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‘शर्म निरपेक्ष’ राजनीति की मंडी में विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त में तेज़ी
इस समय भाजपा के निशाने पर राजस्थान की कांग्रेस सरकार है। वहां उसके दो लक्ष्य हैं। पहला लक्ष्य तो 19 जून को होने जा रहे राज्यसभा चुनाव में दो सीटे जीतना और दूसरा, कांग्रेस सरकार को गिराकर अपनी सरकार बनाना।
अनिल जैन
17 Jun 2020
rajsthan
image courtesy; ndtv

कोरोना की वैश्विक महामारी के चलते देश-दुनिया के बाजारों में अभूतपूर्व मंदी है लेकिन भारत की राजनीतिक मंडी में जनप्रतिनिधियों की ख़रीद-फ़रोख़्त का कारोबार अबाध गति से जारी है। विधायकों के कीमतों में जबर्दस्त उछाल देखने को मिल रहा है। कोरोना काल में ही तीन महीने पहले मध्य प्रदेश से शुरू हुआ कांग्रेस विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का खेल गुजरात होते हुए अब राजस्थान पहुंच गया है।

चूंकि सरकार कोरोना नियंत्रण को अपनी प्राथमिकता सूची में नीचे धकेल चुकी है, इसलिए जनता भी अब संक्रमण के बढ़ते मामलों और उससे होने वाली मौतों के आंकडों को शेयर बाजार के सूचकांक के उतार-चढ़ाव की तरह देखने की अभ्यस्त हो रही है। विधायकों और सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त का खेल तो वह लंबे अरसे से देखती ही आ रही है, सो अभी भी देख रही है।

केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिकता अब राज्यसभा में किसी भी तरह अपना बहुमत कायम करना, विपक्ष शासित राज्य सरकारों को अस्थिर करना और कुछ ही महीनों बाद बिहार तथा बंगाल विधानसभा चुनाव की तैयारी करना है। इन सभी उपक्रमों का लक्ष्य एक ही है- कांग्रेस या कि विपक्ष मुक्त भारत। भाजपा का यह कोई दबा-छुपा लक्ष्य नहीं है। इसका ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह साल पूर्व अपने पहले कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही कर दिया था और इसको अंजाम देने का जिम्मा संभाला था पार्टी अध्यक्ष के रूप में अमित शाह ने। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद एक नहीं, कई बार सार्वजनिक तौर पर कहा कि हम देश के राजनीतिक नक्शे से कांग्रेस का नामोनिशान मिटा देंगे।

ऐसा नहीं है कि विपक्षी दलों की सरकारों को दलबदल के जरिए गिराने या उन्हें किसी न किसी बहाने बर्खास्त करने का अनैतिक और असंवैधानिक काम कांग्रेस के ज़माने में नहीं हुआ हो। कांग्रेस के शासनकाल में भी यह खेल खूब खेला गया। लेकिन भाजपा अपने लक्ष्य को हासिल करने के सिलसिले में जो हथकंडे अपना रही है और जिस तरह तमाम संस्थाओं और एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है, उससे कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व के पूर्वजों द्वारा अपनाए गए सभी तौर तरीकों की 'चमक’ फीकी पड़ गई है।

विपक्षी दलों के विधायकों-सांसदों को तोड़ने, विपक्षी सरकारें गिराने और किसी विधानसभा में बहुमत से दूर रहने के बावजूद येनकेन प्रकारेण भाजपा की सरकार बनाने पूरा खेल यानी सत्ता के लिए सियासी कैबरे का प्रदर्शन चूंकि अमित शाह के निर्देशन में होता है, लिहाजा मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा चीयर लीडर्स की भूमिका निभाते हुए बड़े मुदित भाव से उन्हें 'चाणक्य’ के रूप में प्रचारित करता है और राजनीतिक नंगई के हर आइटम को 'मास्टर स्ट्रोक’ करार देता है।

इस समय भाजपा के निशाने पर राजस्थान की कांग्रेस सरकार है। वहां उसके दो लक्ष्य हैं। पहला लक्ष्य तो 19 जून को होने जा रहे राज्यसभा चुनाव में दो सीटे जीतना और दूसरा, कांग्रेस सरकार को गिराकर अपनी सरकार बनाना। गौरतलब है कि राजस्थान में विधानसभा भाजपा अपने संख्या बल के सहारे राज्यसभा की तीन में से एक सीट ही जीतने की स्थिति में है। लेकिन भाजपा ने वहां अपने दो उम्मीदवार उतारे हैं। उसका दूसरा उम्मीदवार उसी स्थिति में जीत सकता है जब या तो उसे करीब 26 अतिरिक्त वोट मिल जाए। अगर उसे सभी 18 निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन मिल जाए तो आठ वोटों की और जरुरत रहती है। इसलिए भाजपा की कोशिश मध्य प्रदेश की तर्ज पर बडी संख्या में कांग्रेस के विधायकों तोडकर विधानसभा से उनका इस्तीफा कराने की है। ताकि उसका दूसरा प्रत्याशी भी जीत जाए और बाद में विधानसभा में शक्ति परीक्षण के जरिए सरकार भी गिराई जा सके। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में भी भाजपा को राज्यसभा की एक और कांग्रेस को दो सीट मिलना थी, लेकिन कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे से न सिर्फ उसकी सरकार गिर गई बल्कि वह राज्यसभा की दूसरी सीट भी जीतने की स्थिति में भी नहीं रही।

राजस्थान में कांग्रेस ने निर्दलीयों सहित अपने सभी विधायकों को भाजपा से बचाने के लिए जयपुर के एक रिसॉर्ट में ठहराया है। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का आरोप है कि भाजपा ने उसके विधायकों को 25-25 करोड रुपये का ऑफर दिया है। इस सिलसिले में कांग्रेस की ओर से राजस्थान पुलिस के एंटी करप्शन ब्यूरो को भाजपा की इस कोशिश के बारे में एक शिकायत भी की गई है।

राजस्थान की तरह ही गुजरात में भी राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट जीतने के लिए भाजपा पर ऐसा ही करने का आरोप है। गौरतलब है कि तीन महीने पहले मार्च में लॉकडाउन लागू होने से पहले जब राज्यसभा के चुनाव होना थे तो कांग्रेस के पांच विधायक विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे। भाजपा की कोशिश कुछ और कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे कराने की थी लेकिन लॉकडाउन लागू होने की वजह से चुनाव स्थगित हो गए थे, इसलिए विधायकों को तोडने का कार्यक्रम भी टल गया था। लॉकडाउन हटने के बाद जैसे ही दोबारा चुनाव का ऐलान हुआ वैसे ही कांग्रेस के तीन और विधायक विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए। कांग्रेस के विधायकों को इस तरह तोड़कर अपने पाले में लाने का खेल गुजरात में दो साल पहले भी राज्यसभा चुनाव के मौके पर खेला गया था। फिलहाल भाजपा की ओर से संकेत दिया गया है कि कांग्रेस के कुछ और भी विधायक जल्दी ही इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो सकते हैं। इसी तरह के संकेत झारखंड को लेकर भी मिले हैं। वहां भी कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं।

मार्च महीने में जब कोरोना संक्रमण के चलते राज्यसभा और विधान परिषदों के चुनाव टाले गए थे, तब भी यह माना गया था कि चूंकि गुजरात और राजस्थान में भाजपा पर्याप्त संख्या में कांग्रेस विधायकों को तोड़ने में सफल नहीं हो सकी, इसीलिए उसने चुनाव आयोग पर दबाव डालकर कोरोना की आड़ में चुनाव टलवाए हैं। इस आरोप को उस समय और भी वजन मिल गया जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की गुहार पर प्रधानमंत्री के 'अभूतपूर्व हस्तक्षेप’ से महाराष्ट्र विधान परिषद के ताबडतोड़ चुनाव कराए गए, ताकि ठाकरे के विधानमंडल का सदस्य होने का रास्ता साफ हो सके।

मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान की घटनाएं तो अभी हाल की है। इससे पहले बीते छह सालों के दौरान उत्तराखंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, गोवा, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी बडे पैमाने पर कांग्रेस के विधायकों से दल बदल करा कर सरकारें गिराने-बनाने का खेल खेला जा चुका है। हालांकि महाराष्ट्र में तो बाजी दो दिन में ही पलट गई और भाजपा के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देना पड़ा। ऐसी ही कोशिश सिक्किम में भी की गई थी लेकिन नाकाम रही। फिर भी वहां विधानसभा के चुनाव में खाता न खुल पाने के बावजूद 32 सदस्यीय विधानसभा सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के 15 में से 10 दस विधायकों से दलबदल कराकर विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल की हैसियत तो भाजपा ने हासिल कर ही ली। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस धमकी का उल्लेख करना भी लाजिमी होगा, जो पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल की एक चुनावी रैली के मंच से उन्होंने ममता बनर्जी को दी थी। उन्होंने कहा था, ''ममता दीदी, कान खोल कर सुन लो, आपके 40 विधायक मेरे संपर्क में हैं।’’

विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त के जरिए जहां राज्यों में सरकारें बनाने-गिराने का खेल खेला गया, वहीं राज्यसभा में पहले सबसे बडी पार्टी बनने के लिए और फिर बहुमत के नजदीक पहुंचने के लिए विपक्षी दलों के सांसदों से भी इस्तीफा करा कर दल बदल कराया गया और फिर उन्हें उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर राज्यसभा में भेजा गया। इस सिलसिले में कांग्रेस ही नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल के सांसदों को भी तोड़ा गया।

कहने की आवश्यकता नहीं कि मोदी-शाह की जोड़ी ने सत्ता में आने के बाद कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का जो ऐलान किया था, उस दिशा में उन्होंने बड़े मनोयोग से काम भी किया है। उन्हें स्वाधीनता संग्राम के धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्य से भले ही नफ़रत हो और वे जब-तब उसकी खिल्ली उडाते हों, मगर ‘शर्म-निरपेक्षता’ से उन्हें कतई परहेज़ नहीं है। उनकी राजनीति में शर्म-निरपेक्षता ने एक अनिवार्य मूल्य के रूप में जगह बना ली है। इसी मूल्य के अनुरूप उनके सारे प्रयासों को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि वे 'एक देश-एक पार्टी’ के लक्ष्य को लेकर आगे बढ रहे हैं।

यह विडंबना ही है कि देश की संसदीय राजनीति में व्याप्त दलबदल की बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए कांग्रेस की सरकार ने ही 1985 में दलबदल निरोधक कानून संसद से पारित कराया था और दलबदल के खेल का सबसे ज्यादा शिकार भी कांग्रेस ही हो रही है। वैसे दलबदल निरोधक कानून का मखौल उड़ाना तो उसके अस्तित्व में आने के कुछ समय बाद ही शुरू हो गया था, लेकिन पिछले छह वर्षों में तो इसे पूरी तरह बेमतलब बना दिया गया है।

बहरहाल इस सिलसिले में कांग्रेस से सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि आमतौर पर आखिर उसके ही विधायक यहां-वहां बड़ी संख्या में क्यों टूटते या बिकते हैं? कांग्रेस के विधायक सिर्फ उन्हीं राज्यों में नहीं टूट रहे हैं जहां पार्टी विपक्ष में है, बल्कि जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है वहां भी उसके विधेयक बिकने के लिए तैयार हैं। इस स्थिति की आख़िर क्या वजह है? पिछली सदी के आखिरी दशक में गुजरात में शंकर सिंह वाघेला की बगावत के चलते अपने विधायकों को रिसॉर्ट में ले जाकर छुपाने की जो शुरुआत भाजपा ने की थी, वह फार्मूला आज कांग्रेस को आए दिन किसी न किसी राज्य में आजमाना पड़ रहा है।

यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा इस समय केंद्र की सत्ता पर काबिज है और मोदी-शाह के खौफ की वजह से किसी की हिम्मत नहीं हो रही है कि वह भाजपा के विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त करे या किसी राज्य में भाजपा विधायकों का कोई समूह अपनी पार्टी से बगावत करने की सोचे। ज्यादा पीछे की बात न करें तो जब पार्टी पर मोदी-शाह की कमान नहीं थी और केंद्र में दस साल तक कांग्रेस की सरकार थी तब भी एकाध छोटे-मोटे अपवाद को छोड़ दें तो कोई मिसाल नहीं मिलती कि भाजपा ने कभी शिकायत की हो कि उसके विधायकों या सांसदों को खरीदने की कोशिश की जा रही है।

कांग्रेस और भाजपा के बीच यह फर्क बताता है कि गांधी परिवार का नेतृत्व भले ही कांग्रेस की एकता का आधार हो, मगर अब उस ‘सर्व स्वीकार्य’ नेतृत्व की भी पार्टी पर पकड़ पहले जैसी नहीं रह गई है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर कांग्रेस का नेतृत्व गांधी परिवार से इतर किसी और नेता के हाथ में आ जाए तो पार्टी की स्थिति क्या होगी?

कांग्रेस का आरोप है कि लोकतंत्र की हत्या करना भाजपा का चरित्र बन चुका है और वह 'ऑपरेशन लोटस’ के जरिए कांग्रेस सहित सभी विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने में जुटी है। यह आरोप अपनी जगह सही है, मगर कुछ सवाल ऐसे हैं जिनसे कांग्रेस भी मुंह नहीं मोड सकती।

अहम सवाल है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व ने अपने सांसदों, विधायकों और आम कार्यकर्ताओं को वैचारिक प्रशिक्षण देने के लिए कभी कोई कार्यक्रम चलाया? क्या पार्टी में ऐसी कोई व्यवस्था बनाई गई, जिसके तहत पार्टी के विधायकों और सांसदों का अपने शीर्ष नेतृत्व से सतत संपर्क बना रहे और वे अपनी कोई शिकायत या सुझाव पार्टी नेतृत्व को दे सकें? इन सवालों के जवाब तलाशने के साथ ही कांग्रेस को अपने यहां प्रत्याशी चयन की प्रकिया पर भी पुनर्विचार करना चाहिए।

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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