NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
चुनाव 2022
नज़रिया
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
मणिपुरः जो पार्टी केंद्र में, वही यहां चलेगी का ख़तरनाक BJP का Narrative
बात बोलेगी— क्या आपको पता है कि मणिपुर की पूरी आबादी पूरे भारत की आबादी का 0.4 फ़ीसदी से भी कम है और यहां के लोगों पर सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून (AFSPA) सहित बाक़ी ख़ौफ़नाक कानून 32 फीसदी थोपे गये हैं।
भाषा सिंह
02 Mar 2022
manipur

मणिपुर की राजधानी इंफाल, कमोबेश पूरे उत्तर-पूर्व की कहानी कह देती है। यहां के मतदाता बेहद ख़ामोश, बेहद संयमित, नाप-तौल कर बोलने वाले भारतीय नागरिक लगते हैं। मानो उनके ऊपर 360 डिग्री का सर्विलांस हो। खामोशी की इस राख को, थोड़े भरोसे के साथ कुरेदने पर उनके ज़ख्म फटने लगते हैं।

क्या आपको पता है कि मणिपुर की पूरी आबादी पूरे भारत की आबादी का 0.4 फीसदी से भी कम है और यहां के लोगों पर सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (AFSPA)  सहित बाकी खौफनाक कानून 32 फीसदी थोपे गये हैं। यहां पर ज़रा-ज़रा सी बात पर, मुख्यमंत्री या किसी भी मंत्री के ट्वीट पर असहमति भरे तंज कसने पर पत्रकारों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून तक लगा दिया जाता है। इस माहौल ने किस तरह से लोगों को खुलकर बोलने से रोका है, इसका अहसास नौजवान मतदाताओं से बतियाते हुए होता है।

इरोम शर्मिला और महात्मा गांधी। इरोम शर्मिला ने AFSPA के ख़िलाफ़ लगातार 16 साल अहिंसक आंदोलन (अनशन) किया।

चुनावी माहौल में जहां तमाम राजनीतिक दलों के बीच दावों-प्रतिदावों की लड़ाई बहुत तीखी होती है और कमोबेश बड़े राजनीतिक दलों के समर्थकों के बीच टकराहट होना आम होता है—मणिपुर में ऐसा जीवंत लोकतांत्रिक माहौल नहीं दिखाई देता—कम से कम ऊपरी तौर पर। जानकार तबका मुद्दों की बात करता है, लेकिन वह भी दबे स्वर में। वहीं दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पक्ष में बहुत मुखर और कमोबेश एक ही ढंग के तर्क सुनाई देते हैं।

इसे भी पढ़ें : मणिपुर चुनाव: भाजपा के 5 साल और पानी को तरसती जनता

एक दशक से भी ज्यादा समय से सैन्य बलों द्वारा मारे गये लोगों के परिजनों को न्याय दिलाने के लिए संगठन- ईईवीएफएएम (एक्सट्रा ज्यूडिशियल एग्जिक्यूशन विक्टिम फैमिलीज़ एसोसिएशन मणिपुर) की अध्यक्ष रेनू ताखिलामबाम बेहद चुटीले अंदाज में कहती हैं, भाजपा ने किया तो कुछ नहीं, झूठ बोलने के अलावा, महंगाई में हमें ढकेलने के अलावा, पानी के बिना हमें तड़पता छोड़ने के अलावा, लेकिन आएगी तो वही। मैंने पूछा क्यों—मुस्कुरा कर हाथ से इशारा किया पैसे का और बाहुबल का। सामने सड़क पर गिरती-पड़ती ड्रग शिकार को दिखा कर बोलीं—इसका माफिया तो फूल खिलाएगा ही।

इसे भी पढ़ें : मणिपुर : ड्रग्स का कनेक्शन, भाजपा और इलेक्शन

रेनू और उनकी साथी रीना दोनों ने बहुत कम उम्र में अपने पति को सैन्य बलों के फर्जी एनकाउंटर में खोया था। इस दुख और सदमे से बेहद मुश्किल से निकलीं, संगठन बनाया और 10 बरस की अथक मेहनत के बाद सुप्रीम कोर्ट तक उनकी जनहित याचिका पहुंची, जिसमें 1528 फर्जी एंनकाउटरों के जरिए की गई हत्याओं के मामले में इंसाफ की गुहार लगाई गई है। वे इस बात से बहुत नाराज हैं कि एक तरफ तो भाजपा सरकार ने उन लोगों के सवालों की कोई सुनवाई नहीं की, चुनावी घोषणापत्र तक में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (AFSPA)  को हटाने तक का वादा नहीं किया, जबकि मणिपुर में चुनाव में उतरी तमाम विपक्षी पार्टियों ने अपने घोषणापत्र में सत्ता में आने के बाद आफस्पा को हटाने की बात कही है।

रेनू ने साफ-साफ कहा कि भाजपा ने यह सरासर झूठा दावा किया है कि इसकी वजह से इन हत्याओं में कमी आई है, हकीकत यह है कि हमारे आंदोलन और सुप्रीम कोर्ट में हमारे केस की वजह से जो अदालती हस्तक्षेप हुआ है, उसने इन नाइंसाफियों पर लगाम लगाई है। राज्य सरकार ने इस पूरे मामले में इंसाफ की लड़ाई में कोई मदद नहीं की, कोई दोषी सजा की गिरफ्त में नहीं आया।

मणिपुर चुनाव कवरेज के दौरान स्थानीय लोगों के साथ

छात्रों और नौजवानों में मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम, राजनीतिक पार्टियों को लेकर गहरी हताशा है। राजनीतिक नेताओं का भीषण रूप से भ्रष्ट आचरण उनके भीतर राजनीति को लेकर गहरी विरक्ति विकसित कर रहा है। यह विरक्ति भाजपा के पक्ष में माहौल विकसित करती है। कानून की पढ़ाई करने वाली छात्रा सिमरन का यह कहना कि हम वोट किसे भी दें, यहां बाद में तो उसे खरीद लिया जाता है, यह तो हमारे जनादेश की हत्या है। लेकिन अब नया राजनीतिक चलन यही है। चुनाव के बाद, हम खुद को ठगा हुआ महसूस करते है कि अरे ये दोनों तो मिले हुए थे।

सिमरन की बात, मणिपुर सहित उन तमाम राज्यों के मतदाताओं के दिल की बात है, जहां पिछले कुछ सालों में भाजपा ने जोड़-तोड़ करके किसी और पार्टी के सरकार बनाने के हक को मारते हुए सत्ता पर कब्जा जमा लिया। वर्ष 2017 में मणिपुर में कांगेस को मतदाताओं ने ज्यादा सीटें दी थी। कांग्रेस के पास 28 सीटें थीं और  भाजपा के पास 21 लेकिन उसने राज्यपाल के साथ मिलकर सरकार बना ली।

गोवा में भी यही हुआ था 2017 में। वहां भी जब मैं इस बार चुनाव कवरेज के लिए गई, तो बहुत से मतदाता इसे लेकर हताश से दिखाई दिये। और तो और उत्तर प्रदेश में भी, जहां भाजपा को कड़े ज़मीनी विरोध का सामना करना पड़ रहा, वहां भी लोग खुलेआम यह कहते मिल जाएंगे कि अगर भाजपा 150 पार हो गई तो सरकार तो जोड़-तोड़ करके बना ही लेगी। बहुत पैसा है, बहुत ताकत है।

थोड़ा ध्यान से देखें तो भारतीय लोकतंत्र में खरीद-फरोख्त को नया नार्मल बनाने के पीछे भाजपा की असल मंशा यह है कि बड़े पैमाने पर लोगों के दिमाग में यह बैठा देना है कि येन-केन-प्रकारेण सरकार तो भाजपा ही बना लेगी। इससे भाजपा से नाराज मतदाताओं को दिगभ्रमित करने में सहूलियत होती है। भाजपा विरोध की धार खत्म हो जाती है और एक हताशा घर कर जाती है। जिस तरह से मणिपुर में 2017 के बाद जनादेश पर धावा बोलकर, आया-राम गया राम की राजनीति करके सरकार को भगवा कर दिया।

इसी से जुड़ा हुआ एक और अहम मुद्दा है नेताओं का पार्टी बदल होना। मिसाल के तौर पर  भाजपा के मुख्यमंत्री से लेकर बाकी तमाम बड़े नेता कांग्रेस से आए हैं। यह काम भाजपा ने सिर्फ मणिपुर में ही किया, ऐसा नहीं पूरे उत्तर पूर्व में किया। असम से इसी क्रम की बड़ी शुरुआत की— हिमंता बिस्वा सरमा से करके सातों बहनों (Seven Sisters—असम, त्रिपुरा, अरुणाचल, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और मणिपुर) में जोड़-तोड़ से सरकार बनाने, बहुमत हासिल करने औऱ दूसरी राजनीतिक पार्टियों की जमीन को हड़पने की शुरुआत की। राजनीतिक फलक पर भाजपा का यह दांव बहुत कामयाब रहा—उसने येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल की, असहमति के तमाम स्वरों को कुचलने के लिए तमाम ख़ौफनाक कानूनों (AFSPA, UAPA, NSA…) का इस्तेमाल किया।

इस बारे में ह्यूमन राइट्स अलर्ट संस्था के निदेशक बबलू लोइतोंगबम ने कहा, सिविल सोसाइटी का स्पेस बहुत बुरी तरह से ख़त्म कर दिया गया है। हकों की बुनियादी बात करने पर, सरकार के कदम की आलोचना करने पर जेल में डालना, नया नॉर्मल बन गया है। इन चुनावों में जिस तरह से भाजपा ने ड्रग माफिया के साथ हाथ मिलाया, जिस तरह से ड्रग तस्करी से जुड़े लोगों को टिकट दिया, उसने राज्य के भविष्य को अंधकार में डाल दिया है।

मिलिटेंट समूहों का खुलेआम भाजपा के पक्ष में मतदान करने की अपील करना—दिखा रहा है कि सत्ता पाने के लिए हर जोड़-तोड़ करने के लिए यह पार्टी दांव खेल रही है। ऐसा संभवतः पहली बार हो रहा है, जब इस तरह के मिलिटेंट ग्रुप्स खुलकर एक सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में वोट देने की बात कह रहे हैं। इससे पहले खेल परदे के पीछे से होता था। मणिपुर जीतना कितना अहम है भाजपा के लिए कि इस छोटे से राज्य को जीतने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह,  असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा बैठक जमाते है, कैबिनेट मंत्री चक्कर काटते हैं। भव्य भोज की फोटो ट्वीट करके अलग-अलग दांव चले जा रहे हैं, वहीं विपक्षी पार्टियों प्रचार में तकरीबन लुटी-पिटी सी नजर आती है।

भाजपा के साथ बिहार में सरकार बनाने वाली जनता दल-यूनाइटेड भी कई इलाकों में मजबूत पकड़ बनाए हुई है। मजेदार बात यह है कि जद (यू) में अधिकांश ऐसे लोग चुनाव लड़ रहे हैं, जिन्हें भाजपा ने टिकट नहीं दिया। एक तरह से जद (यू) भाजपा की बी-पार्टी के रूप में चुनाव लड़ रही हैं और परिणाम के बाद भाजपा की सरकार बनाने में मदद निभाएगी। मणिपुर के पहाड़ी इलाकों की कहानी फर्क है। कांग्रेस का पुराना आधार यहां रहा है।

बहरहाल, मणिपुर और खासतौर से उसकी राजधानी इंफाल में हर कोने पर भाजपा के बड़े-बड़े बैनर पोस्टर अटे हुए थे, उससे धनबल की कहानी में तमाम अन्य दल कहीं नज़र ही नहीं आ रहे थे। 60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा के लिए पहले दौर में 38 सीटों का चुनाव 28 फरवरी को हुआ जबकि दूसरे दौर में 22 सीटों के लिए 5 मार्च को मतदान होना है।

किस तरह से धीरे-धीरे इस राज्य को भाजपा ने अपनी गिरफ्त में लिया है, उसमें सबसे अहम तर्क यह है कि जिस पार्टी की केंद्र में सरकार है, वही यहां सरकार बनाती है। केंद्र की सरकार के हाथ ही में उत्तर पूर्व के राज्यों की नकेल है—यहीं भारतीय लोकतंत्र का नया नॉर्मल है। यह देश के संघीय ढांचे के लिए बेहद खतरनाक घंटी है।

सभी फ़ोटो—भाषा सिंह

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें—

मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव

 

इसे भी देखें—

मणिपुर चुनावः जहां मतदाता को डर है बोलने से, AFSPA और पानी संकट पर भी चुप्पी

 

manipur
Manipur Election 2022
Assembly Election 2022
BJP
Congress
jdu
NPP
NPF
AFSPA

Related Stories

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

त्रिपुरा: सीपीआई(एम) उपचुनाव की तैयारियों में लगी, भाजपा को विश्वास सीएम बदलने से नहीं होगा नुकसान

यूपीः किसान आंदोलन और गठबंधन के गढ़ में भी भाजपा को महज़ 18 सीटों का हुआ नुक़सान

जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता

पंजाब : कांग्रेस की हार और ‘आप’ की जीत के मायने

यूपी चुनाव : पूर्वांचल में हर दांव रहा नाकाम, न गठबंधन-न गोलबंदी आया काम !

उत्तराखंड में भाजपा को पूर्ण बहुमत के बीच कुछ ज़रूरी सवाल

गोवा में फिर से भाजपा सरकार

त्वरित टिप्पणी: जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और जीतना होता जा रहा है मुश्किल

जनादेश-2022: यूपी समेत चार राज्यों में बीजेपी की वापसी और पंजाब में आप की जीत के मायने


बाकी खबरें

  • सबाह गुरमत
    ना शौचालय, ना सुरक्षा: स्वतंत्र क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं से कंपनियों के कोरे वायदे
    20 Oct 2021
    भारत में गिग इकोनॉमी (छोटी अर्थव्यवस्था) में काम करने वाले कामगारों को आने वाली दिक्कतों पर कुछ समय से काम किया जा रहा है, लेकिन महिला कर्मचारियों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    सुप्रीम कोर्ट में लखीमपुर हत्याकांड की सुनवाई, कोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार
    20 Oct 2021
    सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना ने कहा कि हम कल रात एक बजे तक स्टेटस रिपोर्ट का इंतजार करते रहे लेकिन हमें रिपोर्ट अभी मिली है। उन्होंने अपने पुराने आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि हमने पिछली…
  • Chamoli
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड: बारिश ने तोड़े पिछले सारे रिकॉर्ड, जगह-जगह भूस्खलन से मुश्किल हालात, आई 2013 आपदा की याद
    20 Oct 2021
    बारिश-बाढ़-भूस्खलन से घिरे उत्तराखंड में जो हो रहा है, यही जलवायु परिवर्तन है, आपदा के बाद हम सिर्फ प्रतिक्रिया में कदम उठाते हैं। लेकिन हमें शार्ट टर्म, मिडिल टर्म और लॉन्ग टर्म के लिहाज से तैयारी…
  • लखीमपुर कांड: मंत्री पर एक्शन क्यों नहीं मोदी जी ?
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    लखीमपुर कांड: मंत्री पर एक्शन क्यों नहीं मोदी जी ?
    20 Oct 2021
    बोल के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा कैबिनेट मंत्री अजय मिश्रा की बर्खास्तगी पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं.
  • Kisan Jan-Jagran Padyatra
    विजय विनीत
    किसानों ने बनारसियों से पूछा- तुमने कैसा सांसद चुना है?
    20 Oct 2021
    गांधी जयंती 2 अक्टूबर को चंपारण से शुरू हुई किसान जन-जागरण पदयात्रा का आज 20 अक्टूबर को बनारस में समापन हुआ। अब 7 नवंबर से कन्याकुमारी से दिल्ली तक के लिए पदयात्रा शुरू होगी, जो 26 नवंबर को दिल्ली…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License