NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
खोता बचपन और शिक्षा का ‘राजमार्ग’
असल में 'सीखना' जिसे शिक्षा कहते हैं - वह तो एक सामूहिक प्रक्रिया है। ऊपर से भले ही यह व्यक्तिगत प्रतिभा दिखे, लेकिन है तो यह सामाजिक प्रक्रिया ही। कोरोना और उसके कारण ऑनलाइन शिक्षा के उत्साह ने शिक्षा की इस मौलिक अवधारणा को ही दरकिनार करने की कोशिश की है।
राजीव कुंवर
06 Jul 2020
खोता बचपन और शिक्षा का ‘राजमार्ग’
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : enavabharat

पाँच साल से लेकर अठारह साल के मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों के घर का कोना फिर से वर्चुअल स्कूल में बदल चुका है। मोबाइल या लैपटॉप को ईयरफोन से जोड़कर इन्हें घर-घर में देख सकते हैं। थोड़ा ध्यान से देखेंगे तो साफ पता चल जाएगा कि 'वर्चुअल क्लास' की गतिविधियों के अलावा भी बहुत कुछ है जो चल रहा है। सो मैंने पूछ लिया बेटे से। खैर थोड़ी देर में ही उसने बता दिया कि जब उसे मन नहीं लगता तब वह उसमें वीडियो देख लेता है, चैटिंग कर लेता है। जब शिक्षक पत्नी से बेटे का हाल बताया तो उन्होंने कहा कि यह सिर्फ इसका नहीं ज्यादातर बच्चों का हाल है, सो चिंता मत करो। मेरी चिंता और बढ़ गयी थी, क्योंकि यह आने वाली एक पूरी पीढ़ी की सामूहिक प्रवृत्ति का संकेत है।

असल में 'सीखना' जिसे शिक्षा कहते हैं - वह तो एक सामूहिक प्रक्रिया है। ऊपर से भले ही यह व्यक्तिगत प्रतिभा दिखे, लेकिन है तो यह सामाजिक प्रक्रिया ही। कोरोना और उसके कारण ऑनलाइन शिक्षा के उत्साह ने शिक्षा की इस मौलिक अवधारणा को ही दरकिनार करने की कोशिश की है। इसे समझने के लिए बेटे से जो बात हुई उसे आपके सामने पेश कर रहा हूँ। मेरे यह पूछने पर कि क्या ऑनलाइन क्लास में मन नहीं लगता ? तभी तो वीडियो देखते हो ? - उसने कहा कि नहीं, मैं तब देखता हूँ जब जो बताया जा रहा होता है वह 'बोरिंग' लगता है। मैंने कहा कुछ उदाहरण से बताओ। उसने कहा जैसे इंग्लिश पीरियड में शब्दों को चुनने और उसके इस्तेमाल की बात होती है तब!

इसे भी पढ़ें : लाखों बच्चों को सज़ा दे रही है महामारी

उसके इस जवाब ने मेरी परेशानियों को बढ़ा दिया था। यह प्रवृत्ति तो भगोड़ेपन की है। हमारे घर में हिंदी का माहौल है। ऐसे में इंग्लिश भाषा उसे स्कूल में ही सीखने को मिलता है जो सामूहिक या सामाजिक प्रक्रिया में उसे प्राप्त होता है। इंग्लिश का मुश्किल होना उसके लिए स्वाभाविक है, लेकिन यह मुश्किल स्कूल की सामूहिक या सामाजिक प्रक्रिया में सीखने की भी स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है। यही कारण है कि मुश्किलों का सामना करने की सहज प्रवृत्ति को स्कूली शिक्षा में निर्मित किया जा सकता है। लेकिन यही 'मुश्किल' वर्चुअल स्पेस में वैकल्पिक विचलन के लिए तमाम संभावनाओं को भी प्रस्तुत कर देता है। यूट्यूब से लेकर चैटिंग तक यही वैकल्पिक विचलन की संभावनाएं हैं। मगजपच्ची, जिसे ब्रेन-स्ट्रोमिंग कह सकते हैं की बजाय दिमाग को ही 'अन्य भटकाव' जिसमें उसे 'मजा' आता है - की तरफ मोड़ देता है। मगजपच्ची या मगजमारी की सामूहिक प्रक्रिया एक आनंदायक खेल हो सकता है, लेकिन यही प्रक्रिया एकांतिक रूप में बोरिंग भी।

इसे भी पढ़ें : ऑनलाइन शिक्षा पैकेज: मनुवाद और मनीवाद!

इंटरनेट से लैश मोबाइल फोन, टैब या कंप्यूटर लेकर जब बच्चा एकांत में शिक्षा लेने के लिए तैयार किया जा रहा है, तब हमें इसकी सीमा को पहचानने की भी जरूरत है। आज हालात क्या हैं ? अधिकांश मध्यम वर्गीय परिवार जो इस ऑनलाइन शिक्षा का हिस्सा है उनके घरों में देखेंगे तो आपको सिंगल चाइल्ड दिखेगा। आज वह सिंगल चाइल्ड 'अकेला' पड़ चुका बच्चा है। लंबे समय तक उससे सामूहिकता या सामाजीकरण की प्रक्रिया छिन गयी है। विकल्प क्या है ? हमारे एक डॉक्टर साथी जो बताते थे कि उनका बेटा इलेक्ट्रॉनिक गजट से दूर है अभी तक। उसे आउट डोर गेम पसंद है, आज बता रहे कि वह भी उन्हीं में लगा हुआ है। वजह यह कि कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है।

इस सबका नकारात्मक असर पढ़ने की क्षमता पर देखा जा सकता है। जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का प्रयोग बढ़ रहा है दृश्य-श्रव्य माध्यम से ही सीखने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। पढ़ने की प्रवृत्ति में जबरदस्त गिरावट देख सकते हैं। किताबों में रुचि जबरदस्त घटी है। क्लास रूम में बच्चों के इस पढ़ने की प्रवृत्ति को बढ़ाने के लिए सामूहिक गतिविधि करवायी जाती रही है। अभी हालात यह है कि हमारे एक मित्र ने यूट्यूब चैनल शुरू किया, जिसमें मात्र साहित्य के टेक्स्ट का पाठ किया गया है। पूछने पर पता चला कि हरिशंकर परसाई का 'भोला राम का जीव' जब बच्चे नहीं पढ़े तो मैंने यह प्रयोग किया। सब बच्चों ने यूट्यूब में उसे सुन लिया।

इसे भी पढ़ें : ऑनलाइन शिक्षा मूल संवैधानिक उद्देश्य से भटकाव का मॉडल है

पढ़ना और लिखना आधुनिक ज्ञान निर्माण की आरंभिक शर्त है। ऑनलाइन शिक्षा का सबसे बड़ा हमला इसी पढ़ने और लिखने की ठोस भौतिक प्रक्रिया पर हुआ है। वर्चुअल एजुकेशन में आज पढ़ने और लिखने का विकल्प देखना और सुनना हो गया है। देखना और सुनना ज्ञान का उपभोक्ता तो बना सकता है निर्माता नहीं। भविष्य निर्माण की योजना बनाते हुए हमें देखना होगा कि आखिर हम 'नॉलेज क्रियेटर' बना रहे हैं या मात्र 'कंज्यूमर' तैयार कर रहे हैं। शिक्षा के जरिए पूरी दुनिया की नॉलेज इकॉनोमी में भारत का योगदान उसकी खासियत रही है। क्या इस नई शिक्षा नीति में हम भविष्य के ज्ञान निर्माता की भूमिका निभा सकेंगे ? मात्र  उपभोक्ता बनकर वैश्विक आर्थिक ताकत बन पाना क्या संभव है? थोड़ी देर के लिए उपभोक्ता की ताकत का एहसास चीनी एप्प पर प्रतिबंध लगाकर भले ही महसूस कर लें, लेकिन यह भविष्य का सत्य नहीं बन सकता।

इसे भी पढ़ें : 
ऑनलाइन एजुकेशन तो ठीक है लेकिन कहीं ये 'डिजिटल खाई' तो नहीं बना रहा है?

भविष्य की ताकत बनना है तो मात्र मध्यवर्गीय ऑनलाइन उत्साह से हमें निकलना होगा। सोचना होगा अपनी सबसे बड़ी ताकत यानी अपनी 70% आबादी का जो आज गरीबी रेखा को छू रही है। निजीकरण और ऑनलाइन जैसे वैकल्पिक मॉडल जो नई शिक्षा नीति के आधार हैं - उसके दायरे से यह 70% बाहर होगा। इस बड़ी संख्या को अगर हमने 'नॉलेज इकोनॉमी' का 'वॉरियर्स' बना लिया तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का दबदबा बनने से उसे कोई रोक नहीं सकता। वास्तविकता इससे ठीक उलट है। आज वैश्विक पूँजी के फायदे के लिए हम दुनिया के देशों की तकनीक के भरोसे अपने सस्ते अनस्किल्ड लेबर, पर्यावरण के नष्ट होने की शर्तों पर और मध्यमवर्गीय उपभोक्ता-बाजार के जरिए वैश्विक अर्थव्यवस्था की ताकत बनने का सपना पाल रहे हैं।

इसे भी पढ़ें : केरल की “फर्स्ट बेल”: डिजिटल शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के लिए व्यापक जन-आन्दोलन की शुरुआत

निजी पूँजी देशी हो या विदेशी क्या उसने राष्ट्र निर्माण की भूमिका अतीत में भी निभाई है ? तो फिर भविष्य में उससे उम्मीद करना शुतुरमुर्गी दृष्टि ही होगी। कितने शैक्षणिक या स्वास्थ्य संस्थानों का निर्माण भारत की आज़ादी के बाद से लेकर नब्बे के दशक तक देशी पूंजीपतियों ने किया है? उंगलियों पर इनकी गिनती हो सकती है। निजीकरण की प्रक्रिया में गुणवत्तापूर्ण चंद स्कूल एवं उच्च संस्थानों के टापू का निर्माण ही किया गया। इनके अलावा ज्यादातर संस्थान धन लाभ के लिए ही खोले गए। आदिवासी, दलित, पिछड़ा एवं महिलाओं का अधिकांश गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित है। इतनी बड़ी मात्रा में जो जन-शक्ति मौजूद है उसका सशक्तिकरण किए बिना राष्ट्र निर्माण और वैश्विक शक्ति बन सकना बस दिवास्वप्न है।

इसे भी पढ़ें : लॉकडाउन में ‘इंडिया’ तो ऑनलाइन पढ़ लेगा लेकिन ‘भारत’ का क्या होगा?

कोरोना संक्रमण के बाद एक बार फिर से सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य के यूनिवर्सल स्वरूप के विकास की जरूरत वर्तमान ही नहीं भविष्य की राष्ट्रीय जिम्मेदारी बन गई है। इसके बिना कोई भी राष्ट्रीय सामूहिक स्वप्न देखना या दिखाना देश को धोखा देना होगा। इस सामूहिक राष्ट्रीय स्वप्न को निजी पूँजी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। निजी पूँजी को अपने लाभ के लिए उपभोक्ता मात्र चाहिए। वह छात्र को भी उपभोक्ता के नजर से ही देखता है। राष्ट्र निर्माण उसके एजेंडे से बाहर है। ऐसे में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माताओं को निजीकरण एवं ऑनलाइन के विकल्प से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्वप्न देखना-दिखाना होगा। वही भविष्य का राष्ट्रीय मार्ग हो सकता है।

इसे भी पढ़ें : डीयू ऑनलाइन एग्ज़ाम प्रकरण: क्या एबीवीपी अंतत: सरकार के कवच का काम करेगी?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

education
Online Education
Digital Education
Coronavirus
Lockdown
education system
School students and teachers
poverty line
digital india
Digital India reality
Online Learning

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

कर्नाटक पाठ्यपुस्तक संशोधन और कुवेम्पु के अपमान के विरोध में लेखकों का इस्तीफ़ा

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस

बच्चे नहीं, शिक्षकों का मूल्यांकन करें तो पता चलेगा शिक्षा का स्तर

पूर्वोत्तर के 40% से अधिक छात्रों को महामारी के दौरान पढ़ाई के लिए गैजेट उपलब्ध नहीं रहा

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

कर्नाटक: स्कूली किताबों में जोड़ा गया हेडगेवार का भाषण, भाजपा पर लगा शिक्षा के भगवाकरण का आरोप

शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का ज़रूरी मोर्चा

नई शिक्षा नीति बनाने वालों को शिक्षा की समझ नहीं - अनिता रामपाल


बाकी खबरें

  • Chhattisgarh
    रूबी सरकार
    छत्तीसगढ़: भूपेश सरकार से नाराज़ विस्थापित किसानों का सत्याग्रह, कांग्रेस-भाजपा दोनों से नहीं मिला न्याय
    16 Feb 2022
    ‘अपना हक़ लेके रहेंगे, अभी नहीं तो कभी नहीं’ नारे के साथ अन्नदाताओं का डेढ़ महीने से सत्याग्रह’ जारी है।
  • Bappi Lahiri
    आलोक शुक्ला
    बप्पी दा का जाना जैसे संगीत से सोने की चमक का जाना
    16 Feb 2022
    बप्पी लाहिड़ी भले ही खूब सारा सोना पहनने के कारण चर्चित रहे हैं पर सच ये भी है कि वे अपने हरफनमौला संगीत प्रतिभा के कारण संगीत में सोने की चमक जैसे थे जो आज उनके जाने से खत्म हो गई।
  • hum bharat ke log
    वसीम अकरम त्यागी
    हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक
    16 Feb 2022
    जनवरी 2020 के बाद के कोरोना काल में मानवीय संवेदना और बंधुत्व की इन 5 मिसालों से आप “हम भारत के लोग” की परिभाषा को समझ पाएंगे, किस तरह सांप्रदायिक भाषणों पर ये मानवीय कहानियां भारी पड़ीं।
  • Hijab
    एजाज़ अशरफ़
    हिजाब के विलुप्त होने और असहमति के प्रतीक के रूप में फिर से उभरने की कहानी
    16 Feb 2022
    इस इस्लामिक स्कार्फ़ का कोई भी मतलब उतना स्थायी नहीं है, जितना कि इस लिहाज़ से कि महिलाओं को जब भी इसे पहनने या उतारने के लिए मजबूर किया जाता है, तब-तब वे भड़क उठती हैं।
  • health Department
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव: बीमार पड़ा है जालौन ज़िले का स्वास्थ्य विभाग
    16 Feb 2022
    "स्वास्थ्य सेवा की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में सुधार के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। प्रदेश के जालौन जिले की बात करें तो यहां के जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक पिछले चार साल से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License