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तमिलनाडु में रह रहे प्रवासी मजदूरों की परेशानी 
शोषण और भाषा इत्यादि की मुश्किलों के बावजूद, झारखण्ड और बिहार से कई प्रवासी बेहतर मजदूरी और अपनी प्रतिष्ठा को बरक़रार रखने की खातिर यहाँ पर काम करना जारी रखे हुये हैं, जबकि उनमें से कुछ लोग तो अच्छे-खासे शिक्षित हैं।
गरिमा साधवानी, अर्पित पाराशर
01 Jun 2021
तमिलनाडु में रह रहे प्रवासी मजदूरों की परेशानी 
चित्र साभार: अर्पित पाराशर 

चेन्नई: भले ही भोला महतो ने हाल ही में देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में अपना प्रवासन किया है, लेकिन उन्हें लगता है कि वे एक अलग ही दुनिया में पहुँच गए हैं।

वे कहते हैं, “चेन्नई नहीं चाइना आ गए हैं।”महतो झारखण्ड के हज़ारीबाग जिले के रहने वाले हैं और पिछले 20 सालों से वे एक दिहाड़ी मजदूर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने हाई-स्कूल किया है और वे औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के प्रमाणपत्र धारक हैं। लेकिन हज़ारीबाग या उनके गृह राज्य के किसी भी अन्य जिले में उनके लिए कोई काम-धाम नहीं है।

महामारी फैलने से पहले, महतो मुंबई में एक पर्यटक मोटर-बोट चलाने का काम करते थे। लेकिन लॉकडाउन के बाद से उन्होंने मुंबई छोड़ दिया था, हालाँकि उनके मालिक ने उनके खर्चे का भुगतान करने की पेशकश की थी। उनको डर था कि यदि उन्हें वायरस ने जकड़ लिया तो उन्हें काम से निकाल बाहर कर दिया जायेगा।

अब, महतो तारामणि में एक निर्माण स्थल पर एक हेल्पर के तौर पर काम करके 850 रूपये की दिहाड़ी मजदूरी पाते हैं, जबकि इसी काम के लिए उनके स्थानीय तमिलनाडु समकक्ष प्रतिदिन कम से कम 1,200 रूपये कमाते हैं।

2011 के जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु में 1.95 लाख से अधिक प्रवासी मजदूर काम करते हैं। उनमें से एक लाख से अधिक अकेले बिहार और झारखण्ड से हैं। महतो भी उनमें से एक हैं।

चित्र साभार: अर्पित पाराशर 

महतो का कहना है कि उन्हें कर्मचारी भविष्य निधि नहीं दी जाती, जबकि इस फंड के वास्ते ठेकेदार उनके वेतन में से पैसे काट लेता है। वे आगे बताते हैं कि महीने के अंत में ठेकेदार इस सबको अपने पास ही रख लेता है।

वो कौन सी चीज है जो महतो जैसे लोगों को अपने घरों को छोड़ने और प्रवासी बनने के लिए बाध्य करती है?

 पीपुल्स एक्शन फॉर एम्प्लॉयमेंट गारण्टी, एक एमजीएनआरईजीएस (ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) ट्रैकर ने अक्टूबर 2020 में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि बिहार के एक गाँव में लगभग 1,854 लोग “करीब-करीब 18 लाख रूपये की कीमत के बेरोजगारी भत्ते के पात्र थे।”
भले ही ग्रामीण विकास मंत्रालय ने दावा किया था कि जून 2020 में मनरेगा के तहत 6.69 करोड़ लोगों को रोजगार हासिल हुआ था, लेकिन आँकड़े इंगित करते हैं कि 2020 में कोविड-19 की वजह से लगाये गए लॉकडाउन हटने के बाद 66% से अधिक प्रवासी शहरों को लौट गए थे। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि जरुरी नहीं कि अल्पावधि के रोजगार कार्यक्रम सही समाधान हों।
 
इसी आंकड़े ने यह भी सुझाव दिया है कि अधिकांश प्रवासी मजदूर 10,000 रूपये प्रति माह से कम की कमाई करते हैं, और उनके पास गंतव्य राज्य की श्रम योजनाओं तक पहुँच नहीं हासिल है।इस सबके बावजूद, इन श्रमिकों को बिहार एवं झारखण्ड जैसे राज्यों से पलायन करने के मजबूर होना पड़ता है क्योंकि वहां पर रोजगार के अवसर काफी कम हैं। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में केवल 5.4% छोटे एवं मध्यम-आकर के उद्यमों (एसएमई) की उपलब्धता बिहार में है। 

चित्र साभार: अर्पित पाराशर 

टाइम्स इंडिया में प्रकाशित एक अन्य लेख में कहा गया है: “बिहार में अपेक्षाकृत कम उत्पादक क्षमता है, जो कम पूंजी एवं कम रिटर्न में तब्दील हो जाती है।” कुछ ऐसा ही हाल झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश का भी है।

अपने गाँवों में रोजागर और आजीविका के अभाव के कारण इन श्रमिकों के पास पलायन के सिवाय और कोई चारा नहीं बचता। बिरजू राय (40), जो झारखण्ड में गिरिडीह के रहने वाले हैं, कहते हैं: “वहां पर मेरे गृह जनपद में सिर्फ एक कोयले की खदान है, वहां पर काम करके कुल कितने लोग अपनी गुजर-बसर चला सकते हैं? अगर हम वहीँ पर बने रहते हैं तो अपने परिवार का पेट कैसे भरेंगे और अपने बच्चों को स्कूलों में कैसे भेज पायेंगे?”

राय कहते हैं कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। वे यहाँ रोज के हिसाब से 800 रुपया कमा लेते हैं, जबकि स्थानीय श्रमिकों को इसी काम के 1,200 रूपये मिलते हैं। लेकिन घर पर रहते तो इस काम के लिए मात्र 300 रूपये ही मिलते।

42 वर्षीय लेपा सिंह, जो लॉकडाउन से पहले तक ड्राईवर हुआ करते थे, इस बात से सहमत हैं। यहाँ पर एक निर्माण स्थल पर काम करने पर उन्हें 500 रूपये प्रतिदिन की कमाई हो जाती है, लेकिन इसी काम के लिए उनके गाँव में उन्हें 300 रूपये भी नसीब नहीं होते। यह तो सिर्फ उनकी तनख्वाह और उनकी पत्नी जो कुछ सिलाई से कमा लेती है, उससे ही उनकी किसी प्रकार से गुजर-बसर हो पा रही है।

एक अन्य पहलू जिसे ध्यान में रखने की आवश्यकता है, वह यह है कि उनके गृह राज्यों में व्हाइट कालर नौकरियों का अभाव बना हुआ है। 28 वर्षीय राजकुमार लाल की शिकायत है कि, वाणिज्य विषय से स्नातक होने के बावजूद उन्हें बिहार में कोई नौकरी नहीं मिल पाई। वे कहते हैं “कम से कम यहाँ पर इस निर्माण स्थल पर एक हेल्पर के तौर पर काम करने पर मुझे 500 रूपये की दिहाड़ी मिल रही है।”
बिहार के चैनवा के रहने वाले उपेन्द्र कुशवाहा (39) एक वेल्डर हैं, और इसके साथ ही निर्माण स्थल पर श्रमिकों की आपूर्ति के रूप में दोहरा काम करते हैं। हालाँकि उनके सामने भी लाल जैसे ही हालात हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक अपनी उम्मीद नहीं छोड़ी है।

चित्र साभार: अर्पित पाराशर 

उन्होंने इस नौकरी को स्वीकार किया और चेन्नई चले गए, क्योंकि उन्हें अपने बच्चों को अंग्रेजी-माध्यम के स्कूल में भेजना था। उनके पिता, जो दिल के मरीज हैं और उनकी माँ एक मधुमेह रोगी हैं, की दवाइयों के लिए उन्हें प्रतिमाह 3,500 रूपये खर्च करने पड़ते हैं-- यह एक और महत्वपूर्ण वजह है जिसने उन्हें इस नौकरी को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। 

वित्तीय अस्थिरता के अलावा एक और भी वजह है, जिसके चलते ये लोग पलायन करने के लिए मजबूर हैं। 42 वर्षीय रमेश कुमार, जो रांची के रहने वाले हैं, का कहना है कि उन्हें अपने परिवार से अपनी ब्लू कालर वाली मजदूर की पहचान को छुपाकर रखना पड़ता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि एक पोस्ट ग्रेजुएट होकर एक निर्माण स्थल पर काम करना उनकी गरिमा को नीचे गिराना है। “यहाँ पर मुझे प्रति माह मात्र 10,000 रुपये की ही कमाई हो रही है। लेकिन यह मेरे परिवार के सामने मेरी गरिमा को बनाये रखने के लिए पर्याप्त है, जिसे नहीं पता कि यहाँ पर मैं क्या काम करता हूँ।”

कोरोनावायरस प्रेरित लॉकडाउन ने चीजों को बद से बदतर बना कर रख दिया है। संजय सिंह के मामले में ही देख लीजिये। झारखण्ड के जरकुंडा के रहने वाले 25 वर्षीय सिंह, महामारी से पहले वेटर और ड्राईवर के तौर पर काम करते थे। पहले जहाँ वे औसतन प्रति माह 15,000 रूपये कमा लेते थे, उन्हें नहीं पता कि अपनी वर्तमान नौकरी से उन्हें कितना मिलेगा, क्योंकि पिछले दो महीनों से उन्हें उनकी मजदूरी नहीं मिली है। अभी तक उन्हें सिर्फ भोजन के लिए कुछ भत्ता दिया गया है।

यह पहली बार है जब सिंह को एक मजदूर के तौर पर काम करना पड़ा है। उन्होंने 16 साल की उम्र में अपना गाँव छोड़कर मुंबई का रुख किया था, लेकिन जीवन में पहली बार उन्हें इस प्रकार की अनिश्चतता का सामना करना पड़ रहा है।

वे इन दूर-दराज के शहरों में कैसे पहुँचते हैं?

अब सवाल यह उठता है कि – ये लोग कैसे उन राज्यों में काम ढूंढ लेते हैं, जहाँ वे न तो पहले कभी गए, और जहाँ लोग ऐसी भाषाएँ बोलते हैं जिन्हें वे नहीं समझ पाते?

चित्र साभार: अर्पित पाराशर 

48 वर्षीय पंकज कुमार के पास इसका जवाब है। वे झारखण्ड के धनबाद में पिछले 14 वर्षों से ठेकेदार हैं और उनका कहना है कि अधिकाँश ठेकेदारों ने विनिर्माण एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में काम करने वाले जूनियर इंजीनियरों के साथ एक नेटवर्क स्थापित कर रखा है। जब कभी भी मजदूरों की जरूरत पड़ती है, ठेकेदार अपने गांवों में काम की तलाश कर रहे लोगों को तलाश करके रखे रहते हैं, और उन्हें शहरों में भेज देते हैं। 

चेन्नई में एक साईट के ठेकेदार और प्रभारी सतीश कुमार (33) स्वीकार करते हैं कि उन्होंने स्थानीय श्रमिकों को काम पर रखना बंद कर दिया है। उनका कहना था “वे लोग सुबह 8:30 बजे काम पर आते हैं और शाम 6:00 बजे तक छुट्टी कर लेते हैं, और प्रतिदिन काम खत्म होने के बाद उन्हें भुगतान करने की आवश्यकता पड़ती है।”

लेकिन प्रवासी मजदूर सुबह 6 बजे से ही काम शुरू कर देते हैं और देर रात तक काम करते हैं, ओवरटाइम और रात की शिफ्ट में भी काम करते हैं। उन्हें हर रोज भोजन के लिए भुगतान किया जाता है, और बाकी की मजदूरी उन्हें हर पखवाड़े या मासिक आधार पर चुकता कर दी जाती है।

श्रमिकों का कहना है कि उन्हें किसी भी प्रकार के सुरक्षा उपकरण या कोविड बीमा प्रदान नहीं कराया गया है। उन्हें बूट और सुरक्षा वस्त्र दिए गए हैं, जिसके लिए उनके पहले वेतन से 250 रूपये काट लिए गए थे। अगर वे स्वेच्छा से ओवरटाइम करने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो भी उन्हें 50 रूपये प्रति घंटे के ही भुगतान किया जाता है।

कुमार ने कहा “प्रवासी मजदूरों का यहाँ पर कोई राजनीतिक झुकाव नहीं है, और कोई सवाल-जवाब नहीं करते, जिसकी वजह से उनके साथ काम करना काफी आसान हो जाता है।”

मुंबई स्थित एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता, शरण्य आनंद ने कहा: “जो भी समाधान निकाले जाते हैं, वे सभी अल्पकालिक एवं अदूरदर्शी प्रतीत होते हैं। किसी समस्या को हल करने के लिए दृष्टि का होना बेहद अहम है, फिर भी इसकी कमी बनी हुई है।”

इस बीच महतो जैसे लोग अपने घरों से काफी दूर रहकर अपने संघर्ष को जारी रखे हुए हैं। वे कहते हैं “घर वापस जाकर वहां अपमान झेलने की तुलना में यहाँ पर अपमानजनक परिस्थितियों में रहकर काम करना फिर भी कहीं ज्यादा बेहतर है।”

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Migrant Labourers in TN – Caught Between a Rock and a Hard Place

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