NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
आख़िर लॉकडाउन का उद्देश्य क्या है?
भारत के केंद्र और राज्य सरकारों ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए तीन हफ़्ते के लॉकडाउन को बढ़ाने की घोषणा की है। इस बीच हमें इसके उद्देश्यों पर नज़र डालनी चाहिए।
सजय जोस
15 Apr 2020
लॉकडाउन

वैश्विक स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ और एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से संबंधित डॉ देवी श्रीधर ने एक अप्रैल को ट्वीट करते हुए कहा, ‘दक्षिण कोरिया में अब तक 154 मौतें हुई हैं। किसी तरह का लॉकडाउन नहीं किया गया। ब्रिटेन में 2,352 मौतें हो चुकी हैं, पिछले 24 घंटों में ही 563 लोगों ने जान गंवाई है। तीन हफ़्ते से लागू लॉकडाउन की बड़ी सामाजिक और आर्थिक कीमत उठानी पड़ी है।’

दो हफ़्ते बाद ब्रिटेन में मौतों का आंकड़ा 11,239 पहुंच चुका है। वहीं दक्षिण कोरिया में कुलमिलाकर 222 मौतें हुई हैं। जबसे ब्रिटेन में लॉकडाउन शुरू हुआ है, तबसे लगातार कोरोना संक्रमण और उससे जान गंवाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। लॉकडाउन के दौरान वहां 10 अप्रैल तक वहां 8,681 नए मामले सामने आए हैं।

किस्मत से दक्षिण कोरिया में 10 अप्रैल के बाद नए मामलों और मौतों में कमी आ रही है। इससे आस लगाई जा रही है कि देश में कोरोना की दर अपने उच्चतम बिंदु को छू चुकी है। इस बीच 13 अप्रैल को केवल 25 नए मामले सामने आए और सिर्फ़ तीन लोगों की मौत हुई। माना जा रहा है कि दक्षिण कोरिया ने कोरोना के वक्र को सीधा करने में कामयाबी पा ली है।

दक्षिण कोरिया का रिकॉर्ड हमेशा इतना बेहतर नहीं था। संक्रमण के शुरूआती दौर में वहां की सरकार इस पर काबू नहीं पा सकी थी। 25 लाख की आबादी वाले देएगू शहर और चेओंगडो में संक्रमण के दो ‘कलस्टर’ बन गए थे। इसके बावजूद जांच, संक्रमण के शिकार लोगों के संपर्को की पहचान और सोशल डिस्टेंसिंग की आक्रामक नीति से दक्षिण कोरिया ने स्थिति पर काबू पा लिया। 

यह सफलता इसलिए भी अहम हो जाती है कि इसे बिना किसी बड़े स्तर के बंद या यात्रा प्रतिबंधों के हासिल किया गया है। दक्षिण कोरिया, ताईवान और हॉन्गकॉन्ग ऐसे देश हैं, जहां दुनियाभर में संक्रमण पर काबू पाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे लॉकडाउन के तरीके को नकारा गया है। इसके बावजूद इन चंद देशों ने संक्रमण पर काबू पाया है। इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा इसे आदर्श तरीका माना जा रहा है।

इन देशों के ठीक उलट ब्रिटेन जैसे देश हैं, जहां दुनिया का सबसे बेहतरीन स्वास्थ्य ढांचा होने के बावजूद संक्रमण पर काबू नहीं पाया जा सका। ब्रिटेन के मामले में इसकी ज़िम्मेदारी सरकार द्वारा शुरूआत में अपनाई गई सामुदायिक प्रतिरोधक क्षमता विकास (हर्ड इम्यूनिटी) की रणनीति है।

तो एक तरफ हमारे पास दक्षिण कोरिया है, जहां महामारी को प्रभावी ढंग से रोका गया। वह भी बिना लॉकडाउन। दूसरी तरफ ब्रिटेन की कहानी है, जहां लॉकडाउन के बावजूद इस पर काबू नहीं पाया जा सका। आखिर वहां चल क्या रहा है? इससे भारत को क्या सीख मिलती है, जहां लॉकडाउन को अगले दो हफ़्तों के लिए बढ़ाया जा चुका है। 

उनका लॉकडाउन और हमारा लॉकडाउन

यह सही बात है कि दक्षिण कोरिया या ब्रिटेन की तुलना भारत से नहीं की जा सकती। लेकिन इससे हमारी चिंता और बढ़ ही जाती है। क्योंकि भौगोलिक, प्रशासनिक, तकनीकी, वित्त या सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे जैसे मानक, जो कोरोना संक्रमण को चुनौती देने के लिए अहम हैं, उनमें भारत इन दो देशों से काफ़ी कमजोर नज़र आता है। 

प्रभावित लोगों और भूगोल के हिसाब से देखें, तो भारत के तीन हफ़्ते का राष्ट्रीय लॉकडाउन का ऐतिहासिक तौर पर सबसे बड़ा है। इसमें दुनिया के सबसे कड़े कदम उठाए गए हैं, चीन से भी ज़्यादा।

हाल ही में एक अनुमान से पता चला है कि लॉकडाउन से 195 लोगों की मौत हुई है, जिनमें भूख और थककर मरने वाले लोग शामिल हैं। यह तो वो लोग हैं, जिनके बारे में पता चल गया।   इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ऑक्सफोर्ड COVID-19 के सरकारी प्रतिक्रिया के कठोरपन वाले पैमाने पर भारत को 100 नंबर मिले हैं। यह एक ऐसा इंडेक्स है, जिसमें इन प्रतिक्रियाओं की प्रभावशीलता के बारे में कुछ नहीं बताया जाता।

यह ध्यान दिलाने वाली बात है कि चीन ने अबतक एक भी राष्ट्रीय लॉकडाउन लागू नहीं किया है। सिर्फ एक राज्य हुबेई और कुछ शहरों को लॉकडाउन किया गया है। हुबेई लॉकडाउन पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विश्लेषक संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पांच फरवरी को कहा था, ‘कोरोना वायरस के खिलाफ़ लड़ाई में सेंसरशिप, भेदभाव, मनचाही हिरासतों और मानवाधिकार उल्लंघन की कोई जगह नहीं है।’ जब दुनियाभर में एक के बाद एक देशों ने लॉकडाउन लागू किए, तब इन चीजों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। 

बल्कि भारत में वंचित तबकों के लिए मानवाधिका और महामारी से भी ज़्यादा भयावह दिक्कतें इंतज़ार में हैं। अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संगठन ने भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूर समूहों को दुनियाभर में लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला बताया है। अनुमान है कि करीब़ 40 करोड़ मज़दूर गरीब़ी में और गहरे धंस जाएंगे। यह बात उस दौर में कही गई है, जब भारत में एकसाथ स्वास्थ्य विशेषज्ञ विक्रम पटेल, जयप्रकाश मुलियिल, अर्थशास्त्री ज्यां द्रां, रघुराम राजन और जयती घोष, पूर्व नौकरशाह प्रोनब सेन और सिराज हुसैन ने इसके बारे में चेतावनी दी थी।

इन अनुमानों का ज़मीन से लगातार आ रही रिपोर्टें पुष्टि करती हैं। इन रिपोर्टों में लॉकडाउन का वंचित तबकों की जिंदगी और काम पर पड़ने वाले प्रभाव को बताया गया है। इस संकटकाल में सरकार द्वारा किए गए राहत प्रावधान पर्याप्त साबित नहीं हुए हैं। रिपोर्टों में पता चला है कि भारत के 13 राज्यों में सरकार से ज़्यादा खाना खिलाने का काम एनजीओ ने किया है।

क्या हम सही हाथों में हैं? 

26 मार्च को भारत के लॉकडाउन का दूसरा दिन था। नागरिकों को शांत करवाने की प्रशासनिक कोशिश की गई, जिसने लॉकडाउन को इस महामारी को रोकने का कोई जादुई तरीके के तौर पर पेश किया। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के रमन गंगाखेडकर ने मीडिया ब्रीफिंग में कहा, ‘अगर लॉकडाउन सफल हो भी जाता है, तो हम मौजूदा आंकड़ों को भी गिरता देखेंगे।’ इस दावे की पुष्टि के लिए कोई सबूत नहीं दिए गए। स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े लव अग्रवाल, जो उसी मीडिया ब्रीफिंग में शामिल थे, उन्होंने कहा, ‘कोरोना संक्रमण के मामले भले ही बढ़ते दिख रहे हों, लेकिन उनके बढ़ने की दर स्थायी समझ में आती है।हालांकि यह शुरूआती रुझान ही है।’

उनकी टाइमिंग इससे ज़्यादा खराब नहीं हो सकती थी। क्योंकि अगले दिन ही भारत में कोरोना संक्रमण के 160 नए मामले सामने आए। उस वक़्त तक यह एक दिन में सामने आए सबसे ज़्यादा मामले थे। 26 मार्च के बाद भारत में कोरोना के मामलों की संख्या तेजी से बढ़ना शुरू हो गई। यह अब 10,541 पर पहुंच चुका है। 358 लोगों की मौत हो चुकी है। 13 अप्रैल को ही भारत में 1248 नए मामले सामने आए। यह 26 मार्च तक सामने आए कुल मामलों का दोगुना है। यह वही दिन था, जिस दिन हमें लॉकडाउन का शुक्रिया अदा करने के लिए कहा गया था। दरअसल आंकड़ों में गिरावट नहीं आई।

तीन हफ़्ते बाद, लॉकडाउन के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई बातों के विरोध में सबूत आने शुरू हो गए। जैसा ब्रिटेन और दूसरे देशों के मामले में हुआ, यह सबूत प्रशासनिक असफलता दिखाने के लिए पर्याप्त हैं। आखिर सरकार ने ही तो पूरे देश में लॉकडाउन लागू करने का फैसला किया था। इससे पुष्टि होती है कि सरकार ने जो भी चीजों की कोशिश की, वो असफल हो गईं या और खराब बात है कि सरकार ने कोशिश ही नहीं की। भारत के मामले में सबूत दूसरी बात की पुष्टि करते हैं। (ज़्यादा विस्तार में देखने के लिए इस लेखक की महामारी को शुरूआती स्तर पर रोकने के लिए नीतिगत खामियों पर एक विश्लेषण पढ़िए)

नये ‘सामान्य’ पर कठिन सवाल

इसमें कोई शक नहीं है कि कोरोना महामारी एक जटिल और गतिज अवधारणा है, जिस पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आईं और कई तरह के नतीज़े निकले। दक्षिण कोरिया और इंग्लैंड ने बताया कि इसके नतीज़े कितने अलग हो सकते हैं। वैश्विक परिदृश्य, जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था और इसके गरीब़ नागरिकों पर हथौड़े की मार पड़ेगी, इसे देखते हुए भारत में राष्ट्रीय लॉकडाउन की रणनीति पर कुछ जरूरी सवाल बनते हैं।

भारत के राष्ट्रीय लॉकडाउन के पीछे वैज्ञानिक तर्क क्या था? इसे लागू करने के वक़्त का आधार क्या था। जिस वक़्त इसे लागू किया गया, उसका कारण क्या था? आखिर इसे विशेष भौगोलिक क्षेत्र या स्तरीकरण से लागू करने के बजाए पूरे राष्ट्रीय स्तर पर लागू क्यों किया गया? आखिर देश के 133 करोड़ लोगों को इतनी प्रबलता वाले कदम के लिए तैयारी करने का वक़्त क्यों नहीं दिया गया? अब जब लोग लॉकडाउन में हैं, तब हम क्या कदम उठा सकते हैं कि इस लॉकडाउन का पूरा सदुपयोग हो?

ऐसा लगता है कि जो लोग लॉकडाउन को वहन कर सकते हैं, उनके लिए यह जीवन का एक नया तरीका है। जो नहीं कर सकते, उनके लिए यह मरने का नया ज़रिया है। हमें इसके जल्दबाज़ी में लागू किए गए तरीके, इसकी कीमत और यह कितनी प्रतिउत्पादक प्रक्रिया है, इस पर गौर करना चाहिए। इसका हमें उतनी ही बारीकी से विश्लेषण करना चाहिए, जितनी किसी भी अतिवादी नीति का लोकतंत्र में किया जाना जरूरी होता है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख आप इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

What is a Lockdown all About Anyway?

Lockdown Extension
India Lockdown
COVID-19
Lav Agarwal
Coronavirus cases
South Korea
Migrant Labour
India Livelihoods
Lockdown Costs

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी


बाकी खबरें

  • bhasha singh
    भाषा सिंह
    बात बोलेगी: सावित्री बाई फुले को याद करना, मतलब बुल्ली बाई की विकृत सोच पर हमला बोलना
    03 Jan 2022
    सवाल यह है कि जिन लोगों ने, सावित्री बाई फुले के ऊपर कीचड़ डाला था, उनके ख़िलाफ गंदी-अश्लील टिप्पणी की थी, वे 2022 में कहां हैं। वे पहले से अधिक खूंखार हो गये हैं, पहले से ज्यादा बड़े अपराधी—जिन्हें…
  • stop
    सोनिया यादव
    ‘बुल्ली बाई’: महिलाओं ने ‘ट्रोल’ करने के ख़िलाफ़ खोला मोर्चा
    03 Jan 2022
    मुस्लिम महिलाओं को ‘ट्रोल’ करने की कोशिश के बीच विपक्ष के साथ-साथ महिला संगठनों और आम लोगों ने सोशल मीडिया पर इस मामले में सरकार और पुलिस की सक्रियता और कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पटनाः एनएमसीएच के 84 डॉक्टर कोरोना पॉज़िटिव, मरीज़ों में कोरोना चेन बनने का ख़तरा
    03 Jan 2022
    एनएमसीएच में डॉक्टरों समेत 194 लोगों का सैंपल लिया गया था। 84 डॉक्टरों की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद आशंका बढ़ गई है कि अस्पताल के कई मेडिकल स्टॉफ भी चपेट में आ सकते हैं।
  • jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : जारी है एचईसी मज़दूरों की हड़ताल, साथ आए सभी विपक्षी दल
    03 Jan 2022
    एचईसी के मज़दूरों के टूल डाउन और हड़ताल को एक महीना हो गया है और अभी भी वो जारी है, ऐसा एचईसी के इतिहास में पहली बार हुआ है।
  • covid
    ऋचा चिंतन
    नहीं पूरा हुआ वयस्कों के पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य, केवल 63% को लगा कोरोना टीका
    03 Jan 2022
    पहले केंद्र ने दिसंबर 2021 के अंत तक भारत में सभी वयस्क आबादी के पूर्ण टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल कर लेने का लक्ष्य घोषित किया था। जबकि हकीकत यह है कि करीब 9.73 करोड़ वयस्कों को अभी भी दोनों खुराक दी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License