NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
माओवादियों के गढ़ में कुपोषण, मलेरिया से मरते आदिवासी
महामारी के चलते बस्तर के ग़रीब बच्चों के लिए दूध और अंडे की आपूर्ति में बाधा पहुंची है।
सौरव कुमार
14 Oct 2021
Lakheswari in Kadampara village
छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले के कदमपारा गांव की लखेश्वरी

लखेश्वरी किसी तरह रेंग कर चल सकती है क्योंकि उसके पैर इतने कमज़ोर हैं कि वे अपने पैरों के सहारे अपने 5.5 किलोग्राम के नाज़ुक शरीर का भार भी नहीं ढो सकती है। राज्य सरकार की ओर से ग़रीब बच्चों को दिये जाने वाले खाने को लेकर तैयार भोजन के पैकेट की आपूर्ति में महामारी के चलते बाधा पहुंची है और इस वजह से सूखकर कांटा हो चुकी और अविकसित 2.5 साल की यह लड़की कुपोषण की एक मिसाल है। उनके पिता आशा राम अपने गांव कदमपारा से 27 किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के बस्तर के ज़िला मुख्यालय जगदलपुर में एक निर्माण स्थल पर काम करते हैं। उन्हें इतनी ज़्यादा दूरी इसलिए तय करनी पड़ती है, क्योंकि आस-पास काम ही नहीं है और इतनी दूर काम करके वह हर रोज़ महज़ 250 रुपये कमा पाते हैं।

आंगनबाडी कार्यकर्ताओं ने राम को 2020 में उनकी बेटी के अविकसित रह जाने की जानकारी दी थी। वह याद करते हैं कि लॉकडाउन के दौरान किस तरह उनके हाथ से रोज़गार निकल गया था और दिन में महज़ एक बार ही खाना मिल पाता था। पिछले दिन का जो भात बच जाता था,वही उनका अगले दिन का भोजन होता था।  यह ग़रीब परिवार, जो मुश्किल से अपना भरण-पोषण कर पाता था, अपनी बेटी को ज़रूरी आहार दे पाने की स्थिति में नहीं था, और इस वजह से वह रोग और मौत का शिकार हो गयी।

कदमपारा के तोंगुडा अस्पताल में पिछले दस साल से ताला लगा हुआ है

कदमपारा, जहां कई ग्रामीण गंभीर रूप से लेकर मामूली कुपोषण के शिकार हैं, वहां पिछले दस सालों से एक ऐसा अस्पताल है,जो किसी काम का रह नहीं गया है। अगर तोंगुडा अस्पताल चालू होता तो मलेरिया, पेचिश और डायरिया के मरीज़ों का इलाज वहां हो सकता था। इस अस्पताल के बगल में कवालीकल पंचायत के आंगनवाड़ी केंद्र में प्रतिनियुक्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हेमलता सेठिया कहती हैं कि इस अस्पताल में कुपोषण और भुखमरी के गंभीर मामलों का भी इलाज हो सकता था। पोषण पुनर्वास केंद्र नहीं होने से ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

बस्तर ज़िला प्रशासन के एक अधिकारी का दावा है कि जनवरी 2019 से मई 2021 के बीच इस राज्य के 1.41 लाख कुपोषित बच्चों को बचाया गया है। इस अधिकारी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि हर गांव में कुपोषित बच्चों को मितानिन (छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य स्वयंसेवकों) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मदद से गुड़, दूध और अंडे दिये जाते हैं।

पिछले साल महात्मा गांधी की 151 वीं जयंती के मौक़े पर राज्य सरकार ने राज्य को कुपोषण मुक्त बनाने के उद्देश्य से बेहद प्रचार-प्रसार के बीच मुख्यमंत्री सुपोषण योजना की शुरुआत की थी।

सेठिया ने न्यूज़क्लिक को बताया कि महामारी से कदमपारा के आदिवासी बच्चों के स्वास्थ्य को नहीं भरपाई की सकने वाला नुक़सान हुआ है, क्योंकि महामारी की वजह से प्रशासन की ओर से हफ़्ते में तीन बार दूध और अंडे की आपूर्ति कुपोषित बच्चों सहित कम से कम 47 बच्चों को बंद कर दी गयी थी। 47 बच्चों में से 10 से ज़्यादा बच्चों का विकास रुका हुआ था। एक अन्य आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने कहा कि खाने के लिए तैयार भोजन के पैक भी न तो पर्याप्त मात्रा में हैं और न ही गुणवत्ता के ख़्याल से अच्छे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता शकील रिज़वी कहते हैं, “राज्य के बस्तर जैसे संसाधन संपन्न इन इलाक़ों में आदिवासी मलेरिया जैसी घातक बीमारियों के सबसे ज़्यादा शिकार हुए हैं। इन आदिवासी बस्तियों में स्वास्थ्य देखभाल की कमी की वजह से कुपोषित लोगों की तादाद बढ़ रही है। ऊपर से बढ़ती महंगाई ने उनकी समस्याओं को और बढ़ा दिया है।” उन्होंने न्यूज़क्लिक को बताया कि तक़रीबन 10 गांवों में कुपोषित बच्चों का ग़ैर-सरकारी आंकड़ा 150 है, जिनमें गंभीर तेज़ कुपोषण और मझोले तीव्र कुपोषण, दोनों ही तरह के कुपोषणों में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज़्यादा है।

सुभद्रा रंधरीरस गांव, बस्तर

रंधरीरस गांव की चार साल की सुभद्रा का पेट आगे की ओर लटका हुआ है और लीवर शायद बढ़ा हुआ है।लगता है कि वह मझोले स्तर के कुपोषण की शकार है। इस अविकसित बच्चे का वज़न 9 किलोग्राम है, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के वज़न-आयु मानक से 2 किलोग्राम कम है।

सुभद्रा के पिता दशरू नाग एक लकड़ी कारखाने में काम करते हैं और भूमिहीन दिहाड़ी मज़दूर हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें प्रोटीन सहित उचित आहार मिल पाता है, इसके जवाब में वह व्यंग्यात्मक रूप से अपने तीर-धनुष की ओर इशारा कर देते हैं, जो कि इस बात का संकेत है कि ऐसा तभी मुमकिन हो सकता है, जब वह खरगोश या लोमड़ी का शिकार करें। आंगनबाडी सुविधायें नहीं मिल पाने से उनके सेहतमंद होने की राह में रुकावट पहुंच रही है और सुभद्रा फिर से गंभीर कुपोषण की चपेट में आ गयी हैं।

बस्तर के पुष्पल गांव में अंकिता

अंकिता के पिता जयदेव नेत्रहीन हैं और मां चैती शारीरिक रूप से विकलांग है और अंकिता का मामला कुपोषण के सबसे ख़राब मामलों में से एक है। जगदलपुर क़स्बे से पंद्रह किलोमीटर दूर स्थित पुष्पल गांव की यह पांच साल की बच्ची अपने झुके हुए पैरों से मुश्किल से चल पाती है। तीन लोगों का यह परिवार हर सरकारी योजना से वंचित है। जयदेव और चैती का कहना है कि विकलांग होने के बावजूद उन्हें कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती है। जयदेव जगदलपुर में अपने साउंडबॉक्स का इस्तेमाल करके स्थानीय लोकगीत गा-गाकर रोज़ी-रोटी कमाते हैं। दिन के ख़त्म होते-होते वह मुश्किल से 100-150 रुपये कमा पाते हैं। इस दंपति को अब भी एक तिपहिया साइकिल और अंकिता के लिए ज़रूरी आहार का इंतजार है।

कुपोषण के अलावे माओवादियों के इस गढ़ में आदिवासियों के लिए मलेरिया एक और समस्या है। यहां के घने जंगल ख़ास तौर पर मानसून के दौरान मलेरिया परजीवियों के प्रजनन के लिए एक मुफ़ीद जगह हैं, जिसके नतीजे कई तरह के प्रकोप के रूप में सामने आते हैं।

जब बस्तर के जंगलों के बाहर रहने वाली आबादी महामारी के दौरान ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब रंधारीरस का आदिवासी गांव मलेरिया के दूसरी लहर से जूझ रहा था। साठ साल के कल्लू नाग, जिन्हें दुबारा संक्रमण हो गया था, कहते हैं कि कम से कम हर घर में एक व्यक्ति को मलेरिया के लक्षण और दस्त थे।

बस्तर के रंधारीरस गांव की स्वास्थ्य स्वयंसेवक देवली नाग

देवली नाग एक मितानिन हैं और जगदलपुर स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों की सहायता से रंधरीरस गांव के 39 घरों को दवा पहुंचाती हैं।

गांव में लगातार मलेरिया के इस फैलने के पीछे का कारण प्राइमाक्विन की गोलियों का नहीं होना है।यह दवा इस समय एकमात्र मलेरिया-रोधी अनुशंसित दवा है। नाग की बेटी को दिसंबर में जो गोलियां स्वास्थ्य कर्मियों की ओर से दी गयी थी,उनमें प्राइमाक्विन की गोलियां नहीं थीं।

चित्तलगुर बड़े पारा के किसान शंकर बरसे

चित्तलगुर बड़े पारा बस्तर के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान का एक भीतरी इलाक़ा है,जहां तक़रीबन 150 लोग रहते हैं। तीन महीने पहले इस इलाक़े में मलेरिया के प्रकोप ने तबाही मचा दी थी,जहां सैकड़ों ऐसे मामले थे,जिनमें  मलेरिया के लक्षण थे और जिसमें दो लड़कियों की मौत हो गयी थी।

मई में मलेरिया से संक्रमित होने वाले 38 साल के एक सीमांत किसान शंकर बरसे ने न्यूज़क्लिक को बताया, “स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं होने की वजह से हम समय-समय पर बीमारी से संक्रमित होते रहने के आदी हो चुके हैं। तेज़ी से परीक्षण (फिंगर प्रिकिंग) किये जाने का इंतज़ाम नहीं था; दरवाज़े-दरवाज़े जाकर परीक्षण नहीं किये गये या फिर जागरूक करने वाले पर्चे तक नहीं बांटे गये। यहां के मरीज़ों को नांगुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) तक पहुंचने के लिए 45 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है, जहां अक्सर दवायें नहीं होती हैं और इस वजह से उन्हें स्लाइन की बोतल भी नहीं चढ़ पाती।

बस्तर के अन्य हिस्सों के उलट सरकार के मलेरिया-रोधी कार्यक्रम मलेरिया मुक्त बस्तर अभियान के तहत चित्तलगुर को शामिल नहीं किया गया है। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक कर्मचारी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि नज़दीकी नांगुर सीएचसी में पर्याप्त मात्रा में मलेरिया परीक्षण किट और दवायें तक नहीं हैं।

बस्तर का यह इलाक़ा केरल के उस इलाक़े से कहीं बड़ा है, जो मलेरिया परजीवी प्लास्मोडियम वाइवैक्स और प्लास्मोडियम फ़ॉल्सीपेरम ग्रस्त कुछ इलाक़ों में से एक है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, राज्य में मलेरिया के 76 फ़ीसदी मामले बस्तर संभाग में हैं, जिसमें सात ज़िले (बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, कांकेर और कोंडगांव) आते हैं। 2019 में बस्तर संभाग में 13.12 से ज़्यादा वार्षिक परजीवी प्रकोप (एपीआई-मलेरिया) देश में सबसे ज़्यादा था।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Malnutrition, Malaria hit Tribals in Maoist Hotbed

malnutrition
Pandemic
tribals
malaria
Maoism
Chhattisgarh
Bastar
jagdalpur
COVID-19

Related Stories

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

कोरोना वायरस : टीके की झिझक से पार पाते भारत के स्वदेशी समुदाय

बाघ अभयारण्य की आड़ में आदिवासियों को उजाड़ने की साज़िश मंजूर नहीं: कैमूर मुक्ति मोर्चा

सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा

मध्य प्रदेश के जनजातीय प्रवासी मज़दूरों के शोषण और यौन उत्पीड़न की कहानी


बाकी खबरें

  • ram_navmi
    अफ़ज़ल इमाम
    बढ़ती हिंसा व घृणा के ख़िलाफ़ क्यों गायब है विपक्ष की आवाज़?
    13 Apr 2022
    हिंसा की इन घटनाओं ने संविधान, लोकतंत्र और बहुलतावाद में विश्वास रखने वाले शांतिप्रिय भारतवासियों की चिंता बढ़ा दी है। लोग अपने जान-माल और बच्चों के भविष्य को लेकर सहम गए हैं।
  • varvara rao
    भाषा
    अदालत ने वरवर राव की स्थायी जमानत दिए जाने संबंधी याचिका ख़ारिज की
    13 Apr 2022
    बंबई उच्च न्यायालय ने एल्गार परिषद-माओवादी संपर्क मामले में कवि-कार्यकर्ता वरवर राव की वह याचिका बुधवार को खारिज कर दी जिसमें उन्होंने चिकित्सा आधार पर स्थायी जमानत दिए जाने का अनुरोध किया था।
  • CORONA
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1,088 नए मामले, 26 मरीज़ों की मौत
    13 Apr 2022
    देश में अब तक कोरोना से पीड़ित 5 लाख 21 हज़ार 736 लोग अपनी जान गँवा चुके है।
  • CITU
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: बर्ख़ास्त किए गए आंगनवाड़ी कर्मियों की बहाली के लिए सीटू की यूनियन ने किया प्रदर्शन
    13 Apr 2022
    ये सभी पिछले माह 39 दिन लंबे चली हड़ताल के दौरान की गई कार्रवाई और बड़ी संख्या आंगनवाड़ी कर्मियों को बर्खास्त किए जाने से नाराज़ थे। इसी के खिलाफ WCD के हेडक्वार्टस आई.एस.बी.टी कश्मीरी गेट पर प्रदर्शन…
  • jallianwala bagh
    अनिल सिन्हा
    जलियांवाला बाग: क्यों बदली जा रही है ‘शहीद-स्थल’ की पहचान
    13 Apr 2022
    जलियांवाला बाग के नवीकरण के आलोचकों ने सबसे महत्वपूर्ण बात को नज़रअंदाज कर दिया है कि नरसंहार की कहानी को संघ परिवार ने किस सफाई से हिंदुत्व का जामा पहनाया है। साथ ही, उन्होंने संबंधित इतिहास को अपनी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License