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मोदी जी, अर्थव्यवस्था के बारे में क्या कोई योजना है?
उग्र और बढ़ती महामारी फिर से वापस आ गई है, और इसलिए देश के कई हिस्सों में क़रीब-क़रीब लॉकडाउन जैसी स्थिति है, लेकिन क्या सरकार फिर से वही ग़लतियाँ दोहराने जा रही है?
सुबोध वर्मा
16 Apr 2021
Translated by महेश कुमार
मोदी जी, अर्थव्यवस्था के बारे में क्या कोई योजना है?

जब देश भर में कोविड-19 की नई लहर चल रही है, कई राज्यों ने रात के कर्फ्यू से लेकर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं (सिर्फ हरिद्वार में कुंभ मेले को छोड़कर)! पिछले साल की तरह, देश भर में अनिश्चितता और भय, महामारी की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन, पिछले साल की तुलना में केंद्र सरकार मुख्यत सिरे से गायब है। पिछले साल, इस समय पीएम मोदी अपने तीसरे देशव्यापी संबोधन के जरिए आम लोगों को बीमारी से लड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जबकि इस साल कुछ रस्मी शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कि मास्क और 'सफाई' के बारे में बताया जा रहा  हैं, और टीकाकरण के बारे में कुछ प्रचार किया जाता रहा तब तक कि यह अभियान भी टीके की कमी के कारण रस्साकसी में नहीं बदल गया।

लेकिन जो बात चौंकाने और डराने वाली है वह यह कि कोविड की इस नई लहर से जो आर्थिक तबाही उआ नुकसान होने वाला है उससे निपटने की सरकार की कोई तैयारी या योजना नज़र नहीं आती है। लगता है आर्थिक गतिविधियों को बड़ा नुकसान होगा, और महामारी अनियंत्रित हो जाएगी। इस पहेली को हल करने का एकमात्र तरीका यही है कि सरकार इस बात को सुनिश्चित करे कि आम लोगों को बीमारी या प्रतिबंध के कारण आर्थिक/वेतन आदि का नुकसान होने पाए उनका समर्थन किया जाए। यह समर्थन कई रूपों में दिया जा सकता है - प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता देकर, मुफ्त अनाज और अन्य आवश्यक खाद्य पदार्थों का वितरण कर, मुफ्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना, जिसमें जांच और मुफ्त टीके लगाना, मुफ्त और निरंतर इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध कराना आदि शामिल हैं ताकि बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर सकें।

इस सब को लागू करने के लिए कुशल योजना और सबसे महत्वपूर्ण, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। मोदी सरकार को पिछले साल की तरह कर्व (बढ़ती बीमारी) के पीछे दौड़ने के बजाय कर्व के आगे चलने की जरूरत है। याद है मोदी सरकार ने पिछले साल अचानक और भयानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी और अपर्याप्त आर्थिक सहायता या खाद्यान्न वितरण में बहुत देरी की थी। 

सरकारी ख़ज़ाने से ख़र्च करो 

इस मुद्दे पर मोदी सरकार की शिथिलता या कमी के कुछ अर्थ या समझ नीचे दिए गए चार्ट से हासिल की जा सकती है, जो इस महीने जारी किए गए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नवीनतम आंकड़ों पर आधारित है। ये आंकड़े पिछले साल कुछ सरकारों द्वारा लोगों को आर्थिक संकट में दी गई मदद से हुए अतिरिक्त खर्च को दिखाता है। यह मदद, प्रत्यक्ष सहायता या खर्च बढ़ाने या फिर राहत देने के लिए राजस्व में कुछ छूट के रूप में हो सकती है।

आम लोगों को या अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए सहायता प्रदान करने के मामले में भारत का दर्जा बहुत खराब है, क्योंकि इसने इस दौरान सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 3.1 प्रतिशत  खर्च किया है। यह उन सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मामले में औसत से भी कम है जिनमें से एक भारत भी है। जो सबसे आश्चर्यजनक बात है वह यह कि उन्नत यानि विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने अपने सकल घरेलू उत्पाद का औसतन लगभग 13 प्रतिशत खर्च किया है, हम उससे बहुत ही नीचे है। ध्यान दें कि चीन ने (4.7 प्रतिशत), दक्षिण अफ्रीका ने (5.5 प्रतिशत) और ब्राजील ने (8.3 प्रतिशत) सकल घरेलू उत्पाद का बड़ा हिस्सा खर्च किया है।

तर्क यह दिया जा रहा है कि अमीर देशों के पास खर्च करने के लिए काफी अधिक संसाधन हैं, और भारत इस तरह की विलासिता को बर्दाश्त नहीं कर सकता है। लेकिन यह तथ्य सही नहीं है क्योंकि अगर मोदी सरकार ने आम जन में वितरण के लिए अनाज के स्टॉक का इस्तेमाल किया होता, कॉरपोरेट्स को दिए गए बड़े पैमाने पर कर छुट को वापस लिया होता, और सुपर-रिच पर कर लगाकर अधिक संसाधन जुटाए होते तो सार्वजनिक खर्च में काफी वृद्धि हो सकती थी।

इस प्रत्यक्ष खर्च के अलावा, अधिकांश सरकारों ने व्यापात/व्यवसायों को ज़िंदा रखने के लिए कर्ज़, इक्विटी या गारंटी की भी पेशकश की थी। इन्हें आमतौर पर सरकारों द्वारा पेश किए जाने वाले आम ‘पैकेज’ के हिस्से के तौर पर गिना जाता है, लेकिन वास्तव में ये उल्लेखनीय फंड हैं, और इसका इस्तेमाल अगले कुछ वर्षों तक प्रभाव बनाए रखेगा। आईएमएफ के आंकलन के अनुसार, भारत ने जीडीपी के लगभग 5.1 प्रतिशत क्रेडिट और गारंटी की पेशकश की है।

अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब 

अर्थव्यवस्था पिछले साल कोविड+लॉकडाउन के झटके से अभी तक उबर नहीं पाई है। सीएमआईई के अनुमान के अनुसार अप्रैल में बेरोजगारी दर 7.1 प्रतिशत पर है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) फरवरी 2020 की तुलना में इस वर्ष फरवरी में 3.6 प्रतिशत कम है, यह सब दर्शाता है कि औद्योगिक गतिविधि में बहुत सुधार नहीं हुआ है। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार बैंक ऋण में वृद्धि पिछले वित्त वर्ष में सबसे निम्न स्तर यानि 4.2 प्रतिशत पर रही है, और इस वर्ष इसमें कोई सुधार होने का संकेत नहीं मिल रहा है। और, फरवरी में, सरकार का खुद का अनुमान था कि 2020-21 में जीडीपी पिछले वर्ष की तुलना में 8 प्रतिशत कम रहेगी, निजी उपभोग के खर्च में लगभग 9 प्रतिशत की गिरावट होगी और सकल स्थिर पूंजी निर्माण (यानी पूंजी निवेश) पिछले वर्ष की तुलना में 12 प्रतिशत गिर जाएगा। 

जैसे-जैसे 2020-21 का वित्तीय वर्ष नज़दीक आया छोटे वृद्धिशील सुधारों को लेकर बहुत उत्सव मनाया गया, जबकि पूरी की पूरी तस्वीर उदास बनी रही है। इस पृष्ठभूमि में, नई महामारी की लहर विनाशकारी परिणाम ला सकती है - औद्योगिक उत्पादन में और गिरावट आ सकती है, निवेश निश्चित रूप से सुस्त हो जाएगा, निजी खपत खर्च कम हो जाएगा, और अधिक लोग नौकरी खो देंगे। ये वे हालात हैं जो अब भारत के ऊपर मंडरा रहे है।

करना क्या चाहिए 

केंद्र सरकार चुपचाप राज्य सरकारों को विस्फोटक कोविड-19 के संकट से निपटने के लिए अकेला छोड़े दे रही है और वह इससे उत्पन्न दोनों संकट आर्थिक और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों से लड़ने की तैयारी से इंकार कर रही है। कामकाजी लोग यानि कारखाने के मजदूरों, खेतिहर मजदूरों और अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों की सीधे मदद के वित्तीय पैकेज की घोषणा तुरंत कर दी जानी चाहिए। पिछले साल, ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने आयकर नहीं चुकाने वाले सभी परिवारों को 7,500 रुपये प्रति माह प्रत्यक्ष अनुदान देने की मांग उठाई थी। इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए ताकि काम कर रहे लोगों को ऐसे समय में कमाने के लिए बाहर जाने से रोका जा सके खासकर तब-जब कोरोनोवायरस का प्रसार तेजी से हो रहा हो। इस कदम से न केवल सामाजिक संपर्क और बीमारी के प्रसारण पर अंकुश लगेगा, बल्कि लोगों के हाथों में बहुत ही जरूरी खरीद करने की ताक़त आएगी, जो बाज़ार में मांग बढ़ाएगी और इस तरह अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी और उसे संकट से बचाने में मदद भी मिलेगी।

इसके अलावा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सरकारी गोदामों में अटे पड़े भारी अनाज के भंडार को सभी लोगों तक पहुंचाने में तेजी लाने की जरूरत है। रबी की फसल की खरीद से अगले दो महीनों में खाद्यान्न का भंडार बढ़ने वाला है और देश में अनाज की मात्रा हर किसी के लिए पर्याप्त होगी, बशर्ते मोदी सरकार इसके वितरण को तैयार हो। यह एक विशाल रसद पहुंचाने का काम है और इसे जल्द शुरू करने की जरूरत है ताकि आने वाले हफ्तों में कोई भी भारतीय इंसान भूखा न सोए, जैसा कि पिछले साल हुआ था।

चूंकि पिछले साल महामारी के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश में पूरा वक़्त बर्बाद हो गया था और फिर न ही ढहती स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार की कोई दीर्घकालिक योजना बनाई गई,  इसलिए देश में अभी भी पिछले साल के समान ही नज़ारे नज़र आ रहे हैं – जांच के परिणाम में देरी, अस्पतालों में बिस्तर नहीं है, स्वास्थ्य कर्मियों की कमी, इत्यादि। यह एक तरह की आपराधिक उपेक्षा से कम नहीं है। हालांकि स्वास्थ्य का मसला काफी हद तक राज्य का विषय है, लेकिन राज्यों को हेल्थकेयर सुविधाओं को बढ़ाने या उनका विस्तार करने के लिए केंद्रीय स्तर  से धनराशि मुहैया कराने से मोदी सरकार हजारों लोगों की जान बचा सकती है और निजी अस्पतालों की जबरन फीस वसूली से निजात दिला सकती है, और साथ ही अपने खर्चों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे परिवारों पर आर्थिक बोझ को भी कम कर सकती है।

मोदी सरकार को इस संकट के समय में बड़ी तेजी से काम करने की जरूरत है। इसे राज्य सरकारों को विश्वास में लेने की जरूरत है और अपना पर्स ढीला करने की भी निहायत जरूरत है। अन्यथा, भारत फिर से पिछले साल की तुलना में बहुत खराब आपदा प्रबंधन में नामवर हो जाएगा। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Mr. Modi, Any Plan for the Economy?

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