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‘भक्त’ की चिठ्ठी, ‘प्रभु’ के नाम: आदरणीय नरेंद्र मोदी जी, नमस्कार!
पिछले संबोधन में आपकी विश्वगुरु वाली बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसने मुझे 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज से भी ज्यादा प्रभावित किया। यही नहीं आप मज़दूरों की मौत से कतई विचलित न हो। मुझे पता है आप नहीं हो रहे, मैं फिर भी कह रहा हूं। आप इन मौतों को गौरव प्रदान करें...।
राज कुमार
19 May 2020
Modi Bhakt
Image courtesy: India Resists

आदरणीय नरेंद्र मोदी जी,

नमस्कार!

आप संबोधन नहीं सम्मोहन करते हैं। आप जादूगर हैं। आपसे अनुरोध है कि जल्द ही एक संबोधन और करें जिसके लिये मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूं।

पिछले संबोधन में आपकी विश्वगुरु वाली बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसने मुझे 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज से भी ज्यादा प्रभावित किया। मैंने कहा अरे! मोदी जी का असली मास्टर स्ट्रोक तो यही है। दुख है कि इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया और लालची लोग देशहित को दरकिनार कर 20 लाख करोड़ की तरफ लपक पड़े।

आपसे अनुरोध है कि एक संबोधन और करें जिसमें सिर्फ विश्व गुरु बनने पर ही बात हो। मैं आपसे ये अनुरोध इसलिये भी कर रहा हूं क्योंकि मुझे पता है ये आप ही कर सकते है। इस तरह की बातों पर आप ही यक़ीन दिला सकते हैं। आप बहुत ही अच्छे ढंग से एक्सप्लेन करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग जैसा जटिल मुद्दा मैंने आपसे ही समझा कि ”असल में मौसम नहीं बदल रहा बल्कि हम बूढ़े हो रहे हैं।” अद्भुत! ऐसे आसान शब्दों में ऐसा गूढ़ ज्ञान। आप जब संस्कृत श्लोक बोलते हैं, तो क्या कहने। मुझे समझ बिल्कुल नहीं आते लेकिन भाव-विभोर हो जाता हूं। इसके अलावा ताली, थाली, मोमबत्ती वगैरह को भी एक्सप्लेन करने में आपकी क्षमता पूरी दुनिया ने देखी है। इसीलिये आपसे ही उम्मीद है। ये उम्मीद किसी और से हो ही नहीं सकती। ये आप ही कर सकते हैं। भारत को विश्वगुरु आप ही बना सकते हैं।

आप मज़दूरों की मौत से कतई विचलित न हो। मुझे पता है आप नहीं हो रहे, मैं फिर भी कह रहा हूं। आप इन मौतों को गौरव प्रदान करें। मज़दूरों को आश्वस्त करें कि उनकी तपस्या व्यर्थ नहीं जाएगी। भारत विश्वगुरु बनके ही रहेगा। इस महान कार्य में उनके प्राणों की आहुति के लिये आप उन्हें धन्यवाद करें। ताकि मज़दूर मरने से पहले आश्वस्त हो जाएं कि मर गये तो क्या, देश तो विश्वगुरु बन ही जाएगा। विश्वगुरु बनने का ये आश्वासन उनको चैन से मरने में मदद करेगा। देश के लिये प्राण न्यौछावर करने का एहसास उन्हें तब तक नहीं होगा, जब तक आप उन्हें संबोधित नहीं करेंगे। मरने से पहले उनके दिमाग में भूख, दिहाड़ी, बीवी-बच्चे, गांव, न जाने क्या-क्या उल-जुलूल विचार चल रहे होंगे।

उन्हें मुक्ति दें प्रभु। निजी स्वार्थ से मुक्ति दें। उन्हे बताएं कि देशभक्ति यही है। इसलिये एक संबोधन और करें तथा इसे जल्दी करें। वर्ना भूख से मरने में बहुत तकलीफ होगी। दूसरी तरफ एक्सिडेंट वगैरह से तो और भी दर्दनाक मौत होती है। छोटा मुंह, बड़ी बात। माना देश को विश्वगुरु बनाना आपके प्रमुख ध्येय है लेकिन मज़दूरों के प्रति भी आपका कुछ राज धर्म है। मज़दूरों की मौत की पीड़ा को कम करें। कृपा करके इन मौतों को इतना सुगम बनाएं कि ये अदृश्य हो जाएं। सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। आपसे कह रहा हूं क्योंकि मुझे पता है ऐसा आप ही कर सकते हैं। आप जादूगर हैं।

मुझे पता है कि कोरोना की रोकथाम, भोजन का प्रबंध, मज़दूरों की वापसी, रोज़गार का प्रबंध वगैरा-वगैरा सासंसारिक-भौतिक झमेले आप हल नहीं कर पाएंगे। आपने इसके लिये जन्म नहीं लिया है। मैं तो कहूंगा आपने जन्म ही नहीं लिया है बल्कि अवतार लिया है, कुछ बड़ा करने के लिये। आपने खुद भी कहा है कि हमें कोरोना के साथ जीना सीखना होगा। मुझे तो आपके कहने से पहले ही पता था। मैं तो 2014 में ही समझ गया था। आप छोटी चीजों के लिए बनें ही नहीं है। आप संसारिक मसलों की तरफ बिल्कुल ध्यान न दें। 70 साल से भी तो देश किसी तरह चल ही रहा था। आप अपना पूरा ध्यान विश्वगुरु बनने की परीक्षा पर लगाएं। दिमाग पर रत्ती भर भी बोझ न लें। हालांकि मुझे पता है आप नहीं ले रहे हैं फिर भी कह रहा हूं।

ये सब तो होनी है और होनी को कौन टाल सकता है। होनी को टाल नहीं सकते, लेकिन बुला तो सकते हैं। आप आपदा को असवर में बदलिये। हम आपके साथ हैं। आप विश्वगुरु बनने की अनहोनी को होनी करेक दिखा दें, बस। होनी टल भी जाएगी और अनहोनी हो भी जाएगी। आर्यावर्त आपका ऋणी रहेगा। आपसे एक बार फिर अनुरोध है कि देश के लोगों के बजाय देश पर ही ध्यान केंद्रित रखें। मुझे पता है कि आप ऐसा कर रहे हैं, मैं फिर भी कह रहा हूं।

आपसे एक फेवर और चाहिये था। आप देश को विश्वगुरु बनाने के साथ-साथ मुझे भी किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर या छोट-मोटा गुरु बना दें, तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। मेरे ज्ञान की झलक तो आप ऊपर देख ही चुके हैं। मैं आपके योगदान और बलिदान पर एक पुस्तक भी लिखना चाहता हूं। आपने देश को विश्वगुरु कैसे बनाया। ये पुस्तक 51 हज़ार पेज की होगी। पुस्तक पत्थर के पेज पर लिखी जाएगी और एक पेज की लंबाई 121 मीटर और चौड़ाई 51 मीटर होगी। 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज को अगर हम इस पुस्तक के लेखन और साज-सज्जा पर खर्च करें तो शायद देश का ज्यादा भला होगा। भारत के विश्वगुरु बनने की दास्तान इतिहास बन जाएगी। ये एक मौका है न इसे आप चूकें और न मुझे चूकने दें। आइये! मिलकर आपदा को अवसर में बदल दें।

आपका भक्त

...

(यह एक व्यंग्यात्मक आलेख है। लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते रहते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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