NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
पश्चिम एशिया
ईरान को अपना अगला राष्ट्रपति चुनने दें
यदि कोई विश्वसनीय सुधारवादी उम्मीदवार चुनावी मैदान में नहीं उतर पाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि किसी सर्वोच्च शक्ति को नियुक्त कर दिया गया है, बल्कि इसलिए कि सुधारवादी मोर्चा आज मतदाताओं की नज़र में बदनाम हो चुका है।
एम. के. भद्रकुमार
01 Jun 2021
Translated by महेश कुमार
ईरान के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सैय्यद अब्राहिम रायसी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत दो कार्यक्रमों के साथ की है: 26 मई 2021 को व्यवसायियों के साथ एक बैठक और तेहरान ग्रैंड बाज़ार का दौरा किया है।
ईरान के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सैय्यद अब्राहिम रायसी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत दो कार्यक्रमों के साथ की है: 26 मई 2021 को व्यवसायियों के साथ एक बैठक और तेहरान ग्रैंड बाज़ार का दौरा किया है।

पश्चिमी विश्लेषक ईरान द्वारा उदार लोकतंत्र की नियम की पुस्तिका का पालन करने से इनकार करने पर काफी उत्तेजित महसूस कर रहे हैं। तेहरान ने मंगलवार को 18 जून को होने वाले चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए संवैधानिक परिषद द्वारा योग्य पाए गए उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी की जिस पर पश्चिमी विश्लेषक आक्रोश महसूस कर रहे हैं।

एक आम सहमति इस बात पर बन रही है कि चुनाव उन शक्तियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है जो सत्ता में होते हैं। वास्तव में, वे लोकतंत्र के पश्चिमी मानदंडों को ही लागू कर रहे हैं, हालांकि 1979 की ईरानी क्रांति ने ईरान में एक अनूठी राजनीतिक व्यवस्था तैयार की थी, जो वेलायित-ए-फ़कीह, (सत्ता में न्यायविदों की संरक्षकता में बना निकाय) की अवधारणा के अभेद्य वर्चस्व पर आधारित है, लेकिन ये व्यवस्था स्वतंत्र नवीकरणीय चुनाव के सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर बनी है। 

लोकप्रिय समर्थन और इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित इस तरह की राजनीतिक व्यवस्था को क्रांतिकारी आदर्शों को संरक्षित करने और स्थिरता सुनिश्चित करने के साथ-साथ शत्रुतापूर्ण विदेशी शक्तियों के हिंसक हमलों के खिलाफ एक फ़ायरवॉल बनाने के सर्वोत्तम साधन के रूप में कल्पना की गई थी। ईरान का आधुनिक इतिहास बेशर्म और निर्दयी विदेशी हस्तक्षेपों से भरा हुआ है और यह कोई रहस्य नहीं है कि ईरानी क्रांति आज एक चौराहे पर खड़ी है।

सर्वोच्च नेता की जगह लेने का संक्रमण लंबा होता जा रहा है, जिस पर अली खामेनेई 1989 में विराजमान हुए थे जब वे मात्र 50 वर्ष के थे। इस पद की व्यवस्था के अनुसार वे आध्यात्मिक प्रमुख होने के साथ-साथ सबसे शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता के अत्यधिक जिम्मेदारियां व्यक्ति हैं जिनका सरकार की कार्यकारी, विधायिका और न्यायिक शाखाओं के साथ-साथ सेना और मीडिया पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण है।

दिलचस्प बात यह है कि विशेषज्ञों की सभा द्वारा सर्वोच्च नेता के रूप में चुने जाने से पहले खमेनेई ने 1981 से 1989 तक ईरान के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया था।

अमेरिकी प्रतिबंधों के हटने के साथ, जो कि होना तय है, ईरान के विश्व अर्थव्यवस्था में  एकीकरण होने से उसके एक नए चरण में प्रवेश करने की उम्मीद है, और देश के निर्णय लेने पर विदेशी प्रभाव और दबाव पहले की तरह तेज होना तय है। ईरान संसाधनों में संभावित रूप से काफी समृद्ध देश है और विशेष रूप से इसके खनिजों के लिए एक किस्म की आपा-धापी होने वाली है।

अनुभवी न्यूयॉर्क टाइम्स के विदेशी संवाददाता लेखक स्टीफन किंजर ने 2006 में एक अद्भुत पुस्तक लिखी थी जिसमें उन्होने 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर वर्तमान समय तक विदेशी सरकारों को उखाड़ फेंकने में अमेरिका की भागीदारी के बारे में लिखा है। 

किन्जर का तर्क है कि "दुनिया भर में सैन्य ठिकाने स्थापित करना और विदेशी सरकारों को अमेरिकी नियंत्रण में लाना कभी भी खत्म न होने वाली बात है" क्योंकि उसका मक़सद "संयुक्त राज्य अमेरिका को दूर देशों के बाजारों, संसाधनों और निवेश क्षमता को बढ़ाने और सुनिश्चित करने के लिए नए-नए तरीके तैयार करना है।" अमेरिकी हस्तक्षेप कई बार मानवीय अभिमान के जरिए आता है जिसे वह पूरक हस्तक्षेप के रूप में देखता है– जो दुनिया की नज़रों में "अमेरिकी असाधारणता के महान विचार की शक्ति है।"

ईरान के साथ अमेरिका के भयावह संबंधों में लालच और अहंकार दोनों शामिल हैं, जो संबंध राजनयिक संबंध स्थापित होने पर भी निकट भविष्य में प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मौजूद रहेंगे। अमेरिका का मानना है कि ईरान में एक विशाल तबका अमेरिकी समर्थक भावना से ओत-प्रोत है और कि हर ईरानी जुझारू रूप से इजरायल विरोधी, अमेरिका विरोधी नहीं हो सकता है या वह तबका वेलायित-ए-फकीह की प्रणाली के पक्ष में भी नहीं हैं। 

फिर, एक ऐसी धारणा भी है कि ईरान के भीतर प्रतिरोध आंदोलनों का समर्थन इतना गहरा नहीं है और लोग नहीं चाहते कि देश के संसाधनों को हिज़्बुल्लाह या हमास जैसे आतंकवादी समूहों का समर्थन करने में बर्बाद किया जाए, तब जबकि अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने की जरूरत है।

बिना किसी प्रयोगसिद्ध डेटा के इन स्वयंभू धारणाओं ने यूएसजी को ईरान में लोकतंत्र और अधिक "खुले" समाज को बढ़ावा देने के लिए 75 मिलियन डॉलर का विनियोग करने के लिए प्रेरित किया है।

किन्ज़र अपनी पुस्तक में लिखते हैं, "संयुक्त राज्य अमेरिका अन्य देशों को अपनी लाइन को  मनवाने के लिए कई तरह के साधनों का उपयोग करता है ... बीसवीं शताब्दी के अंत तक, अमेरिकियों के लिए तख्तापलट काफी कठिन रास्ता बन गया था क्योंकि विदेशी नेताओं ने अमरीका का विरोध करना सीख लिया था। तख्तापलट भी अनावश्यक हो चला था।”

जब ईरान की बात आती है, तो व्यवस्था नियंत्रण और संतुलन पर आधारित होती है जो राजनीतिक शक्ति के संकेंद्रण को रोकती है। लेकिन सत्ता के फैलाव का एक दूसरा पहलू भी है - यह न केवल एक निष्क्रिय प्रणाली बना सकता है बल्कि विदेशी प्रवेश के लिए जगह भी बनाता है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक व्यवस्था के तीन मुख्य स्तंभ - प्रेसीडेंसी, मजलिस और न्यायपालिका - विशिष्ट मुद्दों पर किसी भी मतभेद के बावजूद व्यापक रूप से एक दूसरे के साथ सद्भाव में रहे। तमाम मज़बूती के बावजूद गुटवाद ऐतिहासिक रूप से शिया राजनीति की बड़ी कमी रहा है।

ये सभी विचार तब ओर भी प्रबल हो जाता हैं जब अनुमोदित राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों की सूची की घोषणा की जाती है। द गार्जियन काउंसिल, जो राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवारों को नियुक्त करती है, सर्वोच्च नेता द्वारा नियुक्त की जाती है और छह इस्लामी न्यायविदों (फ़कीह, या, इस्लामी कानून के विशेषज्ञ) और कानून के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले छह न्यायविदों का एक संवैधानिक 12 सदस्यीय निकाय है जो मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित मुस्लिम न्यायविदों में से मजलिस द्वारा चुने जाने वाले सदस्य होते हैं। सिद्धांत के तौर पर,  सर्वोच्च नेता राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के अनुशंसित पैनल में संशोधन की मांग कर सकते हैं और ऐसा एक बार, 2005 में राष्ट्रपति चुनाव में हो चुका है। 

अब, यहाँ सब कुछ अमेरिका में लोकतंत्र की प्रथा के अनुरूप नहीं हो सकता है। लेकिन फिर, जैसा कि अमेरिका की प्रणाली है, वैसे ही किसी भी देश की खुद के इतिहास और संस्कृति और राजनीति की अत्यावश्यकताओं के संदर्भ में सबसे उपयुक्त चुनावी प्रणाली को अपनाने की पसंद हो सकती है। जब इस साल के चुनाव की बात आती है, तथाकथित सुधारवादी विंग आम सहमति के आंकड़े पर सहमत नहीं हो सके, जबकि रूढ़िवादी गुट (प्रिंसिपलिस्ट) के कई उम्मीदवार मैदान में हैं।

मुख्य न्यायाधीश सैय्यद अब्राहिम रायसी, जिन्हे फ्रंट रनर माना जा रहा है, और जाहिर तौर पर रूढ़िवादी खेमे में उनका व्यापक समर्थन है, ने 2017 के पिछले चुनाव में मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी की उम्मीदवारी का विरोध किया था, लेकिन उन्हे रूहानी के 23 मिलियन मतों के मुकाबले केवल 15.8 मिलियन मत ही मिले थे। स्पष्ट रूप से, केवल रूढ़िवादी गुट का पसंदीदा होना ही चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं कर सकता है। जब मतदाता अपनी पसंद का नेता चुनते हैं तो बड़ा आश्चर्य होता है।

रायसी के अलावा अन्य दुर्जेय उम्मीदवार भी मैदान में हैं - विशेष रूप से, आईआरजीसी के पूर्व कमांडर मोहसिन रेजाई; सईद जलीली, 2007-2013 तक ईरान के मुख्य परमाणु वार्ताकार (वर्तमान में एक एक्सपीडिएंसी काउंसिल के सदस्य जो किसी भी विवाद में संसद और अभिभावक परिषद के बीच मध्यस्थता करते हैं); अब्दोलनासर हेममती, केंद्रीय बैंक के गवर्नर (एक "उदारवादी" टेक्नोक्रेट) जिन्होंने ईरान के राजनीतिक गुटों के विरोधी विंग के दो राष्ट्रपतियों के अधीन काम किया है, तीनों उम्मीदवार पीएचडी धारक हैं।

कुल मिलाकर, पश्चिमी दृष्टिकोण के हिसाब से, ईरान में वर्तमान चुनाव के मामले में वास्तविक समस्या यह है कि एक उदारवादी उम्मीदवार का दृष्टिकोण धूमिल है। और इसका एक ऐसे समय पर गहरा प्रभाव पड़ता है जब ईरान पर प्रतिबंध हटाए जाने की संभावना है और देश 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार विकास और बढ़ोतरी के लिए ईरान अपनी पूरी क्षमता को झोंकने का प्रायास करेगा।

अप्रैल में शिकागो काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स और ईरानपोल ने ईरानी जनता के बीच एक संयुक्त सर्वेक्षण किया था और पता लगाने की कोशिश की कि ईरानी अपने देश के मामले में इस महत्वपूर्ण क्षण को कैसे देखते हैं। अमेरिकी थिंक टैंक ने अनुमान लगाया कि "ईरानी रूहानी की नीतियों को काफी नकारात्मक रूप से देखते हैं, विशेष रूप से उनकी आर्थिक नीतियों को ... जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, लगभग दो-तिहाई ईरानियों का कहना है कि वे ईरान के अगले राष्ट्रपति के रूप में रूहानी के आलोचक को पसंद करेंगे।"

कहने का मतलब यह है कि यदि कोई विश्वसनीय सुधारवादी उम्मीदवार चुनावी मैदान में नहीं आया है, तो यह इसलिए नहीं है कि किसी श्रेष्ठ शक्ति को नियुक्त किया गया है, बल्कि सिर्फ इसलिए कि सुधारवादी मोर्चा आज मतदाताओं की नजर में बदनाम है।

चुनावी में मुख्य दावेदार ज्यादातर रूढ़िवादी उम्मीदवार हैं। सर्वेक्षण में रायसी को 27 प्रतिशत मत मिला है, लेकिन फिर, ईरानियों की बहुलता यानि करीब 35 प्रतिशत ने अभी कोई निर्णय नहीं लिया हैं कि वे किसे चुनेंगे। निर्णय न लेने वाल हिस्सा चुनाव को किसी भी दिशा में मोड़ सकता है। जाहिर है, सर्वेक्षण से लगता है कि आगामी चुनाव में जनता का कोई निर्णायक पसंदीदा उम्मीदवार नहीं है। 

दिलचस्प बात यह है कि आधे ईरानियों को लगता है कि राष्ट्रपति बाइडेन के अपने कार्यकाल में  प्रतिबंधों में ढील दिए जाने की संभावना है, लेकिन बावजूद इसके अगले चार से आठ वर्षों में अमेरिका-ईरान संबंधों में सुधार की बहुत कम उम्मीद है।

मामले की जड़ यह है कि ईरान में चुनाव कभी भी विदेश नीति को लेकर नहीं होते हैं। ईरान की एक बहुत ही एनिमेटेड राजनीतिक संस्कृति है। उनके अपने प्रतीकवाद और व्यावहारिकता दोनों, इस बात से स्पष्ट हो जाते हैं कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रायसी ने बुधवार को दो कार्यक्रमों के साथ अपने चुनाव अभियान की शुरुवात की: एक, व्यापारियों के साथ बैठक और दूसरा तेहरान ग्रैंड बाजार का दौरा। 

चुनाव के परिणाम ऐसे नहीं होंगे जिनकी पश्चिमी दुनिया को उम्मीद है। यहां ईरान की विदेश नीति का कंपास रीसेट नहीं होने जा रहा है। यह सामरिक स्वायत्तता पर आधारित है। इसमें शायद पश्चिम की निराशा निहित है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Let Iran Choose its Next President

IRAN
Iran Presidential Elections
Seyyed Ebrahim Raeisi
US-Iran Relations

Related Stories

ईरानी नागरिक एक बार फिर सड़कों पर, आम ज़रूरत की वस्तुओं के दामों में अचानक 300% की वृद्धि

असद ने फिर सीरिया के ईरान से रिश्तों की नई शुरुआत की

सऊदी अरब के साथ अमेरिका की ज़ोर-ज़बरदस्ती की कूटनीति

अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई

ईरान पर विएना वार्ता गंभीर मोड़ पर 

ईरान के नए जनसंख्या क़ानून पर क्यों हो रहा है विवाद, कैसे महिला अधिकारों को करेगा प्रभावित?

2021: अफ़ग़ानिस्तान का अमेरिका को सबक़, ईरान और युद्ध की आशंका

'जितनी जल्दी तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान को स्थिर करने में मदद मिलेगी, भारत और पश्चिम के लिए उतना ही बेहतर- एड्रियन लेवी

ईरान की एससीओ सदस्यता एक बेहद बड़ी बात है

ईरान और आईएईए ने ईरान परमाणु कार्यक्रम के निगरानी उपकरणों की मरम्मत को लेकर समझौता किया


बाकी खबरें

  • जलवायु परिवर्तन पर दुनिया के आदिवासी समूहों के सम्मेलन में क्या कहा गया?
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    जलवायु परिवर्तन पर दुनिया के आदिवासी समूहों के सम्मेलन में क्या कहा गया?
    30 Aug 2021
    40 अलग-अलग आदिवासी समूहों में से 120 पारंपरिक तौर पर स्वामित्व रखने वालों ने केर्न्स (ऑस्ट्रेलिया) में जलवायु परिवर्तन पर पाँच दिन तक चली नेशनल फ़र्स्ट पीपुल्स गैदरिंग में हिस्सा लिया।
  • अवनि लेखरा
    भाषा
    पैरालंपिक में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी निशानेबाज अवनि लेखरा
    30 Aug 2021
    यह भारत का इन खेलों की निशानेबाजी प्रतियोगिता में भी पहला पदक है। टोक्यो पैरालंपिक में भी यह देश का पहला स्वर्ण पदक है। पैरालंपिक खेलों में पदक जीतने वाली वह तीसरी भारतीय महिला हैं।
  • इज़रायल का गाज़ा के वीकेंड प्रदर्शन पर हवाई हमले सहित हिंसक कार्रवाई, 30 लोग घायल
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल का गाज़ा के वीकेंड प्रदर्शन पर हवाई हमले सहित हिंसक कार्रवाई, 30 लोग घायल
    30 Aug 2021
    गाज़ा पर 14 साल से चली आ रही इज़रायली नाकेबंदी को हटाने और वस्तुओं की आपूर्ति पर प्रतिबंधों में ढील देने की मांग को लेकर गाजा में फिलिस्तीनी पिछले कई दिनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
  • इतिहास बताता है कि अमेरिका भी तालिबान की तरह ही चरमपंथी है
    एजाज़ अशरफ़
    इतिहास बताता है कि अमेरिका भी तालिबान की तरह ही चरमपंथी है
    30 Aug 2021
    अमेरिकी नेता जब दुनिया में इंसाफ़ और जम्हूरियत को बढ़ावा देने की बात करते हैं तो मुस्लिम जगत को यह बात प्रतिशोध और लोलुपता की तरह दिखायी-सुनायी देती है।
  • राजनीति: कांग्रेस अपने ही नेताओं के वैचारिक संकट और अवसरवाद की शिकार
    अफ़ज़ल इमाम
    राजनीति: कांग्रेस अपने ही नेताओं के वैचारिक संकट और अवसरवाद की शिकार
    30 Aug 2021
    हालत यह हो गई है कि अब सत्ताधारी भाजपा के साथ-साथ कुछ विपक्ष के नेता भी यह तंज कसने लगे हैं कि जब कांग्रेस खुद अपना घर नहीं ठीक कर पा रही है तो वह राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विपक्षी एकता कैसे बनाएगी?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License