NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मध्य प्रदेश: मंत्रिमंडल गठन में शिवराज पर भारी पड़ा सिंधिया का प्रभाव
मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के 100 दिन बाद मंत्रिमंडल का प्रतिक्षित विस्तार गुरुवार को हो गया। इसमें कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए नेताओं का दबदबा है। कैबिनेट विस्तार में सिंधिया समर्थकों से किए गए वायदों को निभाने के कारण कई भाजपा नेताओं को जगह नहीं मिल पाई।
राजु कुमार
02 Jul 2020
मंत्रिमंडल
साभार : जनसंपर्क विभाग, मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार को गिराकर सत्ता हासिल करने वाली भाजपा ने गुरुवार को 100 दिन बाद मंत्रिमंडल का विस्तार किया। लगातार मशक्कत और लंबा समय लेने के बाद भी मंत्रिमंडल विस्तार में न तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने मन मुताबिक विधायकों को मंत्री बना पाए और न ही भाजपा इसमें संतुलन साधने में कामयाब हो पाई।

राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों की बदौलत सत्ता में आई भाजपा के लिए मंत्रिमंडल का गठन एक चुनौती भरा काम रहा। जब मंत्रिमंडल का गठन हुआ, तो इसमें 40 फीसदी पूर्व कांग्रेसी मंत्री के रूप में शामिल हुए। 33 फीसदी सिंधिया समर्थकों और 3 पूर्व कांग्रेसियों को मंत्रिमंडल में जगह देने के बाद ग्वालियर-चंबल संभाग का इसमें दबदबा हो गया है। 2018 के चुनाव में विंध्य से कांग्रेस का सफाया करने वाले भाजपा नेताओं को मंत्रिमंडल विस्तार में जगह नहीं मिल पाई।

अपने नेताओं की नाराजगी, क्षेत्रीय असंतुलन, अपनी पसंद का अभाव और विभिन्न नेताओं के दबावों के बीच सरकार चलाने और आगामी विधानसभा उप चुनावों में भाजपा को जीत दिलाकर स्थिर सरकार बनाने का भार शिवराज सिंह चौहान के ऊपर आ गया है।

दिसंबर 2018 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के परिणाम भाजपा के लिए चौंकाने वाला था। राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश में संपन्न विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने के प्रति भाजपा आश्वस्त थी, लेकिन चुनाव परिणामों ने कांग्रेस को आगे कर दिया और निर्दलीय एवं बसपा व सपा को साथ लेकर कांग्रेस ने 15 साल की भाजपा सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया। इस हार के बावजूद भाजपा के वरिष्ठ नेता लगातार बयानबाजी करते रहे कि वे जब चाहे सरकार गिरा देंगे।

आखिरकार मार्च 2020 में भाजपा को इसमें कामयाबी मिली, जब कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए और उनके समर्थक 19 विधायकों सहित कांग्रेस के 22 विधायक कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में चले गए। 20 मार्च को कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 23 मार्च को मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए।

मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान को अपनी टीम गठन करने में मुश्किलें आने लगी। लेकिन कोरोना का हवाला देकर मंत्रिमंडल का विस्तार टालना ज्यादा मुश्किल नहीं रहा। लेकिन जब देश भर में यह सवाल उठने लगा कि कोविड-19 से निबटने के लिए मध्यप्रदेश में न तो स्वास्थ्य मंत्री है और न ही गृह मंत्री, तो 29 दिन बाद 21 अप्रैल को 5 मंत्रियों को शपथ दिलाकर छोटा मंत्रिमंडल बनाया गया।

लेकिन इस पर भी विपक्ष सवाल उठाता रहा कि जब 5 मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है, तो पूर्ण मंत्रिमंडल गठन के लिए दूसरे मंत्रियों को शपथ दिलाने में क्या दिक्कत है? विपक्ष के इस सवाल का जवाब लगातार कोविड-19 की व्यस्तता का हवाला देकर भाजपा टालती रही। लेकिन विपक्ष से ज्यादा जब अंदरूनी दबाव ज्यादा बढ़ने लगा, तो भाजपा के लिए मंत्रिमंडल का विस्तार टालना भारी पड़ने लगा।

सिंधिया समर्थकों का सिंधिया पर दबाव और उनका भाजपा नेताओं पर दबाव कि उप चुनाव की घोषणा से पहले इस्तीफा दे चुके विधायकों को मंत्री नहीं बनाया गया, तो क्षेत्र में उनकी स्थिति कमजोर हो जाएगी, के कारण आखिरकार 100 दिन बाद 2 जुलाई को मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया।

सिंधिया के प्रभाव वाली इस मंत्रिमंडल को साथ लेकर चलने में शिवराज कितना सहज हो पाते हैं, यह तो अगले दो-तीन महीने में दिखाई देगा, लेकिन मध्यप्रदेश के मंत्रिमंडल विस्तार पर टिप्पणी करते हुए माकपा के राज्य सचिव जसविंदर सिह का कहना है, ‘यह मंत्रिमंडल शिवराज की नहीं, सौदेबाजी की है। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद ही कई कांग्रेसी विधायक, जो मंत्री नहीं बन पाए थे, कहते थे कि जो उन्हें मंत्री बनाएगा, वे उनके साथ होंगे।

आज वैसे लोगों ने सौदेबाजी कर मंत्री पद हासिल कर लिया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी सौदेबाजी की थी कि उन्हें केंद्र में मंत्री और उनके 10 समर्थकों को राज्य में मंत्री बनाया जाए। उन्हें भी मंत्री बनाया गया। एक ओर भाजपा कहती रही कि कांग्रेस की अराजकता से मुक्ति दिलाएगी, तो दूसरी ओर दिखाई दिया कि उनकी अंदरूनी असंतोष के कारण मंत्रिमंडल का विस्तार 100 दिन तक टल गया। इससे पता चलता है कि शिवराज सिंह चौहान को कितने दबावों से गुजरना पड़ा है। भाजपा का असंतोष मुखर भी होने लगा है, जो राज्यसभा चुनाव में मतदान के समय दिखा भी था, जब एक भाजपा विधायक ने क्रॉस वोटिंग की थी। इस सरकार को बाहर से खतरा नहीं है, बल्कि अब अंदर से खतरा है। भाजपा को अब प्रदेश के विकास से मतलब नहीं है, बल्कि उसे सरकार बचाए रखने की चिंता है।’

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ट्वीट किया है, ‘आज के मंत्रिमंडल के गठन में कई योग्य, अनुभवी, निष्ठावान भाजपा के वरिष्ठ विधायकों का नाम नहीं पाकर मुझे व्यक्तिगत तौर पर बेहद दुःख भी है। लोकतंत्र के इतिहास में मध्यप्रदेश का मंत्रिमंडल ऐसा मंत्रिमंडल है, जिसमें कुल 33 मंत्रियो में से 14 वर्तमान में विधायक ही नहीं है। यह संवैधानिक व्यवस्थाओं के साथ बड़ा खिलवाड़ है। प्रदेश की जनता के साथ मज़ाक है।’

tweet_1.PNG

वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया कहते हैं, ‘देश में पहली बार किसी मंत्रिमंडल में इतने गैर विधायक मंत्री बनाए गए हैं। इससे जाहिर है कि सिंधिया का दबदबा इस मंत्रिमंडल पर है।  इसके साथ ही यह भी पहली बार देखने को मिला है कि जब प्रदेश का मुख्यमंत्री देश के वरिष्ठ नेताओं से मंत्रियों के नाम पर मंत्रणा करने के बाद खाली हाथ अपने प्रदेश आया हो। इससे पता चलता है कि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को महत्व देना कम कर दिया है। अब वे उतने सशक्त नहीं दिखाई देते, जितने पहले के कार्यकाल में दिखाई देते थे।’ इस संदर्भ में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह बयान मायने रखता है, जब उन्होंने मंत्रिमंडल गठन से पहले दिया था कि मंथन के बाद अमृत तो बंट जाता है और विष तो शिव को ही पीना पड़ता है।

हरदेनिया कहते हैं, ‘बाहर से आए नेताओं को भाजपा ज्यादा महत्व नहीं देती है। लेकिन मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार की मजबूरी है कि उसे बाहर से आए नेताओं के आगे अपने नेताओं को उपेक्षित करना पड़ा है। मुख्यमंत्री अपनी पसंद के मंत्रिमंडल तक नहीं बना पाए। प्रदेश में 22 कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे और दो विधायकों की मृत्यु की वजह से 24 सीटों पर उप चुनाव होने हैं। वर्तमान में 14 मंत्रियों को भी विधानसभा चुनावों का सामना करना है। ऐसे में भाजपा के लिए अपने नेताओं की नाराजगी और सरकार में गुटीय उभार के कारण उप चुनावों का सामना करना एक बड़ी चुनौती है और यह प्रदेश में एक बार फिर सरकार में उलट-फेर का कारण बन सकता है।’

Madhya Pradesh
Shivraj Singh Chauhan
Jyotiraditya Scindia
Congress
BJP
kamalnath
Gopal Bhargav
Bisahu Lal Sahu
Imarti Devi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • putin
    अब्दुल रहमान
    मिन्स्क समझौते और रूस-यूक्रेन संकट में उनकी भूमिका 
    24 Feb 2022
    अति-राष्ट्रवादियों और रूसोफोब्स के दबाव में, यूक्रेन में एक के बाद एक आने वाली सरकारें डोनबास क्षेत्र में रूसी बोलने वाली बड़ी आबादी की शिकायतों को दूर करने में विफल रही हैं। इसके साथ ही, वह इस…
  • russia ukrain
    अजय कुमार
    यूक्रेन की बर्बादी का कारण रूस नहीं अमेरिका है!
    24 Feb 2022
    तमाम आशंकाओं के बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला करते हुए युद्ध की शुरुआत कर दी है। इस युद्ध के लिए कौन ज़िम्मेदार है? कौन से कारण इसके पीछे हैं? आइए इसे समझते हैं। 
  • up elections
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    उत्तर प्रदेश चुनाव: ज़मीन का मालिकाना हक़ पाने के लिए जूझ रहे वनटांगिया मतदाता अब भी मुख्यधारा से कोसों दूर
    24 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनाव के छठे चरण का मतदान इस इलाक़े में होना है। ज़मीन के मालिकाना हक़, बेरोज़गारी और महंगाई इस क्षेत्र के कुछ अहम चुनावी मुद्दे हैं।
  • ayodhya
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    यूपी चुनाव: अयोध्यावादियों के विरुद्ध फिर खड़े हैं अयोध्यावासी
    24 Feb 2022
    अयोध्या में पांचवे दौर में 27 फरवरी को मतदान होना है। लंबे समय बाद यहां अयोध्यावादी और अयोध्यावासी का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा है और धर्म केंद्रित विकास की जगह आजीविका केंद्रित विकास की मांग हो रही…
  • mali
    पवन कुलकर्णी
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों की वापसी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक जीत है
    24 Feb 2022
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों को हटाने की मांग करने वाले बड़े पैमाने के जन-आंदोलनों का उभार 2020 से जारी है। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में, माली की संक्रमणकालीन सरकार ने फ़्रांस के खिलाफ़ लगातार विद्रोही…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License