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भारत
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मिटे नहीं, विस्थापित हुए हैं: नर्मदा बांध के संघर्ष का इतिहास
यह वेबसाइट उन लोगों की कहानी को एक साथ लाती है जिनकी आंखों के सामने इस परियोजना की आधारशिला रखी गई थी और उन्हें उन्ही की उस ज़मीन से विस्थापित कर दिया गया जहां वे पीढ़ियों से रह रहे थे।
रोसम्मा थॉमस
09 Jul 2020
Translated by महेश कुमार
Narmada Struggle
Image Courtesy: Oral History Narmada

इस वर्ष 4 जून को, नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध का जल स्तर 121.48 मीटर था, जबकि बांध की कुल क्षमता 138.68 मीटर है। 18 जून को, जब मानसून गुजरात पहुंचा तो जल स्तर बांध की कुल क्षमता से सिर्फ 11 मीटर नीचे था चूंकि वह 127 मीटर तक भर चुका था। इस परियोजना के तहत 30 बड़े, 135 मध्यम और 3,000 छोटे बांधों के जलाशय गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के उपजाऊ गांवों में बनाए गए हैं। अकेले सरदार सरोवर परियोजना से 245 गाँव विस्थापित हुए हैं। एक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से अब उस संघर्ष के इतिहास को दर्ज़ करने का प्रयास किया जा रहा है।

इस वेबसाइट का नाम Oralhistorynarmada.in है, यह उन लोगों की कहानी को एक मंच पर लाती है, जिनके सामने इस परियोजना की आधारशिला रखी गई थी और जिन्हे इस परियोजना के लिए अपनी ही ज़मीन से बेदखल कर दिया गया था जिस पर वे पीढ़ियों से रह रहे थे।

इस परियोजना से विस्थापित हुए लगभग 2.5 लाख लोगों में से आधे से अधिक आदिवासी थे, और वे भूमि की हुई हानि के बदले केवल ज़मीन मांग रहे थे। सरकार के लिए ज़मीन देना असंभव माना गया। वर्ष 2000 में अपने आदेश में, परियोजना के निर्माण को आगे बढ़ाते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि जिन लोगों को विस्थापित किया गया था, उन्हें तीनों राज्य सरकारों को "संतोषजनक" तरीके से पुनर्वास और पुनर्वासित करना होगा।

केवल उन लोगों को परियोजना प्रभावित लोग (पीएपी) माना गया जो बांध के डूबने वाले क्षेत्र में रहते थे, लेकिन जिन्हे कॉलोनियों और नहरों के निर्माण के मामले में इसलिए विस्थापित किया गया कि वहां आधारभूत ढांचे के लिए ऐसा करना जरूरी था, उन्हें परियोजना से प्रभावित नहीं माना गया, और इसलिए उन्हे केवल छोटी सी नकद राशि का मुआवजा दे दिया गया।

न्यायमूर्ति एसपी भरुचा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश में अपने असहमतिपूर्ण फैसले में लिखा कि, 'जल संसाधन मंत्रालय और पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए नोटों में संदेह का कोई रास्ता नहीं है क्योंकि जब परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया गया तो  अपेक्षित डेटा उपलब्ध नहीं था।'

गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर वडगाम गाँव की उषाबेन तडवी, सरदार सरोवर परियोजना के चलते सबसे पहले बाढ़ में बहने वालों में से हैं और याद करती हैं कि बाँध से पहले की चीज़ें कैसी थीं। ओरल हिस्ट्री साइट पर एक वीडियो में वे कहती हैं, "जब बच्चे बीमार होते थे, तो हम दवाइयाँ बनाने के लिए गाँव के पौधों और पेड़ों तथा वनस्पति का इस्तेमाल करते थे। और वे ठीक हो जाते थे, महंगे उपचार की कोई जरूरत नहीं पड़ती थी, हम अब उसी महंगे उपचार पर निर्भर हैं, और जो हमें कर्ज में धकेल देता है। हम बड़ी शांति से जीवन व्यतीत करते थे, पर्याप्त पानी मिलता था - हम नर्मदा में स्नान करते थे और कपड़े धोते, इन दिनों (धरमपुरी में पुनर्वास कॉलोनी में) हम सिर्फ एक बाल्टी पानी में स्नान करते हैं। हम वहां केवल जमीन पर बीज फेंकते और वे अंकुरित हो जाते थे, यह जैविक खेती थी। इन दिनों, हमें पानी और उर्वरक दोनों की जरूरत पड़ती है, और फिर भी फसल स्वस्थ नहीं होती है।”

वे कहती हैं कि गाँव के कच्चे घर बेहतर थे - दीवारों पर महंगे पेंट करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, वे दीवारों पर बस मिट्टी के एक कोट का इस्तेमाल करते थे। वे बिना किसी महंगे रखरखाव या खर्च के अच्छे लगते थे। पक्के घरों में, दीवारों को रंगना भी एक खर्च है; और फिर रंग भी मुफ्त नहीं आता है।

उषाबेन याद करती हैं कि वे कैसे अक्सर अपने पति के घर से अपनी माँ के घर चली जाती थी – वे मायके पैदल भी आ सकती थी। पुनर्वास कॉलोनी से, हालांकि, उसकी मां के घर आने-जाने पर कम से कम 500 रुपये का खर्च होता है। अब वह दो या तीन साल में एक बार जाती है, उन्होने बताया कि जब वे आखिरी बार गई थी तब परिवार में एक सदस्य की मौत हुई थी।

मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के जलसिंधी गाँव की परवी कहती है, “जंगल हमारे पिता हैं, नदी हमारी माँ। जब नदी मुक्त बहती थी, तो जानवर भी खुश थे। वे नदी से पानी पीकर वापस लौट जाते थे। बांध निर्माण शुरू होते ही किनारों के पास का इलाका दलदली हो गया है। पशु वहां फंस जाते हैं। मैं इस दलदल में एक गाय और एक भैंस को खो चुकी हूं। नदी में मगरमच्छ भी थे जो जानवरों का शिकार करते थे।”

वह न केवल उन फलों से लड़े पेड़ों और घरों को याद करती है जो डूब गए, बल्कि तेंदुए और भालू, जैसे जानवर उसके पड़ोसी थे। वह कहती है अब, "नदी का दम घुटता है, बांध उसकी गर्दन के चारों ओर शिकंज़ा जमाए हुए है,"। नर्मदा बचाओ आंदोलन, जिसने शुरुआत में विस्थापित लोगों के उचित पुनर्वास की मांग की थी, वह इन बड़ी परियोजनाओं के विकास के प्रतिमान पर भी सवाल उठाता है, जो परवी जैसी महिलाओं की चिंताओं का प्रतिनिधित्व करता है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की एक कार्यकर्ता नंदिनी ओझा ने इन साक्षात्कारों की वीडियो रिकॉर्डिंग को इकट्ठा किया है, फिर उन्होंने पिछले साल नवंबर में एक वेबसाइट पर संकलित किया था। "एक पुरानी अफ्रीकी कहावत है: जब तक शेरों का अपना इतिहास नहीं होगा तब तक  शिकार का इतिहास शिकारी को गौरवान्वित करता रहेगा।" "विकास" के संदर्भ में भी, जब तक पीड़ित लोग अपना इतिहास नहीं लिखेंगे तो विकास के योजनाकार परियोजनाओं का महिमामंडन करते रहेंगे, भले ही वे सच्चाई से दूर की बात ही क्यों न हो। ओझा कहती हैं, कि वेबसाइट इस बात को सुनिश्चित करने का एक प्रयास है कि ये कहानियाँ बाहर आए,”।

वर्तमान में वे ओरल हिस्ट्री एसोसिएशन ऑफ इंडिया की अध्यक्ष हैं, जिसे 2013 में संस्कृति और इतिहास के विभिन्न पहलुओं को संरक्षित करने के लिए एक पेशेवर समूह के रूप में स्थापित किया गया था, जिन्हें मुख्यधारा के कथानकों या कहानियों में प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है।

मध्य प्रदेश के पिपरी की शांताबेन यादव, जो उन सात लोगों में से हैं, जिन्होंने परियोजना का विरोध करने के लिए 1990 में अनिश्चितकालीन अनशन किया था, कहती हैं, “हमारी संस्कृति नष्ट हो गई, घाटी हाथ से चली गई। ओंकारेश्वर, महेश्वर… इतने बड़े बांध हैं, पर नदी अमर है। यह नदी सबसे खराब सूखे में भी कभी सुखी नहीं थी, लेकिन अब इसका पानी खराब हो गया है। शूलपनेश्वर जंगल बहुत ही समृद्ध संसाधन था, जो अब चला गया। इनकी तबाही के निर्णय मुंबई और दिल्ली में लिए गए है…”

दलसुखबाई तडवी जो अब 83 वर्ष की हैं वे 1961 में एक युवा थी, जब परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी। उन्हे उन लोगों के साथ एक मजदूर के रूप में काम करना अभी भी याद है जो जमीन का सर्वेक्षण और माप लेने के लिए आए थे। वह और अन्य मजदूर उनके उपकरण ले जाने में मदद करते और पर्दों को साफ करते ताकि माप सही आए। उन्हें याद है कि उनकी प्रति दिन दैनिक मजदूरी 1.50 रुपये थी। वे उस समय को याद करते हैं जब प्रधानमंत्री हेलीकॉप्टर से पहुंचे और लोगों से हिंदी में बात की थी।

“इन दिनों, जो लिखा जाता है वह एक झूठ हो सकता है। लेकिन उन दिनों, सत्य ही आदर्श था। हमारे पास प्रधानमंत्री के प्रति अविश्वास करने का कोई कारण नहीं था जब उन्होंने हमें बताया कि परियोजना के लिए हमारी भूमि की आवश्यकता है, और हम कहीं और चले जाएंगे।

हमने सोचा कि हमें दूसरी जगह जमीन मिल जाएगी। हमने उन पर भरोसा किया, और याद करते हुए कहते हैं कि आसपास के गांवों से बड़ी भारी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे, नाव से पहुंचे थे क्योंकि उन दिनों नदी पार करने का कोई दूसरा साधन नहीं था।

जब 1960 के दशक में अधिग्रहण शुरू हुआ था तो जमीन खोने वालों लोगों को दी जाने वाली राशि एक एकड़ पर मात्र 60-100 रुपये थी। "नमक की कीमत पर भूमि ली गई थी," दलसुखबाई कहते हैं।

मुल्जिबाई तडवी जो एक ऐसे परिवार से आती हैं जो केवडिया में पीढ़ियों से रहते आए हैं, अब वहां बांध खड़ा है, उन्हे अब भी याद है जब 1962 में नेहरू के आने के कुछ समय बाद ब्लास्टिंग का काम शुरू हुआ था। जिन ग्रामीणों को ज़मीन के बदले मुआवज़े में ज़मीन नहीं दी गई थी, वे भी इस समय के आसपास विरोध प्रदर्शन में उतर गए थे, याचिकाएँ दायर कीं और राज्य सरकारों के बीच बढ़ते मतभेदों को देखा गया, जिससे परियोजना के काम में नितांत देरी हुई। राज्यों के बीच नदी के पानी के बंटवारे पर फैसला करने के लिए, 1969 में एक न्यायाधिकरण की स्थापना की गई थी।

तड़वी ने बताया कि "(प्रधान मंत्री) मोरारजी देसाई ने तीनों राज्यों को एक समझौते पर लाने के लिए कई तरकीबों का इस्तेमाल किया,"। जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी, तो राज्य जलमग्न क्षेत्र और अपने पानी के हिस्से को लेकर परेशान थे; जब 1977 में देसाई पीएम बने, तो इस मामले में तेजी आई और 1979 में ट्रिब्यूनल ने एक फैसला दिया।

गुजराती में लिखी गई मोरारजी देसाई की जीवनी से अनुवाद करते हुए, नंदिनी ओझा लिखती हैं: “इंदिरा गांधी… हालांकि प्रधानमंत्री ने शीघ्र समाधान का वादा किया था, लेकिन वर्ष 1974 तक कोई समाधान नहीं निकाला था। इसके विपरीत, उन्होंने इस मुद्दे को ट्रिब्यूनल से वापस ले लिया था और इसे अनसुलझे रखा और वर्ष 1974 के अंत में फिर से ट्रिब्यूनल को दे दिया था। इस तरह बिना निर्णय के काफी देरी हो गई। दोनों राज्यों में से एक को नाराज होना पड़ेगा और इसलिए कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सका। लेकिन उन्हे इस बात को पहले से समझना चाहिए था। उन्हे गुजरात की जनता से इस मामले में जल्द निबटाने का वादा नहीं करना चाहिए था।

मुल्जिबाई तडवी बताती हैं कि किस तरह से सभी ग्रामीण एक साथ अदालत में पहुंचे लेकिन वे थक चुके थे - उन्हें सुनवाई के लिए हर बार गाँव से लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, और फिर वे अदालत में नंबर आने का इंतज़ार करते रहते थे। अंत में लगा कि वकीलों की फीस और यात्रा पर होने वाला खर्च केस के लायक नहीं था।

इस परिकल्पना के 70 वर्षों के बाद, यह परियोजना सिंचाई की जरूरतों को पूरा करने में विफल रही है जिसके बारे में शुरू में सोचा गया था। यह परियोजना गुजरात में उच्च सिंचाई लाभ हासिल करने के लिए थी, जबकि गुजरात को जल विवाद न्यायाधिकरण ने परियोजना से उत्पन्न बिजली का केवल 16 प्रतिशत ही प्रदान किया। हालांकि, राज्य में औद्योगिक और घरेलू उपयोग के लिए पानी का उपयोग किया जाता है; लेकिन सिंचाई की जरूरतें इससे पूरी नहीं हुईं हैं और सूखे से प्रभावित कच्छ और सौराष्ट्र जिले अभी भी कृषि के लिए बारिश पर निर्भर हैं।

इतिहास, कानून, विकास या पर्यावरण का अध्ययन कर रहे छात्रों के लिए, साक्षात्कार के वीडियो इस बात की झलक हैं कि कैसे भारत के सामान्य नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों और पर्यावरण को बचाने के लिए राज्य के साथ चर्चा चलाते हैं, और कैसे हमारे संस्थान उन्हें बार-बार विफल करते हैं।

लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।

मूल आलेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Displaced, Not Erased: Videos Record History of Narmada Struggle

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