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लेबनान : बढ़ती भुखमरी और बेरोज़गारी रोकने में विफल सरकार के ख़िलाफ़ जनता का प्रदर्शन
प्रदर्शनकारियों ने कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के लिए ज़रूरी सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करते हुए गाड़ियों में प्रदर्शन किया।
पीपल्स डिस्पैच
22 Apr 2020
लेबनान

21 अप्रैल को सैंकड़ों लेबनान वासी देश के मुख्य शहरों की सड़कों पर आ गए और बढ़ती बेरोज़गारी और भुखमरी रोकने में विफल सरकार का विरोध किया। कई लोगों ने गाड़ी के अंदर रह कर और नारे लगा कर प्रदर्शन किया। जनता ने कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के लिए ज़रूरी सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करते हुए गाड़ियों में प्रदर्शन किया।

सरकार ने देश में 15 मार्च से लॉकडाउन लागू किया हुआ है। इसके अलावा सरकार से नाइट कर्फ़्यू भी लगाया है। लेबनान में अब तक कोरोना संक्रमण के कुल 677 मामलों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 21 लोगों की मौत हो गई है। 

राजधानी बैरूत में प्रदर्शनकारियों ने एक थिएटर हौल में चल रही संसद तक मार्च किया। स्पीकर नबील बेरी ने थिएटर हाल में संसद बुलाई है ताकि सोशल डिस्टेन्सिंग के नियमों का पालन हो सके।

देश में वित्तीय संकट, जो दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद अनुपात में सबसे बड़ा ऋण है, महामारी के कारण गहरा गया है। लॉकडाउन के बाद से बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी नौकरी खो दी है, मुद्रास्फीति 27% तक बढ़ गई है और बैंकों ने लॉकडाउन के समय आवश्यक नकदी से बड़ी संख्या में लोगों को वंचित करने वाले धन की वापसी पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए हैं।

स्थानीय मीडिया में हताश आर्थिक स्थितियों के कारण लोगों द्वारा आत्मदाह का प्रयास करने की कई रिपोर्टें सामने आई हैं।

पिछले महीने देश अंतरराष्ट्रीय ऋणों के भुगतान में नाकाम रहा था। संसद ने वित्तीय संकट से निपटने और कोरोना वायरस महामारी के प्रभाव से लड़ने के लिए मंगलवार, 21 अप्रैल को विश्व बैंक से ताज़ा ऋण की मांगों को मंजूरी दी।

लेबनान में यह प्रदर्शन पिछले साल के अक्टूबर से जारी हैं, जिनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री साद हरीरी के इस्तीफ़े की मांग की गई थी। उनके इस्तीफ़े के बाद कई महीनों बाद हसन दियाब को नए प्रधानमंत्री के रूप में चुना गया। 

हालांकि महामारी की घोषणा के बाद देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन रोक दिये गए थे, लेकिन वे पिछले हफ़्ते त्रिपोली में शुरू हो गए और कल तक पूरे देश में फैल गए।

देश में मौजूदा राजनीतिक अभिजात वर्ग के बीच भ्रष्टाचार की व्यापक धारणा है। लोग ग़रीबी और बेरोज़गारी के कारण के रूप में प्रणालीगत प्रवाह को दोष देते हैं और देश की राजनीतिक प्रणाली में एक ओवरहाल की मांग करते हैं।

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