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कोविड-19
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राजनीति
सात साल के सबसे बड़े संकट में नरेंद्र मोदी
2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं और तब से लेकर अभी तक के सात साल में इतने कमजोर और लाचार वे कभी नहीं दिखे। उनकी सरकार को समझ ही नहीं आ रहा है कि इस संकट से निकलने के लिए आगे का रास्ता क्या होना चाहिए।
परंजॉय गुहा ठाकुरता
01 Jun 2021
Translated by हिमांशु शेखर
नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने केंद्र में सात साल का कार्यकाल पूरा किया है। इस मौके पर भले ही औपचारिक तौर पर सरकार और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की ओर से बड़े आयोजन नहीं किए गए हों लेकिन हर तरह से यह बताने की कोशिश की जा रही है कि मोदी सरकार ने सात साल में वह सब कर दिखाया है जो पहले की सरकारों ने 70 साल में नहीं किया था। जबकि सच्चाई यह है कि इस वक्त देश एक बहुत बड़े संकट से गुजर रहा है।

2020 में कोविड-19 की वजह से शुरू हुई परेशानियां खत्म भी नहीं हुई थीं कि इस साल भारत में इस बीमारी की दूसरी लहर आ गई। इस बीमारी ने इस बार बहुत लोगों की जान ली। बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए। कोरोना वायरस की दूसरी लहर में उफान के बावजूद केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों को कुछ समय के लिए टालने की कोशिश नहीं की। बल्कि कहा जाए तो चुनाव आयोग की मदद लेकर केंद्र सरकार ने पूरे देश और बंगाल में कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच चुनाव कराया और इस बीमारी को बढ़ाने में एक तरह से अपना योगदान दिया। इसकी वजह से कोरोना के मामले तो बढ़े ही लेकिन साथ ही साथ पश्चिम बंगाल में भाजपा को बहुत बुरी हार का सामना करना पड़ा।

2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं और तब से लेकर अभी तक के सात साल में इतने कमजोर और लाचार वे कभी नहीं दिखे। उनकी सरकार को समझ ही नहीं आ रहा है कि इस संकट से निकलने के लिए आगे का रास्ता क्या होना चाहिए। स्वास्थ्य सुविधाओं के सही प्रबंधन के बजाय सरकार का पूरा जोर अब भी अपनी छवि प्रबंधन और मीडिया प्रबंधन पर ही है। यह स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि मोदी सरकार अपने अब तक के सात साल के कार्यकाल में अपने लिए सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है।

दरअसल, पिछले साल की सर्दियों में शुरू हुए किसान आंदोलन ने मोदी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती पेश की थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार की इस बात को लेकर आलोचना होने लगी कि किसानों का देश कहे जाने वाले भारत में किसानों के हकों और हितों की ही अनदेखी की जा रही है और किसानों पर कॉरपोरेट घरानों को तरजीह दी जा रही है।

लेकिन केंद्र सरकार और भाजपा को यह लगा कि अगर वह पश्चिम बंगाल का चुनाव जीत लेगी तो फिर से यह बात वह हर तरफ कह पाएगी कि किसान आंदोलन को जनता का समर्थन हासिल नहीं है और यही वजह है कि भाजपा को लोग लगातार जिता रहे हैं। पश्चिम बंगाल में जीत से भाजपा को होने वाले कई राजनीतिक फायदों में एक बड़ा फायदा यह भी था। पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण था कि न सिर्फ कोरोना वायरस के खतरों को नजरअंदाज करके चुनाव कराए गए और रैलियां कराई गईं बल्कि भाजपा ने अपने तमाम बड़े नेताओं और अपना पूरा संसाधन इस चुनाव में झोंक दिया था। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पूरे राज्य में कई रैलियां कीं। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने इतनी बड़ी और संसाधन संपन्न पार्टी को पटखनी दे दी।

करारी हार के बाद अब भी भाजपा यह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है कि वह चुनाव हार गई है। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल सरकार को प्रशासनिक से लेकर और भी कई स्तर पर परेशान करने की कोशिश लगातार केंद्र सरकार की ओर से हो रही है। भाजपा चुनी हुई सरकार का जो तर्क केंद्र में अपने हर काम को सही ठहराने के लिए देती है, वही तर्क बंगाल के मामले में वह भूल जाती है।

दरअसल, पश्चिम बंगाल में भाजपा की हार की कई वजहों में एक बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘दीदी ओ दीदी’ वाला बयान बन गया। नरेंद्र मोदी ने जिस अंदाज में यह बात कही और बार-बार दोहराई, वह हर किसी को एक महिला के लिए अपमानजनक लगी। पश्चिम बंगाल में हर जाति-धर्म की महिला को यह बात अपमानजनक लगी। यही वजह थी कि पूरे प्रदेश में महिलाओं ने ममता बनर्जी का साथ दिया। ऐसी भी बातें सामने आई हैं कि कुछ परिवार के पुरुषों ने किसी और पार्टी को वोट दिया लेकिन महिलाओं ने ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया।

पश्चिम बंगाल में इतनी बुरी तरह से हारना भाजपा और नरेंद्र मोदी के लिए बहुत बड़ा झटका था। एक तरफ बंगाल में हार हुई तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार की लापरवाही की वजह से कोरोना वायरस की दूसरी लहर लगातार बढ़ती गई। भारत में बहुत कम परिवार ऐसे बचे होंगे जिस परिवार का कोई न कोई सदस्य इस बार कोरोना वायरस की वजह से बीमार नहीं हुआ हो। इसे दूसरे ढंग से भी कह सकते हैं कि कोविड-19 की वजह से देश में करीब-करीब हर परिवार को इस बार अपनी जान सांसत में लगी। भले ही घर पर रहकर और दवा खाकर लोग इस बीमारी से ठीक हो रहे हों लेकिन यह बीमारी ऐसी है कि होने के बाद न सिर्फ बीमार व्यक्ति की बल्कि उसके परिवार और जानने वालों को तब तक चिंता बनी रहती है जब तक उसकी रिपोर्ट निगेटिव न आ जाए।

वहीं बहुत बड़ी संख्या में लोगों को जान गंवानी पड़ी। देश भर के श्मशानों से जो तस्वीरें आईं, उससे यह बात साबित हो रही थी कि सरकार मौत के आंकड़ों को सही ढंग से लोगों के सामने नहीं रख रही है। मोदी सरकार के मंत्रियों ने इन तस्वीरों को प्रकाशित और प्रसारित करने वाले मीडिया संस्थानों पर लगातार हमले किए। सरकार ने सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने वालों और ऑक्सीजन की मांग करने वालों पर कानूनी कार्रवाई करके अपने विरोध को दबाने की कोशिश की।

लेकिन इस सबके बावजूद नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर आम लोगों का गुस्सा चरम पर है। लोगों को यह लगने लगा है कि इस बीमारी से जो स्थिति पैदा हुई है, उसका बेहतर प्रबंधन मोदी सरकार कर सकती थी। लोग यह भी समझ रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता आम लोगों की जान नहीं है बल्कि उनके लिए चुनाव में जीत लोगों की जान से अधिक प्यारी है। यही वजह थी कि कोरोना की दूसरी लहर में उफान के बीच उन्होंने पश्चिम बंगाल में चुनाव कराया।

नरेंद्र मोदी को लेकर गुस्से की लहर सिर्फ आम लोगों में नहीं है बल्कि हर मसले पर उनका समर्थन करने वाले भक्त वर्ग में भी है। क्योंकि ऐसे बहुत सारे लोगों के किसी न किसी परिजन या करीबी की जान इस बार सरकार के कुप्रबंधन की वजह से गई है। हर मामले में नरेंद्र मोदी का साथ देने वाले भाजपा के मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं में भी नरेंद्र मोदी को लेकर नाराजगी तेजी से बढ़ी है।

संघ में नेतृत्व के स्तर पर भी नरेंद्र मोदी को लेकर पहले की तरह उत्साह नहीं है। ऐसे लोग भी अनौपचारिक बातचीत में यह स्वीकार कर रहे हैं कि इस संकट का प्रबंधन बेहतर ढंग से नरेंद्र मोदी सरकार कर सकती थी और बहुत सारे लोगों को मरने से बचाया जा सकता था। अभी यह कहना तो जल्दबाजी होगी कि संघ के अंदर नरेंद्र मोदी के विकल्प की तलाश शुरू हो गई है लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि संघ के अंदर नरेंद्र मोदी की स्थिति सात साल में इतनी कमजोर कभी नहीं थी। यही स्थिति आम लोगों के बीच भी है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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