NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
नज़रिया
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
मोदी की लोकप्रियता अपने ही बुने हुए जाल में फंस गई है
अलोकप्रिय नीतियों के बावजूद पीएम की चुनाव जीतने की अद्भुत कला ही उनकी अपार लोकप्रियता का उदाहरण है। जहाँ इस लोकप्रियता ने अभी तक विमुद्रीकरण, जीएसटी और महामारी में कुप्रबंधन के बावजूद अच्छी तरह से उनकी राजनीति में मदद की है, वहीं किसानों के आंदोलन ने अंततः एक वैकल्पिक राजनीतिक आख्यान को खड़ा कर, उनकी दुखती रग ढूंढ निकाली है।
अजय गुदावर्ती
09 Feb 2022
modi

मोदी की बेहद सावधानीपूर्वक गढ़ी गई छवि के जरिये चुनावों को जीतने की उनकी स्पष्ट क्षमता और अपने दम पर लोकप्रिय समर्थन हासिल करने की क्षमता को गढ़ा है। यही वह चीज है जो मोदी के लिए समर्थन को खास बना देती है। उन्हें लगातार अपने द्वारा किये गए वादों या अपने द्वारा किये गये प्रदर्शन के मूल्यांकन के आधार पर ‘निर्भरता’ के बगैर जीतने की क्षमता का निरंतर प्रदर्शन करना पड़ता है। वायदों और प्रदर्शनों के आधार पर यदि जीत हासिल हो तो यह उन्हें ‘साधारण’ बना देता, जो उनके विराट व्यक्तित्व और आत्मसम्मान को घटा देता। अपवादस्वरुप सिर्फ जीत ही वास्तविक अर्थों में सफलता के लिए मायने रखती है। यह हर हाल में जीत के बारे में नहीं है, बल्कि उन लागतों के बावजूद है।

अर्थव्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए तरलता एवं क्रय शक्ति की आवश्यकता होती है, लेकिन इसके बावजूद मोदी की आर्थिक नीति लोकलुभावन नीतियों की तुलना में कर्ज देने के बारे में अधिक है, यहाँ तक कि किसी चुनावी साल के बजट वर्ष में भी। इसे भले ही बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करने के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा हो, लेकिन इसके पीछे की असली प्रेरणा शक्ति इसमें है कि बिना किसी लोकलुभावन वादों के बावजूद नेता की चुनाव जिताऊ क्षमता साबित हो। एक ऐसी कल्पना में, लोकप्रियता एक समझौता-विहीन प्रकार बन जाता है। इसमें व्यक्ति सिर्फ अपनी लोकप्रिय नीतियों, रियायतों या कल्याणकारी कामों के लिए नहीं बल्कि इस प्रकार की चुनावी राजनीति के ‘फंसाव’ के बगैर भी लोकप्रिय है। मोलभाव और लोकप्रिय मांगों की स्वीकृति के आधार पर मिली जीत को कहीं न कहीं समझौते के तौर पर देखा जाता है, सबसे खराब रूप में एक कमजोरी के तौर पर समझा जाता है। अलोकप्रिय नीतियों के बावजूद उनकी जीतने की अनुमानित क्षमता की लोकप्रियता की अग्निपरीक्षा है।

मोदी ने इस प्रकार की उपलब्धि को इससे पहले विमुद्रीकरण के साथ 2017 में यूपी चुनावों में हुए पिछले चुनावों में हासिल की थी। जीएसटी के बावजूद वे व्यापारिक समुदाय को साथ लेने में सफल रहे। महंगाई, मुद्रा स्फीति, फेल होती अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी के बावजूद उनके पास अच्छा-खासा जनाधार बना रहा। यह कोई आकस्मिक स्थिति नहीं है, बल्कि यह संभवतः अपवाद को साबित करने की अनिवार्य जरूरत से उपजा है, जबकि विपक्ष को लोकप्रिय दबावों पर उसके ‘अनुरूप होने’ के बावजूद चुनावों में हार जाता है। यहाँ तक कि उन स्थितियों में भी जिसमें मोदी सौदेबाजी की स्थिति में होते हैं, वे दूरगामी कल्याणकारी नीतियों को लागू कर पाने की स्थिति रखते हैं, किंतु वे इसे दूसरे तरीके से करना पसंद करते हैं। उनकी लोकप्रियता को किसी लोकप्रिय नेता की नियमित चलनी के हिसाब से गुजरना पड़ता है।

यहाँ तक कि जब वे झूठ बोलते हैं, तो चुनाव जीतने की उनकी क्षमता तथ्यों को विकृत करती है और भ्रामक सूचना फैलाती है। भ्रामक सूचना को फैलाने का मकसद किसी रणनीति के तहत नहीं बल्कि उनकी लोकप्रियता की गुणवत्ता को परखने के तौर पर प्रचारित किया जाता है। ऐसे में अमित शाह एक साक्षात्कार में यह कहने में नहीं हिचकिचाते कि हर खाते में 15 लाख जमा कराने की बात एक जुमला है। विमुद्रीकरण के दौरान होने वाले कष्टों का परिणाम कम नहीं बल्कि कहीं अधिक समर्थन में मिला।  प्रवासी मजदूरों की अनदेखी की पीड़ा बिहार में चुनाव परिणामों को प्रभावित कर पाने में विफल साबित हुई। यह अलग बात है कि इस प्रकार की छवि निर्माण की कवायद के कारण जो नुकसान देखने को मिले, उसे शानदार चुनावी रणनीति, निर्वाचन क्षेत्र वार आंकड़े और बेहिसाब खर्च के माध्यम से इसकी भरपाई कर दी जाती है। 

इसके साथ ही, इस अंतर्निहित आत्म-तुष्टि वाले तर्क के एक हिस्से में नुकसान की भरपाई कर देने की उनकी क्षमता है, भले ही वह कुछ भी हो। जो चीज मायने रखती है वह यह है कि इस प्रकार की कठिन परिस्थितियों से उबार लेने की उनकी क्षमता, जो बाकी के ‘सामान्य’ नेताओं के वश की बात नहीं है। महामारी के कुप्रबंधन की वजह से भले ही लोगों की जानें गईं हों, लेकिन मोदी की टेफ़लोन कोटिंग छवि बगैर कोई खरोंच लगे बाहर आने की रणनीति का केंद्र बिंदु बन जाती है। मोदी द्वारा आपके नुकसान को साझा करना और अपने आंसुओं से भरी आँखों के साझाकरण से खो दिए गए लोगों की याद को मिटा सकती हैं या उन्हें संदेह का लाभ उठाने का मौका दे सकती हैं। मुद्दा यह है कि उनकी जगह पर यदि कोई अन्य नेता होता तो उसे इस लापरवाही का खामियाजा भुगतना पड़ता। इस चीज को हम योगी आदित्यनाथ के साथ होता देख रहे हैं जिन्हें कोविड संकट के कुप्रबंधन की वजह से लोकप्रियता में भारी नुकसान हो रहा है। 

अपवाद द्वारा दोहराया गया नियम किसी असाधारण नेता का सर्वोत्कृष्ट गुण होता है। यह एक प्रकार से रोजमर्रा के ‘जनमत संग्रह’ की तरह है। नेताओं की आत्म-छवि में, यह चुनावी नतीजों की तुलना में सहमति का कहीं उच्च स्वरूप है, या चुनावी परिणाम तो हर चुनाव से पहले होने वाले ‘मतदान संग्रह’ का ‘मात्र’ प्रमाण भर होते हैं। यह चाहे 2017 में विमुद्रीकरण हो या 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करना रहा हो। अपवाद के नियम को नेताओं की असाधारण निर्णय लेने की क्षमता के द्वारा पुनः संशोधित किया जाता है जिसे कोई दूसरा नेता करने का साहस नहीं दिखा सकता।

कृषि विरोध ने शासन के इस मॉडल को एक तेज चीख के साथ अपवादस्वरुप रोक दिया है। ऐसा मान कर चला जा रहा था कि मोदी की विश्वसनीयता किसानों को उनके लिए कुछ अच्छा करने के इरादे का बताकर सहमति हासिल करने में कामयाब रहेगी। जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने कई दौर की चर्चाओं के जरिये उन्हें थका दने की कोशिश की। जब यह भी विफल रहा तो किसानों को बदनाम करने और वैकल्पिक आख्यानों को बनाने की कोशिशें की गईं। जब यह तरतीब भी काम नहीं आई तो हिंसा के जरिये किसानों को डराने-धमकाने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं बचा। यह केवल इसके बाद ही था कि मोदी ने नुकसान को नियंत्रित करने के लिए कृषि कानूनों को वापस लेने की कवायद शुरू की और किसानों के लिए अच्छा करने के इरादे और अपनी तपस्या में कमी के लिए उनसे माफ़ी मांगी।

हालाँकि, असल नुकसान तो तब हुआ जब किसानों ने उनकी एक न सुनी और कृषि कानूनों को वापस ले लिए जाने के बाद भी उन्होंने नेता पर भरोसा करने से इंकार कर दिया। उनकी और से दबाव डाला गया कि इस कानून वापसी की प्रकिया को संसद से पारित कराया जाए, और उनकी ओर से मौतों के लिए जवाबदेही और क़ानूनी कार्यवाही और न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी) को लागू करने सहित अन्य मांगें पूरी किये जाने पर दबाव डाला गया। इसके बाद अब किसानों की ओर से यूपी और पंजाब के चुनावों में भाजपा को हारते हुए देखने के लिए दृढ प्रतिबद्धता का पालन किया जा रहा है।

अपवादस्वरुप शासन के इस स्वरुप का खोखलापन कृषि कानूनों को वापस लेने के अनुपालन से परे संघर्ष को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता के सामने बेनकाब हो जाता है। इस वापसी को आख्यान में तब्दील करने में लगभग पूर्ण विफलता और किसानों के निरंतर गुस्से ने विकल्पों को उभरने के लिए आवश्यक स्थान बना दिया है। इसका एक हिस्सा हमें यूपी में नए उभरते गठबन्धनों और भाजपा की स्पष्ट हताशा में दिखता है। इसने समाज को फिर से खड़ा होने और सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर क्यों किसानों ने मांगें पूरी कर दिए जाने के बाद भी विरोध को जारी रखा हुआ है। इसने शासन के निर्धारित आख्यानों से बाहर निकल कर सोचने का एक मार्ग दिखाया है। 

अजय गुडावर्ती जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर पोलिटिकल स्टडीज विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

https://www.newsclick.in/Modi-Popularity-Finds-Itself-Trap-Own-Making


बाकी खबरें

  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में कोरोना से मौत का आंकड़ा 5 लाख के पार
    04 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,49,394 नए मामले सामने आए और 1,072 मरीज़ों की मौत हुई है। देश में कोरोना से अब तक 5 लाख 55 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • SKM
    रौनक छाबड़ा
    यूपी चुनाव से पहले एसकेएम की मतदाताओं से अपील: 'चुनाव में बीजेपी को सबक़ सिखायें'
    04 Feb 2022
    एसकेएम ने गुरुवार को अपने 'मिशन यूपी' अभियान को फिर से शुरू करने का ऐलान करते हुए कहा कि 57 किसान संगठनों ने मतदाताओं से आगामी यूपी चुनावों में भाजपा को वोट नहीं देने का आग्रह किया है।
  • unemployment
    अजय कुमार
    क्या बजट में पूंजीगत खर्चा बढ़ने से बेरोज़गारी दूर हो जाएगी?
    03 Feb 2022
    बजट में पूंजीगत खर्चा बढ़ जाने से क्या बेरोज़गारी का अंत हो जाएगा या ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही बात कह रही है?
  • farmers SKM
    रवि कौशल
    कृषि बजट में कटौती करके, ‘किसान आंदोलन’ का बदला ले रही है सरकार: संयुक्त किसान मोर्चा
    03 Feb 2022
    मोर्चा ने इस बात पर भी जोर दिया कि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक बार भी किसानों की आय को दुगुना किये जाने का उल्लेख नहीं किया है क्योंकि कई वर्षों के बाद भी वे इस परिणाम को हासिल कर…
  • working women
    सोनिया यादव
    ग़रीब कामगार महिलाएं जलवायु परिवर्तन के चलते और हो रही हैं ग़रीब
    03 Feb 2022
    सीमित संसाधनों में रहने वाली गरीब महिलाओं का जीवन जलवायु परिवर्तन से हर तरीके से प्रभावित हुआ है। उनके स्वास्थ्य पर बुरा होने के साथ ही उनकी सामाजिक सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई है, इससे भविष्य में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License