NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति एक और विनाशकारी दुस्साहस!
हर मुद्दे की तरह नई शिक्षा नीति का पेश किया जाना भी तरह तरह के जुमलों की  बरसात का अवसर बन गया है।
लाल बहादुर सिंह
08 Aug 2020
मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति
image courtesy : IBG

सात अगस्त को ‘Education Conclave 2020’ को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने दावा किया कि नई राष्ट्रीय शिक्षानीति में यह क्षमता है कि वह न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था बल्कि पूरे देश को बदल देगी। यह नए भारत की आधारशिला रखेगी।

पर क्या सचमुच नई शिक्षानीति प्रधानमंत्री के दावे के अनुरूप ऐसा कर पायेगी या वह शिक्षा व्यवस्था और देश को और बड़े संकट की ओर ले जाएगी? 

लगे हाथों प्रधानमंत्री ने यह भी दावा कर दिया कि किसी सेक्टर में इस शिक्षानीति की आलोचना नहीं हो रही है! जबकि राष्ट्रीय राजधानी स्थित देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ DUTA ने इस शिक्षानीति की कड़ी आलोचना की है, साथ ही व्यापक छात्र समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले AISA समेत तमाम लोकप्रिय छात्र संगठनों ने इसके खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया है और वे कैम्पस खुलते ही प्रतिवाद की तैयारी कर रहे हैं।

दरअसल, किसी भी सरकार द्वारा लायी गयी शिक्षानीति, उस सरकार की नीतियों की समग्र दिशा का ही अभिन्न अंग होती है।

यह बात गौरतलब है कि  प्रताप भानु मेहता जैसे उदारवादी स्तंभकार दस्तावेज के Text में कही बातों की मोटे तौर पर तारीफ करते हुए भी मोदी सरकार की रीति-नीति के Context में इसके क्रियान्वयन पर गहरा संदेह व्यक्त कर रहे हैं। 

वे कहते हैं कि दस्तावेज आलोचनात्मक चिंतन और free inquiry पर जोर देता है, जो बिल्कुल सही  है। लेकिन यह text उस context में पढ़ना मुश्किल हो जाता है जब हम देखते हैं कि सरकार विश्वविद्यालयों को राजनैतिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में अनुचर बनने (conformity) के लिए  डरा धमका रही है।

दरअसल दस्तावेज के Context ही नहीं Text से भी, तथा इस दस्तावेज की गैर-जनतांत्रिक निर्माण प्रक्रिया से भी यह साफ है कि मोदी सरकार ने अपने दूरगामी वैचारिक-सांस्कृतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने, अपनी राजनैतिक जरूरतों तथा आर्थिक नीतियों की दिशा के अनुरूप यह नीति पेश किया है जो आने वाले दिनों में शिक्षा के संकट को चौतरफा बढ़ाएगी तथा व्यापक छात्र-शिक्षक विक्षोभ को जन्म देगी। यह अनायास नहीं है कि RSS ने संतोष व्यक्त किया है कि उसके 60 % सुझाव शामिल कर लिए गए, जबकि तमाम शिक्षाविदों, शिक्षक व छात्र संगठनों ने नाराजगी व्यक्त की है कि उनके सुझावों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।

इस तरह अस्तित्व में आई इस नई शिक्षा नीति का मूल स्वर है, नव उदारवादी अर्थनीति के मौजूदा चरण की जरूरतों के अनुरूप श्रम शक्ति की आपूर्ति सुनिश्चित करते हुए शिक्षा के क्षेत्र को देशी-विदेशी धनकुबेरों के हाथों सौंप देना और सरकार का सबको सस्ती समान शिक्षा सुलभ कराने के दायित्व से हाथ झाड़ लेना। अकादमिक स्वतंत्रता तथा कैम्पस लोकतंत्र का खात्मा, पाठ्यक्रमों में ऐसा बदलाव जिससे शिक्षा के अंतर्निहित मूल्यों को हिंदुत्व की विचारधारा के अनुरूप ढाला जा सके तथा इसे आधुनिक नागरिक बोध, वैज्ञानिकता व तार्किकता से रहित कर देना।

इस शिक्षानीति का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह गैर समावेशी है और समाज के आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर तबके के छात्रों को शिक्षा, विशेषकर उच्च शिक्षा से बाहर करेगी। विभिन्न संस्थानों को जो स्वायत्तता,  वित्तीय स्वयतत्ता समेत, देने की बात की गई है, उसका निहितार्थ यही है कि वे संस्थान छात्रों से भारी फीस वसूल करेंगे क्योंकि सरकार उन्हें फ़ंड नहीं देगी। जाहिर है ऐसी संस्थाओं से गरीब व सामान्य मध्यवर्गीय परिवारों के छात्र बाहर हो जाएंगे।

जो सरकार शिक्षा पर जीडीपी का 3% से भी कम खर्च कर रही है, और लगातार शिक्षा मद में कटौती की फिराक में है, उसके शिक्षा पर जीडीपी के 6%  खर्च का लक्ष्य हास्यास्पद है। उसका जिक्र महज इसलिए लगता है कि वह 60 के दशक में बने कोठारी आयोग के समय से चली आती परम्परा है।

डॉ. कस्तूरीरंगन समिति द्वारा तैयार शिक्षा नीति के मसौदे में निजी क्षेत्र के गैर-परोपकारी (Non-philanthropic) शिक्षण संस्थाओं को खारिज किया गया था, लेकिन अब शिक्षानीति  से यह बात गायब है। ठीक इसी तरह सरकार द्वारा final नई शिक्षानीति के प्रारम्भिक ड्राफ्ट में शिक्षा के अधिकार (Right to Education) के  संदर्भ शामिल थे लेकिन अब सरकार की वेबसाइट से वह भी गायब है। 

शिक्षानीति में प्रस्तावित सार्वजनिक-निजी-परोपकारी भागीदारी को प्रोत्साहन तथा विश्वस्तरीय विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसर देश में खोलने की इजाजत शिक्षा के कारपोरेटीकरण, चरम व्यवसायीकरण की दिशा में ही कदम हैं। जाहिरा तौर पर अपनी बेहद ऊंची फीस के कारण ऐसे संस्थान व्यापक आम छात्रों की पहुंच के बाहर होंगे।

प्रो. प्रभात पटनायक ने इस बात को बेहद शिद्दत के साथ नोट किया है कि शिक्षानीति के पूरे दस्तावेज में affirmative action के माध्यम से सामाजिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए आरक्षण का कहीं जिक्र तक नहीं है। उन्होंने आशंका जाहिर की है कि जिस तरह आज JNU में सरकार की नाक के नीचे आरक्षण को चुपचाप दफ़्न किया जा रहा है, आने वाले दिनों में नई शिक्षानीति के माध्यम से व्यापक तौर पर आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े छात्रों को उच्चशिक्षा से बाहर कर दिया जाएगा, जिसके बदतरीन शिकार उत्पीड़ित समुदायों से आने वाले छात्र होंगे।

उच्च शिक्षा में लचीलेपन के नाम पर multiple entry, multiple exit प्रणाली बनाई गई है। इसमें स्नातक की पढ़ाई 4 साल की करने और बीच में पढ़ाई छोड़ने पर छात्र को उस अवधि के लिए प्रमाणपत्र, डिप्लोमा या डिग्री देने का प्रावधान किया गया है। जाहिर है महंगी होती शिक्षा के दौर में इस 4 साला स्नातक डिग्री से ड्रॉप आउट्स की संख्या बेहद बढ़ जाएगी। 1 साल, 2 साल की आधी अधूरी पढ़ाई के बाद कागजी सर्टिफिकेट लेकर छात्र करेंगे क्या? उन्हें कोई रोजगार तो मिलने से रहा। यह विशेषकर आर्थिक, सामाजिक रूप से वंचित तबकों से आने वाले छात्रों  को स्नातक होने तक से वंचित कर देगा। इसी तरह का एक प्रयास UPA-II के दौरान दिल्ली विवि में हुआ था, जिसे दिल्ली विवि में छात्रों-अध्यापकों के भारी विरोध के कारण मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वापस लेना पड़ा था।

अब फिर उसी पैटर्न को जिसे राष्टीय राजधानी स्थित देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में विफल होने और व्यापक विरोध के कारण इसी सरकार को वापस लेना पड़ा था, उसी को पूरे देश में लागू किया जाएगा!

समुचित स्तर तक की आधुनिक शिक्षा एक सभ्य सुसंस्कृत नागरिक बनने के लिए सबके लिए जरूरी है, वह चाहे जिस भी पेशे से आजीविका कमाए।

पर उससे वंचित करके, वोकेशनल शिक्षा और कौशल विकास के नाम पर आखिर किस तरह के नागरिक पैदा किये जायेंगे?

जॉब seekers नहीं जॉब creators का शोर चाहे जितना हो, रोजगार तो आखिर सही आर्थिक नीतियों से अर्थ व्यवस्था में पैदा होगा, जो आज रसातल में जा रही है। शिक्षा को वोकेशनल बना देने से रोजगार थोड़े ही पैदा हो जाएगा।

इस तरह छात्रों को आधुनिक, वैज्ञानिक, तार्किकता पैदा करनेवाली, प्रश्न खड़ा करने वाली शिक्षा से वंचित करके उन्हें कथित मूल्य-आधारित शिक्षा जिसकी जड़ें भारतीय संस्कार ( निष्काम कर्म जैसे भावबोध) में हो , जो भारतीय होने के गर्व पर आधारित हो, जो मौलिक कर्तव्यों के प्रति सम्मान का भाव जगाए, ( मौलिक अधिकारों के प्रति नहीं!) आदि के द्वारा आधुनिक नागरिक पैदा करने की बजाय अनुयायियों/भक्तों, अनुचरों की फौज खड़ी करना है, जो उच्चतर स्तरों पर वित्तीय पूंजी के सरदारों के आगे नतमस्तक हों और निचले स्तरों पर शासन-प्रशासन सरकार के सामने।

पाठ्यक्रम का बोझ कम करने के नाम पर, इसी दिशा के अनुरूप, सीबीएसई बोर्ड ने पिछले दिनों 11वीं कक्षा में नागरिकता, संघवाद, राष्ट्रीयता और धर्मनिरपेक्षता जैसे बेहद जरूरी विषयों को पाठ्यक्रम से हटा दिया।

संस्कृत पर जोर, प्राचीन ग्रंथों और सांस्कृतिक व्यवहारों पर जोर आदि इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा है। क्या मातृभाषा में शिक्षा पाने वाले छात्रों के लिए, इंग्लिश मीडियम से आनेवाले छात्रों के समांतर उच्चतर शिक्षा व रोजगार में अवसर की गारंटी की जाएगी? वरना पिछड़ी पृष्ठभूमि के छात्रों को कूपमंडूक और  वंचित बनाये रखने के अतिरिक्त इसका और क्या परिणाम निकलेगा?

इस शिक्षानीति का एक प्रमुख लक्ष्य बची खुची अकादमिक स्वतंत्रता और कैम्पस लोकतंत्र का खात्मा है। कस्तूरीरंगन कमेटी के मसौदे मैं उच्च  शिक्षण संस्थानों में तमाम निकायों में छात्रों को प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव था जिसे प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद हटा दिया गया।

दरअसल हाल के वर्षों में सरकार के तमाम जनविरोधी, निरंकुश कदमों के खिलाफ सबसे कड़ा प्रतिरोध शैक्षणिक समुदाय की ओर से खड़ा हुआ। सरकार इस नई शिक्षानीति के माध्यम से छात्रों की संरचना बदलकर, उनके वैचारिक डिस्कोर्स को बदलकर, संस्थानों के चरित्र को बदलकर इस प्रतिरोध की कमर तोड़ देना चाहती है, ताकि वह निर्भय होकर अपने फासीवादी प्रोजेक्ट की दिशा में आगे बढ़ सके।

क्या शैक्षणिक समुदाय इसे यूं ही स्वीकार कर लेगा ?

(लेखक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

NEP
Modi government's NEP
Narendra modi
Education Sector
Higher education
Education Conclave 2020
democracy
MHRD
DUTA
central university

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

बच्चे नहीं, शिक्षकों का मूल्यांकन करें तो पता चलेगा शिक्षा का स्तर

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

डीयूः नियमित प्राचार्य न होने की स्थिति में भर्ती पर रोक; स्टाफ, शिक्षकों में नाराज़गी

शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का ज़रूरी मोर्चा

स्कूलों की तरह ही न हो जाए सरकारी विश्वविद्यालयों का हश्र, यही डर है !- सतीश देशपांडे

नई शिक्षा नीति बनाने वालों को शिक्षा की समझ नहीं - अनिता रामपाल

नई शिक्षा नीति से सधेगा काॅरपोरेट हित

उत्तराखंड : ज़रूरी सुविधाओं के अभाव में बंद होते सरकारी स्कूल, RTE क़ानून की आड़ में निजी स्कूलों का बढ़ता कारोबार 


बाकी खबरें

  • सत्यम् तिवारी
    वाद-विवाद; विनोद कुमार शुक्ल : "मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ था, कि मैं ठगा जा रहा हूँ"
    16 Mar 2022
    लेखक-प्रकाशक की अनबन, किताबों में प्रूफ़ की ग़लतियाँ, प्रकाशकों की मनमानी; ये बातें हिंदी साहित्य के लिए नई नहीं हैं। मगर पिछले 10 दिनों में जो घटनाएं सामने आई हैं
  • pramod samvant
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः प्रमोद सावंत के बयान की पड़ताल,क्या कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार कांग्रेस ने किये?
    16 Mar 2022
    भाजपा के नेता महत्वपूर्ण तथ्यों को इधर-उधर कर दे रहे हैं। इंटरनेट पर इस समय इस बारे में काफी ग़लत प्रचार मौजूद है। एक तथ्य को लेकर काफी विवाद है कि उस समय यानी 1990 केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी।…
  • election result
    नीलू व्यास
    विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया
    16 Mar 2022
    जब कोई मतदाता सरकार से प्राप्त होने लाभों के लिए खुद को ‘ऋणी’ महसूस करता है और बेरोजगारी, स्वास्थ्य कुप्रबंधन इत्यादि को लेकर जवाबदेही की मांग करने में विफल रहता है, तो इसे कहीं से भी लोकतंत्र के लिए…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये
    16 Mar 2022
    किसी भी राजनीतिक पार्टी को प्रश्रय ना देने और उससे जुड़ी पोस्ट को खुद से प्रोत्सान न देने के अपने नियम का फ़ेसबुक ने धड़ल्ले से उल्लंघन किया है। फ़ेसबुक ने कुछ अज्ञात और अप्रत्यक्ष ढंग
  • Delimitation
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर: परिसीमन आयोग ने प्रस्तावों को तैयार किया, 21 मार्च तक ऐतराज़ दर्ज करने का समय
    16 Mar 2022
    आयोग लोगों के साथ बैठकें करने के लिए ​28​​ और ​29​​ मार्च को केंद्र शासित प्रदेश का दौरा करेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License