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क्या ‘आत्मनिर्भर भारत’ होगा एक विपन्न भारत?
बचाव पैकेज या रेस्क्यू पैकेज अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाने के लिए होते हैं; परंतु मोदी सरकार के आत्मनिर्भर भारत पैकेज भाजपा के वास्ते राजनीतिक बचाव पैकेज अधिक लगते हैं।
बी सिवरामन
19 Nov 2020
लॉकडाउन के दौरान शहरों से अपने गांवों को लौटते मज़दूर
लॉकडाउन के दौरान शहरों से अपने गांवों को लौटते मज़दूर। फाइल फोटो, केवल प्रतीकात्मक प्रयोग के लिए। साभार: गूगल

बहुप्रतीक्षित आत्मनिर्भर भारत 3.0 पैकेज, जिसकी घोषणा वित मंत्री निर्मला सीतारमण ने की, ‘ऊंची दुकान फीकी पकवान’ का एक और नमूना साबित हुआ। विडम्बना है कि अगले ही दिन सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अधीन कार्यरत नैश्नल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (National Statistical Office, NSO) ने अक्टूबर 2020 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) का डाटा (2012 आधार वर्ष लेकर) जारी किया, और इसने अर्थव्यवस्था के मामले में मन और भी उदास किया। डाटा में मीट-मछली के दामों में 18.70 प्रतिशत वृद्धि दर्शाई गई। अंडे में 21.81 प्रतिशत की वृद्धि हुई, खाद्य तेल में 15.17 प्रतिशत की, दालों में 18.34 प्रतिशत की और सब्ज़ियों में 22.51 प्रतिशत की (अक्टूबर 2019 की अपेक्षा 2020 में)।

संपूर्ण ‘खाद्य और पेय’ श्रेणी में डबल-अंक की मुद्रास्फीति दिखाई पड़ी- 10.16 प्रतिशत, और उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक साल-दर-साल 10.68 प्रतिशत की मुद्रास्फीति दर तक पहुंच गई है। अक्टूबर 2019 में वह 4.62 प्रतिशत थी और एक वर्ष में दूना से अधिक हो गई है।

सीएमआईई (Centre for Monitoring Indian Economy, CMIE) का आंकलन है कि इस वर्ष तकरीबन 14 करोड़ रोजगार का खत्मा हुआ, जिनमें शामिल हैं 1 करोड़ 89 लाख संगठित क्षेत्र की व्हाइट कॉलर यानी सफेदपोश नौकरियां। यह इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। दो-अंकों की मूल्य वृद्धि और इस परिमाण में वेतन/रोजगार का खात्मा भायनक ‘कॉम्बो’ है। इससे समझ में आता है कि भारत संभवतः मुद्रस्फीतिजनित मंदी (stagflation) के दौर में प्रवेश कर रहा है- विकासहीनता और मुद्रास्फीति का मेल, जो किसी मुद्रास्फीति का सबसे खतरनाक दौर होता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ठोस रूप में इसका क्या मतलब है? मोदी के ‘हैचेट मैन’ (जो सरकार के सभी बुरे काम करता है) आरबीआई गवर्नर शक्तिकान्त दास अब ब्याज दरों को और कम नहीं कर सकते, क्योंकि मौद्रिक कस (monetary tightening) के लिय बेंचमार्क 6 प्रतिशत मुद्रास्फीति है। इसका मतलब है कि रिवाइवल की संभावनाओं पर और अधिक संकुचन के साथ गहराता बेरोगारी संकट। फिर, अगली फरवरी में निर्माला जी भारी घाटे का बजट ला नहीं सकतीं। इसलिए उधार लेकर मूलढांचा परियोजनाएं या इन्फ्रास्ट्रकचर प्राजेक्टों पर बढ़े खर्च का दरवाज़ा बंद है। उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ने का मतलब है कम उपभोग खर्च और कम औसत मांग, जो विकास को अवरुद्ध करता है। इसलिए एक ठोस प्रोत्साहन पैकेज के बिना काम कतई नहीं चलने वाला। हास्यास्पद ढंग से किश्तों में पैकेज देना समाधान नहीं है।

बचाव पैकेज (rescue package) किस लायक है इसका पता तो उसके परिणाम से ही आंका जा सकता है। 12 मई 2020 को मोदी ने पहला आत्मनिर्भर भारत पैकेज घोषित किया था। उन्होंने दावा किया था कि यह जीडीपी (GDP) का 10 प्रतिशत मूल्य का 20 लाख करोड़ का पैकेज था। इसका तात्कालिक परिणाम क्या था? वित्तीय वर्ष 2020 के पहले तिमासे में (अप्रैल-जून) भारतीय अर्थव्यवस्था रिकार्ड 23.9 प्रतिशत संकुचित हो गयी। आरबीआई के अनुसार संभावना जताई गई है कि इसी वित्तीय वर्ष के दूसरे तिमासे में, यानि जुलाई-सितम्बर 2020 में जीडीपी और भी 8.5 प्रतिशत संकुचित होगा। निर्मला सीतारमण  ने 12 अक्टूबर 2020 को आत्मनिर्भर भारत पैकेज 2.0 की घोषणा की थी, जिसकी धनराशि मात्र 73,000 करोड़ रुपये थी। इसका जमीनी स्तर पर प्रभाव तो छोड़ ही दें, यहां तक कि मीडिया ने भी इसे तवज्जो नहीं दिया। जाहिर है कि एक ही माह के अंतराल में, 12 नवम्बर 2020 को उन्हें आत्मनिर्भर भारत 3.0 की घोषणा करनी पड़ी, जिसकी धनराशि 2.65 लाख करोड़ है। आइये हम इसे थोड़ी बारीकी से देखें।

बचाव पैकेज या रेस्क्यू पैकेज अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाने के लिए होते हैं; परंतु मोदी सरकार के आत्मनिर्भर भारत पैकेज भाजपा के वास्ते राजनीतिक बचाव पैकेज अधिक लगते हैं। आखिर हम क्या कहें जब यह सरकार सामान्य वार्षिक फर्टिलाइजर सब्सिडी को बचाव पैकेज के हिस्से के रूप में पेश करने लगे? सरकार की प्राथमिकता यह नहीं है कि वह असली संकट का समाधान एक ठोस बचाव पैकेज के माध्यम से करे, बल्कि उनका मकसद है कि विशेष पैकेज के मामले में कम-से-कम खर्च करें और धोखाधड़ी करके पैकेज की मात्रा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए धारणा प्रबंधन (perception management) करें।

सफेद झूठ मोदी के अधीन चल रहे शासन की पहचान बन गया है। अतः उनके लिए संकट प्रबंधन केवल मीडिया प्रबंधन बनकर रह जाता है। आम लोगों को तो कुछ समय तक बेवकूफ बनाया जा सकता है पर मीडिया को लम्बे समय तक मैनिपुलेट नहीं किया जा सकता। प्रमुख संचार केंद्रों और उनके लिये काम कर रहे अर्थशास्त्रियों ने मान लिया है कि शासन में झूठ-फरेब चलाना सत्ता में बैठे अपस्टार्ट्स (upstarts) की सस्ती राजनीतिक कार्यनीति ही है। खैर, वे तीनों आत्मनिर्भर भारत पैकेजों के खिलाफ आलोचनात्मक रवैया अपना रहे हैं।

आत्मनिर्भर भारत 3.0 का एक ही अवयव (component) है जो महत्व का है, और वह है उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन स्कीम (Production-linked Incentive Scheme, PLI),  पीएलआई। इसके अंतरगत तीन क्षेत्रों के वर्तमान पीएलआई स्कीम का दस और क्षेत्रों तक विस्तार किया जाएगा। इस स्कीम के बारे में विस्तृत विवरण अभी जारी नहीं किया गया है। पर यदि हम देखें कि तीन क्षत्रों में इन्हें कैसे लागू किया गया था, मसलन मोबाइल फोन सेक्टर में, बढ़े उत्पादन का 4-6 प्रतिशत कैश प्रोत्साहन दिया जाना है। एमएसएमईज़ (MSMEs) के लिए कोई विशेष छूट प्रस्तावित नहीं है। दर्शकों को तो समझ में आ ही रहा है कि कैसे कॉरपोरेट घरानों को दिये जा रहे नकद दान को आत्मनिर्भर (self-reliance) भारत का नाम दिया जा रहा है। पिछले नवंबर में इन्हें इस तर्क के आधार पर 1.45 लाख करोड़ की टैक्स छूट दी गई थी कि इससे उनकी बचत में इजाफा होगा, तो उनके द्वारा निवेश बढ़ेगा। कॉरपोरेट्स की तिजोरियों में अधिक पैसा जमा हुआ, उनके लाभांश और सुविधाएं या पक्र्स बढ़ीं पर वे निवेश और उत्पादन में वृद्धि करने से बचते रहे। आत्मनिर्भर भारत 3.0 में जो उत्पादन-लिंकेज लागू किया गया वह अपने आप में एक मौन स्वीकृति थी कि पैसे को बेवजह बहाया जा रहा था।

संरचना के आधार पर पीएलआई बुनियादी तौर पर तृटिपूर्ण है। वह शुरू से ही दसों क्षेत्रों में से एक-एक को दिये जाने वाले प्रोत्साहन पर कोटा/सीलिंग तय करता है। उदाहरण के लिए ऑटोमोबाइल और ऑटो-कंपोनेंट (automobile and auto-component) क्षेत्र के लिए कुल स्वीकृत पीएलआई 57,042 करोड़ होनी है। पर इसी ऑटो सेक्टर की वार्षिक बिक्री मूल्य 39 लाख करोड़ या भारत की जीडीपी का 2.3 प्रतिशत है। मोदी 10 क्षेत्रों को टुकड़े फेंककर हमें विश्वास दिलाना चाहते हैं कि इससे अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर देंगे। इसी तरह टेक्सटाइल इकाइयों को 10,683 कारोड़ रुपये पर सीमित कर दिया गया है, पर भारत में 10,000 से अधिक टेक्सटाइल इकाइयां हैं। तो प्रत्येक इकाई कैश प्रोत्साहन के लिए योग्य नहीं माना जाएगा। केवल उन्हीं को प्रोत्साहन के लिए योग्य समझा जाएगा जो मंत्रियों की समिति से अनुमति प्राप्त करेंगे और इसमें नौकरशाहों व राजनेताओं के विवेकाधिकार का मामला जुड़ेगा, यानि इसमें भ्रष्टाचार की पूर्ण संभावना होगी। टेक्सटाइल बैरन (barons) बढ़े बिलों के आधार पर बढ़ाचढ़ाकर दावा पेश करेंगे, जैसा कि बढ़ते जीएसटी घोटालों में दिखाई पड़ता है।

आत्मनिर्भर भारत पैकेज 1.0 की घोषणा के बाद मीडिया के एक हिस्से ने कहा था कि फोकस केवल आपूर्ति की ओर था और मांग की ओर ऐसा ठोस कुछ न था जो अर्थव्यवस्था में औसत मांग बढ़ाने को प्रेरित करे। जब 12 अक्टूबर 2020 को आत्मनिर्भर भारत 2.0 की घोषणा हुई, उन्होंने टिप्पणी की कि यह ‘‘too little, too late’’ है यानी ‘बहुत देर में बहुत थोड़ा’ है। अब जब निर्मला सीतारमण ने आत्मनिर्भर भारत 3.0 की घोषणा की है, मीडिया ने टिप्पणी की है कि न ही यह बरोज़गारी की समस्या पर बात करता है और न ही अर्थव्यवस्था में औसत मांग बढ़ाने की दिशा में कुछ कह रहा। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार भारतीय इतिहास की सबसे भयंकर मंदी को हल करने के लिए कोई कॉमेडी सीरियल बना रही है।

करना क्या चाहिये था?

मंदी या रिसेशन के मायने है काफी समय तक नकारात्मक विकास, मस्लन 2 तिमासे तक। आंशिक तौर पर विकास गिरता है क्योंकि निवेश में गिरावट आती है। विकास प्रमुख तौर पर इसलिए गिरता है क्योंकि औसत मांग गिरती है क्योंकि उपभोग कम है, और यह इसलिए कि लोगों की आय कम होने की वजह से उनकी क्रय शक्ति कम होती जाती है। मंदी के अलग-अलग दौर में विभिन्न कारक पृथक सीमाओं के अंदर काम करते हैं। इसलिए अलग-अलग मंदियों से निपटने के तरकीब पृथक हो सकते हैं।

एक दृष्टिकोण हो सकता है ‘सप्लाई साइड अप्रोच’ (supply side approach) जिसमें टैक्स छूट दी जाती है, सस्ता और अधिक क्रडिट दिया जाता है और उद्योगपतियों को सीधे नकद प्रोत्साहन दिया जाता है ताकि निवेश को प्रेरित किया जाए। पर एक समय के बाद केवल निवेश बढ़ाते जाने से घाटा बढ़ता जाता है।

दूसरा दृष्टिकोण है मौद्रिक विस्तार पर दबाव डालना और सार्वजनिक निवेश बढ़ाना ताकि मांग पैदा हो जिससे ‘ग्रोथ मल्टिप्लायर इफेक्ट’ हो। इससे केवल एक बबल अर्थव्यवस्था तैयार होगी और अवश्य ही कृत्रिम रूप से फल-फूल रही अर्थव्यवस्था पुनः फट जाती है। उपरलिखित दोनों दृष्टिकोणों में मुद्रास्फीति बढ़ाने का खतरा भी मौजूद है।

तीसरा दृष्टिकोण है कि जनता की अवशिष्ट आय (disposable income) और उपभोग को बढ़ाया जाए; इससे औसत मांग बढ़ेगी। लोकप्रिय रूप से इसे केन्सियन इकाॅनाॅमी (Keynesian economics)के नाम से जाना जाता है। यह अधिक स्थिर व दीर्घकालिक बहाली (sustained recovery) की ओर बढ़ने में मदद करता है।

जैसा कि ट्रम्प ने किया, मोदी प्रत्येक गरीब परिवार को एक वर्ष तक 10,000 रु प्रति माह दे सकते थे और 10 करोड़ परिवारों तक इस इमदाद को पहुचा सकते थे। 12 लाख करोड़ रुपये वित्तीय रूप से वहनीय भी है। प्रत्येक बेरोजगार युवा के लिए 5000 रु प्रति माह बेरोज़गारी भत्ता दिया जा सकता था। बजाए इसके, मोदी ने पूंजीपतियों के हाथ अधिकतम पूंजी दे दी । निजी उपभोग दूसरे क्वाटर में 26.7 प्रतिशत गिर गया। पूंजीपतियों पर लाखों करोड़ लुटाए गए पर निश्चित निवेश यानि फिक्स्ड इन्वेस्टमेंट दूसरे क्वाटर में 47.1 प्रतिशत गिर गया।

 मोदी ने केंद्र में अर्थव्यवस्था के संचालन पर एकाधिकार जमा लिया है, इसलिए अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में राज्यों की कोई भूमिका नहीं रही। केवल 11 राज्यों को पूंजीगत व्यय के लिए ब्याज-मुक्त कर्ज के रूप में महज 3261 करोड़ की छोटी रकम अनुमोदित की गई है। यानि केंद्र आत्मनिर्भर भारत के तहत तीनों पैकेज के लिए 29.87 लाख करोड़ खर्च करेगा, पर 28 राज्यों को अपने उद्योगों को प्रेरित करने के लिए केवल 3261 करोड़, वह भी केंद्र से कर्ज के रूप में देगा। यह कैसा सहयोगी संघवाद है? जहां तक डिमांड साइड की बात है तो गरीबों को आत्मनिर्भर भारत के 26.87 लाख करोड़ व्यय में से प्रधान मंत्री गरीब कल्याण योजना के नाम पर केवल 1,92,800 रु मिलेंगे।

मोदी की गलत प्राथमिकताओं के चलते आत्मनिर्भर भारत विपन्न भारत ही बनने के लिए अभिशप्त है। मोदी अपनी पीठ थपथपाते हैं कि उन्होंने हमें भ्रष्टाचार मुक्त भारत दिया है। पर उनका का नया नारा होना चाहिये-‘‘हम नहीं खाएंगे और खाने नहीं देंगे, क्योंकि खाने के लिए कुछ  नहीं है!’’

(लेखक श्रम और आर्थिक मामलों के जानकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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