NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क़ानून रेगुलेट करता है लेकिन राजनीति तय करती है : अखिल गोगोई की निराशाजनक कहानी
पुराने मामलों में आरोपियों को फिर से गिरफ़्तार करने की यह प्रथा, जब किसी भी बड़े आरोपों में चार्जशीट दाखिल नहीं की जा सकती है, यह कार्यकारी क़दमों की न्यायिक जांच को दरकिनार करने का एक प्रयास है।
अपूर्बा के बरुआ  
25 Jun 2020
Translated by महेश कुमार
Law Regulates But Politics Governs

अखिल गोगोई एक धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील जन नेता हैं उन्होने असम में कृषक मुक्ति संग्राम समिति (KMSS) – नामक एक किसान संगठन की स्थापना की हैं। केएमएसएस भूमिहीन किसानों, ग्रामीण और शहरी गरीबों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला अग्रिम संगठन है। इसने भूमि और वन अधिकारों को हासिल कर  वन गांवों से बाढ़ पीड़ितों और आदिवासी लोगों के पुनर्वास की मांग के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाए हैं।

यह पर्यावरण के संरक्षण के लिए काम करता है जिसमें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े बांधों के निर्माण के खिलाफ लड़ाई शामिल है जो हजारों लोगों के जीवन को खतरे में डालते हैं और वनस्पतियों और जीवों का विनाश करते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अथक सेनानी के रूप में, गोगोई ने मंत्रियों से जुड़े कई बड़े घोटाले उजागर किए हैं। 2013 में, गोगोई ने खुदरा में एफडीआई के विकल्प के तौर पर किसान सहकारी और खुदरा दुकानों की स्थापना की, जो किसान को सीधे तौर पर शहरी बाजारों से जोड़ते हैं।

जनता के बीच गोगोई की लोकप्रियता राज्य द्वारा किए जा रहे अन्याय का विरोध करने और लोगों को जुटाने की उनकी क्षमता में परिलक्षित होती है; जो शांतिपूर्ण और निडरता का सबब है। लेखक के अनुसार, अखिल गोगोई की राज्य में अवैध हिरासत 2017 में एनएसए के तहत शुरू हुई थी, जिसे उच्च न्यायालय ने अवैध ठहराया था। उन्होंने सीएए-विरोधी आंदोलन का भी नेतृत्व किया क्योंकि उनका मानना है कि यह संविधान का उल्लंघन है और इसलिए भी क्योंकि इससे असम के छोटे देशज समुदायों की पहचान को खतरा पैदा हो जाएगा। सीएए के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन के बाद, राज्य ने विरोधियों के खिलाफ एफआईआर की झड़ी लगा दी और इस प्रक्रिया के माध्यम से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निरंतर और अवैध हिरासत में ले लिया है। लेखक अन्याय के खिलाफ और कार्यकर्ताओं के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक हस्तक्षेप का तर्क पेश करती है।

"जब कानून में तर्क समाप्त हो जाता है, तो कानून ही समाप्त हो जाता है।" डिक्रेटम ग्रैटियानी।

"जब तक अप्रभावित लोग उतने ही नाराज़ नहीं होंगे, जितने कि प्रभावित लोग, तब तक न्याय नहीं होगा” बेंजामिन फ्रैंकलिन 

मार्टिन लूथर किंग ने कहा था, "कहीं भी अगर न्याय नहीं होता है तो  न्याय की हर जगह मनाही हो जाती है।"

समकालीन भारत में खुद को यह याद दिलाना जरूरी है कि, जब भी जरूरी होता है, राजनीति कानून बना देती है और यहां तक कि उन्हे दोबारा बना देती है या उन कानूनों को बदल देती है और इसलिए न्यायिक प्रणाली की एक सीमा है जिसके तहत आप न्याय चाहते हैं। अखिल गोगोई का मामला भी इसी धारणा की पुष्टि करता है कि कानून रेगुलेट करता है लेकिन राजनीति तय करती है!

सामाजिक कार्यकर्ता अखिल गोगोई की लगातार हिरासत, और 12 दिसंबर के बाद से बार-बार उनकी गिरफ्तारी, हममें से उन लोगों के लिए एक बड़ी चिंता है जो कानून के शासन को भारतीय लोकतंत्र का एक प्रमुख घटक मानते हैं। आधारहीन आरोपों पर मुकदमे का सामना करना गोगोई के लिए कोई नई बात नहीं है। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो समाज के उच्च स्थानों में और सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ, और किसानों, बेरोजगारों और भूमिहीनों के अधिकारों के लिए लड़ने के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उनका सीएए विरोधी आंदोलन शुरू हुआ था, जिसमें वे बड़ी संख्या में लोगों को लामबंद करने में सफल रहे थे, जिन्होंने इस बिल को चुनौती दी थी। इस विधेयक को असम की जनसांख्यिकी को बदलने के प्रयास के रूप में देखा गया और इस प्रकार यह कानून असमिया (कानूनी निवासियों) की सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक अधिकारों को उनकी अपनी मातृभूमि पर खतरा पैदा करता था।

जांच का इतिहास

सरकार के दावों के अनुसार, गोगोई ने मोरन (ऊपरी असम) में आयोजित एक सभा में कहा, "अगर बांग्लादेश के हिंदू प्रवासियों को असम के लोगों पर थोपा जाएगा, तो यहां के लोग हथियार उठाने के लिए मजबूर हो जाएंगे।" इसलिए 13 सितंबर, 2017 को उन्हें एनएसए के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। गोगोई के संगठन, कृषक मुक्ति संग्राम समिति (KMSS) ने एनएसए के तहत उनकी नजरबंदी को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया।

गौहाटी उच्च न्यायालय ने निरोध आदेश को खारिज कर दिया और “असम सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वह सभी व्यक्तियों को शामिल कर एक विस्तृत जांच करेंगे, उनकी जिन्होने  याचिकाकर्ता के खिलाफ निवारक निरोध के आदेश की प्रक्रिया में रचनात्मक या सलाहकार की भूमिका निभाई थी और बाद में प्रक्रिया में शामिल लोगों के निवारक निरोध के आदेश के संबंध में भी ऐसा किया था। इस तरह की जाँच के माध्यम से, इस तरह का गंभीर नुकसान कहाँ और क्यों हुआ, इस बारे में एक उचित विश्लेषण किया जाना चाहिए और ऐसा करने के बाद, प्रभावी सुधारात्मक उपाय किए जाने चाहिए कि भविष्य में ऐसे नुकसान और कमज़ोरी न हों। 

अपने चरित्र के अनुरूप सरकार ने कुछ भी नहीं किया, और न्यायालय भी शायद इस मामले को भूल गया। हालाँकि, जो बात सरकार कभी नहीं भूली, वह यह कि गोगोई सरकार के इरादों के लिए एक वास्तविक खतरा है जिन इरादों को असमिया लोग अपने अस्तित्व का खतरा मानते हैं। अदालत के निर्देश के बावजूद, लगता है सरकार अभी भी प्रतिशोधी बनी हुई है क्योंकि वह गोगोई के खिलाफ आरोपों के बाद आरोपों लगा रही है। यह बात जुदा है कि लगाए गए आरोपों में से कोई भी कानून की अदालत में साबित नहीं हो सका।

गिरफ़्तारी और ज़मानत के बीच 

असम में सीए-विरोधी विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने के बाद उन्हे हिरासत में लिया गया था, जो अंततः पूरे देश में फैल गया। 12 दिसंबर 2019 को जोरहाट से उन्हें निवारक उपाय के रूप में गिरफ्तार किया गया था, जबकि विरोध प्रदर्शन जारी था। 13 दिसंबर को, गुवाहाटी पुलिस ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। गुवाहाटी मामले को 14 दिसंबर को एनआईए को सौंप दिया गया था और उन पर कुख्यात गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, 90 दिनों की अनिवार्य अवधि के भीतर पुलिस उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने में विफल रही और इस तरह उन्हें 17 मार्च को विशेष न्यायाधीश (एनआईए) ने जमानत दे दी।

फिर शिवसागर (ऊपरी असम में) पुलिस ने उन्हे एक साल पहले दर्ज किए गए एक मामले में तुरंत गिरफ्तार कर लिया। फिर 19 मार्च को शिवसागर पुलिस ने उन्हे चार दिन की पुलिस हिरासत में रखा। 26 मार्च को गोगोई को पानबाजार पुलिस स्टेशन द्वारा दर्ज़ एक अन्य मामले में जमानत मिल गई  थी। सीएए विरोध के संबंध में जनवरी में मामला दर्ज किया गया था और एनआईए द्वारा जांच की गई थी।

शिवसागर स्टेशन, डिब्रूगढ़ जिले के चबुआ पुलिस स्टेशन से जमानत पर रिहा होने से पहले 28 मार्च को उन्हें एक अन्य मामले में गिरफ्तार कर लिया गया था और वह भी उन्हे शारीरिक रूप से बिना किसी अदालत के समक्ष पेश किए ऐसा किया गया था। गोगोई की कानूनी टीम के सदस्य ने संवाददाताओं को बताया कि सरकार के अधिवक्ताओं ने अखिल गोगोई के खिलाफ दर्ज इन अन्य मामलों के बारे में अदालत को सूचित नहीं किया था।

इस बीच, एनआईए ने विशेष न्यायाधीश द्वारा दिए गए जमानती आदेश के खिलाफ गौहाटी उच्च न्यायालय के समक्ष एक आपराधिक अपील दायर की। उच्च न्यायालय ने 16-3-2020 को जारी किए गए जमानती आदेश के संचालन पर रोक लगा दी और मामले को पूर्ण पीठ के पास भेज दिया।  हालांकि, पूर्ण पीठ ने आज तक इसकी सुनवाई नहीं की है और परिणामस्वरूप वे हिरासत में है। इस मामले को तत्काल सुनने में उच्च न्यायालय की विफलता ने सभ्य समाज का ध्यान आकर्षित किया और 8 मई को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को नागरिक समाज के सात प्रमुख सदस्यों ने एक पत्र लिखा जिसमें उन्होने कार्यकर्ताओं द्वारा सहन किए जा रहे अन्याय की तरफ इशारा किया और शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया। हालांकि, 10 मई को इस लेख को लिखने के समय गौहाटी उच्च न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई की स्वीकृति नहीं दी थी।

निष्कर्ष 

नागरिक समाज ने भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐसी कार्यकारी रणनीति यानि सरकार की कारगुजारियों के परिणामों के बारे में चिंता व्यक्त की है। औरे भारत के शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं, वरिष्ठ पत्रकारों, लेखकों, कार्यकर्ताओं, पूर्व सांसदों और अन्य 30 से अधिक लोगों ने 2 अप्रैल को एक बयान जारी किया था।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि जिस तरह से गोगोई को एक के बाद एक मामले में हिरासत में लिया जा रहा है वह प्राकृतिक न्याय के मानदंडों को दरकिनार करता है और, संबंधित जमानत आदेशों को निष्प्रभावी बनाता है। यह स्पष्ट है कि सरकार द्वारा गोगोई की बार-बार की गई गिरफ्तारी का मकसद बिना किसी जांच के उन्हें हिरासत में रखना है। परिणामस्वरूप, वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अपने अधिकार से वंचित हो गए है। पुराने मामलों में आरोपियों को फिर से गिरफ्तार करने की यह प्रथा, जब किसी भी बड़े आरोपों में चार्जशीट दाखिल करने में पुलिस नाकामयाब है, यह सरकार/कार्यकारी के कदमों की न्यायिक जांच को दरकिनार करने का एक प्रयास है। यह निश्चित रूप से प्राकृतिक न्याय के मानदंडों का घोर उल्लंघन है।

उच्च न्यायपालिका को इस तरह का अन्याय सहने वाले सभी कार्यकर्ताओं के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करने की जरूरत है। गोगोई का स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है और जेल अधिकारी उन्हें उचित उपचार नहीं दे पा रहे हैं। नतीजतन, एनआईए की विशेष अदालत को उनके स्वास्थ्य की निगरानी के लिए चेक-अप और एक मेडिकल बोर्ड का गठन करने का आदेश देना पड़ा।

बीमारी के बावजूद, गोगोई को अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया है और अधिकारी केवल दोपहर में मेडिकल कॉलेज के चक्कर लगाते  हैं जब तब केवल जूनियर डॉक्टर मौजूद रहते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा अगर उनके साथ कुछ गंभीर घटना घट जाती है, खासकर कोरोना महामारी के संदर्भ में। कानूनी बिरादरी को अब न्यायिक प्रक्रिया पर नजर रखने की जरूरत है खासकर जब एक निवर्तमान प्रतिष्ठित न्यायाधीश कहता है कि कानून और कानूनी प्रणाली अमीर और शक्तिशाली के पक्ष में काम करती हैं।

(प्रोफेसर बरुआ एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद और सामाजिक स्कूल ऑफ नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के पूर्व डीन हैं)

नोट: लेख में व्यक्त राय और विचार लेखक के अपने हैं।

Courtesy: THE LEAFLET

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस लेख को भी आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-

Law Regulates But Politics Governs: The Sad Case of Akhil Gogoi

Akhil gogoi
NIA
Assam
CAA
NRC
Assam Accord
Amit Shah
BJP
North East

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • CORONA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 15 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 278 मरीज़ों की मौत
    23 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 15,102 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 67 हज़ार 31 हो गयी है।
  • cattle
    पीयूष शर्मा
    यूपी चुनाव: छुट्टा पशुओं की बड़ी समस्या, किसानों के साथ-साथ अब भाजपा भी हैरान-परेशान
    23 Feb 2022
    20वीं पशुगणना के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पूरे प्रदेश में 11.84 लाख छुट्टा गोवंश है, जो सड़कों पर खुला घूम रहा है और यह संख्या पिछली 19वीं पशुगणना से 17.3 प्रतिशत बढ़ी है ।
  • Awadh
    लाल बहादुर सिंह
    अवध: इस बार भाजपा के लिए अच्छे नहीं संकेत
    23 Feb 2022
    दरअसल चौथे-पांचवे चरण का कुरुक्षेत्र अवध अपने विशिष्ट इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना के कारण दक्षिणपंथी ताकतों के लिए सबसे उर्वर क्षेत्र रहा है। लेकिन इसकी सामाजिक-राजनीतिक संरचना और समीकरणों में…
  • रश्मि सहगल
    लखनऊ : कौन जीतेगा यूपी का दिल?
    23 Feb 2022
    यूपी चुनाव के चौथे चरण का मतदान जारी है। इस चरण पर सभी की निगाहें हैं क्योंकि इन क्षेत्रों में हर पार्टी की गहरी हिस्सेदारी है।
  • Aasha workers
    वर्षा सिंह
    आशा कार्यकर्ताओं की मानसिक सेहत का सीधा असर देश की सेहत पर!
    23 Feb 2022
    “....क्या इस सबका असर हमारी दिमागी हालत पर नहीं पड़ेगा? हमसे हमारे घरवाले भी ख़ुश नहीं रहते। हमारे बच्चे तक पूछते हैं कि तुमको मिलता क्या है जो तुम इतनी मेहनत करती हो? सर्दी हो या गर्मी, हमें एक दिन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License