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भारत
राजनीति
मोदी संग योगी: काशी का अनुष्ठान छवियों के अंत का अनुष्ठान साबित हुआ
बनारस में नरेंद्र मोदी हमेशा की तरह एक राजनीतिक दल यानी भाजपा के ही प्रधानमंत्री के तौर पर नज़र आए जिन्होंने अपनी विराट असफलताओं में योगी की असफलताओं को भी झूठ की कई परतों में लपेट लिया।
सत्यम श्रीवास्तव
16 Jul 2021
मोदी संग योगी: काशी का अनुष्ठान छवियों के अंत का अनुष्ठान साबित हुआ

कल, गुरुवार, 15 जुलाई को  जिस अंदाज़ में अपने तमाम असफल मुख्यमंत्रियों में सबसे ज़्यादा असफल रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की तारीफ़ों के कसीदे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी में सभा में पढ़े उसे देखकर लगता है कि अब अपनी आत्म-छवि की असल कीमत उन्हें समझ आ गयी है।

इन झूठी तारीफ़ों ने हालांकि उन तमाम कयासों पर विराम लगा दिया जो कुछ समय से योगी बनाम मोदी के रूप में आम चर्चा में थीं लेकिन इसने कई नयी अटकलों को उकसा दिया है।

प्राय: मोदी किसी की तारीफ नहीं करते। झूठ बोलना और सरेआम बोलना उनका एक ऐसा गुण समझा जाता है जिसके सामने विपक्ष का कोई नेता नहीं टिकता। इस लिहाज से लोग ठीक ही ये सवाल करते हैं कि मोदी नहीं तो कौन? या विकल्प क्या है? लेकिन यहाँ बात झूठी ही सही लेकिन तारीफ करने की है।
 
बनारस में नरेंद्र मोदी हमेशा की तरह एक राजनीतिक दल यानी भाजपा के ही प्रधानमंत्री के तौर पर नज़र आए जिन्होंने अपनी विराट असफलताओं में योगी की असफलताओं को भी झूठ की कई परतों में लपेट लिया।

इसलिए अपने ‘नए भारत’ के तसव्वुर में ‘नए उत्तर प्रदेश’ को गढ़ने का श्रेय योगी को दे दिया गया। प्रकारांतर से हालांकि उन्होंने यह भी बता दिया कि अब तक इस ‘नए भारत’ के संकल्प में उत्तर प्रदेश शामिल नहीं था। जब बीते सात सालों से सकल भारत ही नया भारत बन रहा है तब उत्तर प्रदेश क्या अलग से नया उत्तर प्रदेश बनेगा? यह ऐसा सवाल था जिसे सभा में बैठे लोगों को खड़े होकर पूछना चाहिए था लेकिन मोदी और योगी जानते हैं कि कोई पूछने वाला नहीं है और इसी भरोसे पर कुछ भी बोला जा सकता है।

देश में कोरोना की विभीषिका के सबसे ज़्यादा चित्र और खौफनाक मंज़र उत्तर प्रदेश से ही आए जिन्हें न केवल देश की मीडिया बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। और यह भारत की बदनामी के लिए नहीं बल्कि इस बीमारी की भयावहता को दर्शाने के लिए किया गया।

उत्तर प्रदेश ने देश की मीडिया को सात साल बाद मजबूर किया कि वो तस्वीरें और लोगों की दर्दनाक विवशताओं को दुनिया के सामने लाए। यह एक बहुत छोटा वक्फ़ा रहा जब देश की तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया ने उत्तर प्रदेश की सच्चाई सामने लाने का साहस किया। अपनी समझौता परस्त नीतियों से समझौता किया और वह दिखाया जो घट रहा था।

गंगा में तैरती नागरिकों की मृत देहें और रेत में दफन हिंदुओं की लाशों ने मोदी और योगी की कृत्रिम लोकप्रियता को एक झटके में ध्वस्त कर दिया। सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा के बीच सरकार विहीनता की स्थिति तक पहुँच चुके प्रदेश की उस जनता को भी प्रभावित किया जो कट्टरता की हद तक इन दो नेताओं की समर्थक रही।

मोदी जी ने भी इन खबरों को देखा होगा। अगर न भी देखा हो तो अपनी पार्टी की मातृ संस्था और ‘परिवार’ द्वारा बार बार उत्तर प्रदेश सरकार और योगी के कामकाज की समीक्षा की तमाम कोशिशों से ही कुछ समझा होगा। हालांकि यह स्वीकार करना मुश्किल है बल्कि सशरीर किया गया दौरा इसी समीक्षा से निकला हुआ एक कदम था। उत्तर प्रदेश इस पार्टी और सरकार के लिए एक ऐसा सामरिक क्षेत्र है जिस पर कब्जा किए बगैर हिंदुस्तान पर कब्जा कर पाना मुश्किल है।

जब भाजपा समर्थक विकल्प न होने की बात करते हैं तो वो पूरी शिद्दत से भाजपा के अंदर भी विकल्पों का घनघोर अभाव देखते हैं इसलिए तमाम असफलताओं का सेहरा अपने सर बांधे योगी को ही निर्विवाद रूप से अंतिम विकल्प मान लिया गया है। यह अंत की तरफ जाता रास्ता है लेकिन कोई और रास्ता भी नहीं है।

वाराणसी का अनुष्ठान छवियों की अंत का अनुष्ठान साबित हुआ है। दो कृत्रिम छवियों के द्वंद्व से जब कुछ नया निकलता हुआ नहीं दिखा तब अंतिम रास्ता इन दो छवियों के एकमेव हो जाने का ही बचता है। हिन्दुत्व और विकास, हिन्दुत्व और प्रचार, हिन्दुत्व और जनसंख्या नियंत्रण, हिन्दुत्व और आतंकवाद, हिन्दुत्व और लव जिहाद आदि आदि ऐसे कई युग्म बनाते जाएँ तो जो अंतिम युग्म भाजपा की अंतिम रणनीति के दौर पर दिखलाई देगा वो योगी और मोदी के रूप में प्राप्त होगा। यही वाराणसी में हुआ।
 
15 जुलाई के संबोधन में उस मरहम का लेश मात्र भी नहीं दिखा जो अपने संसदीय क्षेत्र यानी बनारस के डॉक्टर्स से बात करते हुए मोदी के रुँधे कंठ में दिखलाई पड़ा था। जो महज़ दूर से एक स्क्रीन के सामने अकेले बैठकर अपने संसदीय क्षेत्र के नागरिकों की अकाल मौत पर दुखी हो सकता है वो उनके सामने पहुंचकर इतनी निर्लज्जता से यह कैसे कह सकता है कि कोरोना के लिए योगी जी ने सबसे अच्छा प्रबंधन किया?

या तो वह रुँधा गला झूठ था या कल जो कहा वो झूठ था? लेकिन इन दोनों अनुष्ठानों के बीच के अंतराल और इस अंतराल में घटी घटनाओं से जो लोग वाकिफ हैं उन्हें दोनों घटनाएँ समय के तकाजे और मांग के अनुसार अपनी अपनी जगह ठीक लगेंगीं। जब मोदी ने स्क्रीन पर अपने गले को सिसकियों से तर किया तब वह योगी की बढ़ती हठधर्मिता और खुद से होड़ लेते एक महत्वाकांक्षी प्रतिद्वंद्वी की तरह देख रहे थे। ये सिसकियाँ असल में यह बतलाना चाहतीं थीं कि योगी ने कोरोना में लोगों को राहत नहीं दी और वो भावुक होकर योगी की अकुशलता पर शर्मिंदगी का इज़हार कर रहे थे। राजनीति में इन अवसरों के बहुत महीन अर्थ होते हैं।

लेकिन बनारस में मोदी, मजबूरी में या अपने ‘परिवार’ के निर्देशों पर योगी में अपने भविष्य की गारंटी खोज रहे थे। यह सार्वजनिक रूप से मोदी और योगी की छवियों की हार तो है ही लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अपरिहार्यता की स्थापना भी है। सरकार के तौर पर दोनों सरकारों के मत्थे केवल और केवल असफलताएँ हैं। ये असफलताएं अब इतनी दृश्यमान हैं कि इन्हें केवल मीडिया पर नियंत्रण और उसके अपने पक्ष में प्रबंधन के बल पर ढंका नहीं जा सकता। ऐसे में सरकार के काम काज के आधार पर बड़े पैमाने पर इन दोनों नेताओं का जनाधार खिसक चुका है। दोनों सरकारें अब पुन: संघ की शरण में हैं। इसके बिना हालांकि इनका कोई स्वतंत्र वजूद कभी रहा नहीं लेकिन खुद संघ की वर्षों की मेहनत से गढ़ी छवि के वास्ते सरकार को स्वतंत्र दिखलाना एक मजबूरी हो जाती है।

बनारस के इस आयोजन से अब यह स्पष्ट हो चुका है कि दोनों सरकारों की शेष समयावधि में राष्ट्रीय स्वयं सेवक की भूमिका न केवल पार्श्वभूमि के तौर पर बढ़ने वाली है बल्कि उसकी धमक अब कई बार सहज रूप से दृश्यमान भी होने जा रही है।

एक तरह से देखें तो यह आयोजन महज़ हिन्दुत्व के दो कद्दावर प्रतीकों के संविलयन के लिए ही नहीं बल्कि दोनों सरकारों के आत्मसमर्पण के लिए भी याद रखा जाना चाहिए। ‘मोदी के बाद योगी’ का गढ़ा और बहुप्रचारित आख्यान कल दम तोड़ता हुआ दिखलाई दिया। अकेले के दम पर न तो योगी वापस सत्ता में लौट रहे हैं और न ही मोदी जिनके लिए उत्तर प्रदेश सत्ता का वो दरवाजा है जिसे फतह किए बिना वो कहीं नहीं पहुँच सकते।

योगी को भी यह बात समझ आ गयी है या समझा दी गयी है कि मामला प्रतिद्वंदिता का नहीं बचा है बल्कि एकमेव हो जाने का है। उत्तर प्रदेश की जनता के पास दिल्ली के ताले की चाभी होना दोनों को इस मिलन के लिए अनिवार्य शर्त बना देता है।
 
देखना दिलचस्प होगा कि लंबे अंतराल के बाद जिस तरह से इस आयोजन की धज्जियां उड़ी हैं और भाजपा के दोनों बड़े चेहरों की असफलताओं और नाकामयाबियों को सार्वजनिक जीवन में जगह मिली है उसका कितना दूरगामी असर होता है। दोनों नेताओं और इनके मास्टर्स को बहुत छोटी सी बात समझने की ज़रूरत है कि आप हर किसी को हर समय बेवकूफ नहीं बना सकते। जनता अब वास्तविक मुद्दों पर देश और प्रदेश के नेतृत्व की तवज्जो चाहती है। हर वो कदम जो जनता का ध्यान भटकाने के लिए उठाया जाएगा अब अंत की तरफ जाएगा।

(लेखक पिछले 15 सालों से सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हैं। समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।) 

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