुत्व ’राष्ट्र की अवधारणा का एक मुख्य विश्वास’ है।

कई लोगों ने किसान की बात नहीं सुनने या उनसे सार्थक बात न करने के लिए केंद्र की सरकार की आलोचना की है। हालांकि, सुनना 'राष्ट्र' की इस अवधारणा में मूल रूप से विरोधाभासी है, जो वार्ता के माध्यम से राष्ट्रीय एकता के निर्माण में नहीं, बल्कि 'राष्ट्रीय' एकता के पूर्ववर्ती अस्तित्व में विश्वास करता है, और जो धारणा 'नेता' में परिलक्षित होती है, जो सवाल करता है कि किसकी बुद्धिमत्ता का वास्तविक है या तो "राष्ट्र-विरोधी" है या ज्ञान की कमी से उत्पन्न भोलेपन में निहित है

मुकेश अंबानी के जियो मोबाइल फोन नेटवर्क का किसान आंदोलन द्वारा बहिष्कार करने का आह्वान; मोदी सरकार के पुतले के साथ-साथ अंबानी और अदानी का पुतला जलना; जो नकली ‘राष्ट्र’ के नाम पर कुछ व्यापारिक घरानों के लिए ‘धन सृजन’ करने के मोदी के  षड्यंत्र या धारणा के प्रति किसानों में जागरूकता का संकेत हैं।

विडंबना यह है कि किसानों के जियो के बहिष्कार के आह्वान के ठीक एक दिन पहले, अंबानी ने जियो 5  के लॉन्च की घोषणा की थी। इसे हर टीवी चैनल पर एक बड़ी ’राष्ट्रीय’ उपलब्धि के रूप में दिखाया गया था। जियो उत्पादों का बहिष्कार करने का किसानों का आह्वान केवल एक विशिष्ट रणनीतिक चाल नहीं है; बल्कि यह उस पूरी कहानी के विपरीत है जो चंद कॉरपोरेट घरानों को ‘राष्ट्र‘ के समान मानता है।

लेकिन किसान सिर्फ इस कहानी का मुकाबला नहीं कर रहे हैं; बल्कि वे एक वैकल्पिक और बिलकुल विरुद्ध कहानी/धारणा पेश कर रहे हैं, जो औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष का वास्तविक राष्ट्रवाद रहा है। विरोध स्थलों पर एक आम नारा है जहां वे एकत्र हुए हैं: जय भारत, जय किसान, जिसका दोहरा महत्व है। एक ओर बात कि यह किसानों के साथ ‘राष्ट्र' की पहचान करता है, अर्थात, मेहनतकश लोगों से राष्ट्र बंता है। दूसरी ओर, जो महत्वपूर्ण है वह यह कि यह भारत माता की जय नहीं कहता है।  जो ‘राष्ट्र’ को एक माँ के रूप की कल्पना करता है, जिसे फिर लोगों को ऊपर माना जाता है, और इसलिए इसके लिए केवल बलिदान करने की अपेक्षा की जाती हैं। यह कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ द्वारा प्रचारित ‘राष्ट्रवाद’ की विशेषता है जो लोगों को राष्ट्र की भलाई के लिए कॉरपोरेट्स के लिए बलिदान करने को कहता है।

इसी तरह, किसानों द्वारा हिंदी के बजाय पंजाबी और अन्य भाषाओं में नारे लगाना देश की क्षेत्रीय-भाषाई राष्ट्रीयताओं की बहुलता में एकता को दर्शाती है, जो एक केंद्रीकृत ‘राष्ट्र' की धारणा से बिलकुल अलग है'। 

किसान आंदोलन के प्रतीक चिल्ला-चिल्ला कर इस बात को कह रहे हैं। किसान आंदोलन द्वारा इस्तेमाल किए गए सभी प्रतीक, सरकार द्वारा इसके खिलाफ उठाए गए रुख की प्रकृति, संक्षेप में इसकी पूरी प्रथा, कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ द्वारा प्रचारित 'राष्ट्रवाद' की सशक्त अस्वीकृति तो है साथ ही यह आंदोलन वास्तविक राष्ट्रवाद की धारणा को पुन परिभाषित करती है, जिसने उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के माध्यम से आज़ाद भारत की नींव रखी थी। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Kisan Movement Counters Corporate-Hindutva ‘Nationalism’ Narrative

Nationalism
Hindutva
Farmer slogans
Anti-colonial Struggle
Farmer protests
Hindutva-Corporate Alliance
Kissan Movement
Centralised nation

Related Stories

हापुड़ अग्निकांड: कम से कम 13 लोगों की मौत, किसान-मजदूर संघ ने किया प्रदर्शन

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

फ़ासीवाद से मुक्ति के लिए हिंदू धर्म को एक सांस्कृतिक आंदोलन चाहिए

2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान

‘(अ)धर्म’ संसद को लेकर गुस्सा, प्रदर्शन, 76 वकीलों ने CJI को लिखी चिट्ठी

सेना का हेलीकॉप्टर क्रैश, किसानों के केस वापसी पर मानी सरकार और अन्य ख़बरें।

किसान आंदोलन ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रहा है

किसान आंदोलन: केंद्र ने किसानों को भेजा प्रस्ताव, मोर्चे ने मांगा स्पष्टीकरण, सिंघु बॉर्डर पर अहम बैठक

रेल रोको: आख़िर क्यों नहीं हो सकता आरोपी मंत्री बर्खास्त, पूछें किसान

कर्नाटक : राज्य भर से किसान विधानसभा पर प्रदर्शन करने पहुंचे, एफ़आरपी बढ़ाने की कर रहे हैं मांग


बाकी खबरें

  • putin
    एपी
    रूस-यूक्रेन युद्ध; अहम घटनाक्रम: रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश 
    28 Feb 2022
    एक तरफ पुतिन ने रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश दिया है, तो वहीं यूक्रेन में युद्ध से अभी तक 352 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • mayawati
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है
    28 Feb 2022
    एसपी-आरएलडी-एसबीएसपी गठबंधन के प्रति बढ़ते दलितों के समर्थन के कारण भाजपा और बसपा दोनों के लिए समुदाय का समर्थन कम हो सकता है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,013 नए मामले, 119 मरीज़ों की मौत
    28 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1 लाख 2 हज़ार 601 हो गयी है।
  • Itihas Ke Panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी: आज़ादी की आखिरी जंग
    28 Feb 2022
    19 फरवरी 1946 में हुई रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी को ज़्यादातर लोग भूल ही चुके हैं. 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में इसी खास म्युटिनी को ले कर नीलांजन चर्चा करते हैं प्रमोद कपूर से.
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर में भाजपा AFSPA हटाने से मुकरी, धनबल-प्रचार पर भरोसा
    27 Feb 2022
    मणिपुर की राजधानी इंफाल में ग्राउंड रिपोर्ट करने पहुंचीं वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह। ज़मीनी मुद्दों पर संघर्षशील एक्टीविस्ट और मतदाताओं से बात करके जाना चुनावी समर में परदे के पीछे चल रहे सियासी खेल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License