NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
आर्थिक दिक़्क़तों और मोदी की लोकप्रियता में क्यों है विरोधाभास?
साफ़ तौर पर अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब है लेकिन लोग सरकार के किरदार के बजाए, अपनी दिक़्क़तों के लिए अन्य वजहों को खोजने की कोशिश कर रहे हैं।
अजय गुदावर्ती
15 May 2020
आर्थिक दिक़्क़त
फाइल फोटो

भारत में इस वक़्त अभूतपूर्व आर्थिक मंदी छाई है, जिसे कुछ लोग आर्थिक आपात भी क़रार दे रहे हैं। मुख्य आर्थिक क्षेत्रों में विकास पूरी तरह सिकुड़ गया है, साथ में घरेलू और ग्रामीण खपत भी कम हो गई है। महंगाई और बेरोज़गारी बढ़ रही है, 'प्रत्यक्ष विदेशी निवेश-FDI' भी लगभग न के बराबर ही आ रहा है।

अगर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से तुलना करें तो आज की अर्थव्यवस्था साफ तौर पर कमजोर है, इसका ग्रामीण गरीबों, शहरी अनौपचारिक क्षेत्र और मध्यम वर्ग पर बहुत बुरा असर पड़ा है। लेकिन पिछली सरकार के उलट, इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को लेकर कोई नाराज़गी नहीं है। हालिया सर्वे के मुताबिक़ उनकी लोकप्रियता 68 फ़ीसदी के ऊंचे पैमाने पर है।

पिछली सरकार में प्याज़ के दाम बढ़ने पर कई विरोध प्रदर्शन हुए थे। महंगाई को जनता-विरोधी बताया गया था। आज बिलकुल उलटे हालात हैं। महंगाई लोकप्रिय राजनीति में कोई मुद्दा ही नहीं है। जबकि लोग लगातार परेशान हो रहे हैं। आखिर इतने कम वक़्त में ऐसा बदलाव कैसे आया? कोई भी सीधे तौर पर इसके लिए मीडिया की भूमिका और बहुसंख्यक धार्मिकता का प्रभाव समेत दूसरे कारण बता सकता है। लेकिन यह सब सतही बातें हैं। दरअसल आज जो हो रहा है, वह विमर्श की शर्तों, सामाजिक-राजनीति मुद्दों को समझने और लोगों के सोचने के ढंग में ही बदलाव कर रहा है।

धीमी होती अर्थव्यवस्था के बावजूद राजनीतिक नेतृत्व की बढ़ती लोकप्रियता को बेहतर ढंग से समझने के लिए मैंने विंध्य क्षेत्र के दक्षिण में जातीय सर्वे किया। इस क्षेत्र में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पकड़ गंगा के इलाकों की तुलना में कई वजहों से कमजोर मानी जाती है। मुझे लगा कि ऐसा करने से आज की वास्तिविक स्थितियों का ज़्यादा बेहतर भान हो पाएगा। इसके लिए मैंने तेलंगाना में हैदराबाद से 50 किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बे और एक गांव की यात्रा की। मैंने ''सजग'' नागरिकों के साथ ज़्यादा वक़्त बिताने का फ़ैसला किया, यह लोग आज बन रहे हालातों और उनके प्रभावों की ज़्यादा बेहतर समझ रखते हैं।

इस दौरान मैंने सरकारी स्कूल के शिक्षकों और स्थानीय व्यापारियों से बात की। यह चाय के दौरान अनियमित किस्म की चर्चाएं थीं। आश्चर्यजनक तौर पर मुझे उन तरीकों की समझ बनी, जिनसे किसी मुद्दों को खास ढांचे में बदला जाता है, तब मुझे समझ में आया कि क्यों आर्थिक दिक्कतों के बावजूद शिक्षक और व्यापारी वर्ग मोदी का समर्थन ही नहीं, उनकी प्रशंसा भी कर रहा है।

जिन शिक्षकों से मैंने बात की, उन्होंने मोदी द्वारा हाल में लिए गए सभी फ़ैसलों का समर्थन किया। इसमें नोटबंदी, जीएसटी, अनुच्छेद 370 को हटाया जाना, अयोध्या में मंदिर विवाद का निपटारा और बालाकोट एयरस्ट्राइक शामिल थे। यहां एक शिक्षक की टिप्पणी बहुत ग़ौर करने वाली थी, उन्होंने कहा था, ''शब्द, काम से ज़्यादा अहमियत रखते हैं।'' मतलब अच्छा संचार समावेशी होता है, इससे संबंधित व्यक्ति की मंशा के बारे में झलक मिलती है, यह किसी फ़ैसले से मिलने वाले नतीजों के आधार पर बनने वाली समझ से बेहतर होती है।”

शिक्षक की यह टिप्पणी, बीजेपी के हालिया नारे- ''साफ नीयत, सही विकास'' से बहुत कुछ मिलती है। लेकिन अब भी एक शक बना हुआ है। क्या मौजूदा सत्ता अपने पक्ष में सहमति ''बनाती'' है या इसका पूर्ण ''निर्माण'' करती है। या फिर यह एक जनता की 'स्वाभाविक नैतिकता' का ''प्रतिनिधित्व'' करती है।

सच्चाई हमेशा प्रतीकों से भ्रमित की जाती रही है। लेकिन किसी बिंदु पर इसके बनने का आधार कई कारकों पर निर्भर करता है, यह कारक भौतिक/स्पृश्य या सांस्कृतिक/अप्रांसगिक/अस्पृश्य हो सकते हैं।

मौजूदा सत्ता के दौरान अस्थायी और हवा-हवाई कल्पनाओं का खूब राजनीतिकरण किया गया। मोदी ने लोगों को अपने शासन की तुलना कांग्रेस के 70 सालों से करने का आमंत्रण दिया। किसी को भी विश्लेषण करते वक़्त यह ध्यान रखना चाहिए कि मोदी की सफलता बहुत छोटे वक़्त का हासिल है, जबकि उनकी असफलताओं को ज़मीनी सच्चाईयों में पकने के लिए लंबे वक़्त की जरूरत है। 

सर्वे के दौरान कई शिक्षकों ने कहा कि मोदी ने ''कश्मीर और अयोध्या जैसे लंबे वक़्त से लंबित पड़े मामलों पर कार्रवाई की।'' जबकि कांग्रेस टालमटोल का रवैया अपना रही थी। ठीक इसी वक़्त शिक्षकों ने यह भी माना कि नोटबंदी से भ्रष्टाचार दूर नहीं हुआ और जीएसटी ने अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचाया है, लेकिन ''किसी को भी अच्छे नतीज़ों के लिए इंतज़ार करना चाहिए।'' वह यह सोचकर शांति पा लेते हैं कि ''दुनिया में भारत को पहचान मिल रही है।'' मोदी हिंदी में भाषण देकर, हाथ मिलाने के बजाए ''नमस्ते'' कहकर भारत को अच्छी तरह से पेश कर रहे हैं।

ऐसे विचारों से हमें अंदाजा होता है कि लोग सच्चाई को उस व्यवहार से महसूस करते हैं, जिन्हें वो खुद ठीक ढंग से समझते हैं।

स्थानीय व्यापारी समुदाय से बातचीत में भी बहुत कुछ नया जानने वाला मिला। स्थानीय व्यापारियों को आर्थिक मंदी का ठीक-ठाक नुकसान हुआ है। बल्कि स्थानीय लोगों से संपर्क करवाने और मेरे साथ रहकर उन्होंने मेरी मदद की, ताकि मुझमें इस नुकसान की बेहतर समझ बन सके। लेकिन मुझे उस वक़्त अंचभा हुआ, जब इन व्यापारियों ने मोदी के नेतृत्व को पूरा समर्थन दिया, इस दौरान इन्होंने बिना किसी अपवाद के हालिया महीनों में खुद के नुकसान की बात भी मानी।

मैंने जब उनसे पूछा कि क्या जीएसटी और नोटबंदी से यह नुकसान हुआ है, तो उन्होंने कहा, ''जो गलत हैं, केवल वही शिकायत कर रहे हैं।'' कई तरीकों से नोटबंदी ने खुद के भीतर देखने वाली लोगों की नज़र को बदला है। मूल्यांकन के लिए एक दूसरी नैतिक नज़र पैदा की है। इस हिसाब से देखा जाए तो यह महज़ आर्थिक कदम नहीं है। 

जीएसटी के मुद्दे पर एक स्थानीय मेडिकल स्टोर के मालिक ने कहा, ''मैं ईमानदार हूं, इसलिए मुझे इससे फर्क़ नहीं पड़ा।'' कर का नया ढांचा सभी के भले के लिए ही लाया गया है।

अपराध बोध और सामूहिक भाईचारा, आत्म-अनुशासन और विरोध ने अपनी स्थितियां बदल चुके हैं। जब मैंने उनसे जोर देकर पूछा कि सामूहिक भाईचारे की भावना से नुकसान को सही कैसे ठहराया जा सकता है, तो उसने कहा ''नुकसान के लिए कुछ दूसरी वजह भी थीं। इसमें मेरी 'तकनीकी बदलावों के हिसाब से ढलने की अक्षमता' भी शामिल है। जिन लोगों ने ऑनलाइन कंप्यूटर उपयोग करना सीख लिया, वो बेहतर कर रहे हैं।''

नई असलियत से तालमेल बिठाने के लिए ऐसी चीजों को मानना जरूरी है, जिन्हें संबंधित व्यक्ति नहीं समझ सकता। यह तकनीकी बदलाव हो सकते हैं या मोदी द्वारा वैश्विक पैमाने पर की जा रही नई भूराजनीति। कोई इन बदलावों का संबंध दैनिक जीवन में पड़ने वाले असर से ही बता सकता है। अगर किसी स्थिति में ऐसा भी संभव नहीं हो पाएगा, तो व्यक्ति बदलावों के पीछे चल पड़ेगा या मान लेगा कि उसमें इन्हें समझने की क्षमता नहीं है। 

एक और छोटे व्यापारी का जिक्र यहां जरूरी है। उसने मुझसे फरवरी, 2019 में हुई एयरस्ट्राइक के बारे में बात की। व्यापारी ने कहा,''चलो मान भी लिया जाए कि स्ट्राइक की बात झूठ है और ऐसी कोई स्ट्राइक ही नहीं हुई, तो भी इनसे भारत की क्षमता के बारे में तो पता चल ही जाता है।''

इसलिए आज जो हो रहा है, वह महज़ ''पारंपरिकता की खोज'' से ज़्यादा है। यह पागलपन से थोड़ा ही कम है। इससे समझ आता है कि लोग ''अधिकारवादी या तानाशाही'’ का अंतर ''अधिकारपूर्ण'' होने से कर रहे हैं, इसी अंतर से लोग खुद को ज़्यादा प्रामाणिक पाते हैं। 

इस सर्वे को DSA, CPS, JNU ने प्रायोजित किया था।

लेखक सेंटर फ़ॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने हाल में प्रकाशित हुई Secular Sectarianism: Limits of Subaltern Politics को संपादित किया है। यह उनके निजी विचार हैं।

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Why Modi’s Popularity Graph and Economic Hardships Don’t Match

Authoritarian
politics
BJP versus Congress
Narendra modi

Related Stories

दवाई की क़ीमतों में 5 से लेकर 5 हज़ार रुपये से ज़्यादा का इज़ाफ़ा

कोविड पर नियंत्रण के हालिया कदम कितने वैज्ञानिक हैं?

हर नागरिक को स्वच्छ हवा का अधिकार सुनिश्चित करे सरकार

बिहारः तीन लोगों को मौत के बाद कोविड की दूसरी ख़ुराक

अबकी बार, मोदी जी के लिए ताली-थाली बजा मेरे यार!

जन्मोत्सव, अन्नोत्सव और टीकोत्सव की आड़ में जनता से खिलवाड़!

डेंगू की चपेट में बनारस, इलाज के लिए नहीं मिल रहे बिस्तर

कई प्रणाली से किए गए अध्ययनों का निष्कर्ष :  कोविड-19 मौतों की गणना अधूरी; सरकार का इनकार 

मृत्यु महोत्सव के बाद टीका उत्सव; हर पल देश के साथ छल, छद्म और कपट

टीका रंगभेद के बाद अब टीका नवउपनिवेशवाद?


बाकी खबरें

  • bhasha singh
    भाषा सिंह
    बात बोलेगी: सावित्री बाई फुले को याद करना, मतलब बुल्ली बाई की विकृत सोच पर हमला बोलना
    03 Jan 2022
    सवाल यह है कि जिन लोगों ने, सावित्री बाई फुले के ऊपर कीचड़ डाला था, उनके ख़िलाफ गंदी-अश्लील टिप्पणी की थी, वे 2022 में कहां हैं। वे पहले से अधिक खूंखार हो गये हैं, पहले से ज्यादा बड़े अपराधी—जिन्हें…
  • stop
    सोनिया यादव
    ‘बुल्ली बाई’: महिलाओं ने ‘ट्रोल’ करने के ख़िलाफ़ खोला मोर्चा
    03 Jan 2022
    मुस्लिम महिलाओं को ‘ट्रोल’ करने की कोशिश के बीच विपक्ष के साथ-साथ महिला संगठनों और आम लोगों ने सोशल मीडिया पर इस मामले में सरकार और पुलिस की सक्रियता और कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पटनाः एनएमसीएच के 84 डॉक्टर कोरोना पॉज़िटिव, मरीज़ों में कोरोना चेन बनने का ख़तरा
    03 Jan 2022
    एनएमसीएच में डॉक्टरों समेत 194 लोगों का सैंपल लिया गया था। 84 डॉक्टरों की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद आशंका बढ़ गई है कि अस्पताल के कई मेडिकल स्टॉफ भी चपेट में आ सकते हैं।
  • jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : जारी है एचईसी मज़दूरों की हड़ताल, साथ आए सभी विपक्षी दल
    03 Jan 2022
    एचईसी के मज़दूरों के टूल डाउन और हड़ताल को एक महीना हो गया है और अभी भी वो जारी है, ऐसा एचईसी के इतिहास में पहली बार हुआ है।
  • covid
    ऋचा चिंतन
    नहीं पूरा हुआ वयस्कों के पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य, केवल 63% को लगा कोरोना टीका
    03 Jan 2022
    पहले केंद्र ने दिसंबर 2021 के अंत तक भारत में सभी वयस्क आबादी के पूर्ण टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल कर लेने का लक्ष्य घोषित किया था। जबकि हकीकत यह है कि करीब 9.73 करोड़ वयस्कों को अभी भी दोनों खुराक दी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License