NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव को विभाजनकारी एजेंडा का मंच बनाना शहीदों का अपमान
ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम जनता की एकता की बुनियाद पर लड़ी गयी आज़ादी के लड़ाई से विकसित भारतीय राष्ट्रवाद को पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद (जो सहजता से मुस्लिम विरोध में translate कर दिया जाता है) से replace कर देना और परिभाषित कर देना हमेशा से संघ-भाजपा की शातिर रणनीति का हिस्सा रहा है।
लाल बहादुर सिंह
25 Apr 2022
veer kunwar singh

23 अप्रैल को जगदीशपुर, बिहार में हमारे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव को भी विभाजनकारी एजेंडा को आगे बढ़ाने का मंच बना दिया गया। गोदी मीडिया ने बताया अमित शाह की सभा में 77900 राष्ट्रीय ध्वज एक साथ फहराकर भारत ने पाकिस्तान का 57000 राष्ट्रीय झंडे का रेकॉर्ड तोड़ दिया और यह गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में दर्ज हो गया।

इस तरह अंग्रेजों पर कुंवर सिंह की जीत का जश्न पाकिस्तान विरोधी उन्माद में बदल दिया गया !

दरअसल, 23 अप्रैल 1858 को (बिहार में 1857 के विद्रोह का नेतृत्व संभालने के लगभग एक साल बाद) कुंवर सिंह ने जगदीशपुर की लड़ाई में ब्रिटिश अधिकारी ले ग्रैंड को हराया। 26 अप्रैल, 1858 को, अपनी अंतिम जीत के तीन दिन बाद, कुंवर सिंह की जगदीशपुर में मृत्यु हो गई।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम जनता की एकता की बुनियाद पर लड़ी गयी आज़ादी के लड़ाई से विकसित भारतीय राष्ट्रवाद को पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद ( जो सहजता से मुस्लिम विरोध में translate कर दिया जाता है ) से replace कर देना और परिभाषित कर देना हमेशा से संघ-भाजपा की शातिर रणनीति का हिस्सा रहा है। यहां हम ठीक उसी का प्रयोग देख रहे हैं। दुस्साहस यह देखिए कि यह 1857 के  उस महान राष्ट्रीय संग्राम के शहीद वीर कुँवर सिंह के बहाने किया जा रहा है, जिसमें अनगिनत मुसलमानों-हिंदुओं ने एक साथ लड़ते हुए आज़ादी के लिए आहुति दी थी।

अमित शाह ने बड़ी चालाकी से कुंवर सिंह की इस बात के लिए तारीफ की कि हिन्दू समुदाय की विभिन्न जातियों के लोगों को उन्होंने अपने साथ जोड़ा था, लेकिन वे उसमें उनके मुस्लिम सहयोगियों का जिक्र करना भूल गए। वे लोगों को नहीं बताते कि कुंवर सिंह के कई सेनापति मुसलमान थे। वे नहीं बताते कि उन्होंने मैंगर सिंह को गहमर और रंजीत यादव को चौंगाई डिवीजन का प्रधान बनाया था, तो इब्राहिम खान को बिहिया डिवीजन का प्रधान बनाया था। 1857 के गम्भीर अध्येता अमरेश मिश्र के माध्यम से उनका एक पत्र भी सामने आया है जो उन्होंने अपने सहयोगी जहानाबाद के काज़ी जुल्फिकार अली को लिखा था।

इसे भी पढ़ें : बिहार : हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक कुंवर सिंह के परिवार को क़िले में किया नज़रबंद

अमित शाह भूलकर भी 1857 की लड़ाई के अनगिनत मुस्लिम नायकों में से किसी का नाम नहीं लेते। वे आजमगढ़ और अयोध्या तक कुंवर सिंह के अभियान का जिक्र करते हैं लेकिन उसी अयोध्या- फैज़ाबाद और अवध की लड़ाई के वीर नायक मौलवी अहमदुल्लाशाह उर्फ "डंका शाह " की चर्चा नहीं करते, न वीरांगना हज़रतमहल, 1857 के रणनीतिकार कैप्टन अज़ीमुल्लाह खां या बहादुर शाह जफर का जिक्र करते हैं जिन्हें नेता मानकर वह पूरा संग्राम लड़ा गया था।

अमित शाह ने कहा कि इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया। उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। इसी संदर्भ में उन्होंने आरा में उनका स्मारक बनाने की घोषणा की। अव्वलन तो ऐसे राष्ट्र-नायकों के सम्मान का सबसे अच्छा और जरूरी तरीका यह है कि उनके विचारों और जीवन-मूल्यों का सम्मान किया जाय। लोगों ने सही सवाल उठाया है कि आज़ादी की लड़ाई में अप्रतिम योगदान के लिए उनका समारोह और सम्मान तो राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए, केवल जगदीशपुर, आरा में ही क्यों ? अमित शाह इनकी स्मृति में  दिल्ली में केंद्रीय स्तर पर क्यों नहीं कुछ करते ? 

वैसे कुंवर सिंह की कीर्ति किसी अमित शाह-मोदी के सम्मान दिलाने की मोहताज नहीं। अपनी मृत्यु के 164 साल बाद भी वे देशभक्त जनता के दिलों में आज़ादी की लड़ाई में अपने अद्भुत शौर्य और बलिदान के लिए अमर हैं। किसी सरकारी प्रचार और विज्ञापन के बिना समूची भोजपुरी पट्टी में, जो उनकी रणभूमि थी, वह जनगीतों और कथाओं के माध्यम से लोकस्मृति में हमेशा जीवित रहे हैं और भविष्य में भी रहेंगे। भोजपुरी इलाके में फागुन माह में आज भी यह फाग गाया जाता है-

‘‘बाबू कुंअर सिंह तोहरे राज बिनु अब न रंगाइब केसरिया। 

इतते अइले घेर फिरंगी, उतते कुंवर दुहुं भाई। 

गोला बारूद के चले पिचकारी बिचवा में होते लड़ाई। 

बाबू कुंअर सिंह तोहरे राज बिनु अब ना रंगाइब चुनरिया।।”

जहां तक उनके विचारों और जीवन-मूल्यों की बात है, उस समय संघ-भाजपा के पुरखे और आज वे स्वयं, उनकी विचारधारा के तो  विपरीत खड़े हैं-चाहे वह साम्राज्यवाद विरोध की बात हो और चाहे उसके लिए हिन्दू मुस्लिम एकता को धुरी बनाने की बात हो। आज वे और भी बेशर्मी और नंगई के साथ उस सोच को आगे बढ़ा रहे हैं जो हर दृष्टि से 1857 के वीर नायकों के सोच के बिल्कुल उलट है।

इनकी चरम अवसरवादी राजनीति का ही नमूना है कि वे कुंवर सिंह का विजयोत्सव भी मना लेते हैं और 1857 में कुंवर सिंह का विरोध कर अंग्रेजों का साथ देने वाले, आज़ादी की लड़ाई से गद्दारी करने वाले डुमरांव के राजा के यहां भी नतमस्तक हो लेते हैं। सच्चाई यह है कि ये डुमरांव राज की दलाल परम्परा के ही वारिस हैं, लेकिन देशभक्त जनता का भावनात्मक दोहन करने के लिए जनता की आंख में धूल झोंकते हुए कुंवर सिंह की विरासत भी हड़पना चाहते हैं।

दरअसल, वीर कुंवर सिंह को जो हिन्दू-मुस्लिम एकता की बुनियाद पर खड़े राष्ट्रीय जनविद्रोह और उत्पीड़ित किसानों के छापामार युद्ध के नायक थे, उन्हें एक समय  जाति विशेष के नायक के रूप में reduce कर देने की साजिश हुई, इस कोशिश में जातियों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने वाले अनेक राजनेता शामिल थे।  यहां तक कि  समाज के उत्पीड़ित तबकों के जागरण के खिलाफ उनके नाम पर सामंती गोलबंदी करने और उन्हें तमाम प्रतिक्रियावादी ताकतों का प्रतीक बना देने की साजिश हुई। अब उसी के साथ उन्हें एक हिन्दू नायक बनाकर अपने पक्ष में जातिवादी, सामुदायिक गोलबंदी करने और राष्ट्रवाद की उनकी विरासत को हड़पने तथा  उसे साम्प्रदायिक रंग देने की साजिश की जा रही है।

अमित शाह ने शातिर ढंग से कुंवर सिंह के बहाने सावरकर को भी महिमामंडित कर दिया। उन्होंने कहा कि इतिहासकारों ने 1857 को विफल विद्रोह कह कर बदनाम किया, लेकिन वीर सावरकर ने पहली बार इसे आजादी का स्वतंत्रता संग्राम कह कर सम्मानित करने का काम किया। सच्चाई यह है कि यह उत्पीड़ितों के नेता कार्ल मार्क्स थे जिन्होंने 1857 का संग्राम जब चल रहा था, सावरकर के जन्म से भी पहले, तभी इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम घोषित किया था। युवा सावरकर ने बाद में वही बात दुहरायी थी। परंतु, जब अंग्रेजों से माफी मांग कर और उनके वजीफे पर वे जेल से बाहर आये तथा दो राष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन किये, तब तक जाहिर है सावरकर के लिए स्वतंत्रता संग्राम का अर्थ बदल चुका था, अब उनके लिए इसका अर्थ था अंग्रेजों से नहीं मुसलमानों से मुक्ति, 1857 के शहीदों का आज़ाद भारत नहीं, फासीवादी हिन्दू राष्ट्र! इसी बदले सावरकर को संघ-भाजपा अपना नायक मानते हैं।

सच तो यह है कि 1857 की जो तीन मूल बातें थीं —साम्राज्यवाद विरोध, हिन्दू-मुस्लिम एकता और किसानों की मुक्ति— सावरकर के हिंदुत्व की विचारधारा ठीक उसी के निषेध पर खड़ी हुई। संघ-भाजपा का कारपोरेट-फासीवाद आज इसी बुनियाद पर देश में कहर बरपा कर रहा है और उसने हमारी राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक लोकतन्त्र के लिये गम्भीर संकट खड़ा कर दिया है।

हद तो तब हो गयी जब अमित शाह ने "मौलिक" इतिहास-बोध का परिचय देते हुए कुंवर सिंह से मोदी की तुलना कर डाली,  "कुंवर सिंह ने पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति के उद्धार का काम किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी आज उसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं। कोरोना काल में अगर प्रधानमंत्री 130 करोड़ की जनसंख्या का मुफ्त टीकाकरण नहीं कराते तो न जाने कितने लोग मारे जाते। पैसे वाले तो टीका ले लेते, लेकिन गरीब मारे जाते ! "

जो दिन वीर कुंवर सिंह की गौरव गाथा का उत्सव था, उसे मोदी की उनसे हास्यास्पद और अपमानजनक तुलना और गुणगान का अवसर बना दिया गया।

जो दिन हमारी कौमी एकता के celebration का सबसे बड़ा अवसर बनना चाहिए था, उसे भी संकीर्ण राजनीति का मंच बना दिया गया। जाहिर है यह वीर कुंवर सिंह और 1857 के शहीदों का तथा आज़ादी के लड़ाई के महान मूल्यों का अपमान है, जिसे कोई भी देशभक्त स्वीकार नहीं करेगा।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Veer Kunwar Singh
Military commander
First freedom struggle
Bihar
Victory Festival
War of 1857
Indian Rebellion of 1857

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बिहारः नदी के कटाव के डर से मानसून से पहले ही घर तोड़कर भागने लगे गांव के लोग

मिड डे मिल रसोईया सिर्फ़ 1650 रुपये महीने में काम करने को मजबूर! 

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका

बिहार पीयूसीएल: ‘मस्जिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने के लिए हिंदुत्व की ताकतें ज़िम्मेदार’

बिहार में ज़िला व अनुमंडलीय अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी


बाकी खबरें

  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार में फिर लौटा चमकी बुखार, मुज़फ़्फ़रपुर में अब तक दो बच्चों की मौत
    16 Apr 2022
    मुज़फ़्फ़रपुर के अस्पतालों में हर दिन चमकी बुखार के लक्षण वाले बच्चे आ रहे हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License