NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
महाराष्ट्र: राजनीतिक रस्साकशी के चलते संकट में आया राज्य का चीनी उद्योग
मौसम शुरू होने के बावजूद केंद्र की मोदी सरकार द्वारा निर्यात सब्सिडी रोके रखने से यह उद्योग भयावह वित्तीय संकट से गुजर रहा है। हालांकि, कुछ जानकार इस मौजूदा संकट को राजनीतिक नज़रिए से देख और समझ रहे हैं।
शिरीष खरे
16 Nov 2020
सोमेश्वर सहकारी साखर कारखाना
फाइल फोटो। सोमेश्वर सहकारी साखर कारखाना, नासिक। स्रोत: सोशल मीडिया

चीनी उत्पादन में अग्रणी महाराष्ट्र का चीनी उद्योग पिछले छह महीने से केंद्र सरकार के सामने निर्यात की नीति को स्पष्ट करने पर जोर दे रहा है। लेकिन, केंद्र उसकी इस मांग को लगातार अनसुना कर रहा है। दूसरी तरफ, मौसम शुरू होने के बावजूद केंद्र की मोदी सरकार द्वारा निर्यात सब्सिडी रोके रखने से यह उद्योग भयावह वित्तीय संकट से गुजर रहा है। हालांकि, कुछ जानकार इस मौजूदा वित्तीय संकट को राजनीतिक नजरिए से देख और समझ रहे हैं।

इस सेक्टर के जानकार अर्नाल्ड लुइस मानते हैं कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल द्वारा निर्यात सब्सिडी बंद रखे जाने से भारतीय चीनी उद्योग को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। वे महाराष्ट्र में चीनी कारखानों की स्थिति साफ करते हुए कहते हैं कि राज्य में कई कारखाने बंद हो चुके हैं और कई कारखाने बैंकों से लिए गए कर्ज में डूबे हैं। इस कारण नकद की कमी आ गई है। इससे बड़ी संख्या में कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल पा रहा है। इसका असर खेतीबाड़ी पर भी पड़ रहा है और राज्य के गन्ना किसानों को उनकी फसल का पूरा दाम नहीं मिल रहा है।

वहीं, राज्य में चीनी कारखाना प्रबंधन से जुड़े व्यक्तियों को लगता है कि अबकि बार राज्य में प्रति टन चीनी निर्यात पर दी जाने वाली औसतन ग्यारह हजार रुपये की अनुदान राशि नहीं मिलने से वे फंस गए हैं। जबकि, कुछ प्रबंधकों की यह शिकायत है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी चीनी उद्योग को मदद देने के मामले में अपने हाथ आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। हालांकि, केंद्र पर भाजपा शासित राज्यों के चीनी उद्योग को मामूली राहत देने और अन्य राज्यों के साथ भेदभाव करने के आरोप लग रहे हैं। कहा यह जा रहा है कि केंद्र ने उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य-प्रदेश और गुजरात के गन्ना किसानों को उनकी फसल का अच्छा दाम दिलाने और शक्कर भंडारण जैसे मुद्दे पर थोड़ी मदद की है। वहीं, इस मामले में केंद्र ने महाराष्ट्र के साथ सौतेला व्यवहार किया है।

कहा यह भी जा रहा है कि दुनिया भर के अलग-अलग देशों के चीनी बाजारों में हो रहे परिवर्तन को देखते हुए भारत को भी अपनी चीनी निर्यात नीति स्पष्ट करने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान शक्कर की कमी से जूझ रहा है, जहां खुले बाजार में 120 रुपये किलो की दर से शक्कर बिक रही है, ऐसे में वहां की सरकार 70 रुपये किलो की नियंत्रित दर पर शक्कर बेच रही है। फिजी में गन्ने की फसल में गिरावट राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। थाईलैंड में शक्कर के दाम कम करने के बाद म्यांमार ने अपने यहां भी शक्कर के दाम घटा दिए हैं। इथोपिया में चीनी मिलों का निजीकरण शुरू हो गया है। चीन और आस्ट्रेलिया ने शक्कर खरीदनी बंद कर दी है। जाहिर है कि इस तरह के रुझानों का दुनिया भर के चीनी उद्योग पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ेगा। इसलिए कहा जा रहा है कि इन परिस्थियों को देखते हुए केंद्र सरकार को वैश्विक बाजार के अनुकूल चीनी निर्यात के लिए एक ठोस नीति पर विचार करना चाहिए। लेकिन, उसके ऐसा न करने से घरेलू उद्योग को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

बता दें कि दुनिया भर में सल्फर-मुक्त शक्कर की मांग सबसे अधिक होती है। भारत और खासकर महाराष्ट्र में इसी किस्म की सफेद, चमकदार तथा बड़े दाने वाली शक्कर का उत्पादन किया जाता है। वहीं, महाराष्ट्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी सबसे अधिक हैं। इसके लिए यह उद्योग अन्य राज्यों से भी बड़ी मात्रा में शक्कर खरीदता है। इसी तरह, यहां से ब्रिटेन की कंपनी को भी सालाना ढाई लाख टन शक्कर की आपूर्ति की जाती है। लेकिन, फिलहाल अन्न सुरक्षा कानून के नियमों के चलते इस तरह की आपूर्ति करने में अड़चन आ रही है।

यहां यह बात भी मायने रखती है कि शक्कर में यदि नमी और अन्य घटकों की मात्रा अधिक रहे तो उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसलिए, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में 70 प्रतिशत से अधिक शक्कर का शुद्धिकरण किया जाता है। लेकिन, दिक्कत यह है कि उसके लिए राज्य में स्थानीय स्तर पर जरूरत के मुताबिक मार्केटिंग और वितरण के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। इन सबके बावजूद कुछ जानकार मानते हैं कि केंद्र यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत चीनी की अच्छी कीमत देना शुरू करे तो चीनी व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। महाराष्ट्र सरकार ने 36 रूपये प्रति किलो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर चीनी खरीदने की सिफारिश की है।

बता दें कि आज देश में चीनी का उत्पादन उसकी आवश्यकता से कहीं अधिक बढ़ता जा रहा है। ऐसे में चीनी बेचने के लिए अच्छे नेटवर्किंग की दरकार है। लेकिन, महाराष्ट्र में चीनी बिक्री का नेटवर्क कुछ अन्य राज्यों के मुकाबले कमजोर है। इसलिए, यहां अन्य राज्यों की तुलना में सस्ती दर पर चीनी बेचनी पड़ रही है।

यदि केंद्र द्वारा चीनी निर्यात में दी जाने वाली सब्सिडी बंद होने के नतीजों पर फिर से बात करें तो कह सकते हैं कि राज्य का यह उद्योग पूंजी निवेश के लिए पूरी तरह से सहकारी बैंकों पर निर्भर हो गया है। बता दें कि राज्य के चीनी कारखानों पर 30 हजार करोड़ रुपये के कर्ज का बोझ है। मौजूदा दौर में उसका ब्याज भरना भी आसान नहीं रह गया है। इस ब्याज के बोझ से सिर्फ कारखाना प्रबंधक ही नहीं किसान और ग्राहक भी त्रस्त हैं। लेकिन, राजनीति के शिकार कई सहकारी चीनी कारखाने बिकने की कगार तक पहुंचा दिए गए हैं। इससे पहले भी सहकारी चीनी कारखानों को तबाह करके राज्य के कई नेता खुद चार-पांच कारखानों के मालिक बन गए हैं। इसके बावजूद, आज भी महाराष्ट्र में सौ से अधिक सहकारी मिले हैं। स्थिति यह है कि महाराष्ट्र की दो सौ से ज्यादा तहसीलों की दलगत राजनीति इन्हीं चीनी कारखानों के इर्द-गिर्द घूमती है। दूसरी तरफ, पिछले तीन वर्षों में राज्य के 25 कारखाने सहकारी से प्राइवेट में तब्दील कर दिए गए हैं। ऐसे में यह कहा जा रहा है कि यदि राज्य के चीनी कारखानों को केंद्र से थोड़ी सब्सिडी मिलनी शुरू हो जाती है तो उससे किसानों को उनकी फसल का भुगतान और कर्ज का ब्याज जमा किया जा सकता है। इससे चीनी की कीमतों को नियंत्रित करना आसान हो सकता है और इस तरह ग्राहक पर पड़ने वाले बोझ को भी कम किया जा सकता है। यहां से चीनी उद्योग में आर्थिक सुधार की कुछ गुंजाइश बन सकती है।

(शिरीष खरे स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Maharashtra
sugar industry
sugar factory
Subsidy on sugar
Narendra modi
BJP
farmer crises

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • wildlife
    सीमा शर्मा
    भारतीय वन्यजीव संस्थान ने मध्य प्रदेश में चीता आबादी बढ़ाने के लिए एक्शन प्लान तैयार किया
    11 Jan 2022
    इस एक्शन प्लान के तहत, क़रीब 12-14 चीतों(8-10 नर और 4-6 मादा) को भारत में चीतों की नई आबादी पैदा करने के लिए चुना जाएगा।
  • workers
    सतीश भारतीय
    गुरुग्राम में बेरोजगारी, कम कमाई और बढ़ती महंगाई के बीच पिसते मजदूरों का बयान
    11 Jan 2022
    मजदूर वर्ग सरकार की योजनाओं का नाम तक नहीं बता पा रहा है, योजनाओं का लाभ मिलना तो दूर की बात है।
  • Swami Prasad Maurya
    रवि शंकर दुबे
    चुनावों से ठीक पहले यूपी में बीजेपी को बड़ा झटका, श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के बाद तीन और विधायकों के इस्तीफे
    11 Jan 2022
    यूपी में चुनावी तारीखों का एलान हो चुका है, ऐसे वक्त में बीजेपी को बहुत बड़ा झटका लगा है, दरअसल यूपी सरकार में श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं।
  • Schemes workers
    कुमुदिनी पति
    उत्तर प्रदेश में स्कीम वर्कर्स की बिगड़ती स्थिति और बेपरवाह सरकार
    11 Jan 2022
    “आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आंदोलन चला रही हैं। पर तमाम वार्ताओं के बाद भी उनकी एक भी मांग पूरी नहीं की गई। उनकी सबसे प्रमुख मांग है सरकारी कर्मचारी का दर्जा।”
  • AKHILESH AND YOGI
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    80/20 : हिंदू बनाम हिंदू की लड़ाई है यूपी चुनाव
    11 Jan 2022
    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ठीक ही कहते हैं कि यह 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत की लड़ाई है। बस वे इसकी व्याख्या ग़लत तरीके से करते हैं। पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी का विचार-विश्लेषण
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License