NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
रोज़गार के बढ़ते संकट को अनदेखा करती मोदी सरकार
एमएसएमई और नरेगा के लिए आवंटित किए गए अतिरिक्त धन से पर्याप्त रोज़गार पैदा नहीं होंगे, और अर्थव्यवस्था में भी मंदी छाई रहेगी।
सुबोध वर्मा
26 May 2020
Translated by महेश कुमार
रोज़गार

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा दो नीतिगत उपायों की घोषणा की गई, जिसका सीधा असर नए रोज़गार पैदा करने पर पड़ सकता है, इसके लिए उन्हौने आपसी सहमति से खुद की पीठ थपथपाई ली है और खुद को ही शाबाशी दी जा रही है। इन उपायो में: एमएसएमई (यानि मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्योग) के लिए 3 लाख करोड़ रुपये की खास क़र्ज़ लाइन यानि क्रेडिट लाइन रखी गई है और ग्रामीण नौकरी गारंटी योजना (MGNREGA) यानि मनरेगा के लिए 40,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त आवंटन किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अचानक देशव्यापी तालाबंदी की घोषणा किए जाने के लगभग दो महीने बाद ये उपाय कुछ खास नहीं कर पाएंगे क्योंकि इस दौरान जो तबाही हुई है उसे पूरा करने के लिए यह उपाय नाकाफ़ी है।

बेरोज़गारों की संख्या पर एक नज़र डालें, जिसका अनुमान अपने साप्ताहिक नमूना सर्वेक्षण के माध्यम से सीएमआईई (CMIE) ने लगाया है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 22 करोड़ लोगों का रोज़गार में होने का अनुमान था [नीचे चार्ट देखें]। यह 22 मार्च को लॉकडाउन शुरू होने से दो दिन पहले काम करने वाली या रोज़गारशुदा संख्या से 5.6 करोड़ कम है। और यह एक साल पहले ( यानि मई 2019) से 6.1 करोड़ कम है। 2019 में ग्रामीण क्षेत्रों में औसत रोज़गार 27 करोड़ आंका गया था। इसका मतलब स्पष्ट है कि रोज़गार को पिछले साल के स्तर पर वापस लाने के लिए, करीब छह करोड़ नई या अतिरिक्त नौकरियों को पैदा करना होगा।

image 1_25.JPG

शहरी क्षेत्रों में हालत और भी विकट है। कम से कम ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के माध्यम से बेरोज़गारी की स्थिति को कुछ हद तक हल किया जा सकता है। लेकिन शहरी क्षेत्रों में, तो ऐसी कोई योजना नहीं है। जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है, जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, तब से लेकर अब तक कुछ 4.1 करोड़ लोगों ने शहरी क्षेत्रों में अपनी नौकरियां खो दी है। इसका एक हिस्सा उन दुखी प्रवासी मजदूरों का है जिनकी दुख और संकट से भरी और दिलों को दहलाने वाली तसवीरों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। लेकिन शहरी क्षेत्रों में रोज़गार के हुए भारी नुकसान का यह सिर्फ एक हिस्सा है।

image 2_22.JPG

इसलिए, यदि आप दोनों को जोड़ते हैं, तो करीब 9-10 करोड़ की नौकरियों की जरूरत पड़ेगी, जो सिर्फ पिछले साल के रोज़गार के सामान्य स्तर तक ले जाएगी। यहाँ यह भी याद रखें: कि यह सामान्य कोई वांछनीय सामान्य नहीं था। क्योंकि पिछले साल बेरोज़गारी अपने 45 साल के अबसे ऊंचे स्तर पर चल रही थी और पूरे वर्ष वह करीब 7-9 प्रतिशत के औसत पर थी। लेकिन, भले ही आप उसे अनदेखा कर दें, क्योंकि अब पिछले साल के स्तर पर वापस आना भी एक कठिन चुनौती बन गया है। और मोदी सरकार ने खुद ही यह साबित कर दिया है कि वह इससे निपटने में व्यापक रूप से असमर्थ है।

एमएसएमई को आसान क़र्ज़ देना उनके हाथ में पैसा देना नहीं है। कितने लोगों को क़र्ज़ दिया जाएगा और किस उद्देश्य के लिए, अभी ये बातें स्पष्ट नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि चूंकि अर्थव्यवस्था के भीतर कोई मांग नहीं है, तो क्या केवल आसान क़र्ज़ बाँट देने से उन्हें अपनी गतिविधियों का विस्तार करने या दोबारा शुरू करने के लिए प्रेरित करेगा या नहीं यह एक खुला सवाल है। इसलिए, इस उपाय से किसी भी महत्वपूर्ण तरीक़े से रोज़गार को बढ़ावा देने की गुंजाईश कम ही है।

मनरेगा कितनी मदद कर सकता है

अब ग्रामीण रोज़गार योजना की बारी है। अतिरिक्त धन आवंटन का स्वागत है, क्योंकि यह लंबे समय से चली आ रही मांग थी। यह भी स्वागत है कि मोदी सरकार - आमतौर पर विलम्बित तरीक़े से ही सही, स्वीकार तो किया कि आज पैसा खर्च करने की आवश्यकता है।

लेकिन, पिछले साल के लंबित भुगतानों को अदा करने के बाद और कीमतों में बढ़ोतरी के मद्देनज़र, यह अतिरिक्त धनराशि अधिकतर 10 प्रतिशत अतिरिक्त नौकरियां पैदा कर सकती है। इसका मतलब यह होगा कि रोज़गार की मौजूदा संख्या 24 करोड़ हो जाएगी। इसलिए, बचे 3-4 करोड़ लोग इससे अछूते रह जाएंगे, जो अभी भी बेरोज़गारी की आग में झुलस रहे होंगे।

और यह भी याद रखें: मनरेगा पूरे समय के लिए या लगातार रोज़गार प्रदान नहीं करता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 1 अप्रैल से शुरू होने वाले चालू वित्त वर्ष में, काम के दिन की 22 मई तक औसत संख्या मात्र 14.24 दिन है। इसी स्रोत से यह भी पता चलता है कि योजना में काम करने वाले व्यक्तियों की कुल संख्या प्रत्येक वर्ष 7-8 करोड़ रही थी, जिन्हे औसतन 40 से 50 दिनों के बीच काम मिला था।

इसलिए, भले ही यह सबसे न्यूनतम हो, यहाँ गुज़र-बसर को 'रोज़गार' के रूप में गिना जाता है, जोकि बहुत कम है। इसलिए औसत 14 दिनों के लिए काम करना और उसके लिए दैनिक वेतन 201 रुपया मिलना, इसका मतलब एक श्रमिक को एक महीने में मात्र 2,814 रुपया वेतन के रूप में मिले। यह वेतन भी तुरंत नहीं मिलता है, भले ही वह मिल भी जाए तो क्या वह पांच सदस्यों के परिवार के लिए पर्याप्त है, वह भी आज के भारत में?

शहरी संकट से अछूता है

शहरी क्षेत्र, जहां लगभग 60 प्रतिशत एमएसएमई मौजूद हैं, संकट ज्यों का त्यों बना रहेगा। दो वक़्त की रोटी के लिए यहाँ कोई शहरी रोज़गार गारंटी योजना नहीं है। और, जबकि शहरी क्षेत्र कोविड-19 की चपेट में अधिक हैं। इसलिए, भले ही लुछ उत्पादक गतिविधियां यहाँ शुरू हो गई हैं, लेकिन श्रमिकों को महामारी के बढ़ते ख़तरे के साथ ही कुछ कमाना होगा।

इसकी कतई संभावना नहीं है कि प्रस्तावित क्रेडिट लाइन विनिर्माण या सेवा क्षेत्र की गतिविधियों के लिए एक प्रेरणा का काम करेगी क्योंकि एमएसएमई महामारी से पहले ही गहरे संकट में डूबी थी। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स और इससे पहले, नोटबंदी ने इन्हे मौत का बड़ा झटका दिया था, जिससे वे अभी मुश्किल से ही उबर पाए थे कि फिर से अर्थव्यवस्था में आई मंदी ने उनके संकट को गहरा कर दिया था। उनके क़र्ज़ बढ़ गए थे और इसलिए कई ने पहले ही शटर गिरा दिए थे।

रोज़गार का संकट जारी रहेगा

तो, संक्षेप में कहा जाए तो मोदी सरकार की हाल ही में घोषित नीति रोज़गार-सृजन क्षमता के मामले में गंभीर रूप से सीमित है। क्योंकि यह मांग को पुनर्जीवित करने के लिए पर्याप्त मात्रा में लोगों के हाथों में पैसा नहीं दे पाएगी। और इसलिए, अर्थव्यवस्था के किसी भी पुनरुद्धार की संभावना बहुत कम है।

कई अन्य देशों द्वारा अलग ढंग के अपनाए दृष्टिकोण से काफ़ी मदद मिल सकती है। वह यह कि सरकार खाद्य पदार्थों के अलावा लोगों के हाथ में सीधे पैसा दे। यह लॉकडाउन अवधि के लिए उनके वेतन का काम करेगा, इसे सीधे उनके खातों में डाला जा सकता है, या इसे बेरोज़गारी भत्ता, या इन सभी के संयोजन के रूप में दिया जा सकता है। इससे बाज़ार में मांग पैदा होगी क्योंकि लोगों के हाथों में खरीदने की शक्ति होगी। यह मांग फिर विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों सहित अन्य क्षेत्रों में स्वचालित रूप से आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा देगी।

लेकिन मोदी और उनके सलाहकारों ने फिर से गलत फ़ैसला लिया है। और पूरे देश को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Modi Govt is Blind to the Crushing Jobs Crisis

Job Losses
MSMEs
Lockdown Impact
CMIE data
Urban Job Crisis

Related Stories

महामारी के छह महीने : भारत क्यों लड़ाई हार रहा है 

लॉकडाउन से लद्दाख के 40% परिवारों की आमदनी ज़ीरो, 90% लोगों के जन धन खातों में नहीं पहुंचा पैसा

लॉकडाउन ने कैसे छीना बच्चों के मुँह से पोषक आहार

महामारी की आड़ और मोदी की मंज़ूरी, राज्यों का मज़दूरों के ख़िलाफ़ मोर्चा 

कोविड-19: क्या लॉकडाउन कोरोना वायरस को रोकने में सफल रहा है?

साल 2020 का मई दिवस : श्रमिक महज़ वायरस से ही नहीं लड़ रहे, बल्कि एक निर्दयी पूंजीवादी व्यवस्था से भी लड़ रहे हैं

भारत में मज़दूरों को मौत के खेल में धकेल दिया गया

ग्रामीण भारत में कोरोना-19: पंजाब के गांवों पर लॉकडाउन और कर्फ़्यू की दोहरी मार

भारतीय पूंजीवाद के लिए कृषि आज भी 'खपाऊ' क्षेत्र बनी हुई है

ग्रामीण भारत में कोरोना-15: कृषि बाज़ार का बुरा हाल


बाकी खबरें

  • workers
    रौनक छाबड़ा
    दिल्ली: ट्रेड यूनियन के साइकिल अभियान ने कामगारों के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा शुरू करवाई
    18 Oct 2021
    ट्रेड यूनियनों की मुख्य मांग में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 26000 न्यूनतम भत्ता और चार लेबर कोड की वापसी शामिल हैं।
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: कहीं पे निगाहें, कहीं पर निशाना
    18 Oct 2021
    जैसे-जैसे देश में चुनाव आते हैं, अचानक कश्मीर आ जाता है, बांग्लादेश आ जाता है, पाकिस्तान तो बिना न्यौते के ही जाता है। फिर कैमरे के फ़ोकस में बाक़ी देश को हटाकर इन जगहों को सेट कर दिया जाता है ताकि…
  • mayawati
    लाल बहादुर सिंह
    सियासत: उत्तर प्रदेश चुनाव में दलित एजेंडा कहां है?
    18 Oct 2021
    तथ्य यह है कि  डबल इंजन  सरकार की चौतरफ़ा तबाही का जो तबका सबसे बदतरीन शिकार हुआ है,  सबसे बड़ी मार जिस तबके पर पड़ी है, वे दलित ही हैं।
  • covid
    ऋचा चिंतन
    टीबी के ख़िलाफ़ भारत की जंग: बदतर हालात, चुप्पी साधे सरकार, दवाओं के स्टॉक खाली
    18 Oct 2021
    टीबी के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत का खराब प्रदर्शन जारी है, लेकिन डेलमानिड के स्टॉकआउट होने और परीक्षण किट्स की कमी के रूप में अतिरिक्त चुनौतियां सामने आ रही हैं। इन कमियों के बारे में…
  • mukesh
    राज वाल्मीकि
    मुकेश मानस; असमय स्मृति शेष : क्यों तुम चले गए!
    18 Oct 2021
    मुकेश जी आपका यूं अचानक चले जाना आपके सभी चाहने वालों के लिए, दलित साहित्य और दलित प्रगतिशील आंदोलन के लिए, हमसब के लिए गहरा सदमा है। हमें इस तरह का दुखद सरप्राइज देते हुए जाना नहीं था आपको!
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License