NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मध्य प्रदेश के उपचुनाव नतीजों का देश की राजनीति पर असर होगा
इन नतीजों को 'ऑपरेशन कमल’ के भविष्य के नज़रिए से देखना महत्वपूर्ण होगा। 
अनिल जैन
06 Nov 2020
मध्य प्रदेश के उपचुनाव
फोटो साभार : दैनिक भास्कर

आमतौर पर किसी राज्य में विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव के नतीजे उसी राज्य की राजनीति के लिए ही महत्व रखते हैं, मगर मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा सीटों के लिए एक साथ हुए उपचुनाव के नतीजे इसका अपवाद होंगे। ये नतीजे चाहे जैसे भी रहे, देश की राजनीति में ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व वाले होंगे। यह सही है कि इन उपचुनावों के नतीजों से राज्य की आठ महीने पुरानी भाजपा सरकार को बहुमत हासिल करना है, जिसमें उसे कोई मुश्किल नहीं आने वाली है। क्योंकि 230 सदस्यीय राज्य विधानसभा में उसे अपना अकेले का बहुमत कायम करने के लिए महज नौ सीटें जीतना है। हालांकि बहुजन समाज पार्टी के दो, समाजवादी पार्टी के एक और तीन निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी उसे पहले से ही हासिल है, इसलिए अगर वह नौ सीटों के बजाय दो-तीन सीटें भी जीत लेती है तो उसकी सरकार बची रहेगी। 

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ दावा कर रहे हैं कि उपचुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनेगी। लेकिन उनका यह दावा निराधार है, क्योंकि कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए सभी 28 सीटें जीतनी होंगी, जो कि एक बेहद मुश्किल लक्ष्य है। अगर उन्हें लक्ष्य हासिल भी हो जाता है तो भाजपा के लिए अपनी सरकार बचाए रखना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा, क्योंकि कांग्रेस में अभी भी कुछ विधायक ऐसे हैं जो भाजपा से सौदेबाजी कर कांग्रेस और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे सकते हैं।

लेकिन मध्य प्रदेश के उपचुनाव नतीजों को महज सत्तापक्ष और विपक्ष के संख्याबल के नजरिए से ही नहीं देखा जा सकता। इन नतीजों को इस नजरिए से भी देखने की जरुरत नहीं है कि इन उपचुनाव का उन ज्योतिरादित्य सिंधिया की हैसियत पर क्या असर होगा, जिनके कांग्रेस छोडकर भाजपा में शामिल होने की वजह से कांग्रेस की सरकार गिरी, भाजपा की सरकार बनी और इन उपचुनावों की नौबत आई। 

उपचुनाव लड रहे भाजपा के 28 उम्मीदवारों में 19 वे पूर्व विधायक हैं, जो सिंधिया के समर्थन में कांग्रेस से बगावत कर भाजपा में शामिल हुए हैं। अगर इनमें से ज्यादातर उम्मीदवार नहीं जीते तो सिंधिया की हैसियत भाजपा में कमजोर होगी। सिंधिया ने कांग्रेस से बगावत कर भाजपा की सरकार बनवाने में योगदान की अभी तक मनचाही कीमत वसूल की है। सबसे पहले उन्होंने खुद के लिए राज्यसभा की सदस्यता हासिल की। फिर दो किस्तों में अपने समर्थक 11 पूर्व विधायकों को राज्य सरकार में मंत्री बनवाया। उन मंत्रियों को मनचाहे विभाग दिलवाए। बाकी जो समर्थक मंत्री नहीं बन पाए उन्हें निगमों और बोर्डों का अध्यक्ष बनवा कर मंत्री का दर्जा दिलवाया। यही नहीं, वेे अपने साथ कांग्रेस छोडकर आए सभी पूर्व विधायकों को उपचुनाव में भाजपा का टिकट दिलवाने में भी सफल रहे। लेकिन अब अगर उनके ज्यादातर समर्थक हार जाते हैं तो भाजपा में वे मोल-भाव करने की स्थिति में नहीं जाएंगे। वे अगर कांग्रेस में भी लौटना चाहेंगे तो वापसी की राह आसान नहीं होगी। अगर किसी तरह लौट भी गए तो वहां उनकी पहले जैसी हैसियत नहीं रहेगी। 

उपचुनाव के नतीजों को इस नजरिए से भी नहीं देखा जाना चाहिए कि शिवराज सिंह चौहान भविष्य में कितने समय तक मुख्यमंत्री रह पाएंगे या प्रदेश कांग्रेस की कमान कमलनाथ के हाथों में रहेगी या नहीं।

इन नतीजों को 'ऑपरेशन कमल’ के भविष्य के नजरिए से देखना महत्वपूर्ण होगा। अब तक भाजपा ने अपने 'ऑपरेशन कमल’ के तहत विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के विधायकों और सांसदों के इस्तीफे कराए हैं और फिर उन्हें अपनी पार्टी से चुनाव लडा कर विधायक या सांसद बनाया है। इसी रणनीति के सहारे उसने कर्नाटक, गोवा, मणिपुर अरुणाचल प्रदेश आदि राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें गिरा कर अपनी सरकारें बनाई है और राज्यसभा में भी अपनी ताकत में जबरदस्त इजाफा कर लिया है। 

मध्य प्रदेश में भी उसने इसी 'ऑपरेशन कमल’ के जरिए अपनी सरकार बनाई, लेकिन इस ऑपरेशन की असल परीक्षा उपचुनाव के नतीजों के रूप में होनी है। अगर कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में आए ज्यादातर पूर्व विधायक उपचुनाव जीत जाते हैं तो यह इस ऑपरेशन की कामयाबी होगी। इस कामयाबी से दूसरे राज्यों में इसे आजमाने का रास्ता खुलेगा।

महाराष्ट्र, राजस्थान, झारखंड, हरियाणा आदि राज्यों में भाजपा इस फार्मूले को आजमाने का इरादा रखती है। खबर है कि हरियाणा में कांग्रेस के विधायकों को मध्य प्रदेश की तर्ज पर विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने और उपचुनाव लडने का प्रस्ताव मिल चुका है। झारखंड में भी कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के कई विधायकों के सामने यह प्रस्ताव लंबित है। हालांकि राजस्थान और महाराष्ट्र में भाजपा एक बार तो इस सिलसिले में कोशिश कर चुकी है लेकिन उसमें उसे कामयाबी नहीं मिल सकी। लेकिन अगर मध्य प्रदेश में उपचुनाव के ज्यादातर नतीजे उसके पक्ष में रहे तो महाराष्ट्र और राजस्थान में दोबारा कोशिश करने का रास्ता खुल जाएगा। 

तमाम दूसरी पार्टियों के विधायकों की नजर भी मध्य प्रदेश में हुए उपचुनाव के नतीजों पर है। अगर कांग्रेस इस्तीफा देकर भाजपा आए ज्यादातर पूर्व विधायक चुनाव नहीं जीत पाते हैं तो ऐसी स्थिति में 'ऑपरेशन कमल’ पर ब्रेक लग जाएगा। कोई विधायक अपनी विधानसभा की सदस्यता को खतरे में डालने का जोखिम मोल नहीं लेगा, खासकर ऐसे राज्यों में जहां विधान परिषद नहीं है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में विधान परिषद है। वहां अगर भाजपा ऑपरेशन कमल के जरिए अपनी सरकार बना लेती है तो वह विधानसभा चुनाव हारने वाले को राज्य विधानमंडल के उच्च सदन यानी विधान परिषद में भेज सकती है। लेकिन मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और झारखंड में यह सुविधा यानी विधान परिषद नहीं है।

मध्य प्रदेश में अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया के ज्यादातर समर्थकों के हार जाते हैं और इससे सिंधिया की हैसियत कमजोर होती है तो फिर कांग्रेस के उन नेताओं को भी सोचना होगा जो सिंधिया का रास्ता अपनाने का इरादा रखते हैं। पिछले दिनों राजस्थान में सचिन पायलट ने सिंधिया की तर्ज पर कांग्रेस के बाहर कदम रखने की कोशिश की थी, लेकिन पर्याप्त संख्या में विधायकों का समर्थन न जुटा पाने की वजह से उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पडे थे। लेकिन यूपीए सरकार में मंत्री रहे जितिन प्रसाद और मिलिंद देवडा जैसे नेता कई दिनों से कांग्रेस से बाहर निकलने के लिए कसमसा रहे हैं।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश के चुनाव नतीजों से तय हो जाएगा कि देश में विधायकों की खरीद फरोख्त के जरिए सरकारें गिराने-बनाने का खेल आगे भी जारी रहेगा या उस ब्रेक लगेगा।

Madhya Pradesh
MP By-Elections
BJP
BSP
SP
kamalnath
Congress
jyotiradhitya scindia
Shivraj Singh Chauhan

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • omicron
    भाषा
    दिल्ली में कोविड-19 की तीसरी लहर आ गई है : स्वास्थ्य मंत्री
    05 Jan 2022
    ‘‘ दिल्ली में 10 हजार के करीब नए मामले आ सकते हैं और संक्रमण दर 10 प्रतिशत पर पहुंच सकती है.... शहर में तीसरी लहर शुरू हो चुकी है।’’
  • mob lynching
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: बेसराजारा कांड के बहाने मीडिया ने साधा आदिवासी समुदाय के ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ पर निशाना
    05 Jan 2022
    निस्संदेह यह घटना हर लिहाज से अमानवीय और निंदनीय है, जिसके दोषियों को सज़ा दी जानी चाहिए। लेकिन इस प्रकरण में आदिवासियों के अपने परम्परागत ‘स्वशासन व्यवस्था’ को खलनायक बनाकर घसीटा जाना कहीं से भी…
  • TMC
    राज कुमार
    गोवा चुनावः क्या तृणमूल के लिये धर्मनिरपेक्षता मात्र एक दिखावा है?
    05 Jan 2022
    ममता बनर्जी धार्मिक उन्माद के खिलाफ भाजपा और नरेंद्र मोदी को घेरती रही हैं। लेकिन गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी के साथ गठबंधन करती हैं। जिससे उनकी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर सवाल खड़े हो…
  • सोनिया यादव
    यूपी: चुनावी समर में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री का महिला सुरक्षा का दावा कितना सही?
    05 Jan 2022
    सीएम योगी के साथ-साथ पीएम नरेंद्र मोदी भी आए दिन अपनी रैलियों में महिला सुरक्षा के कसीदे पढ़ते नज़र आ रहे हैं। हालांकि ज़मीनी हक़ीक़त की बात करें तो आज भी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में उत्तर…
  • मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    05 Jan 2022
    “बीएमसी के अधिकारियों ने उन्हें परेशान किया, उनके साथ बुरा व्यवहार किया। वेतन मांगने पर भी वे उस पर चिल्लाते थे।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License