NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
नई शिक्षा नीति अमल में आते ही गुजरात विश्वविद्यालय में लोकतंत्र का पतन
लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए और गुजरात विश्वविद्यालय के विभिन्न वर्गों के हितों के प्रतिनिधित्व करने वाले सीनेट और सिंडिकेट की जगह प्रदेश की सरकार बोर्ड ऑफ गवर्नेंस के गठन की बात कर रही है। 
साहिल कुरेशी
01 Mar 2021
नई शिक्षा नीति

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने सितंबर 2020 में ही घोषणा कर दी थी कि उनका प्रदेश राष्ट्रीय शिक्षा नीति (नेप) को लागू करने वाला देश का पहला राज्य होगा। 

यह काम त्वरित गति से कमेटियों के गठन और कुछ ही महीनों में उनके द्वारा दाखिल की गईं रिपोर्टों के साथ ही शुरू हो गया है। बीते साल रूपानी सरकार ने राज्य में स्कूलों को बंद करने और हजारों स्कूलों के विलय का निर्णय लिया था। गुजरात विश्वविद्यालय सीनेट (सिंडिकेट द्वारा इसका विस्तार करने)1 के चुने गए अधिकतर सदस्यों का कार्यकाल 26 फरवरी 2021 को समाप्त हो गया और अगले चुनाव की तारीख की घोषणा भी नहीं की गई है। इससे मालूम होता है कि सरकार ने सरकारी उच्च शिक्षा को अपना निशाना बना लिया है। इसके तहत लोकतांत्रिक, स्थायी निकायों के प्रतिनिधि को नेप की उस व्यवस्था के साथ बदला जा रहा है, जिसे कॉरपोरेट भाषा में “बोर्ड ऑफ गवर्नेंस” कहा जाता है, जो प्रभावी प्रशासन और नेतृत्व देने की बात कहती है। 

गुजरात विश्वविद्यालय के लोकतांत्रीकरण के लिए संघर्ष

 सीनेट और सिंडीकेट (विभिन्न विश्वविद्यालयों में इनके नाम भिन्न हो सकते हैं) जैसे निकाय भारतीय विश्वविद्यालयों की अवधारणा के समय 1857 से ही उसकी बुनियाद का हिस्सा रहे हैं। ये निकाय विश्वविद्यालय की प्राथमिक विधायी संस्था के रूप में मान्य रहे हैं, जो महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसले भी लेते रहे हैं।

रूपानी सरकार के ताजा निशाने पर गुजरात यूनिवर्सिटी की सीनेट और इसी के जैसे अन्य विश्वविद्यालयों के ऐसे निकाय हैं, जो 19वीं शताब्दी में स्थापित किए गए अपने प्रतिरूपों से, संरचना और नियुक्तियों की प्रक्रिया, के मामले में काफी अलग हैं। मौजूदा सीनेट में पदेन और चुने गए सदस्य होते हैं, जो व्यापक वर्गों - सरकार, शिक्षकों, छात्रों, गैर शिक्षकेतर कर्मियों (ननटीचिंग स्टाफ), कॉलेज प्रबंधनों और उस व्यापक समुदाय के लोग होते हैं - जो अपने समुदायों के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सीनेट के अन्य क्रियाकलापों में सिंडिकेट के लिए कुछ सदस्यों का चुनाव करना और विश्वविद्यालय के कुलपति के चुनाव में वोट डालने का भी है। यह निकाय आज जिस लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक स्वरूप में है, वह हमेशा नहीं था, हालांकि विश्वविद्यालय निकाय के प्रगतिशील तबकों ने इसके लिए संघर्ष किया था। गुजरात यूनिवर्सिटी के मामले में 1962 और 1973 की दरमियां काफी संघर्ष चला था, यह शिक्षा का तेजी से व्यावसायिकरण का दौर था। 

1949 में अपनी स्थापना काल में गुजरात यूनिवर्सिटी सीनेट में प्राध्यापकों, सरकार के पदेन अधिकारियों और मुख्य रूप से छात्र नहीं, बल्कि संबद्ध सभी कॉलेजों के प्राचार्य शामिल थे। 1960 और 1970 के बीच सरकार की उदार अनुदान-सहायता नीति से लाभ लेने के लिए निजी प्रबंधन के तहत बेशुमार कॉलेज खुले और राज्य में निजी कॉलेजों (सभी गुजरात यूनिवर्सिटी से संबद्ध नहीं थे) की तादाद 69 से बढ़कर 205 हो गई। चिमन भाई पटेल ही वह पहले नेता थे जिन्होंने 1960 के दशक में गुजरात में शिक्षा के व्यवसायीकरण की पहल की थी। उनकी सरकार को 1974 में छात्रों की अगुवाई में शुरू हुए नवनिर्माण आंदोलन में उखाड़ फेंका था। नए कॉलेजों की स्थापना के साथ सीनेट के कुल 254 सदस्यों में प्राचार्यो की तादाद 1970 तक बढ़कर 131 हो गई थी। इनकी तुलना में शिक्षक प्रतिनिधियों की तादाद 1949 के समान ही जस की तस 28 बनी रही थी। इसके साथ, इन नए कॉलेजों में काम करने के हालात, नौकरी की सुरक्षा और वेतन स्तर प्रायः बेहतर नहीं थे। हालांकि कॉलेज प्रबंधन के लिए एक प्रमुख प्रतिनिधित्व होने के साथ, सीनेट के अंदर इन मामलों को उठाना उनके लिए असंभव था।

यह तो गुजरात यूनिवर्सिटी एरिया टीचर्स एसोसिएशन जैसे शिक्षक संगठनों और प्रगतिशील विद्यार्थी संघ जैसे छात्र संगठन थे, जिन्होंने उन हालातों से पीड़ित होकर सीनेट में बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन की मांग की थी। इसके लिए बनाए गए सतत दबाव ने अधिनियमों को “आधुनिक” बनाने के लिए सरकार को एक आयोग बनाने पर विवश किया, जिसने अपनी रिपोर्ट में कुछ प्रगतिशील सुझाव दिए और प्राचार्य के जरिए निजी कॉलेजों के “अनुपातहीन प्रतिनिधित्व” किये जाने की तीखी आलोचनाएं की। हालांकि, सरकार उच्च शिक्षा में अपने निहित स्वार्थों के चलते समुचित प्रतिनिधित्व देने के लिए राजी नहीं थी और बदले की भावना से शिक्षकों की छंटनी शुरू कर दी। इस अधिनियम को संशोधित रूप में सरकार द्वारा पारित कराये जाने के पहले ही विरोध में भूख-हड़तालें हुईं, धरना-प्रदर्शनों का दौर चला, परीक्षाओं के साथ-साथ कॉपियां जांचने के काम का भी बहिष्कार किया गया। सरकार ने तब आयोग के बहुत सारे सुझावों को अपने संशोधित अधिनियम में शामिल कर लिया। इसने कुल 250 सदस्यों की संख्या को घटाकर 146 कर दी। प्राचार्यों के लिए सीट की संख्या 35 सीमित कर दी गई तथा शिक्षकों के लिए सीटें बढ़ाकर 48 कर दिया गया। और संभवत: देश में पहली बार किसी राज्य ने छात्रों के चुने गए 12 प्रतिनिधियों को सीनेट में शामिल करने का प्रावधान रखा। इस तरह, देश भर के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के लोकतंत्रीकरण के लिए लड़ाइयां कैसे लड़ीं और जीती गईं, इनको लेकर बहुत सारी कहानियां हैं।

भाजपा का सरकारी विश्वविद्यालयों पर हमला 

पूरी तरह से विखंडित होने और बदले जाने की ताजा कोशिश से पहले, विश्वविद्यालयों के सीनेट भाजपा के 1990 के दशक में सत्ता के आने के बाद से ही लगातार हमले के शिकार होते रहे हैं। हालांकि सरकार काफी समय से लंबित छात्र संघ के चुनावों को कराने से इंकार कर छात्रों, सीनेट और खास करके, उनके इशारे पर काम न करने वाले शिक्षकों को अप्रासंगिक बनाने में एक हद तक कामयाब हुई है। 

लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए और गुजरात विश्वविद्यालय के विभिन्न वर्गों के हितों के प्रतिनिधित्व करने वाले सीनेट और सिंडिकेट की जगह प्रदेश की सरकार बोर्ड ऑफ गवर्नेंस के गठन की बात कर रही है। नेप के अनुसार इस बोर्ड में “काफी योग्य, सक्षम और सिद्ध क्षमताओं वाले प्रतिबद्ध तथा संस्था के प्रति दृढ़ मानसिकता वाले व्यक्ति” शामिल किये जाएंगे। यह सीनेट और सिंडीकेट के सभी कार्यों के लिए जवाबदेह होंगे, जिनमें संस्था के प्रमुख की नियुक्ति भी शामिल है। हालांकि नेप यह उल्लेख नहीं कर सका है कि प्रबुद्ध स्वेच्छाचारी लोगों का यह बोर्ड विश्वविद्यालय को कैसे संचालित करेगा और इसे नेतृत्व प्रदान करेगा। 

नई व्यवस्था में बोर्ड के नए सदस्यों का चुनाव खुद बोर्ड द्वारा ही किया जाएगा। इसमें शिक्षकों और छात्रों के हितों के प्रतिनिधित्व के बारे में बहुत कम उल्लेख किया गया है। प्रतिनिधित्व की कमी जबकि स्पष्ट है, यह थोड़ा हैरतअंगेज है कि नेप लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए निकाय को ऐसी व्यवस्था से बदलने की कोशिश कर रहा है, जो किसी काम के लिए आवश्यक रूप से कॉरपोरेट हितों की मुहर की मोहताज होगी जिससे सरकार को अपने काबू में रखा जाता है। यह सब विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा को बनाए रखने के नाम पर किया जाएगा। ऐसे कदम को अवश्य ही इस रूप में पहचाना जाना चाहिए कि एक निर्वाचित प्रतिनिधि निकाय को “नेतृत्व” और “विशेषज्ञता” के लबादे में एकाधिकारवादी ढांचे में बदलने की कवायद हो रही है। यह एक नवउदारवादी विश्वविद्यालय गठित करने का प्रयास है, जहां इसके मुख्य हिस्से-शिक्षकों, छात्रों और नॉन टीचिंग स्टाफ-की आवाज की कोई अहमियत नहीं है और उसे अपने को “नवाचार और सर्वोत्कृष्टता” की वेदी पर स्वयं की बलि देने के अलावा कोई भूमिका नहीं है। 

 जबकि यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि क्या बोर्ड शीघ्र ही सीनेट की जगह ले लेगा। यह लेख लिखे जाने के समय गुजरात यूनिवर्सिटी में सीनेट का कोई भी निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है और चुनाव की अधिसूचना अभी तक जारी नहीं की गई है, जो अपने आप में बड़ी चिंता का विषय है। इसलिए सतर्क रहना आवश्यक है और अगर सचमुच सीनेट का गठन नहीं किया गया तो यह भारतीय शिक्षा के इतिहास में अभूतपूर्व घटना होगी और इसका अवश्य ही करारा जवाब दिया जाएगा क्योंकि इसके बिना यह कदम नहीं रुकने वाला है। यह न तो गुजरात यूनिवर्सिटी के साथ, न दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी और न सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी न एमएसयू पर आ कर रुकेगा। यह तब तक नहीं रुकेगा जब तक कि प्रत्येक अंतिम संस्थान जिनसे भगवाकरण और उच्च शिक्षा के नीलामी की प्रक्रिया के खिलाफ लोकतांत्रिक प्रतिरोध का जरा स भी डर है वो नष्ट नहीं हो जाते हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों को कॉरपोरेट ऑफिस में बदलने की तीव्र और तीक्षण प्रक्रिया पर कड़ा जवाब दिया जाना चाहिए। न केवल गुजरात के भीतर, बल्कि पूरे देश के वाम और लोकतांत्रिक ताकतों द्वारा इसका प्रतिरोध किया जाना चाहिए।

1. गुजरात यूनिवर्सिटी संशोधन अधिनियम ( 1973) के तहत सीनेट और सिंडीकेट के नाम बदलकर “कोर्ट” और “एग्जीक्यूटिव काउंसिल” कर दिया गया था। हालांकि ये निकायों के अपने पुराने नामों से ही लोकप्रिय रहे। 

साहिल कुरेशी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (ब्रिटेन) में डीफिल के छात्र हैं और 1960-80 के दशकों में गुजरात की छात्र राजनीति और प्रदेश में हिंदू राष्ट्रवाद के उभार में उसकी भूमिका पर शोध कर रहे हैं।

यह आलेख पहली बार इंडियन कल्चरल फोरम में प्रकाशित हुआ था।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें ।

NEP in Action: The Dismantling of Democracy in Gujarat University

NEP
Gujarat University
Public Education
Modi Govt

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का ज़रूरी मोर्चा

स्कूलों की तरह ही न हो जाए सरकारी विश्वविद्यालयों का हश्र, यही डर है !- सतीश देशपांडे

नई शिक्षा नीति बनाने वालों को शिक्षा की समझ नहीं - अनिता रामपाल

नई शिक्षा नीति से सधेगा काॅरपोरेट हित

NEP भारत में सार्वजनिक शिक्षा को नष्ट करने के लिए भाजपा का बुलडोजर: वृंदा करात

नई शिक्षा नीति भारत को मध्य युग में ले जाएगी : मनोज झा

नई शिक्षा नीति, सीयूसीईटी के ख़िलाफ़ छात्र-शिक्षकों ने खोला मोर्चा 


बाकी खबरें

  • Hemant Soren
    अनिल अंशुमन
    झारखंड-बिहार: स्थानीय भाषा को लेकर विवाद कहीं महज़ कुर्सी की राजनीति तो नहीं?
    22 Sep 2021
    “किसी भी प्रदेश में वहां की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलना संविधान सम्मत है। लेकिन अब इस पर भी राजनीति होना संदेह पैदा करता है कि कहीं ये विवाद भी कोई सांप्रदायिक ध्रुविकरण करा कर बुनियादी सवालों…
  • Varanasi
    विजय विनीत
    बदहाली: रेशमी साड़ियां बुनने वाले हाथ कर रहे हैं ईंट-पत्थरों की ढुलाई, तल रहे हैं पकौड़े, बेच रहे हैं सब्ज़ी
    22 Sep 2021
    बनारस से ग्राउंड रिपोर्ट: विश्वविख्यात बनारस की रेशमी साड़ियों का ताना-बाना बिखर रहा है। इसी ताने-बाने में सिसक रही है बुनकरों की जिंदगी। जानने के लिए आपको लिए चलते हैं बनारस की संकरी गलियों में..
  • school
    सौम्या गुप्ता, सी. सरतचंद
    स्कूलों को वक़्त से पहले खोलने की अनुमति क्यों नहीं दी जानी चाहिए
    22 Sep 2021
    केवल स्कूलों को फिर से खोलने से असमान शिक्षा प्रणाली अधिक समान नहीं हो जाएगी जब तक कि सरकारें शिक्षा पर अपने ख़र्च को नहीं बढ़ाती हैं स्थिति में बदलाव लाना असंभव है। स्कूल खोलने से कोविड म्यूटेशन का…
  • SCO
    एम. के. भद्रकुमार
    ईरान की एससीओ सदस्यता एक बेहद बड़ी बात है
    22 Sep 2021
    तेहरान का एससीओ में ज़ोरदार स्वागत के साथ शामिल किया जाना और इस संगठन का जल्दबाज़ी के साथ विस्तार किया जाना दिखाता है कि बीजिंग और मॉस्को के बीच ज़बरदस्त तालमेल है।
  • यूपी: योगी सरकार का "विकासोत्सव" बर्बादी का जश्न है
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: योगी सरकार का "विकासोत्सव" बर्बादी का जश्न है
    22 Sep 2021
    योगी जी का विकास का सारा जश्न दरअसल अर्थव्यवस्था के ध्वंस और कोविड से हलकान, हैरान-परेशान जनता को मुंह चिढ़ाने और उसके जले पर नमक छिड़कने जैसा है। कुछ विश्लेषकों ने ठीक नोट किया है कि "यूपी विकासोत्सव…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License