NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसान आक्रोश के भंवर में घिरती मोदी सरकार
चालाक मोदी-शाह से अबकी बार इस आंदोलन की संभावनाओं के asessment में blunder हो गयी है, जो राजनीतिक तौर उन्हें भारी पड़ सकती है।
लाल बहादुर सिंह
30 Nov 2020
किसान आक्रोश के भंवर में घिरती मोदी सरकार

वित्तीय पूंजी और कारपोरेट हितों के दबाव में किसान-विरोधी काले कानूनों को लागू करने की मोदी जी की मजबूरी तो समझ में आती है, पर लगता है, चालाक मोदी-शाह से अबकी बार इस आंदोलन की संभावनाओं के asessment (मूल्यांकन) में blunder (बड़ी भूल) हो गयी है, जो राजनीतिक तौर उन्हें भारी पड़ सकती है।

किसानों ने उचित ही वार्ता के लिए गृहमंत्री अमित शाह की अहंकार और धमकी भरी शर्त को खारिज कर दिया है कि पहले वे बुराड़ी ग्राउंड पहुंचे तब वार्ता होगी।

किसानों के मन में इस सरकार के इरादों को लेकर गहरा शक है, एक तरफ मोदी जी मन की बात में नए कानूनों के कसीदे काढ़ रहे हैं, स्वयं अमित शाह हैदराबाद में उसे दुहरा रहे हैं और दूसरी ओर वार्ता का ढोंग कर रहे हैं। दिल्ली सरकार ने भी केंद्र के इरादे का भंडाफोड़ कर दिया, जब अस्थायी जेल बनाने के लिए ग्राउंड्स की उसकी मांग को उसने सार्वजनिक तौर पर खारिज कर दिया।

दरअसल, अपने पहले कार्यकाल में भी मोदी ने ऐसा ही दुस्साहस भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर किया था, जिसमें अंततः किसानों ने उन्हें  धूल चटाया था। सरकार ने पीछे हटकर अपनी जान बचायी थी। तब से वे perform न कर पाने के लिए देशी-विदेशी कारपोरेट लॉबी के निशाने पर थे। अब कोरोना का फायदा उठाते उन्होंने उन्हें संतुष्ट करने के लिए यह नया दुस्साहस किया है। पर किसान आंदोलन जिस प्रचंड आवेग के साथ बढ़ रहा है और किसानों का जैसा determination (दृढ़ निश्चय) है, उसे देखते हुए आसार यही हैं कि सरकार फिर मुंह की खाएगी।

अगर सरकार पीछे न हटी तो आंदोलन और व्यापक आयाम ग्रहण करता जाएगा, इसकी तीव्रता और आक्रामकता बढ़ती जाएगी और यह एक लंबी लड़ाई में तब्दील होता जाएगा। जाहिर है किसानों का यह जुझारू आंदोलन देश के पूरे  विमर्श को बदल कर रख देगा और देश मे नए राजनैतिक ध्रुवीकरण की संभावनाओं के द्वार खोल देगा। अन्ना आंदोलन की तरह, लेकिन विपरीत दिशा में, शिकारी अब शिकार बनेगा !

इस आंदोलन की यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि अब पूरे देश में किसानों के बीच एक नया नारा गूँज रहा है, " अडानी-अम्बानी की ये सरकार,  नहीं चलेगी, नहीं चलेगी" , " कम्पनी राज, हो बर्बाद "। यह मोदी जी के साढ़े 6 साल के शासन में पहली बार हो रहा है कि किसानों को अब यह साफ समझ आने लगा है कि मोदी सरकार दरअसल अम्बानी-अडानी, कारपोरेट और वित्तीय पूँजी के धनकुबेरों की सरकार है! यह ठीक वैसे ही है जैसे कभी popular perception (लोकप्रिय धारणा) में कांग्रेस हुकूमतें टाटा-बिड़ला की सरकार हो गई थीं और उनका पतन होता गया।

यह perception (धारणा) एक बार देश के किसानों की अनुभूति का हिस्सा बन गया, तो फिर मोदी जी की गढ़ी गयी आत्मत्याग की मसीहाई छवि और उनके छद्म राष्ट्रवाद की हवा निकल जायेगी। उनके  कामों को देखने का, उनके बारे में सोचने का किसानों का पूरा नज़रिया ही बदल जायेगा और यह मोदी परिघटना के अंत का आरंभ (beginning of the end) होगा।

कैसी विडम्बना है कि ऐन संविधान दिवस ( 26 नवम्बर, जिस दिन 1949 में हमारा संविधान adopt किया गया था) राष्ट्रवाद के दो विरोधी (competing ) visions  के द्वंद्व का अखाड़ा बना।

मोदी जी ने कहा हर चीज को राष्ट्रहित के तराजू पर तौलना चाहिए और  उनकी सरकार किसान आंदोलन को राष्ट्रहित के विरुद्ध पाकर किसानों पर ऐसे टूट पड़ी, जैसे वे दुश्मन देश की सेना हों या फिर आतंकवादी हों। दिल्ली में प्रवेश के सभी राष्ट्रीय राजमार्गों पर trenches (गड्ढे-खाइयां) खोद दी गईं, बैरिकेड्स पर कंटीले तारों के बाड़े बनाये गए, जैसे किसी दुश्मन देश की सीमा पर बनाये जाते हैं, बड़े बड़े पत्थरों के बोल्डर डाल दिये गए, ट्रकों की लंबी लाइनें खड़ी कर दी गईं। आंसू गैस के गोलों के अनगिनत राउंड ऐसे चले जैसे सीमा पर युद्ध के गोले चल रहे हों, ठिठुरती ठंड में उनपर ठंडे पानी के water-canon से हमला किया गया। इन्हीं सब के बीच एक किसान की शहादत हो गयी।

जबकि, किसानों-मजदूरों की समझ है कि जनता ही राष्ट्र है, जनता का हित ही राष्ट्रहित है,  इसलिए जब उन्होंने पाया कि मोदी राज जनहित के विरुद्ध अर्थात राष्ट्रहित के विरुद्ध काम कर रहा है, वह अम्बानी-अडानी, विदेशी कॉर्पोरेशन्स के लिए काम कर रहे हैं, तो उसे रोकने के लिए जान की बाजी लगाकर वे सड़क पर उतर पड़े - उम्र की सीमाएं टूट गईं, बड़े-बुजुर्ग, बच्चे, नौजवान-छात्र, 80-85 साल की नानी-दादियां, पूरा परिवार, 4-4 पीढियां एक साथ निकल पड़ीं।

हरियाणा सरकार द्वारा जगह जगह खड़े किए गए बैरिकेड्स को तोड़ते हुए, लाठीचार्ज, वाटर-कैनन का मुकाबला करते हुए उन्होंने दिल्ली में प्रवेश के सारे राजमार्गों पर कब्ज़ा कर लिया है, और उन्हें रोकने की विफल कोशिशों के बाद मोदी सरकार को उन्हें दिल्ली में प्रवेश की इजाज़त देनी पड़ी। पर वे बॉर्डर पर ही जमे हुए हैं। 28 नवम्बर को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के किसान भी आनंदविहार-गाजीपुर बॉर्डर पर जम गए। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ से आते किसान आगरा के पास रोके गए, लेकिन अब वे भी दिल्ली में दाखिल हो चुके हैं।

पंजाब, हरियाणा और पूरे देश से किसानों का दिल्ली की ओर मार्च जारी है। हजारों-हजार ट्रैक्टर-ट्रालियों के साथ लाखों-लाख किसानों का दिल्ली पर यह घेरा देश के इतिहास में अभूतपूर्व है, किसी को 30 साल पहले के टिकैत आंदोलन की याद आ रही है तो किसी को 1857 की !

दरअसल, किसानों के बयानों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और उनके लिए यह do or die (करो या मरो) की स्थिति है, " हम गोली खाने को तैयार हैं, लेकिन वापस नहीं जाएंगे जब तक तीनों किसान विरोधी कानून वापस नहीं होते। हम तो पहले से ही मरे हुए हैं।", " हम करपोरेट को lease (पट्टा) पर जमीन नहीं देंगे। हम अपनी ही जमीन पर मजदूर नहीं बनना चाहते। यह सबसे तानाशाह सरकार है। " 74 साल के एक बुजुर्ग किसान ने कहा, " इस उम्र में कौन अपना वतन छोड़कर लाठी डंडे खाना चाहता है, पर जब हमारी फसल ही बर्बाद हो जाएगी तो क्या बचेगा?", " आज अगर न लड़ा तो अपने बच्चों की और उनके बच्चों की नजरों का सामना नहीं कर पाऊंगा।" स्वर्णमंदिर से जत्थे में दिल्ली के लिए निकलते हुए किसान ने कहा, " हम भावी पीढ़ी के लिए लड़ रहे हैं। हम दिल्ली पहुंचेंगे, चाहे जो हो।"

इस पूरे मामले में पहले तो कोशिश हुई कोरोना के नाम पर उन्हें दिल्ली आने से रोकने की, जब वह सफल नहीं हुई तो फिर शुरू हुआ उन्हें बदनाम करने और बांटने का शातिर खेल।

मोदी जी के राष्ट्रहित के तराजू से क्लू लेते हुए उनके मित्र खट्टर जी ने किसानों को पंजाबी बना दिया, " इसमें केवल पंजाब वाले हैं", यह कहकर इशारे में उन्होंने कई बातें कह दीं। अर्थात यह पूरे देश के किसानों का आंदोलन नहीं, बस पंजाबियों का है। अब पंजाबियों की बात हुई, तो  सिखों की धार्मिक पहचान तो उभरनी ही थी। उन्हें हरियाणा वालों के मन मे पंजाब-हरियाणा की पुरानी लड़ाई की यादों को भी जगाना था।

बाकी काम गोदी मीडिया, भोंपू चैनलों, छुटभैये नेताओं और ट्रोल आर्मी ने कर दिया, वे उसे भिंडरवाले-खालिस्तान तक खींच ले गए और उन्हें जुलूस में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे सुनाई पड़ने लगे! असली निशाना उन्हें भड़काने वालों अर्थात विपक्ष के खिलाफ केंद्रित किया गया! एक भारी-भरकम चैनल पर, एक कुख्यात ऐंकर रोज सबसे पूछ रही है, " किसानों को कौन भड़का रहा है?"

यह सब एक सोची समझी रणनीति के तहत किसान आंदोलन की राष्ट्रीय छवि की काट के लिए, उसे बदनाम करने, बांट देने और फिर अंततः कुचल देने तथा इन्हें भड़काने और साथ देने के आरोप में विपक्ष को घेर देने की शातिर योजना के तहत किया गया।

यह सब 80 के दशक में इंदिरा गांधी ने किसान आंदोलन और विरोधियों से निपटने के लिए जो कुछ किया था, उसकी याद ताजा करने वाला है। 

बहरहाल, तब से गंगा-सतलज में बहुत पानी बह चुका है, लगभग 4 दशक पूर्व के उस घटनाक्रम से उसकी भयानक त्रासदी से पंजाब के किसानों समेत पूरे देश ने बहुत कुछ सीखा है।

आज किसान-आंदोलन के पास पंजाब में भी और राष्ट्रीय स्तर पर mature नेतृत्व है, और किसान आंदोलन का आवेग इतना तीव्र है कि सरकार की सारी साजिशें फेल हो गयी हैं। परन्तु संकट में घिरते मोदी-शाह के राज में ऐसी साजिशों की खतरनाक संभावनाओं के प्रति लगातार vigilant रहना होगा। अल्पसंख्यक बहुल सीमावर्ती कश्मीर की तरह ही पंजाब भी, केन्द्रीय सत्ता में majoritarian rule के दौर में vulnerable बना रहेगा। वहां की जनता को बदनाम करने और उनके लोकतांत्रिक आंदोलन को साम्प्रदयिक दिशा देने और कुचलने की साजिशों को नाकाम करना होगा।

मोदी सरकार के खिलाफ किसानों की नाराजगी इतनी गहरी है और इस आंदोलन का sweep इतना व्यापक है कि इसे बदनाम करने और दमन की कोशिशें आग में घी का काम करेंगी और यह आन्दोलन राष्ट्रव्यापी स्वरूप ग्रहण करता जाएगा।

बेहतर हो कि सरकार किसानों से टकराव से बाज आये तथा कृषि के ढांचे में आमूल बदलाव करने वाले किसान- विरोधी कानूनों को वापस ले।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Farm bills 2020
Farmer protest
Punjab Farmers
punjab
MSP
BJP
Narendra modi
Modi government
Amit Shah
DILLI CHALO

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

लुधियाना: PRTC के संविदा कर्मियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू

पंजाब: आप सरकार के ख़िलाफ़ किसानों ने खोला बड़ा मोर्चा, चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर डाला डेरा

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • मुजफ्फरनगर दंगा: मंत्री सुरेश राणा, संगीत सोम, साध्वी प्राची पर फिर से चलेगा दंगा भड़काने का मुकदमा
    सबरंग इंडिया
    मुजफ्फरनगर दंगा: मंत्री सुरेश राणा, संगीत सोम, साध्वी प्राची पर फिर से चलेगा दंगा भड़काने का मुकदमा
    14 Aug 2021
    योगी सरकार ने मार्च 2021 में सुरेश राणा, संगीत सोम आदि के मुकदमे, राजनीति से प्रेरित बताते हुए वापस ले लिए थे। इसी से मुजफ्फरनगर दंगे से जुड़े इन मुकदमों के दोबारा खुलने को योगी सरकार के लिए एक बड़ा…
  • आज़ाद भारत में आज़ादी का अर्थः अमृत महोत्सव मनाने और समझने का अंतर
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    आज़ाद भारत में आज़ादी का अर्थः अमृत महोत्सव मनाने और समझने का अंतर
    14 Aug 2021
    आज़ादी को समझने और उसे कायम रखने का मूल मंत्र समता के कार्यक्रमों को बढ़ाने और भाईचारे यानी बंधुत्व पर जोर देने में है। इनके बिना आज़ादी लड़खड़ा रही है। आज़ादी कमजोर हो रही है झूठ और निगरानी के बढ़ते…
  • बिहार में जातीय जनगणना का मुद्दा बीजेपी की परेशानी क्यों बना हुआ है?
    सोनिया यादव
    बिहार में जातीय जनगणना का मुद्दा बीजेपी की परेशानी क्यों बना हुआ है?
    14 Aug 2021
    बिहार विधानसभा में पहली बार 18 फरवरी, 2019 और फिर 27 फरवरी, 2020 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर मांग की गई थी कि 2021 में होने वाली जनगणना जाति आधारित हो। हालांकि अब इस पर राज्य की एनडीए सरकार…
  • कानपुर में मुस्लिम युवक की पिटाई, यूपी में फैलता किसान आंदोलन और अन्य ख़बरें
    न्यूज़क्लिक टीम
    कानपुर में मुस्लिम युवक की पिटाई, यूपी में फैलता किसान आंदोलन और अन्य ख़बरें
    13 Aug 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंड अप में आज हमारी नज़र रहेगी कानपुर में मुस्लिम युवक की पिटाई, यूपी में फैल रहा किसान आंदोलन और अन्य ख़बरों पर।
  • शेयर में छोटे निवेशक लगा रहे हैं सट्टा?
    न्यूज़क्लिक टीम
    शेयर में छोटे निवेशक लगा रहे हैं सट्टा?
    13 Aug 2021
    पिछले 17 महीनों में सेंसेक्स में 220% का उछाल आया है। दरबारी अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि इससे सबसे ज़्यादा छोटे निवेशकों को फ़ायदा हुआ है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि छोटे निवेशक खरीद फ़रोक्त ज़रूर कर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License