NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
विडंबना: मेलघाट टाइगर रिज़र्व के चलते उजड़े कई आदिवासी गांवों का 20 साल बाद भी नहीं हुआ पुनर्वास
अमरावती जिले के तहत आने वाले मेलघाट में तब 33 आदिवासी बहुल गांवों के लिए पुनर्वास की रूपरेखा तैयार की गई थी। इनकी आबादी 25 हजार से ज्यादा थी। आश्चर्य है कि इनमें से 18 गांवों का पुनर्वास करने के लिए राज्य सरकार को बीस साल का समय लगा। जबकि, इन दो दशकों में 15 गांवों का पुनर्वास नहीं हुआ है।
शिरीष खरे
09 Feb 2021
दो दशक पहले सरकार ने प्रति परिवार दस लाख रुपए की मुआवजा राशि तय की थी। तब से कई गुना महंगाई बढ़ने के कारण अब विस्थापित परेशान हैं। तस्वीर: शिरीष खरे
दो दशक पहले सरकार ने प्रति परिवार दस लाख रुपए की मुआवजा राशि तय की थी। तब से कई गुना महंगाई बढ़ने के कारण अब विस्थापित परेशान हैं। तस्वीर: शिरीष खरे

अमरावती: महाराष्ट्र की सतपुड़ा पहाड़ी के आदिवासी बहुल मेलघाट अंचल में आज से बीस साल पहले कई गांवों के लिए पुनर्वास योजना बनाई गई थी। ऐसा इसलिए कि मेलघाट टाइगर रिजर्व एरिया के लिए कई गांवों को विस्थापित किया जाना था। बताया गया कि इससे मनुष्यों और बाघों के बीच संघर्ष कम होगा। साथ ही बाघों के संरक्षण के लिए एक रहवास क्षेत्र भी आरक्षित होगा।

अमरावती जिले के तहत आने वाले मेलघाट में तब 33 आदिवासी बहुल गांवों के लिए पुनर्वास की रूपरेखा तैयार की गई थी। इनकी आबादी 25 हजार से ज्यादा थी। आश्चर्य है कि इनमें से 18 गांवों का पुनर्वास करने के लिए राज्य सरकार को बीस साल का समय लगा। जबकि, इन दो दशकों में 15 गांवों का पुनर्वास नहीं हुआ है।

हर साल बढ़ती महंगाई को देखते हुए जाहिर है कि उसी अनुपात से पुनर्वास की लागत राशि भी बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में प्रश्न है कि यदि बाकी गांवों के पुनर्वास में यह सामान्य अनुमान के आधार पर यदि पंद्रह साल का समय और लगा तो परियोजना का बजट खर्च कहां से आएगा? बता दें कि इन गांवों के पुनर्वास के लिए प्रति परिवार महज दस लाख रुपए की राशि आबंटित है। ऐसे में विस्थापित होने वाले गांवों के लोगों की चिंता है कि अगले 15 साल के हिसाब से 15 गांवों के पुनर्वास को देखते हुए उनके लिए दस लाख रुपए की राशि बहुत अधिक मामूली है।

इस बारे में मेलघाट पहाड़ी क्षेत्र में बच्चों के अधिकारों के लिए कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता संजय इंग्ले बताते हैं कि टाइगर रिजर्व एरिया के तहत सबसे पहले वर्ष 2001 में तीन गांवों का पुनर्वास किया गया था। ये गांव थे- बोरी, कोहा और कुंड। इन्हें तब मेलघाट से कई किलोमीटर दूर अकोला जिले में राजूर और गिरवापुर क्षेत्र में बसाया गया था। वे बताते हैं, "बाकी गांवों को बसाने के लिए पुर्नवास परियोजना का कार्य बहुत मंद गति से चलता रहा। ऐसे में आप कह सकते हैं कि इन बीस वर्षों में जिन 18 गांवों के लोगों का विस्थापन हुआ है उन्हें भी परियोजना में देरी होने के कारण बहुत मामूली मुआवजा मिला। यदि 2001 में ही उन्हें दस लाख रुपये की राशि दी जाती तो भी यह एक हद तक ठीक थी। पर, साल-दर-साल जिस तेजी से महंगाई बढ़ती जा रही है उस लिहाज से मुआवजा की राहत राशि का मूल्य बहुत अधिक घट गया है।"

मेलघाट पहाड़ी क्षेत्र में ढाकना गांव के रहवासी शालिकराम बेलसरे बताते हैं कि इन बीस सालों में कई बच्चे 18 साल से अधिक उम्र के हो गए हैं। बीस साल पहले जब सर्वेक्षण हुआ था तब वे छोटे थे और माता-पिता के साथ रहते थे। इसलिए तब वे एक परिवार के सदस्य थे। लेकिन, समय के साथ स्थितियां बदली हैं और कई नए घर और परिवार बने हैं। शालिकराम कहते हैं, "अब कई लड़कों की शादियां हो गई हैं, उनके अपने बच्चे हैं, अलग घर-परिवार है, लेकिन जब पूरे गांव उजाड़े जाएंगे तो क्या उन्हें मुआवजा मिलेगा? या फिर पिता को ही मुआवजा दिया जाएगा? यदि ऐसा हुआ तो नए परिवारों को फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी। नई जगह पर उनका क्या होगा!"

इसके अलावा पुनर्वास के कार्यों को लेकर भी लोग असंतुष्ट हैं। इस बारे में ढाकना की ही रहवासी शांता भिलावेकर बताती हैं कि जिन अठारह गांवों की बसाहट नई जगहों पर हुई हैं वहां बुनियादी सुविधाएं अब तक नहीं मिली हैं। करीब सात-आठ गांव ऐसे हैं जहां आज भी बसाहट से जुड़े काम पूरे नहीं हुए है। एक पीढ़ी गुजर गई है, लेकिन पुनर्वास से जुड़े काम कब पूरे होंगे तो इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। शांता कहती हैं, "इतने लंबे समय बाद भी लोग नई जगह बस नहीं सके हैं। हमें भी एक न एक दिन अपना गांव और अपनी जमीन छोड़नी पड़ेगी। मगर, हम कब तक बसेंगे। लगता तो ऐसा है कि अपने जीते जी ठीक तरह से बस ही नहीं पाएंगे! और दस लाख इतनी मामूली रकम है कि जो लोग गांवों से उजाड़े गए थे, जिन्हें नई जगहों पर ले जाया गया था, उनके पास यह रकम अब बची भी नहीं है। नए सिरे से घर और गृहस्थी जमाने में पैसा तेजी से फुर हो जाता है। फिर महंगाई भी तो बहुत बढ़ी है। मुआवजे की रकम से नई जगह घर ही कैसे बनेगा, यह भी सोचने वाली बात है। सरकार को पैसा बढ़ाना ही चाहिए।"

शालिकराम और शांता की तरह यहां के पंद्रह गांवों में कई लोग सरकार की पुनर्वास परियोजना को लेकर आशंकित हैं। उनकी आशंकाएं गलत भी कैसे कही जा सकती हैं जब पुनर्वास को लेकर सरकारी कामकाज के अनुभव इस हद तक कड़वे हों। इसलिए, इस बारे में संजय इंग्ले मानते हैं कि सरकार को अपनी पुर्नवास से जुड़े बिंदुओं पर फिर से समीक्षा करनी पड़ेगी, नए सिरे से सर्वेक्षण करने पड़ेंगे और गांव वालों के साथ संवाद करके उन्हें भरोसे में लेना पड़ेगा। बीस साल बाद मुआवजा की राशि दस लाख से बढ़ाकर कितनी की जानी चाहिए, तो इसे लेकर भी जल्दी निर्णय लिया जाए।

इस बारे में शालिकराम कहते हैं, "बीस साल पहले महंगाई कम थी। अब खाने की हर चीज के दाम के लिए हमारे पास पैसे नहीं होते। क्योंकि, मंहगाई के हिसाब से मजूरी नहीं बढ़ी। समय के साथ नए खर्चे भी बढ़ रहे हैं। जैसे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई। सच दस लाख रुपए देकर हमारा गांव छुड़ा देना बहुत नुकसान का सौदा होगा!' वहीं, शांता एक दूसरी समस्या बताती हैं। वे कहती हैं, "अपनी जगह पर रहकर हमारा खर्च कम आता है। हम यहां हमेशा से रह रहे हैं तो साग-सब्जी वगैरह के लिए पैसा नहीं देना पड़ता है। पर, नई जगह ऐसा थोड़ी ही है। वहां हमें मंजूरी मिलेगी या नहीं, मिलेगी तो कहां और क्या काम कराएंगे तो यह भी नहीं पता है। यहां हमारा सिर्फ घर नहीं है, खेत और जंगल भी हैं। इनसे भी हमारा गुजारा हो जाता है। नई जगह सब चीजें ज्यों की त्यों थोड़ी मिलेगी। बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। वे मुआवजा का पैसा तो दे रहे हैं, पर हमारी मेहनत भी तो जाएगी। मेहनत और समय कोई नहीं देख रहा है।"

(शिरीष खरे स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Maharashtra
Melghat Tiger Reserve
aadiwasi
Tribal Villages
tribal rights

Related Stories

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

अमित शाह का शाही दौरा और आदिवासी मुद्दे

महाराष्ट्र सरकार का एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लेकर नया प्रस्ताव : असमंजस में ज़मीनी कार्यकर्ता

स्पेशल रिपोर्ट: पहाड़ी बोंडा; ज़िंदगी और पहचान का द्वंद्व

केंद्रीय बजट में दलित-आदिवासी के लिए प्रत्यक्ष लाभ कम, दिखावा अधिक

हर साल दलित और आदिवासियों की बुनियादी सुविधाओं के बजट में कटौती हो रही है :  बीना पालिकल

जयपाल सिंह मुंडा: आदिवासी समाज की राजनीति और विचारधारा की प्राणवायु

झारखंड: ‘स्वामित्व योजना’ लागू होने से आशंकित आदिवासी, गांव-गांव किए जा रहे ड्रोन सर्वे का विरोध

EXCLUSIVE: सोनभद्र के सिंदूर मकरा में क़हर ढा रहा बुखार, मलेरिया से अब तक 40 आदिवासियों की मौत


बाकी खबरें

  • Goa
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोवा चुनावः क्या है मछली बेचने वालों के मुद्दे और भाजपा का रिपोर्ट कार्ड?
    04 Feb 2022
    गोवा एक तटीय प्रदेश है। बड़ी आबादी मछली कारोबार से जुड़ी हैं। लेकिन बावजूद इसके इनके मुद्दे पूरी चुनाव चर्चा से गायब हैं। हमने मापसा की मछली मार्केट में कुछ मछली बेचने वालों के साथ बात की है कि उनके…
  • journalist bodies
    ऋत्विका मित्रा
    प्रेस की आजादी खतरे में है, 2021 में 6 पत्रकार मारे गए: रिपोर्ट 
    04 Feb 2022
    छह पत्रकारों में से कम से कम चार की कथित तौर पर उनकी पत्रकारिता से संबंधित कार्यों की वजह से हत्या कर दी गई थी। 
  • Modi
    नीलांजन मुखोपाध्याय
    उत्तर प्रदेश चुनाव: बिना अपवाद मोदी ने फिर चुनावी अभियान धार्मिक ध्रुवीकरण पर केंद्रित किया
    04 Feb 2022
    31 जनवरी को अपनी "आभासी रैली" में प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में पिछले समाजवादी पार्टी के "शासनकाल के डर का जिक्र" छेड़ा, जिसके ज़रिए कुछ जातियों और उपजातियों को मुस्लिमों के साथ मिलने से…
  • russia china
    एम. के. भद्रकुमार
    रुस-चीन साझेदारी क्यों प्रभावी है
    04 Feb 2022
    व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग के बीच शुक्रवार को होने वाली मुलाक़ात विश्व राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने जा रही है।
  •  Lucknow
    असद रिज़वी
    यूपी चुनाव: लखनऊ में इस बार आसान नहीं है भाजपा की राह...
    04 Feb 2022
    वैसे तो लखनऊ काफ़ी समय से भगवा पार्टी का गढ़ रहा है, लेकिन 2012 में सपा की लहर में उसको काफ़ी नुक़सान भी हुआ था। इस बार भी माना जा रहा है, भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License