NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
विज्ञान
भारत
अंतरराष्ट्रीय
कोकण के वेलास तट पर दुर्लभ ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं को मिला जीवनदान, संवर्धन का सामुदायिक मॉडल तैयार
वर्ष 2020-21 के मार्च तक इस कछुआ प्रजाति की मादाओं ने अपने अंडे देने के लिए 451 गड्ढे बनाए हैं। इनमें रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगड जिलों के समुद्री तटों पर अब तक क्रमश: 277, 146 और 28 गड्ढे मिल चुके हैं।
शिरीष खरे
19 Jun 2021
olive ridle
नवजात ऑलिव रिडले:  ऑलिव रिडले प्रजाति की मादा कछुआ सिर्फ अपने अंडे देने के लिए समुद्र तट पर आती है। इसी प्रजाति के नर कछुए के बारे में कहा जाता है कि वह अपने पूरे जीवनकाल में कभी समुद्र किनारे रेत पर नहीं आता। वहीं, मादा कछुआ भी समुद्र तट पर एक बार में सैकड़ों अंडे देने के बाद अपने अंडों को देखने के लिए दोबारा नहीं लौटती है। (तस्वीर: मोहन उपाध्याये)

महाराष्ट्र के कोकण समुद्र तट पर रत्नागिरी जिले के मंडणगड तहसील के अंतर्गत वेलास नाम का एक छोटा-सा गांव तीन ओर पहाड़ियों और एक छोर समुद्र किनारे से घिरा है। इस गांव की विशेषता है कि यह पिछले कुछेक वर्षों से समुद्री कछुए की एक दुर्लभ प्रजाति ऑलिव रिडले के संवर्धन के लिए अपनाए गए समुदाय आधारित मॉडल के कारण दुनिया के मानचित्र पर अपनी पहचान बना रहा है।

देखा जाए तो बीते दो दशकों में यहां ग्राम-पंचायत से लेकर महाराष्ट्र राज्य वन-विभाग, स्थानीय रहवासियों, मछुआरों, स्कूल व कॉलेज के छात्रों, सरकारी कर्मचारियों, प्रकृति प्रेमियों, जीव-जंतु विशेषज्ञों, जीव-वैज्ञानिकों और चिकित्सकों तक सामुदायिक दृष्टिकोण से संचालित एक इकाई तैयार हुई है।

इस इकाई की सफलताओं से प्रेरणा पाकर अब कोकण में रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगड जिलों के 32 समुद्र तटों पर ऑलिव रिडले कछुओं को समुदाय की मदद से संरक्षण देने के प्रयास लगातार चल रहे हैं। इसी का नतीजा है कि गए एक वर्ष में इन 32 समुद्र तटों पर अपने अंडे देने के लिए ऑलिव रिडले प्रजाति की मादा कछुओं ने रिकार्ड 451 गड्ढे बनाए हैं।

मराठी में कछुआ को 'कासव' कहा जाता है और क्योंकि वेलास में रहने वाले मोहन उपाध्याये पिछले 17-18 वर्षों से समुद्री कछुए की एक दुर्लभ प्रजाति ऑलिव रिडले के संरक्षण तथा संवर्धन से जुड़े कार्यों में सतत जुटे हुए हैं, इसलिए इस पूरे क्षेत्र में उन्हें 'कासव-मित्र' के तौर पर जाता है। मोहन कई वर्षों के अपने मैदानी अनुभवों के आधार पर यह दावा करते हैं कि कोरोना महामारी के दौरान लगाए गए लॉकडाउन के कारण बीते कई महीनों में समुद्री कछुए की इस दुर्लभ प्रजाति की संख्या बढ़ी है।

अपनी इस बात की पुष्टि के लिए मोहन रत्नागिरी जिले में ही तवसाल समुद्री तट का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि इस बार वहां ऑलिव रिडले मादा कछुओं ने समुद्री किनारे पर पहुंचकर रेत में 9 गड्ढे बनाए और उनमें अपने अंडे दिए। उनके मुताबिक पिछले दस वर्षों के बाद ऐसा हुआ। इसलिए, तवसाल ग्राम-पंचायत और वन-विभाग ने समुद्री कछुए के इन अंडों की अच्छी तरह से देखभाल करने के लिए इस बार तट के नजदीक ही चारों तरफ से मजबूत जाल लगाते हुए एक संवर्धन-स्थल आरक्षित किया है।

इसी तरह, इस बार दापोली वन-विभाग क्षेत्र के अंतर्गत आडे समुद्री तट पर भी मादा कछुए ने रेत में दो गड्ढे बनाकर अंडे दिए। इस बात की सूचना आडे गांव के रहवासियों ने समुद्री किनारे से डेढ़ किलोमीटर आंजर्ले में स्थित ऑलिव रिडले कछुआ संवर्धन-स्थल के कार्यकर्ताओं को दी थी। उसके बाद कार्यकर्ता उन अंडों को आडे से आंजर्ले संवर्धन-स्थल लाए।

इस बारे में मोहन कहते हैं, "यह मादा कछुआ एक बार अंडे देने के बाद दोबारा अंडे देखने के लिए समुद्र तट पर नहीं लौटती है, इसलिए अंडे देने के लिए वह समुद्र तट पर सबसे सुरक्षित ऐसी जगह को तलाशती है जहां लोगों की भीड़-भाड़ कम हो। हालांकि, वह सामान्यत: मध्य-रात्रि को अंडे देती है लेकिन पालघर और ठाणे जिले के अनुभव बताते हैं कि जिन समुद्री तटों पर पर्यटकों की आवाजाही ज्यादा होती है वहां मादा कछुआ अंडे देने बंद कर देती है।"

वहीं, उनके मुताबिक कोरोना के कारण लगाए गए लॉकडाउन से एक अन्य फायदा यह हो सकता है कि इस दौरान मछुआरे बहुत कम बार नाव लेकर समुद्र में मछलियां पकड़ने गए, क्योंकि लॉकडाउन ने मछली बाजार को भी प्रभावित किया है, इसलिए समुद्र में मछुआरों के नावों की संख्या घटने से बहुत संभव है कि मछुआरों की नावों से टकराकर कटने या उनके द्वारा फेंके जाने वाले जालों से फंसकर मरने वाले ऑलिव रिडले कछुओं की संख्या भी घटी होगी।

एक वर्ष में कितनी बढ़ गई संख्या?

महाराष्ट्र राज्य वन-विभाग द्वारा समुद्री कछुए सहित कई दुर्लभ मछलियों की प्रजातियों के संवर्धन के लिए वर्ष 2012 में गठित स्वायत्त-संस्था 'मेंग्रोव फाउंडेशन' के आंकड़ों के अनुसार भी ऑलिव रिडले मादा कछुओं द्वारा समुद्र तट पर अंडे देने के लिए बनाए गए गड्ढों की संख्या पिछले एक वर्ष में दो गुना से ज्यादा बढ़ गई है। देखा जाए तो महाराष्ट्र में करीब 720 किलोमीटर लंबा समुद्री किनारा है। इसमें महज रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगड जिलों में ही क्रमश: 14, 14 और 4 समुद्र तटों पर ऑलिव रिडले कछुआ प्रजाति की मादाएं हर साल नवंबर से अप्रैल महीनों के बीच अंडे देती आ रही हैं। इसके लिए ये कछुआ मादाएं समुद्र तट पर 50 से 80 मीटर दूर तक करीब 18 इंच गहरा गड्ढा बनाती हैं और एक बार में उसमें 80 से 170 तक अंडे देती हैं। फिर ये कछुआ मादाएं गड्ढों में रखे अंडों को रेत से अच्छी तरह ढंककर समुद्र की ओर लौटती हैं।

'मेंग्रोव फाउंडेशन' के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष मार्च तक रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगड जिलों में ऑलिव रिडले कछुआ प्रजाति की मादाओं ने अपने अंडे देने के लिए समुद्र तट पर 233 गड्ढे अधिक बनाए। वर्ष 2019-20 में इस कछुआ प्रजाति की मादाओं ने अपने अंडे देने के लिए 228 गड्ढे बनाए थे। इनमें रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगड जिलों के समुद्री तटों पर क्रमश: 148, 65 और 15 गड्ढे मिले। वहीं, वर्ष 2020-21 के मार्च तक इस कछुआ प्रजाति की मादाओं ने अपने अंडे देने के लिए 451 गड्ढे बनाए हैं। इनमें रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगड जिलों के समुद्री तटों पर अब तक क्रमश: 277, 146 और 28 गड्ढे मिल चुके हैं।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्य करने वाले विश्व के सबसे बड़े संगठनों में से एक 'आईयूसीएन' (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर) द्वारा जारी रेड-लिस्ट में ऑलिव रिडले कछुआ प्रजाति को अति-संवेदनशील प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा, हमारे देश में इसे कानूनी रुप से संरक्षित करने के लिए 'भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972' के परिशिष्ट-I में रखा गया है।

सामान्यत: प्रशांत, हिंद और अटलांटिक महासागरों में पाई जाने वाले ऑलिव कछुए की लंबाई दो फीट तक होती है। वहीं, इस कछुआ प्रजाति का नर 40 किलोग्राम और मादा 45 किलोग्राम तक वजनी होते हैं। ऑलिव कछुआ के बारे में कहा जाता है कि यह 50 वर्षों तक जीवन-यापन कर सकता है, लेकिन इस प्रजाति के बहुत कम कछुए ही 30 वर्ष की वयस्क आयु तक पहुंच पाते हैं। अधिकतर प्रकरणों में यह 30 वर्ष की प्रजनन-योग्य आयु में पहुंचने से पहले ही मर जाते हैं।

'मेंग्रोवे फाउंडेशन' में बतौर आजीविका सहायक रत्नागिरी जिले के आंजर्ले समुद्री तट पर कार्य कर रहे अभिनय केलास्कर बताते हैं कि ऑलिव कछुआ समुद्र जल-परिस्थितिकी के संतुलन को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह समुद्र में मरी मछलियों, जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को खाता है। इस तरह, समुद्र को साफ-सुधरा रखने में मदद करता है। इसके अलावा, ऑलिव रिडले कछुआ समुद्र के एक विषैले जीव जेलीफिश को भी खाता है। यदि कुछ जेलीफिश मछुआरों के जाल में फंस जाएं तो जाल को खराब कर देते हैं। वहीं, जहां जेलीफिश होती हैं वहां छोटी मछलियां नहीं आती हैं जिससे मछुआरों को मछलियां पकड़ने में परेशानी होती है। ऐसे में यह समुद्री कछुआ जेलीफिश को खाकर उनकी संख्या को काबू में रखने का काम करता है।

यहां संकट में क्यों था ऑलिव रिडले?

'मेंग्रोव फाउंडेशन' में बतौर समुद्री जीव-वैज्ञानिक ऑलिव रिडले कछुए के संवर्धन के लिए कार्य कर रहे हर्षल कर्वे मानते हैं कि इस प्रजाति के कछुए के दो हजार अंडों में से दो-एक पिल्ले ही ऐसे होते हैं जो वयस्क होकर प्रजनन-क्रिया कर पाते हैं। दरअसल, यह कछुए समुद्री की गहराई में तैरते हैं और करीब 40 मिनट के अंतर में सांस लेने के लिए समुद्र की सतह पर आते हैं। इस दौरान कई कछुए समुद्र में मछलियां पकड़ने वाली विशालकाय नावों की चपेट में आकर मर जाते हैं या फिर ये मछुआरों द्वारा फेंके गए जालों में फंसकर दम तोड़ देते हैं। इसके अलावा, तटीय स्थलों पर इस कछुए के शिकार, बंदरगाहों के तटीय विकास, पर्यटन की योजनाओं के कारण मानवीय गतिविधियों में बढ़ोतरी और समुद्र में बड़े जीव-जंतुओं का भोजन बनने के कारण भी इनके जीवन पर खतरा बना रहता है।

हर्षल बताते हैं, "ऑलिव रिडले कछुओं के जीवन को बचाने के लिए सबसे पहले जरुरी होता है कि हम उससे संबंधित डाटा तैयार रखें और साथ ही उसे अपडेट भी करते रहें। पिछले कई वर्षों से डाटा न होने से वैज्ञानिक तौर पर विश्लेषण करना मुश्किल हो रहा था। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे द्वारा कुछ वर्षों से वन-विभाग के कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। अब उनके द्वारा डाटा इकट्ठा करने से हमें वस्तुस्थिति का पता लगाने में आसानी होगी।"

दूसरे तरफ, वर्ष 2002 में सबसे पहले वेलास गांव से ऑलिव कछुओं के संवर्धन का कार्य शुरू करने वाले 'सह्याद्रि निसर्ग मित्र, चिपलूण' संस्था के अध्यक्ष भाऊ कतदरे बताते हैं कि उन्हें तब एक शोध के दौरान समुद्र किनारे रेत में कुछ गड्ढे दिखाई दिए थे। फिर जब उन्हें गड्ढों के भीतर ऑलिव रिडले कछुओं के अंडों के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने कुछ वर्षों तक रत्नागिरी जिले की पूरी समुद्री पट्टी में एक जागरूकता-अभियान चलाया और गांव-गांव में बैठकें आयोजित करके स्थानीय लोगों को समझाया कि समुद्री कछुओं की चोरी करना कानूनी तौर पर अपराध है और इसके कारण जेल जाना पड़ सकता है।

भाऊ कतदरे अपने दो दशक पुराने अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, "हम पुलिस-कर्मी और वन-कर्मी को साथ लेकर उन दिनों पेम्फ्लेट बांटते थे और स्थानीय रहवासियों को ऑलिव रिडले कछुए के महत्त्व के बारे में समझाते थे। हमने उनसे कहा कि इसे बाजार में बेचने पर यदि आपको हजार रुपए महीने मिलते हैं तो वह काम छोड़ो और राज्य सरकार के वन-विभाग के कर्मचारियों की मदद करो। वन-विभाग का सहयोग करके उससे दो हजार रुपए लो और समुद्री कछुए को बचाने के अभियान का नेतृत्व भी खुद करो। यदि आप इस कछुए को बचाने में सफल रहे तो आप लोगों का बड़ा नाम होगा।"

इस तरह, भाऊ कतदरे ने इस समुद्री कछुए का शिकार करने वाले स्थानीय लोगों को ही उनके संवर्धन की जिम्मेदारी सौंप दी तो लोगों ने समुद्री कछुओं के अंडे चुराने और बाजार में उन्हें बेचना बंद कर दिया। उसके बाद वर्ष 2014 में 'सह्याद्रि निसर्ग मित्र' संस्था ने खुद को इस कार्य से अलग कर लिया और स्थानीय समूहों को संवर्धन से जुड़े कार्य करने का अवसर दिया। तब से वेलास गांव में ग्राम-पंचायत और वन-विभाग के संयुक्त प्रयास से स्थानीय स्तर पर ऑलिव रिडले कछुओं के संवर्धन का कार्य चल रहा है। इसके लिए वन-विभाग द्वारा संवर्धन से जुड़े कार्य में भागीदार लोगों को वेतन भी दिया जा रहा है। साथ ही, संवर्धन के लिए आवश्यक सभी सुविधाएं और संसाधन जुटाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर आजीविका की संभावना विकसित हों, इसलिए संवर्धन कार्यों को पर्यटन की कुछ गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश भी हुई हैं।

कैसे चलता है संवर्धन का सामुदायिक तंत्र?

इसके लिए संरक्षण की एक वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर प्रबंधन का सारा कामकाज चलता है। इस बारे में भाऊ कतदरे बताते हैं कि मध्य-रात्रि को जब एक मादा कछुआ किनारे की सतह पर गड्ढे खोदकर अंडे देती है और गड्ढे को रेत से ढककर समुद्र में लौटती है तो स्थानीय लोग जानते हैं कि रेत पर किस प्रकार के निशान होने चाहिए, जिन्हें देखकर यह समझा जाए कि उस जगह को खोदने पर अंडे मिलेंगे। इस तरह, स्थानीय लोगों द्वारा अंडों को कुछ घंटों के भीतर ही सुरक्षित निकाल लिया जाता है। फिर उन अंडों को नजदीक ही जालियों से ढके संवर्धन-स्थल पर लाकर रेत में उतनी की लंबाई और चौड़ाई के गड्ढे बनाकर सुरक्षित तरीके से रखे जाते हैं।

अभिनय केलास्कर के मुताबिक इस दौरान यह बात भी ध्यान रखने योग्य होती है कि समुद्र तट से अंडों के साथ वहां की रेत भी संवर्धन-स्थलों तक लाई जाती है। ऐसा इसलिए कि रेत में मादा कछुआ अंडे देते समय एक विशेष किस्म का दृव्य-पदार्थ भी छोड़ती है। यह दृव्य-पदार्थ कई तरह के विषाणुओं से अंडों की रक्षा करता है। अंडे निकालते समय अंडों की तारीखवार एक विवरण रखा जाता है, ताकि मालूम रहे कि अंडे फोड़कर कछुए के चूजे कब तक बाहर आ सकते हैं। आमतौर पर 45 से 60 दिनों के भीतर अंडे फोड़कर कछुए के चूजे बाहर निकलते हैं। एक नवजात चूजे का वजन औसतन 15 से 25 ग्राम तक होता है।

जब अंडों से कछुए के चूजे बाहर निकलते हैं तो वे अपनेआप समुद्र के पानी की ओर चलने लगते हैं। इस दौरान उन्हें बड़ी संख्या में समुद्र में छोड़ा जाता है। इस गतिविधि को वर्ष 2006 से वेलास में 'कछुआ महोत्सव' के नाम से मनाया जा रहा है। वेलास के बाद अंजरले और गवखाडी समुद्री तटों पर भी यह महोत्सव मनाया जा रहा है। इस दौरान सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक कछुओं के चूजों को समुद्र में छोड़ा जाता है। जब नवजात चूजे सैकड़ों की संख्या में समुद्र की ओर जाते हैं तो उन्हें देख पर्यटक अत्याधिक रोमांचित हो जाते हैं। सामान्यत: हर साल मार्च या अप्रैल के महीनों में यह तय किया जाता है कि महोत्सव की तारीख क्या होगी। दरअसल, यह तारीख इस अनुमान से निर्धारित होती है कि कछुए के चूजे अंडे फोड़कर कब तक बाहर आ सकते हैं।

कासव महोत्सव : समुद्री कछुओं को बचाने का पूरा अभियान पर्यटन की गतिविधियों के साथ जोड़कर इस कुछ तरह चलाया जा रहा है कि स्थानीय रहवासी न सिर्फ ऑलिव रिडले प्रजाति का महत्त्व समझ रहे हैं, बल्कि उसके अस्तित्व को अपने रोजगार का जरिया बना रहे हैं। (फाइल तस्वीर: अभिनय केलास्कर)

'कछुआ महोत्सव' के बारे में भाऊ कतदरे बताते हैं कि बड़ी संख्या में जब पर्यटक कछुओं को देखने के लिए आते हैं और गांव या उनके आसपास ही ठहरते हैं। इससे स्थानीय लोगों की भी आमदनी हो जाती है। इस तरह, यह कह सकते हैं कि लोगों की आजीविका के साथ ऑलिव रिडले कछुए के संवर्धन का काम चल रहा है। इससे लोगों को यह बात भी समझ में आ रही है कि यदि समुद्री कछुए की यह प्रजाति रहेगी, तभी उनके भी रोजगार चलेंगे।

कैसे साथ आ रहे मछुआरे, डॉक्टर और छात्र?

दिसंबर, 2018 में 'मेंग्रोव फाउंडेशन' के जरिए वन-विभाग और मत्स्य-विभाग ने मिलकर एक योजना बनाई है। इसके तहत यदि समुद्री कछुआ मछुआरे के जाल में फंस जाए और ऐसी स्थिति में मछुआरे अपना जाल फाड़कर समुद्री कछुए को सुरक्षित बाहर निकलते हुए उसे फिर से पानी में छोड़ते हैं तो मछुआरों को इसके लिए शासन की ओर से 25 हजार रुपए तक मिलेंगे। इसके लिए मछुआरों के पास प्रमाण के रुप में संबंधित वीडियो या उससे जुड़ी तस्वीरें होनी चाहिए, ताकि यह पुष्टि हो सके कि समुद्री कछुए को बचाते समय मछुआरे का जाल फट गया।

मोहन उपाध्याये के मुताबिक मछुआरों को ध्यान में रखकर बनाई गई इस योजना से समुद्र में रहने वाले ऑलिव रिडले कछुओं का जीवन सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। इससे उनकी मौतों की संख्या में कमी आएगी और उस योजना के जरिए मछुआरों को भी ऑलिव रिडले कछुओं के प्रति संवेदनशील बनाया जा सकता है।

इसी तरह, हाल ही में 'मेंग्रोव फाउंडेशन' द्वारा एक पहल की गई है, जिसके तहत ऑलिव रिडले कछुआ यदि मछुआरों की विशालकाय नाव से टकराकर या फिर अन्य कारण से यदि घायल होता है तो उसके उपचार के लिए जीव-चिकित्सक तैनात रहेगा। इस बारे में जानकारी देते हुए अभिनय केलास्कर कहते हैं, "चिकित्सक घायल समुद्री कछुए का इलाज करेगा और उसे दवाइयां देगा। जब कछुआ ठीक हो जाएगा तो उसे वापिस समुद्र में छोड़ देगा। इसके लिए रेस्क्यू सेंटर बनाए गए हैं। साथ ही चिकित्सकों के साथ कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं।"

दूसरी तरफ, मोहन उपाध्याये बताते हैं कि उनकी तरह कई कछुआ प्रेमियों द्वारा अब समुद्री कछुओं के संवर्धन के लिए गांवों के अलावा शहरों और विशेष तौर से स्कूल और कॉलेजों के छात्रों के बीच जागरण-अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान फिल्म डाक्यूमेंट्री दिखाने के बाद छात्रों से संवाद-सत्र आयोजित किए जाते हैं। वह कहते हैं, "इसका लाभ यह हो रहा है कि छात्र किसी समुद्री तट पर यदि ऑलिव रिडले कछुओं के अंडे वाले निशान रेत पर देखते हैं तो तुरंत वाट्सएप के जरिए हमसे संपर्क साधते हैं और हम तक संबंधित सूचनाएं पहुंचाते हैं। इस तरह, एक अच्छी बात यह भी है कि संवर्धन के इस सामुदायिक प्रयास में अब नई पीढ़ी भी भागीदारी निभा रही है।

(शिरीष खरे पुणे स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं l विचार निजी है )

Save environment
endangered species
Wildlife Conservation
Ecology
Maharashtra

Related Stories

कॉर्पोरेट के फ़ायदे के लिए पर्यावरण को बर्बाद कर रही है सरकार

कार्टून क्लिक: पर्यावरण को दांव पर लगाकर पर्यावरणविद् का सम्मान!

'विनाशकारी विकास' के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है देहरादून, पेड़ों के बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोग

उत्तरी हिमालय में कैमरे में क़ैद हुआ भारतीय भूरा भेड़िया

हिमाचल प्रदेश में बढ़ते भूस्खलन की वजह क्या है? लोग सड़कों का विरोध क्यों कर रहे हैं? 

मुबंई: बारिश हर साल लोगों के लिए आफ़त लेकर आती है और प्रशासन हर बार नए दावे!

स्पेशल रिपोर्ट: बनारस की गंगा में 'रेत की नहर' और 'बालू का टीला'

क्या अरब सागर को पार करते हैं चातक पक्षियों के दल?

जब 10 हज़ार पेड़ कट रहे होंगे, चिड़ियों के घोंसले, हाथियों के कॉरिडोर टूट रहे होंगे, आप ख़ामोश रहेंगे?


बाकी खबरें

  • एनबीए को आईटी नियमों से राहत, वेदांता ज़िंक प्लांट और अन्य ख़बरें
    न्यूज़क्लिक टीम
    एनबीए को आईटी नियमों से राहत, वेदांता ज़िंक प्लांट और अन्य ख़बरें
    09 Jul 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी केरल हाई कोर्ट ने नए आईटी नियमों से एनबीए को दी राहत, वेदांता ज़िंक प्लांट और अन्य ख़बरों पर।
  • उत्तर प्रदेश: ब्लॉक प्रमुख चुनाव के नामांकन के दौरान 14 जिलों में हिंसक घटनाएं, पुलिस और प्रशासन बने रहे मूक दर्शक
    असद रिज़वी
    उत्तर प्रदेश: ब्लॉक प्रमुख चुनाव के नामांकन के दौरान 14 जिलों में हिंसक घटनाएं, पुलिस और प्रशासन बने रहे मूक दर्शक
    09 Jul 2021
    उत्तर प्रदेश के कई जिलों से प्रस्तावकों के अपहरण और प्रत्याशियों के बीच गोलियां चलने की खबर है। पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया।
  • वन भूमि पर दावों की समीक्षा पर मोदी सरकार के रवैये से लाखों लोगों के विस्थापित होने का ख़तरा
    अयस्कांत दास
    वन भूमि पर दावों की समीक्षा पर मोदी सरकार के रवैये से लाखों लोगों के विस्थापित होने का ख़तरा
    09 Jul 2021
    विशिष्ट मार्गदर्शिका का अभाव और केंद्रीय निगरानी की मशीनरी न होने के कारण राज्य दर राज्य वन भूमि पर अधिकारों के दावों के मामले अलग-अलग हैं।
  • डाटा संरक्षण विधेयक जब तक कानून का रूप नहीं लेता, नई निजता नीति लागू नहीं करेंगे: वॉट्सऐप
    भाषा
    डाटा संरक्षण विधेयक जब तक कानून का रूप नहीं लेता, नई निजता नीति लागू नहीं करेंगे: वॉट्सऐप
    09 Jul 2021
    वॉट्सऐप ने मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ के समक्ष यह भी साफ किया कि इस बीच वह नई निजता नीति को नहीं अपनाने वाले उपयोगकर्ताओं के लिए उपयोग के दायरे को सीमित नहीं करेगा।
  • झुग्गियों को उजाड़ने के ख़िलाफ़ एवं उनके पुनर्वास की मांग को लेकर माकपा का नोएडा प्राधिकरण पर प्रदर्शन, सौंपा ज्ञापन
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    झुग्गियों को उजाड़ने के ख़िलाफ़ एवं उनके पुनर्वास की मांग को लेकर माकपा का नोएडा प्राधिकरण पर प्रदर्शन, सौंपा ज्ञापन
    09 Jul 2021
    सीपीआईएम ने मांग की है कि जब तक प्राधिकरण या सरकार द्वारा कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कराई जाती है तब तक इन झुग्गी बस्ती में रह रहे गरीब लोगों को वहीं पर रहने दिया जाए। और यदि किसी कारणवश उन्हें जनहित…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License