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मध्यप्रदेश: लोकतंत्र वेंटीलेटर पर, भ्रष्टाचार आकाश और शिक्षा, रोज़गार पाताल में
पिछले 16+ वर्षों के भाजपा राज का सबसे बड़ा और मौलिक योगदान यह है कि उसने एमपी को मध्यप्रदेश की जगह मृत्युप्रदेश बनाकर रख दिया है। कोविड-19 की महामारी के पहले भी यही हाल था और आज भी।
बादल सरोज
19 Apr 2021
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान। फोटो साभार : mpnewscast

पिछले चार-पांच दिन से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही दो तस्वीरें भाजपा राज में मध्यप्रदेश जिस दशा में पहुँच गया है उसकी प्रतिनिधि तस्वीरें है। मौतें धड़ाधड़ हो रही हैं, इंदौर, भोपाल और कुछ अन्य शहरों के मरघटों में 16 से 18 घंटे तक की वेटिंग लिस्ट है, कब्रिस्तान में कब्र खोदने वालों के हाथों में छाले पड़ गए हैं। लगभग आधा प्रदेश लॉकडाउन में है, महाराष्ट्र के बाद दूसरे नंबर पर पहुँच गया है कोरोना संक्रमण - तेजी से पहले नंबर की ओर बढ़ रहा है। ठीक इस बीच  विधानसभा सीट - दमोह - का उपचुनाव जीतने के लिए पूरी सरकार भीड़भड़क्के के साथ न सिर्फ मैदान में कूदी रही बल्कि इसके बीच शाही स्वागत सत्कार और छप्पनभोग भोजों का पूरी तरह से लुत्फ़ लेती रही। एक प्रतिष्ठित कवि ने इस तस्वीर को गिद्दों के मृत्युभोज का शीर्षक दिया है।

(वायरल तस्वीर)

यह मध्यप्रदेश की प्रतिनिधि तस्वीर है। पिछले 16+ वर्षों के भाजपा राज का सबसे बड़ा और मौलिक योगदान यह है कि उसने एमपी को मध्यप्रदेश की जगह मृत्युप्रदेश बनाकर रख दिया है। कोविड-19 की महामारी के पहले भी यही हाल था; बालमृत्यु दर, प्रसव के दौरान महिला मृत्यु दर, कुपोषण की दर सहित मानव विकास सूचकांक का एक भी आंकड़ा ऐसा नहीं है जिसमें भाजपा ने इस मृत्युप्रदेश को देश के सबसे खतरनाक प्रदेशों की सूची में न ला दिया हो। आदिवासियों, दलितों और अन्य पिछड़ी गरीब जातियों, किसानो तथा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का लगभग 80 फीसदी अति-कुपोषित; भूख सूचकांक के हिसाब से इथियोपिया और सोमालिया से भी कहीं नीचे है। जीवन के मुश्किल से मुश्किलतर होने का सच इतना भयावह है कि ठगी और धांधली से तैयार किये जाने वाले झूठे आंकड़े भी न इसे छुपा पा रहे हैं ना ही भविष्य के लिए किसी भी तरह की उम्मीद जगा पा रहे हैं। अभी पिछले ही महीने जारी हुयी प्रदेश की आर्थिक स्थिति की रिपोर्ट के अनुसार पिछली वर्ष की तुलना में इस वर्ष प्रति व्यक्ति आय में 4870 रुपयों की कमी आयी है।

जनता के इस विराट हिस्से के लिए जो नाममात्र की कल्याणकारी योजनाएं है भी उनको भी हड़प कर जाने की जितनी "चतुराई" मध्यप्रदेश के भाजपाईयों ने दिखाई है उतनी शायद ही किसी और ने दिखाई होगी। शिवराज के पहले पंद्रह साला अध्याय का टैग मार्क था व्यापमं; मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले और नौकरियों में भर्ती का विभाग था व्यावसायिक परिक्षा मंडल (व्यापमं) जो शिवराज के चलते घपले, बेईमानी, रिश्वतखोरी, चार सौ बीसी और धांधली आदि भ्रष्टाचार के सारे रूपों का पर्यायवाची शब्द हो गया। महकमे का नाम बदलने के बाद भी असली पहचान और काम वही बना हुआ है। पिछले महीने ही कृषि विस्तार अधिकारियों की भर्ती इसका ताजा तरीन उदाहरण है। इसमें मुन्नाभाई एमबीबीएस से भी आगे वाला चमत्कार हुआ। जो अपनी तीन साल की डिग्री छह साल में पास कर पाए थे वे एक ही जाति,  एक ही इलाके (केंद्रीय कृषि मंत्री की जाति और इलाके) के प्रौढ़ होते जवान एकदम एक बराबर अंक लेकर सबसे ऊपर जा बैठे और सेलेक्ट हो गए। हालांकि ग्वालियर के कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों के आंदोलन और कुछ ज्यादा ही शोर शराबा होने  के चलते, फिलहाल यह परीक्षा निरस्त कर दी गई है। लेकिन कोई जांच या कार्यवाही नहीं हुयी है ।

शिवराज का पहला 15 वर्षीय कार्यकाल "ऐसा कोई काम बचा नहीं जिसको इनने ठगा नहीं" के मुहावरे को "जहाँ न सोचे कोई - वहां भी भ्रष्टाचार होई" की नीचाइयों तक ले जाने वाला रहा। लूट और ठगी के ऐसे ऐसे जरिये खोजे कि नटवरलाल यदि होते तो अपनी नाकाबलियत पर शर्म से पानी पानी हो जाते।  पिछली कुछ साल से बंगाल में डेरा डाले बैठे और हर तरह के भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को भाजपा की गटर में डुबकी लगवाकर उन्हें पुण्यात्मा बनाने वाले कैलाश विजयवर्गीय ने तो इंदौर का मेयर रहते इंदौर में बेसहारा और विधवाओं की पेंशन तक नहीं छोड़ी, करोड़ों का घोटाला कर डाला। मंत्री बनने के बाद सिंहस्थ कुम्भ घोटाले में महाकाल को भी नहीं बख्शा। कुलमिलाकर यह कि कॉपी, कागज, साइकिल, पेन्सिल से लेकर निर्माणों के घोटालों में इमारतों से भी कहीं ज्यादा ऊंचे भ्रष्टाचार की मिसालें कायम कीं। मजदूरों की कल्याण योजनाओं में दसियों करोड़ रुपयों की सेंध लगाई। दवाइयों की खरीद तक में घोटालों के रिकॉर्ड कायम किये। अभी कल ही ऑक्सीजन घोटाला सामने आया है। कोरोना में जीवनरक्षक बतायी जाने वाली रेडमीसिविर दवा की कालाबाजारी करते भाजपाई, जनता ने घेर कर गिरफ्तार कराये हैं। अकेले विजयवर्गीय के इंदौर में ही पिछले लॉकडाउन के दौरान घर घर बांटे जाने वाले राशन में 50 करोड़ का घोटाला सामने आया है।

वैसे तो शिवराज सरकार ही भारत के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। 2018 के विधानसभा चुनावों के जनादेश को अँगूठा दिखाकर - छोटू सिंधिया और उसके विधायकों को कथित तौर पर 35-35 करोड़ रुपयों में खरीद कर लोकतंत्र को मखौल बनाने के साथ यह पिछले लॉकडाउन में कोविड-19 के साथ साथ कुर्सी पर बैठे हैं। दोबारा आने के बाद उन्होंने कारपोरेटी हिन्दुत्व के वायरस का अगला चरण शुरू करते हुए बाकी बचे खुचे लोकतंत्र को भी ध्वस्त करने का काम  हाथ में ले लिया है। धारा 144 स्थायी हो गयी है। गाँवों में किसी के घर के आँगन में भी मीटिंग नहीं की जा सकती। धरने, जलूस, प्रदर्शन पर महामारी क़ानून की धाराओं में मुकदमा लगना नियमित काम बन गया है। इतना निर्लज्ज और हास्यास्पद है कि भोपाल में सिर्फ इसी नाम पर अनिश्चितकालीन धारा 144 लगा दी गयी क्योंकि टीकाकरण - वैक्सीनेशन - होना है।  हर तरह का लोकतांत्रिक प्रतिरोध स्थगित है। पूरी तरह पुलिस राज है - यहां तक कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट तक को कहना पड़ा कि  "मप्र में जंगल राज है, यहां की सरकार संविधान के मुताबिक शासन चलाने के लायक नहीं है। " 

सरकारी संरक्षण में हिटलरी गुण्डों की गश्त कितनी बेलगाम है इसके अनगिनत उदाहरण हैं, यहां सिर्फ दो दिए जा रहे हैं।

नए साल की जनवरी की शुरुआत - मध्यप्रदेश में फासीवादी अंधेरों के गहरे होने के साथ हुयी है। दिसम्बर के अंत से ही मध्यप्रदेश के मालवांचल- इंदौर, उज्जैन, मंदसौर - में ठेठ हिटलरी अंदाज में फासिस्टी गुंडों के हमले जारी हैं। इन हमलों का ख़ास तरीका है;  राममन्दिर के लिए चन्दा इकट्ठा करने के नाम पर गिरोहबन्द होकर संघी आते हैं। बाहर से लाई उनकी भीड़ चुनकर मुस्लिम बहुल बस्तियों में इकट्ठा की जाती है। अश्लील और उकसावे पूर्ण नारे लगाए जाते हैं। प्रतिक्रिया में कोई महिला या बुजुर्ग ज़रा सा भी कुछ बोल दे तब भी और कोई कुछ भी न बोले तब भी, यहां तक कि उत्पातियों के आने से पहले ही सारे मुस्लिम परिवार गाँव या बस्ती छोड़कर चले जायें तब भी,  हुड़दंग शुरू हो जाता है। मकान तोड़े जाते हैं। मारपीट की जाती है। कहीं आग लगाई जाती हैं तो कहीं मस्जिदों के झण्डे उतारकर इन गिरोहों के लाये ध्वज लहरा दिए जाते हैं।

क्या मध्यप्रदेश की पुलिस छुट्टी पर है?  नहीं, बिलकुल नहीं। मौजूद है - पूरी तरह से मुस्तैद और सन्नद्ध है। इस सरासर आपराधिक गुण्डई में इन गिरोहों की मदद करने के लिए एकदम उतारू और तत्पर; उनके आगे भी चलती है पीछे भी रहती है - साथ साथ तो है ही। उन्हें सुरक्षा कवच देती है। उनकी जरूरतों को पूरी करती है। मस्जिदों की ऊंचाई ज्यादा हो तो वहां तक चढ़ने के लिए अपनी पुलिस गाड़ियां उपलब्ध कराते। उनके लिए उन्हीं के मोबाइल्स पर वीडियो बनाते हुए, क़ानून के राज की बची खुची उम्मीदों की धज्जियां उड़ाती है। सारे प्रमाण होने के बाद भी सरकार का कोई कदम न उठाना आतंक को और भयावह और खूंखार बनाने की मुहिम का हिस्सा है।

अभिव्यक्ति की आजादी की हालत इंदौर में एक कैफ़े में प्रस्तुति कर रहे एक स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी के साथ हुयी वारदात से समझ आ जाती है।   हिन्दू रक्षक संस्था के शूरवीरों ने पहले इसकी पिटाई लगाई और उसके बाद स्थानीय भाजपा विधायिका के पुत्र की शिकायत पर पुलिस ने उस कॉमेडियन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। भाजपा नेता की शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इस कलाकार ने अपनी प्रस्तुति में कथित रूप से कुछ देवी देवताओं के बारे में टिप्पणियां करने के साथ अमित शाह का मजाक उड़ाया। बाद में खुद पुलिस ने भी कह दिया कि आर्टिस्ट के वीडियो में देवी देवताओं के बारे में कहा कुछ भी नहीं है। मतलब साफ़ है और वह यह है कि अब अमित शाह के बारे में भी कोई टीका टिप्पणी नहीं की जा सकती। बड़ी मुश्किल से मुनव्वर फारुकी तो जमानत पर छूट गए - उनके दो साथी अभी भी बंद हैं। 

डॉ. अम्बेडकर के जन्मस्थान वाले प्रदेश में इन्हे न संविधान की चिंता है न भारत के गणतंत्र की ; उनकी सारी कोशिश ये है कि एक झूठे आख्यान - फाल्स नैरेटिव - को गढ़कर असली मुद्दों को पीछे, बहुत पीछे, धकेल दिया जाए। पिछ्ला चुनाव हारने के बाद तिकड़म और खरीद फरोख्त से बनी सरकार के राजनीतिक वर्चस्व को हिन्दू-मुसलमान करके गाढ़ा किया जाए। इन प्रायोजित हमलों से ठीक पहले 1968 के उस धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को, जिसमें 52 वर्षों में आज तक 12 प्रकरण भी नहीं आये, जिसमे आज तक किसी को भी दोषी नहीं पाया गया, उस क़ानून को "और कड़ा बनाना" इसी का हिस्सा है। इनका उद्देश्य एक अपेक्षाकृत शांत और आपसी भाईचारे की परम्परा वाले मध्यप्रदेश को विषाक्त, कलुषित और कलंकित करना है। 

किसानों की लूट - मजदूरों के शोषण की दशा मंदसौर गोलीकांड में 6 किसानों  की हत्या तथा 97% मजदूरों को न्यूनतम वेतन सहित हर तरह के कानूनी अधिकार से वंचित होने से समझी जा सकती है। नई पीढ़ी की बर्बादी का पूरा प्रबंध किया जा रहा है। आदिवासी इलाकों के 10486 स्कूलों में से विलीनीकरण सहित अन्य बहानों से 6000 स्कूल बंद किये जा चुके हैं। इसके अलावा 13 हजार बंद किये गए थे - इस तरह कुल 19 हजार सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। स्कूल शिक्षकों, लिपिकों सहित दो लाख के करीब सरकारी नौकरियाँ समाप्त की जा चुकी हैं। युवाओं का भविष्य चौपट किया जा चुका है तो महिला और दलितों का वर्तमान भयावह बना दिया गया है। एक अवयस्क लड़की को बंधक बनाकर सामूहिक बलात्कार की घटना में शहडोल में खुद भाजपा नेता की गिरफ्तारी तथा राजधानी भोपाल का गुमशुदा लड़कियों के मामले में टॉप पर पहुंचना इसकी ताज़ी मिसाल हैं।

(लेखक वरिष्ठ लेखक और लोकजतन के सम्पादक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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