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मिथिला: यहां मधुश्रावणी पर्व के नाम पर आज भी होती है पत्नियों की 'अग्निपरीक्षा’!
बिहार के मिथिला क्षेत्र में मनाए जाने वाले मधुश्रावणी पर्व में 14 दिनों तक नवविवाहिताएँ बिना नमक का और वह भी सिर्फ़ एक बार खाना खाकर ‘व्रत’ करती हैं, ज़मीन पर सोती हैं और अंतिम दिन महिला के घुटनों और पंजों को जलते दीपक की लौ से दागा जाता है।
एकता वर्मा
10 Aug 2021
मिथिला: यहां मधुश्रावणी पर्व के नाम पर आज भी होती है पत्नियों की 'अग्निपरीक्षा’!
प्रतीकात्मक तस्वीर। गूगल से साभार

बिहार के मिथिला क्षेत्र में मधुश्रावणी पर्व के नाम पर मनायी जाने वाली कुप्रथा एक आधुनिक और लोकतांत्रिक देश के लिए शर्म का विषय होनी चाहिए। धर्म इस कुप्रथा को व्रत और पर्व का नाम देता है। अन्य सभी उपवासों की तरह यह भी स्त्रियों के ही हिस्से में आया ‘उपवास’ है। इसमें 14 दिनों तक नवविवाहिताएँ बिना नमक का और वह भी सिर्फ़ एक बार खाना खाकर ‘व्रत’ करती हैं, ज़मीन पर सोती हैं और गाँव भर से फूल-पत्तियाँ चुनकर नाग वंश और गौरी की पूजा करती हैं। अंतिम दिन यह ‘पर्व’ बर्बरता और अतार्किकता की पराकाष्ठा तक पहुँच जाता है, जब लड़की के घुटनों और पंजों को जलते दीपक की लौ से दागा जाता है। आठ बार दोहरायी जाने वाली इस क्रिया में युवती के पैरों में फफोले पड़ जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि फफोले जितने बड़े होंगे, विवाह के पहले उसका चरित्र उतना निष्कलंक होगा, उसके पति की आयु उतनी ही अधिक होगी, उस स्त्री में औरस पुत्रों की माता होने की योग्यता होगी, सहनशीलता और परिवार के प्रति श्रद्धा के साथ साथ वह स्त्री अखंड सौभाग्यवती होगी।

‘सुहाग का अनोखा पर्व’ माना जाने वाला यह ‘व्रत’ सावन के पहले दो हफ़्तों में किया जाता है। 28 जुलाई से शुरू हुआ यह उपवास 11 अगस्त को पैर दागने की क्रिया के साथ ख़त्म होगा। अपनी पौराणिकता में यह स्कंद पुराण से जोड़ा जाता है, जिसके अनुसार नाग देवता और मां गौरी की पूजा करने वाली महिलाएं जीवनभर सुहागिन बनी रहती हैं। अन्य मान्यता कुरूप्रदेश के राजा को तपस्या से प्राप्त अल्पायु पुत्र को इस पूजा के द्वारा चिरायु करने की भी है। मैथिली वैयाकरण गोविंद झा जैसे चिंतक इस प्रथा का सम्बंध गोचारण युग से जोड़ते हुए बताते हैं कि जिस तरह गायों को खो जाने के डर से दागा जाता था, उसी तरह स्त्री को पुरुष की सम्पत्ति मानते हुए दागने की यह प्रथा विकसित हुई है। गोदना गुदवाना इसी दागने की प्रथा का दूसरा रूप है।

इस ‘पर्व’ में दीपक की लौ से पैर दागने की क्रिया को ‘टेमी दागना’ कहा जाता है। इस क्रिया को करते हुए युवती का पति युवती की आँखों को पान के पत्ते से ढँक देता है। पितृसत्तात्मक समाज के भीतर स्त्री के दुःख-दर्द में पुरुष का सहयोग इतना भर ही है। वह स्त्री के कष्ट की वास्तविक पहचान नहीं करता बल्कि व्याख्या करके उसे कष्टहीन बताता है। वह जितना चाहता है, स्त्री को ठीक उतना ही देखने को बाध्य करता है। यह प्रक्रिया पूरी हो जाने के पश्चात युवती का भाई युवती को टेमी दागने के स्थल से उठाता है। इन सारी भूमिकाओं को लैंगिक प्रतीकात्मकता के प्रकाश में देखने पर समाज की ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की संरचना साफ़-साफ़ देखी जा सकती है।

यह कुप्रथा उच्च वर्ण की वेदाचारी जातियों यानी ब्राह्मण वर्ग की औरतों द्वारा मनायी जाती है। चूँकि उच्च वर्ण ने स्त्रियों को उत्पादन प्रक्रिया से सबसे अधिक दूर रखा इसलिए उस वर्ग की स्त्रियों के पास स्वतंत्र रूप में अपना महत्व स्थापित करने का कोई मार्ग नहीं बचा। ऐसी परिस्थितियों में उसे पुरुष के सापेक्ष काम्य बनने को बाध्य होना पड़ा। पुरुष की इच्छाओं के अनुरूप वह जितनी ढलती गयी, पुरुषवादी समाज ने उसे उतना ही सम्मान दिया। पुरुष स्त्री पर अपना एकाधिकार चाहता है, उसके शरीर पर, श्रम पर और गर्भ पर भी। यह उसके अहम को तुष्ट करता है और यहीं से सती प्रथा, जौहर प्रथा, विधवा समस्या पैदा हुईं। मधुश्रावणी इन्हीं अमानुष श्रेणी की प्रथाओं में से एक है।

14 दिनों के इस पूरे कार्यक्रम में अलग-अलग दिनों और कर्मकांडों के लिए गीत और कथाएँ हैं। इन कथाओं और गीतों में ‘व्रत’ करने वाली स्त्री के लिए अपेक्षित मूल्य और आदर्श निहित हैं। मधु श्रावणी व्रत कथा में राजा श्रीकर और उनकी बेटी की कहानी है। राजा श्रीकर की एक बेटी है, जिसकी कुंडली में सौतन की प्रताड़ना है, इसलिए उसके भाई चंद्रकर उसे जंगल के भीतर एक गुप्त सुरंग बनाकर रखते हैं। सुवर्ण नाम के राजा (जो पहले से विवाहित हैं) को राजकुमारी का पता चल जाता है, वे उससे शादी करते है, और कुछ दिन रहकर वापस अपने राज्य चले जाते हैं। सौतन के षड्यंत्र से सुवर्ण मधुश्रावणी का व्रत का सामान राजकुमारी तक नहीं पहुँचा पाते हैं इस पर नाराज़ होकर राजकुमारी पार्वती से विनती करती हैं कि पति के मिलने पर राजकुमारी की अपनी आवाज़ चली जाए। बहन के विवाह से क्रोधित होकर भाई खाद्य-सामग्री भेजना बंद कर देता है, इससे राजकुमारी और उसकी दासी को कई दिनों तक भूखा रहने के बाद तालाब खुदाई के कार्य में मज़दूर की तरह काम करना पड़ता है। एक दिन राजा की नज़र उसपर पड़ती है, राजा उसे पहचान लेते हैं तब सारा भेद खुलता है राजा सौतन को मृत्युदंड देता है। पार्वती की पूजा से उसकी वाणी वापस आ जाती है और वे सुखी वैवाहिक जीवन जीते हैं।

यह पूरी कहानी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की नैतिक कथा जान पड़ती है। इस कहानी में पिता, पति और भाई सबके अपने नाम हैं, किंतु राजकुमारी और सौतन सिर्फ़ सम्बन्धों में ही परिभाषित हैं। पंडितों द्वारा भविष्य देखना और फिर उसका सभी प्रयत्नों के बाद सत्य साबित होना बताया जाना, भाई का सुरक्षा के नाम पर बहन को क़ैद किया जाना और उसकी सहज स्वीकृति दिखाया जाना, भाई के छोटे होने के बावजूद बड़ी बहन को पूर्णतः नियंत्रित करना और पिता की पूरी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बनना, राजा का बहुविवाह की स्थिति में रहने को आपत्तिहीन दिखाया जाना, बहुविवाह में पति को समस्या रूप में न दिखाकर सौतन को समस्या देने वाले कारक की तरह प्रस्तुत करना, राजा का अपनी नवविवाहिता को छोड़कर नगर जाकर भूल जाना, राजा के द्वारा वस्त्र और अन्न न भिजवाए जाने पर राजकुमारी द्वारा स्वयं की आवाज़ चली जाने की प्रार्थना करना, भाई की इच्छा विरुद्ध जाने पर भूखों मरने की नौबत आने का आदर्श बताया जाना, और अंत में राजा के द्वारा अपनी बड़ी रानी को मृत्युदंड देना। पूरी की पूरी कहानी ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज को बनाए रखने के लिए स्त्री को दिए जाने वाले सबकों का संग्रह जान पड़ती है।

लोकगीतों में तो टेमी दागने की प्रथा पर राम और सीता को याद किया जाता है। इन गीतों को सुनते हुए यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि यह प्रथा सीता की अग्निपरीक्षा प्रकरण से आयी है। ‘आजु जनकपुर मंगल सखि’ गीत में पंक्तियाँ हैं-


भालरि जकाँ सीता दाइ थर-थर कांपथि

टेमी देल हरखित श्री राम हे।


इसके अलावा एक अन्य गीत में टेमी दागने पर नवविवाहिता की मन:स्थिति

का कुछ चित्रण मिलता है-


अपन हाथ सक्कत करू

प्रिय पाहुन नयना कसिकऽ धरू

नहु-नुह धर सखि बाती

धरकय कोमल छाती

नहु-नहु पान पसारह

नहु-नहु दुहु दृग झाँपह

मधुर-मधुर उठ दाहे

मधुर-मधुर अवगाहे

यहाँ नवविवाहिता टेमी दागने की प्रक्रिया से घबराई हुई है। वह अपने पति से कसकर आँखें बंद करने को कहती है और सखी से लौ को धीरे-धीरे रखने की बात करती है। हालाँकि इसके बाद आगे ‘मधुर-मधुर उठ दाहे’ अर्थात् दहन को मधुर या मीठा कहकर जलने की सारी भयानकता को ख़त्म कर दिया गया है। इस पंक्ति को पढ़ते हुए नील हर्स्टन अश्वेत अमेरिकी लेखिका के शब्द याद आते हैं कि “अगर अपने दर्द के बारे में मौन रहोगे तो वे तुम्हें मार डालेंगे और कहेंगे तुम्हें आनंद आया।”

इस ‘व्रत’ की एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ‘व्रत’ सिर्फ़ सुहागिन औरतें (जिनके पति जीवित हों) ही कर सकती हैं। पूजा के दौरान आशीर्वाद सिर्फ़ सुहागिन औरतों से ही लिया जाता है और अंतिम दिन ‘व्रत’ की खाद्य सामग्री आदि जिसे सुहाग कहा जाता है, को 14 सुहागिन औरतों के बीच बाँटा जाता है। समाज के भीतर विधवाओं के साथ होते दोयम दर्ज़े के व्यवहार जिसमें उन्हें अपशकुन और अपवित्र मानकर हाशिए पर ढकेल दिया जाता है, उसको प्रोत्साहित करने में इन जैसी प्रथाओं का समर्थन प्राप्त रहता है। सुहाग को सौभाग्य का पर्याय मानकर पूजने का अर्थ वैधव्य को दुर्भाग्य से जोड़कर अपमानित करना है। यह ‘पर्व’ अपनी पूरी संरचना में ब्रह्मणवादी पितृसत्ता का पोषक है, जिसका पालन करना सती प्रथा, जौहर प्रथा जैसी स्त्री-विरोधी और अमानवीय प्रथाओं को वैध ठहराने जैसा है।

इस प्रथा को ख़त्म करने के लिए सोशल मीडिया के छिटपुट प्रयासों के इतर कोई व्यापक प्रयास या आंदोलन अभी तक नज़र नहीं आता है। कुछ मैथिल लेखिकाएँ जैसे सविता झा खाँ, उषा किरण खाँ इस प्रथा का विरोध करती रही हैं। सविता झा खाँ ने अपनी बेटी के संदर्भ में इस प्रथा का पूर्णतः बहिष्कार किया था। उनके इस प्रयास के सार्थक परिणाम भी रहे।

दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधकार्य कर रहीं भव्या मिश्रा इस बार इस व्रत को कर रही हैं। उनसे इस प्रथा की सार्थकता पूछे जाने पर वो कहती हैं कि “कोई आपको जलाए यह किसी को कैसे अच्छा लग सकता है? हाँ, इस व्रत के बहाने लड़कियों को घर से बाहर निकलने का मौक़ा मिलता है, यह ठीक है। मेरे हिसाब से यह व्रत एक तरह की वर्बल ट्रेनिंग है जो हर रोज़ सुनायी जाने वाली कहानियों के माध्यम से लड़की को दी जाती है ताकि वो अपने पति के लिए कुछ भी करने के लिए हमेशा तैयार रहें।” हालाँकि भव्या व्रत की पूरी प्रक्रिया में शामिल हैं, वे बताती हैं कि उन्होंने मौखिक रूप से टेमी न दागने की बात कही है, लेकिन उसका कुछ असर नहीं हुआ है। अब आगे उन्हें अपने पति से आशा है कि वो उनका सहयोग करेंगे।

छोटे-छोटे प्रयासों और बहिष्कारों ने इस कुप्रथा की जड़ें कुछ कमज़ोर की हैं। इसके चलते कुछ जगहों पर यह प्रथा बंद भी हुई है हालाँकि पूर्ण रूप से इसके उन्मूलन के लिए व्यापक स्तर की जागरूकता और आंदोलन की आवश्यकता है।

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय की शोद्यार्थी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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