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भारत
राजनीति
विदेश में मोदीः कूटनीति पर हिंदुत्व हावी
प्रधानमंत्री मोदी को हिंदुत्व और कूटनीति में फर्क करना सीखना पड़ेगा, अन्यथा वह हमारे कूटनीतिक हितों का बेहद नुकसान करेंगे।
अनिल सिन्हा
01 Nov 2021
Modi
रोम में गांधी स्क्वायर पर लोगों से बातचीत करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फोटो साभार: एनडीटीवी

रोम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भारतवंशियों की ओर से स्वागत का कार्यक्रम जिस तरह आयोजित किया गया वह हमारी  पहचान के लायक नहीं था। पियाजा गांधी (गांधी स्क्वायर) पर स्वागत के लिए आई छोटी सी भीड़ ने केवल उस  ‘मोदी-मोदी’ का उच्चार किया जिसकी गूंज अब मद्धिम पड़ने लगी है बल्कि वहां भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में भी नारे लगे और जय श्रीराम भी कहा गया। किसी महिला ने शिव-तांडव स्रोत का अविकल पाठ किया और मोदी ने भी इसके साथ ओम नमः शिवाय का मंत्रोच्चार कर अपनी हिंदू पहचान का खुले तौर पर इजहार किया। बाद में, वह भारतीय समुदाय से मिलने के नाम पर सनातन धर्म संघ के प्रतिनिधियों से भी मिले।

हमें यह सब निर्दोष लगता है क्योंकि हम इन बातों के आदी हो चुके हैं। इस घटना का सबसे खराब पहलू यह है कि यह सब गांधी जी की मूर्ति के सामने हुआ जो सभी धर्मों में एक साथ अपनी आस्था प्रकट करते थे और संभवतः दुनिया के पहले राजनेता थे जिन्होंने इसके प्रदर्शन का नायाब तरीका ढूंढ निकाला था और ऐसी प्रार्थना सभा करते थे जिसमें सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथों के अंशों का पाठ होता था। आजादी के बाद हमारा राष्ट्रीय  पहचान को किसी एक  धर्म से अलग रखने में इस प्रयोग ने अहम भूमिका निभाई है। यह हमारे सेकुलर सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा बन चुका है। 

प्रधानमंत्री के कार्यक्रम जिस तरह बनाए जाते हैं, उसके आधार पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि यह सब पहले से तय था और स्वागत के लिए आने वाले लोगों की पृष्ठभूमि और उनके कार्यक्रम की जानकारी भारतीय दूतावास को पहले से थी। कार्यक्रम को अंतिम स्वीकृति भी प्रधानमंत्री कार्यालय से ही मिली होगी। यही नहीं, सनातन धर्म संघ से मुलाकात के स्थल पर लगे भारत की आजादी के अमृत महोत्सव वाले बैनर से भी यही पता चलता है कि यह सब सरकार की ओर से प्रायोजित था।

प्रधानमंत्री देश के भीतर ही नहीं देश के बाहर भी भारत की हिंदू पहचान बनाना चाहते हैं। वह अगर चाहते तो गांधी पियाजा में राष्ट्रपिता को फूल चढ़ाने के कार्यक्रम को सभी धर्मों को साथ लेकर चलने के भारतीय चरित्र को दुनिया के सामने रखने वाले कार्यक्रम में बदल सकते थे। इसके उलट उन्होंने इसे हिंदू पहचान दिखाने का कार्यक्रम बना दिया। आयोजन को गांधी जी की शख्सियत और भारत के पहचान के लायक बनाने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत भी नहीं थी। वह एक सर्वधर्म प्रार्थना का ही आयोजन तो कर ही सकते थे। 

प्रधानमंत्री ने पहले की अपनी विदेश-यात्राओं का इस्तेमाल भी राजनीतिक उद्देश्यों और अपनी इमेज बनाने  लिए किया है। इसमें उन्होंने लंबे समय से चली आ रही उस परंपरा को भी तोड़ा है जिसमें विदेशी धरती पर अंदरूनी राजनीति की चर्चा से परहेज किया जाता है। उन्हें अपनी इन यात्राओं का उपयोग चुनावी प्रचार में भी कोई संकोच नहीं होता है। 

मोदी की पिछली कई विदेश यात्राओं में यह भी नजर आ रहा है कि वह इन्हें  हिंदुत्व के खुले प्रचार का जरिया बनाना चाहते हैं और इसका उपयोग आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहते हैं। पिछले महीने उनकी अमेरिका की यात्रा के दौरान भी उनकी यह कोशिश साफ तौर पर दिखी। 

भारत में बढ़ती सांप्रदायिकता और लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की घटनाओं ने उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को यह अवसर दिया कि उन्होंने लोकतंत्र पर बढ़ते खतरों को लेकर उन्हें चेता दिया। राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी उन्हें गांधी की याद दिला दी। लेकिन अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की जिद में मोदी ने लोकतंत्र और सेकुलरिज्म में अपनी अटूट आस्था जताने और गांधी-नेहरू के नेतृत्व में गढ़े गए सेकुलर तथा लोकतांत्रिक भारत प्रस्तुत करने के बदले पंडित दीनदयाल उपाध्याय को अपना प्रेरणा-स्रोत बता दिया। उन्होंने हिंदुत्व की अपनी प्राथमिकता जाहिर कर दी।

पश्चिम बंगाल के चुनावों के दौरान मोदी ने मर्यादाओं का खुला उल्लंघन किया और बांग्लादेश की यात्रा के दौरान मतुआ समुदाय को लुभाने की कोशिश में भारत के कूटनीतिक हितों की रक्षा की जिम्मेदारी भूल गए। उन्होंने यह नहीं सोचा कि उनके हिंदुत्ववादी अभियान से बांग्लादेश के साथ हमारे संवेदनशील रिश्ते पर क्या असर होगा।

यूरोप और अमेरिका के मुकाबले बांग्लादेश तथा अन्य पड़ोसी देशों से हमारे कूटनीतिक संबंध ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। बांग्लादेश का निर्माण भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। इसने औपनिवेशिक हितों की रक्षा के लिए गढ़े गए धर्म के आधार पर राष्ट्र बनाने के सिद्धांत को खारिज कर दिया।  यह याद करना दिलचस्प होगा कि अविभाजित भारत के बंगाल में ही मुस्लिम लीग का जन्म हुआ था और यह लंबे समय तक लीग का मुख्य आधार-क्षेत्र  रहा। बंगाल में फैली मुस्लिम सांप्रदायिकता ने पाकिस्तान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अभी के पाकिस्तान वाले हिस्से, पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान में मुस्लिम लीग कभी ताकतवर नहीं थी। बंगाल के सांप्रदायिक उन्माद ने देश को विभाजन की ओर तेजी से ले गया।

लेकिन बांग्लादेश का जन्म इससे बाहर निकलने की अनोखी कहानी है। वहां के लोगों ने भाषा  तथा मिलीजुली संस्कृति के आधार पर एक राष्ट्र बनाया। यह उस इतिहास को उलटने की घटना है जिसने लाखों लोगों की जान ली और करोड़ों को बेघर किया। हम देख चुके हैं कि उन्हें अपने इस चरित्र को बनाए रखने में क्या कुछ नहीं झेलना पड़ा है। शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार को अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी। आज भी शेख हसीना को कट्टरपंथियों का मुकाबला करना  पड़ रहा है। मोदी और भारतीय जनता पार्टी की नीतियां उनकी मदद करने के बदले उनके काम को कठिन बनाती हैं। उन्होंने भारत में बांग्लादेशी होने को एक गाली बना दिया है। अवैध रूप से आने वालों का नाम लेकर पूरे राष्ट्र को बदनाम किया जाता रहा है। आरएसएस अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए देश में ध्रुवीकरण करता ही है, पड़ोसी देश  की धरती में भी इसे बढ़ाने में मदद करता है। त्रिपुरा की हिंसा काउद्देश्य  भी बांग्लादेश में ध्रुवीकरण बढ़ाना है। इस काम में आरएसएस से जुड़ा संगठन विश्व हिंदू परिशद पूरी ताकत से लगा है। 

आरएसएस ने पहचान के संकट से जूझ रहे विदेश में बसे भारतवंशियों की सांस्कृतिक असुरक्षा का फायदा उठाया है। इसमें उसे यूरोप-अमेरिका के उन व्यापारियों की मदद भी मिलती है जो भारत से कारोबारी रिश्ता रखते हैं। गुजरात जैसे राज्यों से बाहर गए कई लोग तो राज्य की सांप्रदायिक राजनीति को बाहर ले गए हैं और हिंदुत्व के प्रचार में लगे हैं। विदेशों में विश्व हिंदू परिषद काफी सक्रिय है।

लेकिन प्रधानमंत्री से तो पार्टीगत स्वार्थों से ऊपर उठने की उम्मीद तो करनी ही चाहिए। विदेशी धरती पर देश की सेकुलर पहचान को मिटा कर वह अपनी राजनीति को भले ही चमका लें, भारत का बड़ा नुकसान कर रहे हैं। कट्टरपंथी ताकतों के असर वाले पाकिस्तान के खिलाफ हमारा सबसे बड़ा हथियार सेकुलरिज्म ही है।

उन्हें अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओें के वीडियो देखना चाहिए। ऐसा नहीं है कि वह प्रवासी भारतीयों से नहीं मिलते थे। लेकिन उन्होंने इन आयोजनों की गरिमा को गिरने नहीं दिया। उन्होंने इसे कभी कांग्रेस के राजनीतिक हितों को साधने का जरिया नहीं बनाया। आत्म-प्रचार तो उनके व्यक्तित्व का हिस्सा ही नहीं था। वह अपनी विद्वता के आधार पर ही इतना सम्मान पाते थे कि उन्हें इसकी जरूरत ही नहीं थी।

प्रधानमंत्री ने इटली में बसे भारतीयों के बीच भी विभाजन पैदा किया है। इटली में सिखों की बड़ी आबादी है और हिंदू पहचान को आगे बढ़ाने से उनकी समग्र भारतीय पहचान खंडित हुई है। उन्हें हिंदुत्व और कूटनीति में फर्क करना सीखना पड़ेगा, अन्यथा वह हमारे कूटनीतिक हितों का बेहद नुकसान करेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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