NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
मीडिया की आज़ादी: किस्से और हक़ीक़त के बीच इमरजेंसी
हमें यह मानना चाहिए कि न्यूज़क्लिक के यहां ईडी का छापा पड़ना इस बात को प्रमाणित करता है कि वह सचमुच पत्रकारिता कर रहा है और इस सरकार को सबसे अधिक डर सच दिखाने से ही लगता है!
जितेन्द्र कुमार
17 Feb 2021
मीडिया की आज़ादी: किस्से और हक़ीक़त के बीच इमरजेंसी

पिछले हफ्ते मीडिया पोर्टल न्यूज़क्लिक व उसके निदेशक सहित संस्थान के कई लोगों के घर पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने छापा मारा। छापा लगातार लगभग 114 घंटों तक चलता रहा, लेकिन छापे के पहले दिन अखबारों के द्वारा देश की जनता को बताया गया कि न्यूज़क्लिक के पास विदेश से संदिग्ध पैसे का लेनदेन हुआ है। समाचार-पत्रों के द्वारा देश-दुनिया को यह भी बताया गया कि ईडी को कई तरह की गड़बड़ियों की जानकारी मिली है और न्यूज़क्लिक के कर्ताधर्ता प्रबीर पुरकायस्थ इन गड़बड़ियों के बारे में कोई संतोषजनक जवाब देने में असफल रहे हैं। अख़बार में यह ख़बर भी छापी गई कि न्यूज पोर्टल न्यूज़क्लिक को मिली लगभग 31 करोड़ की विदेशी राशि का कहीं न कहीं गड़बड़झाला है!

अनाम सूत्र से इस तरह की ख़बर ‘जर्नलिज्म ऑफ करेज’ की टैगलाइन लगाकर वर्षों से पत्रकारिता का झंडा गाड़े इंडियन एक्सप्रेस ने कवर पेज पर छापी थी।

अख़बार के पहले पेज पर छपी रितु सरीन व कृष्ण कौशिक के उस ख़बर में यह भी बताया गया है कि अख़बार ने प्रबीर पुरकायस्थ व प्रांजल पांडेय से ईमेल, मैसेज और फोन पर संपर्क भी करने की कई कोशिश की लेकिन उन दोनों ने इसका जवाब नहीं दिया। कृष्ण कौशिक तो सूचना व मीडिया की बीट कवर करने वाले पत्रकार हैं इसलिए उन्हें यह ख़बर लिखने की जरूरत पड़ी होगी, लेकिन रितु सरीन तो इन देश की जानी-मानी खोजी ख़बर करने वाली पत्रकार हैं। क्या उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि जब भी ईडी या सीबीआई किसी के घर या दफ्तर पर छापे मारती है (अगर वह जेनुइन छापे भी हों) तब उस व्यक्ति का फोन व लैपटॉप सबसे पहले अपने कब्ज़े में ले लेती है जिससे कि वह इंसान किसी से कोई मदद न मांग पाए (वैसे कारवां को दिए गए अपने साक्षात्कार में प्रबीर ने बताया है कि ईडी के अधिकारियों ने उनके लैपटॉप, टैबलेट और दोनों मोबाइल जब्त कर लिए हैं और आज के दिन उनके पास कोई फोन नहीं है)! आखिर इतनी धुरंधर पत्रकार जब ख़बर ‘लीक करने वालों’ का नाम छुपा सकती हैं तो उसी ख़बर में एक पंक्ति में यह सूचना भी तो दे ही सकती थीं कि जिनके यहां छापे मारे जा रहे थे उन्हें फोन या कंप्यूटर तक जाने से रोक दिया जाता है।

‘जर्नलिज्म ऑफ करेज’ का दावा करने वाले अख़बार ने पिछले सात वर्षों से पत्रकारिता के नाम पर अनगिनत वैसे-वैसे खेल खेले हैं जिससे पत्रकारिता शर्मसार हो जाए। ऐसा ही खेल इंडियन एक्सप्रेस ने उस समय भी खेला था जब जस्टिस लोया की हत्या से जुड़े मामले का खुलासा कारवां मैगजीन ने किया था। उस ख़बर में मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े दूसरे सबसे ताकतवर आदमी की मिलीभगत होने की जानकारी थी, लेकिन कारवां की ख़बर के बाद देश के दो महत्वपूर्ण ब्रांड इंडियन एक्सप्रेस व एनडीटीवी ने कारवां की उस ख़बर में उस-उस जगह का जोरदार स्पष्टीकरण वाला खंडन छापा था, जिसमें शक की सुई उस व्यक्ति के ऊपर जा रही थी। सत्ता प्रतिष्ठान ने जान-बूझ कर उन दोनों मीडिया घराने का उस समय इस्तेमाल किया था क्योंकि देश के एक खास तबके में इंडियन एक्सप्रेस की इमेज व्यवस्था विरोधी और एनडीटीवी की धर्मनिरपेक्षता वाली थी। न्यूज़क्लिक से जुड़ी ख़बर में इंडियन एक्सप्रेस ने फिर से अपनी उस विखंडित छवि का इस्तेमाल करके न्यूज़क्लिक की साख को नुकसान पहुंचाया है।

प्रबीर पुरकायस्थ का मामला कोई अलहदा मामला नहीं है। जिस रूप में वर्तनाम सत्ताधारी पार्टी ने पत्रकारिता को घुटने के बल पर लाकर खड़ा कर दिया है वह पिछले 74 साल के इतिहास का सबसे शर्मनाक उदाहरण है। हमारे देश में पत्रकारिता को जितना नुकसान इमरजेंसी के तथाकथित चैंपियन जनसंघ व आरएसएस ने पहुंचाया है, इतना नुकसान देश की सभी सरकारों ने मिलकर भी नहीं पहुंचाया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि देश से निकलने वाले अधिकांश समाचारपत्र या टीवी चैनलों के मालिकों का पत्रकारिता एकमात्र धंधा नहीं है बल्कि अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश मीडिया व्यवसायियों के इसके इतर भी कई-कई धंधे हैं।

मोदी सरकार से पहले तक सरकार सभी खबरों को नियंत्रित नहीं करती थी बल्कि कुछ खबरों को रोकती थी। इसका परिणाम यह होता था कि कई वैसी खबरें बाहर भी आ जाती थीं जो जनता से जुड़ी हों। मोदीकाल में उन सभी खबरों को नियंत्रित किया जा रहा है जिससे कि सरकार की इमेज पर कोई दाग न लगे। आज के दिन सरकार हर उस ख़बर को दबाती है जो सरकार की किसी नीति या कार्यक्रम की आलोचना करती है। अब तो बार-बार वैसा भी होने लगा है कि गलती से अगर कहीं सरकार के बारे में ख़बर छप जाती है तो मुख्यधारा के तमाम अख़बार या टीवी चैनल सरकार की तरफ से उस ख़बर का या तो खंडन करने लगते हैं या फिर उस ख़बर के विपरीत सरकार के समर्थन में कैंपेन शुरू कर देते हैं। टीवी चैनलों व अखबारों की मजबूरी यह है कि उनके मालिकों के इसके अलावा इतने अधिक धंधे हैं और उसमें इतनी गड़बड़ियां हैं कि उसे छुपाने के लिए सरकार की हर बात को मानने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

पिछले 84 दिनों से दिल्ली के बॉर्डर पर हजारों किसान सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। ये किसान इतनी सर्दी में अपने दौ सौ से अधिक धरना दे रहे भाइयों की मौत के बाद भी डटे हुए हैं। यह ख़बर मुख्यधारा की मीडिया में कहीं नहीं आ रही है। इसके उलट सरकार की तरफदारी करते हुए सभी टीवी चैनलों व अख़बारों ने उन किसानों को आतंकवादी-खालिस्तानी से लेकर देशद्रोही तक कहा है।

पिछले दिनों सिंघु बॉर्डर पर जनपथ व कारवां के लिए रिपोर्टिंग कर रहे मनदीप पुनिया व दूसरे पत्रकार धर्मेन्द्र सिंह को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन दोनों को पुलिस ने इसलिए उठाया क्योंकि वे किसानों की बातों को गंभीरतापूर्वक उठा रहे थे। अंदाजा लगाइए कि अगर मुख्यधारा के मीडिया घराने की तरफ से भी किसानों के बारे में सही सही रिपोर्टिंग हो रही होती तो अभी तक सरकार घुटने पर नहीं आ गयी होती? क्या कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर व वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की वह हैसियत होती कि वे इस शर्त पर किसानों से 12 राउंड की बात करते कि हम बिल को वापस नहीं लेंगे, अगर आपको इसके अलावा भी कुछ कहना है तो आप हमारे साथ बात करो!

जिस दिन भी किसानों के साथ बैठक हुई, उस दिन के टीवी चैनलों या अगले दिन के अख़बार की हेडिंग देखने से पता चलता था कि जैसे किसान बिना किसी उद्देश्य के अपना घर-द्वार छोड़कर यहां बॉर्डर पर एय्याशी करने आ गये हैं!

सरकार ने आज न्यूज़क्लिक को निशाने पर लिया है, उसके प्रमोटर प्रबीर पुरकायस्थ का चरित्रहनन कर रही है। कल हो सकता है कि द कारवां, स्क्रॉल, न्यूजलॉड्री, वायर, क्विंट, सत्य हिन्दी जैसे कुछ और न्यूज़ पोर्टलों के यहां छापा डलवाए और उसके प्रमोटरों का भी चरित्र हनन करे। हमें यह मानना चाहिए कि न्यूज़क्लिक के यहां ईडी का छापा पड़ना इस बात को प्रमाणित करता है कि वह सचमुच पत्रकारिता कर रहा है और इस सरकार को सबसे अधिक डर सच दिखाने से ही लगता है!

(जितेंद्र कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं। उनका यह लेख  जनपथ में प्रकाशित हुआ है। लेखक की सहमति से यह लेख साभार प्रकाशित किया जा रहा है। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Media Independence
Emergency in India
unannounced emergency
Newsclick ED Raid

Related Stories

क्या अब देश अघोषित से घोषित आपातकाल की और बढ़ रहा है!

इंदिरा निरंकुशता से मोदी निरंकुशता तक

तुम कौन सी इमरजेंसी के बारे में पूछ रहे थे?

#आपातकाल: 'जेपी ने मुझसे कहा था कि आरएसएस ने उन्हें धोखा दिया है!', जेपी नारायण को गिरफ़्तार करने वाले पूर्व आईएएस अधिकारी ने बताया


बाकी खबरें

  • Sudan
    पवन कुलकर्णी
    कड़ी कार्रवाई के बावजूद सूडान में सैन्य तख़्तापलट का विरोध जारी
    18 Jan 2022
    सुरक्षा बलों की ओर से बढ़ती हिंसा के बावजूद अमेरिका और उसके क्षेत्रीय और पश्चिमी सहयोगियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र भी बातचीत का आह्वान करते रहे हैं। हालांकि, सड़कों पर "कोई बातचीत नहीं, कोई समझौता…
  • CSTO
    एम. के. भद्रकुमार
    कज़ाख़िस्तान में पूरा हुआ CSTO का मिशन 
    18 Jan 2022
    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बुधवार को क्रेमलिन में रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु के साथ कज़ाख़िस्तान मिशन के बारे में कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीट ऑर्गनाइजेशन की “वर्किंग मीटिंग” के बाद दी गई चेतावनी…
  • election rally
    रवि शंकर दुबे
    क्या सिर्फ़ विपक्षियों के लिए हैं कोरोना गाइडलाइन? बीजेपी के जुलूस चुनाव आयोग की नज़रो से दूर क्यों?
    18 Jan 2022
    कोरोना गाइडलाइंस के परवाह न करते हुए हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी तरह से प्रचार में जुटे हैं, ऐसे में विपक्षी पार्टियों पर कई मामले दर्ज किए जा चुके हैं लेकिन बीजेपी के चुनावी जुलूसों पर अब भी कोई बड़ी…
  • Rohit vemula
    फ़र्रह शकेब
    स्मृति शेष: रोहित वेमूला की “संस्थागत हत्या” के 6 वर्ष बाद क्या कुछ बदला है
    18 Jan 2022
    दलित उत्पीड़न की घटनायें हमारे सामान्य जीवन में इतनी सामान्य हो गयी हैं कि हम और हमारी सामूहिक चेतना इसकी आदी हो चुकी है। लेकिन इन्हीं के दरमियान बीच-बीच में बज़ाहिर कुछ सामान्य सी घटनाओं के प्रतिरोध…
  • bank
    प्रभात पटनायक
    पूंजीवाद के अंतर्गत वित्तीय बाज़ारों के लिए बैंक का निजीकरण हितकर नहीं
    18 Jan 2022
    बैंकों का सरकारी स्वामित्व न केवल संस्थागत ऋण की व्यापक पहुंच प्रदान करता है बल्कि पूंजीवाद की वित्तीय प्रणाली की स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License