NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों की मांगों को लेकर मेधा का अनिश्चितकालीन धरना
पुर्नवास और उचित मुआवजे की मांग को लेकर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं और पीड़ित आम लोगों का विरोध प्रदर्शन बीते शनिवार 16 नवंबर से जारी है।
सोनिया यादव
19 Nov 2019
सरदार सरोवर बांध

विकास का प्रतीक माना जाने वाला गुजरात का सरदार सरोवर बांध फिलहाल इसके विस्थापितों के लिए मुसीबत बन गया है। पुर्नवास और उचित मुआवजे की मांग को लेकर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं और पीड़ित आम लोगों का विरोध प्रदर्शन बीते शनिवार 16 नवंबर से जारी है।

नर्मदा भवन के सामने सैकड़ों लोग सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के नेतृत्व में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। 19 नवंबर को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से इस पूरे मामले पर एक समिति के गठन की बात कही गई जो विस्थापितों और बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास की प्रक्रिया को जल्दी सुनिश्चित करने के लिए कारगर कदम सुझा सके।

प्रदर्शन में शामिल लोगों ने न्यूज़क्लिक को बताया कि सरकार द्वारा बनाए गए राहत शिविरों में न पीने के पानी की ठीक व्यवस्था है, ना ही स्वास्थ्य सुविधाओं की। जिन लोगों के घर और धंधे डूब की चपेट में आ गए उन्हें मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं। इन लोगों का साफ कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं, वे धरने पर बैठे रहेंगे।
IMG-20191119-WA0013.jpg
धरने पर बैठी मेधा पाटकर का कहना है कि सरदार सरोवर बांध में इस मानसून में पानी भरने से मध्य प्रदेश के हजारों परिवार बेघर हो गये हैं। हज़ारों की संख्या में लोग राहत शिविरों में बिना सुविधाओं के दयनीय स्थिति में रहने को मजबूर हैं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े महेंद्र नाथ तोमर ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, ‘भारी बारिश और बढ़ते जल स्तर के कारण लोगों की फसलें बर्बाद हो गई हैं। लोग हजारों की संख्या में सड़कों पर रहने को मजबूर हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद अभी तक इस मामले में गठित समिति की मीटिंग नहीं हो पाई है। हमारी मांग है कि इस पर जल्दी कार्रवाई हो, वॉटर लेवल को घटाकर 122 मीटर किया जाए। सरकार इन विस्थापितों के लिए किन योजनाओं पर काम कर रही है, ये किसी को नहीं पता। हम आश्वासन से थक चुके हैं और अब समाधान चाहते हैं।'

गौरतलब है कि इस साल अगस्त में भी विस्थापितों की मांगों और बांध के गेट खोलने को लेकर मेधा पाटकर की अगुआई में नर्मदा चुनौती सत्याग्रह हुआ था। हालांकि बाद में मध्य प्रदेश सरकार के आग्रह और आश्वासन के बाद इसे खत्म कर दिया गया था। अब प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें आश्वासन और वादे नहीं चाहिए, उन्हें उचित मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था चाहिए।
IMG-20191119-WA0014.jpg
सामाजिक कार्यकर्ता आशुतोष कुमार के अनुसार नर्मदा और इसके विस्थापितों को बचाने की ये लड़ाई आज से नहीं बल्कि पिछले 34 सालों से लड़ी जा रही है। इस साल भारी बारिश के कारण नर्मदा नदी का पानी आस-पास के इलाकों में भर गया और कई गांव इसकी चपेट में आ गए। अब लोग अपने हक का मुआवजा मांगने के लिए सरकार से गुहार लगा रहे हैं, लेकिन सरकार अभी भी दिलासे और आश्वासन से लोगों को चुप कराने की कोशिश कर रही है।

रविवार 17 नवंबर को भोपाल में हुई जनसुनवाई के दौरान विभिन्न क्षेत्र के लोगों ने अपनी परेशानियों को मंच से साझा किया। बड़वानी, धार और आस-पास के जिलों से आए सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने इसमें हिस्सा लिया। इस प्रदर्शन में शामिल महिलाओं ने कहा कि बारिश के चलते उनके घर, गांव डूब गए हैं। वो राहत शिविरों में रहने को विवश हैं, लेकिन कब तक वहां रहेंगे? पहले खाना मिलता था, अब वो भी बंद हो गया है।

कुछ लोगों ने बांध में पानी का स्तर बढ़ने से व्यवसाय चौपट होने की बात भी रखी। नर्मदा के आस-पास रहने वाले मछुआरों ने कहा कि उन्हें मछली पकड़ने का अधिकार अभी तक नहीं मिला। ये अधिकार उनसे छीन कर ठेकेदारों को दिया जा रहा है, लेकिन वह इसके लिए मरते दम तक संघर्ष जारी रखेंगे। वहीं, कुम्हारों का कहना था कि पानी के चलते उनके ईंट के भट्टे डूब गए हैं। सरकार ने साल 2017 में इसके बदले मुआवज़े में ज़मीन देने का वादा किया था लेकिन अभी तक उन्हें कोई ज़मीन नहीं मिली है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के लोगों का कहना है कि घाटी में करीब 32,000 परिवार ऐसे हैं, जिनका पुनर्वास नहीं हुआ है। मध्य प्रदेश की पूर्व बीजेपी सरकार ने इसे मानने से इंकार कर दिया था, उनका कहना था कि सभी परिवारों का पुनर्वास हो चुका है।
IMG-20191119-WA0012.jpg
हालांकि वर्तमान कमलनाथ सरकार ने इस बात को स्वीकार किया है कि नर्मदा घाटी के 6,000 लोगों का अभी भी पुनर्वास नहीं हुआ है। इन सबके बावजूद गुजरात सरकार और केंद्र सरकार बांध के गेट को बंद रखे हुए है। जिससे जल स्तर लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में बगैर पुनर्वास डूब कराना अनुचित और असंवैधानिक है।

आशुतोष कुमार के अनुसार नर्मदा के जल से डूब में लगभग 250 गांव प्रभावित हैं। अब तक 20,000 किसानों को उनकी जमीन के बदले जमीनें मिली है। लगभग 30,000 लोगों को प्लॉट मिले हैं लेकिन अब भी 32,000 परिवार ऐसे हैं जिनका सम्पूर्ण पुनर्वास नहीं हुआ है। इस परियोजना से किसी का लाभ नहीं हुआ सिवाय चंद लोगों के। गुजरात के किसान अब भी पानी के लिए आंदोलन कर रहे हैं और जिन लोगों को विस्थापित किया गया, वह पुनर्वास के लिए।

गौरतलब है कि साल 1961 में नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना का उद्घाटन हुआ। जिसमें तीन राज्य-गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान शामिल थे। सरकार ने इसे विकास का प्रतीक माना तो वहीं इससे हज़ारों लोगों के जीवन पर संकट छा गया। सरकारी दावों में इस परियोजना से सिंचाई, पेयजल की आपूर्ति, बाढ़ पर नियंत्रण, रोजगार के नये अवसर, बिजली तथा सूखे से बचाव आदि की बात की गई तो वहीं दूसरी ओर इससे लगभग तीनों राज्यों की 37,000 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो गई, जिसमें से 13,000 हेक्टेयर वनभूमि शामिल है।

कुछ मीडिया खबरों में दावा किया गया कि इससे 248 गांव के एक लाख से अधिक लोगों को विस्थापित होना पड़ा। जिनमें 58 प्रतिशत लोग आदिवासी क्षेत्र के हैं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की शुरुआत साल 1985 में हुई तब से यह लगातार लोगों के हक के लिए लड़ाई लड़ रहा है। इस आंदोलन में न केवल विस्थापित लोगों बल्कि वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों तथा आम जनता की भी भागीदारी रही।

गैर-सरकारी संस्था अंक वाहनी के नेता अनिल पटेल ने साल 1980-87 के दौरान जनजातीय लोगों के पुर्नवास को लेकर उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में लड़ाई लड़ी। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद, गुजरात सरकार ने दिसम्बर 1987 में एक पुर्नवास नीति घोषित की।

आंदोलन का शुरुआती उददेश्य बांध को रोककर पर्यावरण को होने वाले नुकसान एवं लोगों के विस्थापन को रोकना था। लेकिन बांध बनने के बाद आंदोलन का उद्देश्य बांध के कारण विस्थापित लोगों को सरकार द्वारा दी जा रही राहत सुविधाओं की देख-रेख और उनके अधिकारों के लिए न्यायायिक लड़ाई लड़ना बन गया।
Capture_12.JPG
इस आंदोलन के तहत भूख हड़ताल, पदयात्राएं हुईं। फिल्मी कलाकारों तथा हस्तियों ने भी आंदोलन को समर्थन दिया। इससे जुड़े मुख्य कार्यकर्ताओं में मेधा पाटकर, अनिल पटेल, अरुंधती रॉय, बाबा आम्टे आदि शामिल हैं। आंदोलन की मांग रही है कि जिन लोगों की जमीन ली गई है उन्हें उचित मुआवजा मिले साथ ही परियोजना के लाभों में भी उनकी भागीदारी हो।

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने साल 1994 में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की और न्यायपालिका से बांध निर्माण पर रोकने की गुजारिश की। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार बांध के बाकी कार्यों को तब तक रोक दे जबतक विस्थापित हो चुके लोगों के पुर्नवास का प्रबंध नहीं हो जाता।

18 अक्तूबर, 2000 को सर्वोच्च न्यायालय ने बांध के कार्य को फिर शुरू करने तथा इसकी उंचाई 90 मीटर तक बढ़ाने की मंजूरी दी। इसमें कहा गया कि ऊंचाई पहले 90 और फिर 138 मीटर तक जा सकती है, लेकिन इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरण को कोई खतरा नहीं हो। साथ ही लोगों को बसाने का कार्य ठीक तरीके से चले।

न्यायपालिका ने विस्थापित लोगों के पुर्नवास के लिए नये दिशा-निर्देश जारी किए। जिनके अनुसार नये स्थान पर पुर्नवासित लोगों के लिए, प्रति 500 व्यक्तियों पर एक प्राथमिक विद्यालय, पंचायत घर, एक चिकित्सालय, पानी तथा बिजली की व्यवस्था तथा एक धार्मिक स्थल होना शामिल था।

'द कारवां' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2006 में धार जिले का चिकलदा गांव जब डूब की चपेट में आया तो वहां डूबने से पहले 750 घर थे, 56 दुकानें, तीन विद्यालय, एक बड़ा खेल का मैदान, 36 धार्मिक स्थल और एक कब्रिस्तान भी था। चिकलदा की तरह मध्यप्रदेश के 178 गांव डूब की चपेट में आए हैं, जो पूरी तरह या आंशिक रूप से सरदार सरोवर बांध की वजह से डूब गए।

जून 2019 में गुजरात सरकार ने सरदार सरोवर डैम के सभी गेट बंद कर इसकी क्षमता की जांच के लिए इसे 138.68 मीटर तक भरना शुरू कर दिया। हालांकि न्यायालय का निर्देश है कि डैम भरने के 6 माह पूर्व ही डूब प्रभावित क्षेत्रों को खाली कर दिया जाए।

साथ ही इन क्षेत्रों के लोगों के विस्थापन की सही व्यवस्था हो। नोटिस के बावजूद प्राधिकरण और गुजरात सरकार ने डैम भरने का कार्य जारी रखा जिससे 1,300 किमी लंबी नर्मदा नदी का बहाव टूट गया और उसने आस-पास के इलाकों को डूबा दिया गया। जिसके बाद अब हालात और बद्तर हो गए हैं।

इसे भी पढ़े: सरदार सरोवर बांध के बढ़ते जल स्तर के विरोध में 'नर्मदा चुनौती सत्याग्रह'

Sardar sarovar Dam
Narmada chunauti satyagraha
Displaced people
heavy rains
Narmada Bachao Andolan
Medha Pateker
Madhya Pradesh
Rajasthan
Gujrat
kamalnath government

Related Stories

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

एमपी : ओबीसी चयनित शिक्षक कोटे के आधार पर नियुक्ति पत्र की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे

मध्य प्रदेश : आशा ऊषा कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन से पहले पुलिस ने किया यूनियन नेताओं को गिरफ़्तार

दिल्ली में गूंजा छात्रों का नारा— हिजाब हो या न हो, शिक्षा हमारा अधिकार है!

बाल विवाह विधेयक: ग़ैर-बराबरी जब एक आदर्श बन जाती है, क़ानून तब निरर्थक हो जाते हैं!

नीट-पीजी 2021 की काउंसलिंग की मांग को लेकर रेजीडेंट डॉक्टरों की हड़ताल को देश भर से मिल रहा समर्थन

सामूहिक वन अधिकार देने पर MP सरकार ने की वादाख़िलाफ़ी, तो आदिवासियों ने ख़ुद तय की गांव की सीमा


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License