NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
महाराष्ट्र: ठगा तो मतदाता गया, नुकसान तो लोकतंत्र का हुआ!
त्वरित टिप्पणी : आज फिर गंभीर मुद्दा यही है कि क्या सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। क्या सीबीआई, ईडी जैसी स्वायत्त संस्थाओं के जरिये सरकार बनाने और गिराने का खेल खेला जा रहा है।
मुकुल सरल
23 Nov 2019
maharastra politics
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : tv9bharatvarsh

किसी ने किसी को नहीं ठगा। न बीजेपी ने शिवसेना को, न शिवसेना ने बीजेपी को। न अजित पवार ने शरद पवार को। न शरद पवार ने उद्धव ठाकरे या सोनिया गांधी को। महाराष्ट्र में ठगा तो मतदाता गया है।

इसी तरह किसी राजनीतिक दल या नेता ने किसी की पीठ में छुरा नहीं घोंपा, बल्कि इस सत्ता की राजनीति में छुरा तो लोकतंत्र और संविधान के सीने में ही घोंपा जाता रहा है।

इसलिए कोई भी पार्टी नैतिकता-अनैतिकता की बात करते हुए अच्छी नहीं लगती। ख़ासतौर पर महाराष्ट्र के संदर्भ में। यहां शुद्ध सत्ता का खेल हुआ है और अंतत: बाज़ी बीजेपी ने मारी।

अब उद्धव कहें कि जनादेश का अपमान हुआ है या शरद पवार कहें कि अजित पवार ने उन्हें धोखा दिया, यह सब बकवास है। सबने एक-दूसरे को और सबने मिलकर अंतत आम जनता, आम मतदाता को धोखा दिया है, उसके वोट का सौदा किया है, उसके मत का अपमान किया है। और यह भी कोई पहली बार नहीं है।

गोवा से लेकर कर्नाटक तक, बिहार से लेकर हरियाणा तक यही तो हुआ है। कांग्रेस का भी जब तक दम चला उसने ये सब किया। हालांकि अब इस खेल में बीजेपी उससे ज़्यादा माहिर हो गई है। इसलिए पार्टियों की आपस की धोखधड़ी हमारे लिए कोई चिंता का विषय या मुद्दा नहीं है। असल मुद्दा है आम मतदाता का, हमारे संविधान का, हमारे लोकतंत्र का। इससे मज़ाक का हक़ किसी को नहीं दिया जा सकता।

संविधान दिवस (26 नवंबर) से तीन दिन पूर्व 23 नवंबर को खुलेआम संविधान की धज्जियां उड़ा दी गईं। मुद्दा ये नहीं कि बीजेपी ने क्यों महाराष्ट्र में सरकार बना ली, या एनसीपी के अजित पवार ने क्यों पार्टी विधायकों के समर्थन का पत्र हासिल करते हुए बीजेपी से हाथ मिला लिया और डिप्टी सीएम बन गए। आप यहां साफ तौर पर समझ लें कि मुद्दा डिप्टी सीएम का था ही नहीं। किसी की भी सरकार बनती डिप्टी सीएम अजित पवार ही बनते।

जी हां, शिवसेना की सरकार में भी डिप्टी सीएम अजित पवार ही बनते। हो सकता है कि अगर ज़्यादा ज़ोर देकर बारगेन किया जाता और शिवसेना के साथ ढाई-ढाई साल का फार्मूला निकल जाता तो भी एनसीपी के कोटे से ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री अजित पवार ही बनते।

एनसीपी में अजित पवार, शरद पवार के बाद नंबर दो पर हैं। रिश्ते में भी अजित पवार, शरद पवार के भतीजे हैं। यानी सबकुछ घर का मामला है। इससे पहले भी वे डिप्टी सीएम और मंत्री रह चुके हैं। इसलिए समझिए कि डिप्टी सीएम के लालच में तो वे बीजेपी के साथ नहीं गए।

हालांकि ये आशंका सच हो सकती है कि वे डर से बीजेपी के साथ गए। जी हां, डर! ईडी (Enforcement Directorate: प्रवर्तन निदेशालय) का डर! जेल भेजे जाने का डर!

आपको मालूम है कि अजित पवार महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (MSCB) घोटाले में आरोपी हैं। यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है।

दरअसल, इसी साल चुनाव से पहले 24 सितंबर को ईडी ने MSCB घोटाले में अजित पवार समेत 70 लोगों पर मामला दर्ज किया था। ये घोटाला करीब 25 हजार करोड़ रुपये का है।

आरोप है कि चीनी मिल को कम दरों पर कर्ज दिया गया था और डिफॉल्टर की संपत्तियों को सस्ते में बेच दिया था। आरोप है कि संपत्तियों को बेचने, सस्ते लोन देने और उनका रीपेमेंट नहीं होने से बैंक को 2007 से 2011 के बीच 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। अजित पवार उस समय बैंक के डायरेक्टर थे।

इसके अलावा उनके ऊपर सिंचाई घोटाले का भी आरोप है। 28 नवंबर 2018 को महाराष्ट्र एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने अजित पवार को 70 हजार करोड़ के कथित सिंचाई घोटाले में आरोपी बनाया था। अजित पवार एनसीपी के उन मंत्रियों में शामिल रहे, जिनके पास महाराष्ट्र में 1999 से 2014 के दौरान कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार में सिंचाई विभाग का प्रभार था। अभी भी यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है।

तो राजनीति के जानकार बता रहे हैं कि शायद यही डर रहा हो अजित पवार को जो वे अपने चाचा और एनसीपी प्रमुख शरद पवार को छोड़कर बीजेपी के खेमे में चले गए।

ख़ैर, हमारी चिंता भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे किसी राजनेता के डर की भी नहीं होनी चाहिए। असल डर या चिंता इस बात की है कि क्या सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है? क्या सीबीआई, ईडी जैसी स्वायत्त संस्थाओं का प्रयोग या दुरुपयोग मोदी सरकार अपने हित में कर रही है। इनके जरिये अपने राजनीतिक प्रतिद्धवंदियों को फंसाने, ठिकाने लगाने के लिए कर रही है। और ये संस्थाएं ऐसा होने दे रही हैं।

मतलब देश की शीर्ष स्वायत्त संस्थाएं सरकार बनाने और गिराने के खेल में शामिल की जा रही हैं। ऐसे आरोप पहले भी लगते रहे हैं। लेकिन इसी के बरख़िलाफ़ मोदी सरकार सत्ता में आई थी। लेकिन अब ये सब दोगुनी गति और बेशर्मी के साथ हो रहा है। भरी सभा में लोकतंत्र का चीरहरण!

हद ये है कि अब तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी बार-बार सवाल उठने लगे हैं। आशंका जताई जाती रही हैं कि चुनाव आयोग सरकार के मन मुताबिक चुनाव कार्यक्रम तय कर रहा और बदल रहा है।

ख़तरा यही है, डर यही है कि हमारे संविधान के मूल्य, हमारे लोकतंत्र की सारी संस्थाएं सवालों के घेरे में हैं। यानी हमारी आज़ादी ही ख़तरे में हैं। हमारा देश ही दांव पर है। वरना किसी की सरकार बनने या न बनने से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है कि इसके लिए क्या तरीके अपनाए गए। और क्या इस खेल में, इस साज़िश में हमारी शीर्ष संस्थाओं भी शामिल हो गई हैं और सरकार की कठपुतली बनती जा रही हैं।

वाकई अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि देश बुरी हालत में हैं। सरकार हर चीज अपनी ढंग से नियंत्रित और निर्देशित करना चाहती है। हद तो ये है कि हमारे गृहमंत्री अमित शाह यहां तक कहते हैं कि कोर्ट को ऐसे फ़ैसले नहीं देने चाहिए जिनका पालन न कराया जा सके। सरकार को राम मंदिर पर फ़ैसला मंज़ूर होता है लेकिन सबरीमाला पर नहीं। यानी मोदी सरकार कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट को भी अपने अनुसार चलाना चाहती है।

अब ऐसे में छात्र, महिला, किसान, दलित-आदिवासी के हक़-हकूक की बात कौन करे, कैसे करे। आप देख ही रहे हैं कि देश की राजधानी दिल्ली में अपनी फीस वृद्धि के ख़िलाफ़ लड़ रहे छात्र पीटे जा रहे हैं तो सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में बीजेपी की योगी आदित्यनाथ सरकार उन्नाव में किसानों पर लाठी चलवा रही है।  

विडंबना यही है कि अब जब सरकार बनाने में ही सारी 'मेहनत' ख़र्च की जा रही है तो सरकार कैसे चलती है, क्या काम करती है, कौन पूछे और कौन बताए? 

Maharastra
Devendra Fadnavis
Ajit Pawar
Aisi Taisi Democracy
ठगा तो मतदाता गया
BJP
Shiv sena
NCP
SHARAD PAWAR
Amit Shah
Narendra modi
modi sarkar
Party Politics
Maharastra voter's
CBI
ED

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • नए शौचालय बनाने से पहले पुराने शौचालयों की कार्यक्षमता और सफ़ाई कर्मियों की दशा दुरुस्त करने की ज़रूरत
    मोहित यादव, आशुतोष रंगा
    नए शौचालय बनाने से पहले पुराने शौचालयों की कार्यक्षमता और सफ़ाई कर्मियों की दशा दुरुस्त करने की ज़रूरत
    05 Jul 2021
    नए सूखे शौचालय भारत में ख़राब स्वच्छता व्यवस्था के बुनियादी ढांचों और साफ-सुथरे शौचालयों की बदतर हालत का भी एक नतीजा हैं। 
  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 39,796 नए मामले, 723 मरीज़ों की मौत
    05 Jul 2021
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 39,796 नए मामले दर्ज किए गए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1.57 फ़ीसदी यानी 4 लाख 82 हज़ार 71 हो गयी है।
  • खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं
    सुबोध वर्मा
    खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं
    05 Jul 2021
    प्रोटीन के बुनियादी स्रोत जैसे मांस, अंडे, दालें आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गए हैं और रसोई गैस की क़ीमत की तरह खाना पकाने के तेल की क़ीमतों में भी बड़ा उछाल आया है। 
  • लेखक को भविष्य की उम्मीद दिखानी चाहिए
    न्यूज़क्लिक टीम
    लेखक को भविष्य की उम्मीद दिखानी चाहिए
    04 Jul 2021
    न्यूज़क्लिक की ख़ास पेशकश में वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक अजय सिंह ने उपन्यासकार-गद्यकार गीता हरिहरन से उनके उपन्यास I have become the tide के बहाने मौजूदा दौर पर विस्तृत बातचीत की। अजय सिंह ने…
  • Economic Liberalisation: 30 साल में क्या बदला, क्या नहीं?
    न्यूज़क्लिक टीम
    Economic Liberalisation: 30 साल में क्या बदला, क्या नहीं?
    04 Jul 2021
    'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन 1991 Economic Liberalisation की बात कर रहे है. क्या है इसका इतिहास और इसे क्यों लागू किया गया था, आइये जानते हैं
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License