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धारा-377 को निरस्त करने के दो साल: समाज के पूर्वाग्रहों से अब भी लड़ रहा एलजीबीटी समुदाय
सुप्रीम कोर्ट ने छह सितंबर 2018 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सर्वसम्मति से भारतीय दंड संहिता की धारा-377 के कई हिस्सों को रद्द करते हुए कहा था कि यह संविधान में मिले समानता और सम्मान के अधिकार का हनन करता है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
07 Sep 2020
LGBT

दिल्ली: ऋषभ सिंह छह सितंबर 2018 के दिन को याद करते हैं जिसने उनकी जिंदगी बदल दी। दो साल पहले इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने वाली धारा-377 को निरस्त कर दिया था। उसी दिन सिंह ने अपने माता-पिता को अपनी यौन रुचि की जानकारी दी थी।

उन्होंने कहा, ‘मेरे जेहन में यह बात थी कि देश की शीर्ष अदालत भी मानती है कि मैं अपराधी नहीं हूं और इसने मुझे बाहर निकलकर अपने माता-पिता को अपनी यौन रुचि के बारे में बताने का आत्मविश्वास दिया।’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सिंह कहते हैं कि वह इसे अपना दूसरा जन्मदिन मानते हैं जब उनका दोबारा ऐसे व्यक्ति के तौर पर जन्म हुआ जो अधिक स्वतंत्र और आत्मविश्वास से लबरेज है और सुकून में है।

मुंबई में प्रौद्योगिकी के पेशवर सिंह ने कहा, ‘यह पहला कदम है और मेरा मानना है कि अगले कदम का समय आ गया है। समाज की मानसिकता में हमारे प्रति अब भी असमानता है, चाहे फिर वह विरासत कानून के मामले में हो या फिर सेरोगेसी कानून हो। अभी हमें बहुत लंबा रास्ता तय करना है।’

हालांकि, पेशे से इंटीरियर डिजाइनर सुनैना (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि इस फैसले से उनके जीवन में खास बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा, ‘सार्वजनिक रूप से मैं अपनी पहचान जाहिर नहीं कर सकती क्योंकि समाज द्वारा स्वीकार करना बहुत मुश्किल है। मैं मध्यम वर्गीय परिवार से आती हूं, जहां पर समलैंगिकता के बारे में चर्चा करने की भी मनाही है। इस फैसले ने हमारे लिए यह अच्छा किया कि कम से कम हम अपराधी नहीं माने जाते, लेकिन समाज की मानसिकता वही है।’

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने छह सितंबर 2018 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सर्वसम्मति से भारतीय दंड संहिता की धारा-377 के कई हिस्सों को रद्द करते हुए कहा था कि यह संविधान में मिले समानता और सम्मान के अधिकार का हनन करता है। धारा-377 के तहत कथित अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने पर उम्र कैद की सजा का प्रावधान था। इस फैसले का समाज के अधिकतर धड़ों ने स्वागत किया, खासतौर पर युवाओं ने इसे प्यार की जीत करार दिया।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने एलजीबीटी समुदाय जो अब एलजीबीटीक्यूआई (LGBTQI : लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीर और इंटरसैक्स) नाम से पहचाना जाता है के लाखों लोगों को आजादी देने वाले इस ऐतिहासिक फैसले को सुनाते हुए गर्ता, लियोनार्ड कोहेन, शेक्सपीयर तथा ऑस्कर विल्डे की उक्तियों को शामिल किया किया।

तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने छह सितंबर, 2018 को दिये 495 पन्नों के फैसले में आईपीसी की धारा 377 के तहत 158 साल पुराने औपनिवेशिक कानून के हिस्से पढ़ते हुए दार्शनिकों और कवियों के उद्धरणों का उल्लेख किया।

जर्मन लेखक-दार्शनिक गर्ता के प्रसिद्ध शब्द ‘आई एम वॉट आई एम’ हों या ब्रिटिश कवि लॉर्ड अल्फ्रेड डगलस की उक्ति ‘द लव दैट डेयर नॉट स्पीक इट्स नेम’ हो, या फिर कनाडाई गायक लियोनार्ड कोहेन की कविता ‘डेमोक्रेसी इज कमिंग’ हो। पूरा फैसला दुनिया के महान साहित्यकारों और विचारों की उक्तियों से भरा था।

पीठ में न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा भी शामिल थे। पीठ ने चार अलग-अलग लेकिन सहमति वाले फैसलों में व्यवस्था दी थी।

अभी लंबी है लड़ाई

बेंगलुरु के रहने वाले पेशे से लेखक शुभांकर चक्रवर्ती ने कहा कि अगले चरण में एलजीबीटी समुदाय को भी उसी तरह के नागरिक अधिकार दिए जाने चाहिए जैसा सामान्य आबादी को हासिल है। उन्होंने कहा, ‘एलजीबीटी समुदाय के लोग भी कर देते हैं। वे भी कानून का पालन करते हैं और उन्हें भी समान विशेषाधिकारों का हक है।’

चक्रवर्ती ने कहा, ‘निश्चित तौर पर स्थितियां बदली हैं। एलजीबीटी लोग अब अधिक आत्मविश्वास के साथ खुद को व्यक्त कर रहे हैं। व्यक्तिगत रूप से बढ़ रहे हैं और अब भेदभाव या उत्पीड़न के डर के बिना रिश्ते में रह रहे हैं। हालांकि, यह प्राथमिक बदलाव शहरों में और कुछ लोगों तक सीमित है। ट्रांसजेंडर लोगों की हालत में सुधार नहीं हुआ है।’

ट्रांसजेडर बिट्टू कोंडैया ने चक्रवर्ती के विचार से सहमति जताई और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समुदाय को बहुत लाभ नहीं हुआ है। धारा-377 के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन की सदस्य अंजली गोपालन ने कहा कि फैसले के बाद एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर) समुदाय बहुत मजबूत हुआ है लेकिन उन्हें और अधिकार दिए जाने की जरूरत है।

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

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