NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
प्रणब मुखर्जी: जिन्होंने राष्ट्रपति और जनता के बीच की दूरी को कम करने के लिए 'महामहिम' संबोधन हटाया
प्रणब मुखर्जी को कई तरह से याद किया जा सकता है। उनकी लंबी राजनीतिक पारी के लिए, इस दौरान किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए और इस दौरान हुए विवादों के लिए भी। उनके बारे में कहा जाता था कि प्रधानमंत्री पद को छोड़कर ज्यादातर सभी अहम पदों पर उन्होंने काम किया। और इसका शायद उन्हें आख़िरी तक मलाल भी रहा।
अमित सिंह
31 Aug 2020
प्रणब मुखर्जी
फोटो साभार : ट्विटर

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन हो गया है। वो 84 वर्ष के थे और दिल्ली में सेना के आर एंड आर अस्पताल में भर्ती थे। सोमवार को शाम पौने छह बजे के क़रीब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे और पूर्व सांसद अभिजीत मुखर्जी ने ट्वीट करके उनकी मौत की पुष्टि की।

With a Heavy Heart , this is to inform you that my father Shri #PranabMukherjee has just passed away inspite of the best efforts of Doctors of RR Hospital & prayers ,duas & prarthanas from people throughout India !
I thank all of You ?

— Abhijit Mukherjee (@ABHIJIT_LS) August 31, 2020

उन्होंने ट्वीट किया, 'भारी मन से आपको सूचित कर रहा हूं कि आरआर अस्पताल की पूरी कोशिशों और पूरे भारत के लोगों की प्रार्थनाओं, दुआओं के बावजूद मेरे पिता श्री प्रणब मुखर्जी नहीं रहे। मैं सबका धन्यवाद करता हूं।'

आपको बता दें कि एक ब्लड क्लॉट के कारण उनकी ब्रेन सर्जरी की गई थी और 10 अगस्त को उन्होंने ट्वीट करके घोषणा की थी कि वो कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं।

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मिराती गांव में 1935 में पैदा हुए प्रणब मुखर्जी के पिता कामदा किंकर मुखर्जी देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे और 1952 से 1964 के बीच बंगाल विधायी परिषद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि रहे। उनकी मां का नाम राजलक्ष्मी मुखर्जी था।

अपनी आत्मकथा के पहले खंड में वह लिखते हैं कि शुरुआती शिक्षा घर पर लेने के बाद जब वह पांचवी कक्षा की पढ़ाई के लिए स्कूल जाना शुरू किए तो बरसात के दिनों में उन्हें एक नाले को तैरकर पार करना पड़ता था। इस नाले पर पुल बनाने के काम कई साल बाद जब वह मंत्री बने तब किया।

आगे उन्होंने बीरभूम के सूरी विद्यासागर कॉलेज से पढ़ाई की जो कि तब कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। उन्होंने राजनीति शास्त्र और इतिहास में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के साथ-साथ कानून की डिग्री भी ली।

वे 1969 में पहली बार बांग्ला कांग्रेस टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए थे और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1971 में बांग्ला कांग्रेस के कांग्रेस में विलय के बाद वे कांग्रेस संसदीय दल के सदस्य बने। विवादास्पद आपातकाल के दौरान उन पर ज्यादतियां करने का भी आरोप लगा।

बाद में, उन्होंने अपनी पार्टी- राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस- बनाई, लेकिन राजीव से सुलह के बाद उन्होंने कांग्रेस में वापसी की। पीवी नरसिंहराव ने योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। सोनिया गांधी को कांग्रेस का मुखिया बनवाने में भी उनका अहम योगदान रहा।

2004 में जब कांग्रेस नेतृत्व में संप्रग सरकार बनी तब उन्होंने पहली बार लोकसभा के लिए जंगीपुर से चुनाव जीता। तब से लेकर राष्ट्रपति बनने तक मुखर्जी मनमोहन के बाद सरकार के दूसरे बड़े नेता रहे। चूंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राज्यसभा सांसद थे तो इसलिए उन्हें लोकसभा में पार्टी का नेता बनाया गया था। मुखर्जी भारत के एकमात्र ऐसे नेता थे जो देश के प्रधानमंत्री पद पर न रहते हुए भी आठ वर्षों तक लोकसभा के नेता रहे।

इस दौरान वे रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, वित्त मंत्री की जिम्मेदारी संभालते रहे। जुलाई 2012 के चुनाव में उन्होंने पीए संगमा को आसानी से हराकर राष्ट्रपति पद हासिल किया। उन्होंने निर्वाचक मंडल के 70 फीसदी मत हासिल किए थे और देश के 13 राष्ट्रपति के रूप में जुलाई 2012 को पद संभाला था।

प्रणब मुखर्जी को 1969 से पांच बार संसद के उच्च सदन (राज्य सभा) के लिए और 2004 से दो बार संसद के निम्न सदन (लोक सभा) के लिए चुना गया। वे 23 वर्षों तक पार्टी की सर्वोच्च नीति-निर्धारक संस्था कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य भी रहे हैं।

इस दौरान वे पार्टी के लिए संकटमोचक की भूमिका भी निभाते रहे। साल 2004 में हेनरी किसिंजर से हुई उनकी मुलाकात ने भारत और अमेरिका के बीच सामरिक समझौतों को एक नया आयाम दिया। साल 2005 में जब वे भारत के रक्षा मंत्री थे तब भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों के लिए एक नये मसौदे पर हस्ताक्षर हुए थे।

साल 2004 से 2012 तक मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उन्होंने सूचना का अधिकार, खाद्य सुरक्षा, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) और मेट्रो रेल परियोजना की स्थापना जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों में अहम भूमिका निभाई। भारतीय राजनीति में कांग्रेस के बाद के युग के एक प्रमुख शिल्पकार के रूप में उन्हें याद किया जाता है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा और बाद में इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व में बनी संयुक्त मोर्चा की सरकारों के लिए बाहरी समर्थन जुटाने में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। कांग्रेस ने भी इन सरकारों का समर्थन किया था।

2004-2012 की अवधि के दौरान उन्होंने प्रशासनिक सुधार, सूचना का अधिकार, रोजगार का अधिकार, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण, मैट्रो रेल आदि की स्थापना जैसे विभिन्न मुद्दों पर, इस उद्देश्य के लिए गठित 95 से अधिक मंत्री समूहों की अध्यक्षता करते हुए सरकार के लिए महत्त्वपूर्ण निर्णयों तक पहुंचने में अग्रणी भूमिका निभाई थी।

अगर उनके प्रशासनिक जीवन की बात की जाय तो 1973-74 की अवधि के दौरान उन्हें उद्योग; जहाजरानी एवं परिवहन, इस्पात एवं उद्योग उपमंत्री तथा वित्त राज्य मंत्री बनाया गया। उन्होंने 1982 में पहली बार, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में भारत के वित्त मंत्री का पद ग्रहण किया और वे 1980 से 1985 तक संसद के उच्च सदन (राज्य सभा) में सदन के नेता रहे।

बाद में, वे 1991 से 1996 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष, 1993 से 1995 तक वाणिज्य मंत्री, 1995 से 1996 तक विदेश मंत्री, 2004 से 2006 तक रक्षा मंत्री तथा पुन: 2006 से 2009 तक विदेश मंत्री रहे। वे 2009 से 2012 तक वित्त मंत्री रहे तथा 2004 से 2012 तक राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए त्याग-पत्र देने तक संसद के निम्न सदन के नेता रहे।

उन्होंने इंदिरा गांधी, पी वी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह जैसे प्रधान मंत्रियों के साथ काम किया। यही वजह थी कि दशक दर दशक वे कांग्रेस के सबसे विश्वसनीय चेहरे के रूप में उभरते चले गए।

राजनीतिक हलकों में मुखर्जी की पहचान आम सहमति बनाने की क्षमता रखने वाले एक ऐसे नेता के रूप में थी जिन्होंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ विश्वास का रिश्ता कायम किया जो राष्ट्रपति पद पर उनके चयन के समय काम भी आया। उनका राजनीतिक सफर बहुत भव्य रहा जो राष्ट्रपति भवन पहुंचकर संपन्न हुआ। लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना उन्हें नसीब नहीं हुआ।

हालांकि उन्होंने खुलकर इस बारे में अपनी इच्छा व्यक्त कर दी थी। अपनी किताब ‘द् कोअलिशन इयर्स’ में मुखर्जी ने माना कि मई 2004 में जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था तब उन्होंने उम्मीद की थी कि वह पद उन्हें मिलेगा।

उन्होंने लिखा है, ‘अंतत: उन्होंने (सोनिया) अपनी पसंद के रूप में डॉक्टर मनमोहन सिंह का नाम आगे किया और उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। उस वक्त सभी को यही उम्मीद थी कि सोनिया गांधी के मना करने के बाद मैं ही प्रधानमंत्री के रूप में अगली पसंद बनूंगा।’

मुखर्जी ने यह स्वीकार किया था कि शुरुआती दौर में उन्होंने अपने अधीन काम कर चुके मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल होने से मना कर दिया था लेकिन सोनिया गांधी के अनुरोध पर बाद में वह सहमत हुए। साल 2004 में शुरू हुए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल के उथल-पुथल के वर्षों से लेकर 25 जुलाई 2012 को राष्ट्रपति बनने तक वे सरकार के संकटमोचक बने रहे।

यदि हम उनके निजी जीवन की चर्चा करें तो 13 जुलाई 1957 को उनका विवाह सुभ्रा मुखर्जी से  हुआ था, जिनका देहांत हो गया है। उनके दो बेटे और एक बेटी है। उनके बेटे अभिजीत मुखर्जी राजनीति में हैं। उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी कथक नृत्यांगना है और अब वह भी राजनीति में सक्रिय हैं।  

सत्ता के गलियारों में रहने के बावजूद मुखर्जी कभी अपनी जड़ों को नहीं भूले। यही वजह थी कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी दुर्गा पूजा के समय वे अपने गांव जरूर जाया करते थे। मंत्री और राष्ट्रपति रहते पारंपरिक धोती पहने पूजा करते उनकी तस्वीरें अक्सर लोगों का ध्यान आकर्षित करती थीं।

प्रणब मुखर्जी ने कई किताबें लिखी हैं जिनके नाम हैं, मिडटर्म पोल, बियोंड सरवाइवल, इमर्जिंग डाइमेंशन्स ऑफ इंडियन इकोनॉमी, ऑफ द ट्रैक- सागा ऑफ स्ट्रगल एंड सैक्रिफाइस तथा चैलेंज बिफोर द नेशन हैं। 80 वर्षीय मुखर्जी पढ़ने, बागवानी और संगीत का शौक रखते थे। वे हर साल दुर्गा पूजा का त्योहार अपने पैतृक गांव मिराती में ही मनाते थे।

राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए प्रणब मुखर्जी ने संबोधन के लिए महामहिम शब्द को हटाए जाने की बात कही। इस दौरान राष्ट्रपति भवन की धरोहरों के संरक्षण के विशेष उपाय से लेकर इसे देखने वाले आम लोगों के लिए प्रवेश सुलभ बनाने सहित कई नए कदम उठाए।

वहीं, राष्ट्रपति के रूप में ही प्रणब मुखर्जी दया याचिका खारिज करने के मामले में सबसे सख्त नजर आए। इस मामले में उनकी छवि एक कठोर राष्ट्रपति के रूप में रही। उनके सम्मुख 34 दया याचिकाएं आईं और इनमें से 30 को उन्होंने खारिज कर दिया। उनके बारे में कहा जाता है कि राजेंद्र बाबू के बाद प्रणब मुखर्जी ऐसे राष्ट्रपति रहे जिन्होंने राजनीति की लंबी समझ के बाद इस कुर्सी को संभाला।

राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के एक साल बाद 2018 में मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर जाने और वहां समापन भाषण देने को लेकर खासा विवाद हुआ था। बाद में उन्हें भाजपा-नीत केंद्र सरकार द्वारा साल 2019 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। इसे लेकर राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा हुई।

उनके निधन से देश ने इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और संसदीय प्रक्रियाओं में गहरी दिलचस्पी रखने वाला एक प्रखर बुद्धिजीवी खो दिया।

समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ 

Pranab Mukharjee
Pranab Mukherjee dead
Abhijit Mukherjee

Related Stories


बाकी खबरें

  • sbi
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    DCW का SBI को नोटिस, गर्भवती महिलाओं से संबंधित रोजगार दिशा-निर्देश वापस लेने की मांग
    29 Jan 2022
    एसबीआई ने नयी भर्तियों या पदोन्नत लोगों के लिए अपने नवीनतम मेडिकल फिटनेस दिशानिर्देशों में कहा कि तीन महीने से अधिक अवधि की गर्भवती महिला उम्मीदवारों को ‘‘अस्थायी रूप से अयोग्य’’ माना जाएगा।
  • Yogi
    रश्मि सहगल
    यूपी चुनाव: पिछले 5 साल के वे मुद्दे, जो योगी सरकार को पलट सकते हैं! 
    29 Jan 2022
    यूपी की जनता में इस सरकार का एक अजीब ही डर का माहौल है, लोग डर के मारे खुलकर अपना मत ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं लेकिन अंदर ही अंदर एक अलग ही लहर जन्म ले रही है, जो दिखाई नहीं देती। 
  • Pegasus
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    पेगासस मामले में नया खुलासा, सीधे प्रधानमंत्री कठघरे में, कांग्रेस हुई हमलावर
    29 Jan 2022
    अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की खबर के अनुसार, 2017 में भारत और इजराइल के बीच हुए लगभग दो अरब डॉलर के अत्याधुनिक हथियारों एवं खुफिया उपकरणों के सौदे में पेगासस स्पाईवेयर तथा एक मिसाइल…
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: कैसे करेंगे चुनाव प्रचार? जब बागों में ही नहीं है कोई बहार! 
    29 Jan 2022
    बिहार चुनाव होते हैं तो नीतीश बाबू अपने 15 साल के शासन को भुलाकर लालू-राबड़ी की सरकार को कोसते रहते हैं, लेकिन यूपी में किसको कोसेंगे? यहाँ तो उनके ही भाई-बंधुओं की सरकार है।
  • potato farming UP
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव: आलू की कीमतों में भारी गिरावट ने उत्तर प्रदेश के किसानों की बढ़ाईं मुश्किलें
    29 Jan 2022
    ख़राब मौसम और फसल की बीमारियों के बावजूद, यूपी की आलू बेल्ट में किसानों ने ऊंचे दामों की चाह में आलू की अच्छी पैदावार की है। हालांकि, मौजूदा खुदाई के मौसम में गिरती कीमतों ने उनकी उम्मीदों पर पानी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License