NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
अजय सिंह
26 Feb 2022
Nagaland
अनिवार्य कोविड टीकाकरण के ख़िलाफ़ नगालैंड के कोहिमा में नागरिकों की 'फ्रीडम रैली' ।  फ़ोटो साभार: The Morung Express

जिस समय देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की गहमागहमी जारी है और मतदान की प्रक्रिया चल रही है (इन राज्यों के नतीजे 10 मार्च 2022 को आयेंगे), उस समय देश के एक महत्वपूर्ण उत्तर-पूर्वी राज्य नगालैंड में अलग ढंग की लड़ाई चल रही है।

वह है, आज़ादी की चाहः सशस्त्र बल विशेष अधिकार क़ानून (आफ़्सपा, 1958) से आज़ादी, और ज़बरिया कोरोना टीकाकरण से आज़ादी। ये दोनों चीज़ें नगालैंड की जनता पर ज़बरन थोप दी गयी हैं। आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।

कोरोना वायरस बीमारी (कोविड-19) से बचाव के लिए टीका लगाने/लगवाने की ज़रूरत को नगालैंड में सरकारी तौर पर अनिवार्य, बाध्यकारी बना दिया गया है। इसे व्यक्ति की इच्छा या मर्ज़ी पर नहीं छोड़ा गया है। इसका व्यक्ति के निजी व सार्वजनिक जीवन और गतिविधियों पर ख़ासा प्रतिकूल असर पड़ा है।

नगालैंड में हालत यह है कि अगर किसी व्यक्ति के पास कोरोना टीका प्रमाणपत्र नहीं है, तो वह स्कूल-कॉलेज, बैंक, डाकख़ाना, बड़े बाज़ार (मॉल), सिनेमाघर में और अन्य सार्वजनिक जगहों पर नहीं जा सकती/सकता। हर जगह कोरोना टीका प्रमाणपत्र दिखाना पड़ता है। इस प्रमाणपत्र के बग़ैर एक ज़िले से दूसरे ज़िले में जाने पर भी रोक है। इससे जनजीवन बहुत प्रभावित हुआ है।

इसे ‘कोरोना टीका तानाशाही’ के ख़िलाफ़ नगालैंड की राजधानी की राजधानी कोहिमा में जनवरी 2022 के दूसरे पखवाड़े में लोगों ने रैली निकाली, जिसे नाम दिया गया, ‘फ़्रीडम रैली’ (आज़ादी रैली/जुलूस)। इसका आयोजन नागरिक समाज समूहों और चर्चों ने मिल कर किया था। अच्छी-ख़ासी संख्या में लोग इसमें शामिल हुए।

इस रैली के एक आयोजक 41-वर्षीय पादरी अज़ातो कीबा का कहना था कि चूंकि हमारी आज़ादी छीन ली गयी है, इसलिए हमने इसे ‘फ़्रीडम रैली’ कहा। उन्होंने कहा कि हम कोरोना टीकाकरण के ख़िलाफ़ नहीं हैं, हम इसे बाध्यकरी बनाये जाने के ख़िलाफ़ हैं—हम ज़बरिया टीकाकरण नहीं चाहते। इसे व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा पर छोड़ दिया जाना चाहिए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि कोरोना टीकाकरण बाध्यकारी, अनिवार्य नहीं है।

कोरोना टीकाकरण की बाध्यता को ख़त्म करने की मांग के साथ नगालैंड में आफ़्सपा को हटाने/ख़त्म करने की मांग भी ज़ोर पकड़ रही है, और इस सिलसिले में विरोध प्रदर्शन लगातार हो रहे हैं। इस मांग को लेकर 10 जनवरी 2022 को दीमापुर से कोहिमा तक—70 किलोमीटर की दूरी तक—जुलूस/मार्च निकाला गया। इस आफ़्सपा-विरोधी मार्च में, जो दो दिन तक चला, लोगों की अच्छी भागीदारी रही। इसे कई राजनीतिक व सामाजिक संगठनों का समर्थन मिला।

केंद्र सरकार ने 30 दिसंबर 2021 को एक अधिसूचना जारी कर नगालैंड में इस अत्यंत दमनकारी क़ानून (आफ़्सपा) की अवधि छह महीने के लिए और बढ़ा दी। हालांकि केंद्र सरकार ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार क़ानून (आफ़्सपा) को नगालैंड से हटाने की मांग पर विचार करने के लिए एक उच्च-स्तरीय कमेटी बना दी थी, इसके बावजूद उसने (केंद्र सरकार ने) यह क़दम उठाया। नगालैंड की राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक संगठनों व नागरिक समाज समूहों ने इसकी कड़ी निंदा की।

ग़ौर करने की बात है कि यह क़ानून 1958 से, जब से भारत की संसद ने इसे बनाया, नगालैंड में लागू है। (तब नगालैंड को नगा हिल्स के नाम से जाना जाता था।) छह-छह महीने के लिए इसे साल में दो बार लागू किया जाता रहा है/इसकी अवधि बढ़ायी जारी रही है।

यह क़ानून सेना व अन्य सशस्त्र बलों को जनता पर हर तरह की दमनात्मक कार्रवाई करने की खुली, बेरोकटोक छूट देता है। केंद्र सरकार की इजाजत के बग़ैर सेना को न सिविल कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, न उसकी अपराधपूर्ण कार्रवाई पर मुक़दमा चल सकता है, न किसी आरोपित सैनिक अधिकारी को गिरफ़्तार किया जा सकता है।

नगालैंड की जनता लंबे समय से मांग करती रही है कि यह क़ानून हटाया जाये। नगालैंड विधानसभा ने 20 दिसंबर 2021 को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास कर आफ़्सपा को रद्द करने की मांग की।

(लेखक कवि व राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Nagaland
AFSPA
COVID-19
Nagaland Insurgency
Nagaland Independence Struggle

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

महामारी के दौर में बंपर कमाई करती रहीं फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License