NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कोविड-19 : लॉकडाउन की वजह से हर चौथा व्यक्ति बेरोज़गार
महीने भर पहले शुरू हुए लॉकडाउन की वजह से 14 करोड़ से अधिक लोग अपनी नौकरी खो चुके हैं।
सुबोध वर्मा
27 Apr 2020
Translated by महेश कुमार
कोविड-19
Image Courtesy: Telegraph India

भारत में 26 प्रतिशत से अधिक कार्यबल बिना किसी काम के है, जिससे सामाजिक ताने-बाने को खतरा बढ़ गया है और लाखों लोगों के जीवन में असहनीय तकलीफ़ पैदा हो गई है। ये अनुमान सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) द्वारा हाल ही में किए गए साप्ताहिक नमूना सर्वेक्षणों के नवीनतम दौर (19 अप्रैल) से निकले है। आंकड़े बताते है कि बेरोज़गारी में इस कद्र बढ़ोतरी मोदी द्वारा 24 मार्च को कोविड-19 महामारी के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए की गाई देशव्यापी तालाबंदी की घोषणा के बाद हुई है, ताज़ा खबर यह भी बताती है कि यह वाइरस दुनिया भर में अब तक लगभग 50 लाख लोगों को संक्रमित कर चुका है और लगभग 2 लाख लोगों को मौत के घाट उतार चुका है। 

भारत में अब तक कोरोना के लगभग 25,000 मामले सामने आए हैं और करीब 780 मौतें हो चुकी हैं। सरकार दावा कर रही है कि इस निहायत संक्रामक वायरस के तेजी से बढ़ते प्रसार को थामने का यह एक सफल रास्ता है और कम संक्रमण के लिए लॉकडाउन की सफलता को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, विश्व स्तर के अनुभव से पता चलता है कि कई देश अर्थव्यवस्था को इस तरह के कठोर बंद किए बिना और इसके सभी परिणामों के बिना कोरोनोवायरस को नियंत्रित करने में कामयाब रहे हैं – जिन परिणामों में बेरोजगारी का यह स्तर अपने आप में चौंका देने वाला है।

graph 1_3.png

जैसा कि ऊपर दिए गए चार्ट में देखा जा सकता है, बेरोजगारी दर पिछले महीनों में 7-8 प्रतिशत के बीच झूम रही थी, जो अपने आप में कोई बहुत सुखद स्थिति नहीं थी। लेकिन इस पर अब लॉकडाउन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है क्योंकि लॉकडाउन की घोषणा के दिनों के दौरान बेरोजगारी दर में 23.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अब यह उस वक़्त से बढ़कर कभी न सुने जाने वाली स्थिति यानि 26.2 प्रतिशत पर पहुँच गई है। बेरोजगारी का यह आंकड़ा लगभग 10 करोड़ (100 मिलियन) व्यक्ति बैठेगा।

अब न केवल एक महीने के लिए उद्योग, कार्यालय, दुकानें आदि बंद कर दिए गए हैं, बल्कि इसके कारण विशाल अनौपचारिक क्षेत्र (उद्योग और सेवाओं दोनों में) पूरी तरह से ध्वस्त हो गए हैं। इस क्षेत्र में देश का करीब 44 करोड़ कार्यबल कार्यरत था, जो क्षेत्र कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र तक फैला हुआ है। तीन दिनों तक सोचने के बाद, मोदी सरकार ने किसानों के मजबूत विरोध को देखते हुए कृषि क्षेत्र के काम को तालाबंदी के दायरे से बाहर कर दिया, क्योंकि अब रबी की फसल की कटाई का समय हैं और फसल कटाई के लिए तैयार खड़ी हैं। फिर भी, यह घोषणा इतने बेतरतीब तरीके से की गई कि सरकार की इस क्षेत्र को छुट देने की नीति कई खेतिहर मजदूरों को कटाई के पहले या फिर कटाई के बाद के काम के लिए प्रोत्साहित नहीं कर पाई।

बेरोजगारी के इस संकट का एक और भी गंभीर पहलू यह है कि तालाबंदी शुरू होने के बाद से करीब 14 करोड़ लोग अपनी नौकरी खो चुके हैं। सीएमआईइ सर्वेक्षण ने इन चौंकाने वाले आंकड़े का खुलासा किया है, जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दर्शाया गया है:

graph 2_3.png
महामारी से पहले की अर्थव्यवस्था में मंदी ने महामारी के फैलने से ठीक पहले के महीनों में श्रम भागीदारी दर को लगातार कम कर दिया था। इसे भी ऊपर देखा जा सकता है जहां इस वर्ष 19 जनवरी को रोजगारशुदा व्यक्तियों की संख्या लगभग 41.8 करोड़ से 22 मार्च को 40.4 करोड़ हो गई है।

लॉकडाउन के लागू होने के बाद, नौकरी के नुकसान में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई है और पांच दिनों के भीतर-भीतर लगभग 10 करोड़ लोगों के रोज़गार खोने की सूचना है। तब से स्थिति और अधिक खराब हुई है क्योंकि 19 अप्रैल के नवीनतम अनुमान के अनुसार केवल 27.1 करोड़ लोग की ही कार्यरत हैं जो संख्या अपने आप में बहुत कम है। यह कुल कार्यबल का मात्र 27 प्रतिशत हिस्सा है, जो हर समय के लिए काफी कम है।

यह कागज पर दर्ज़ किया जाना चाहिए कि - मोदी सरकार ने घोषणा की थी कि किसी भी मज़दूर को उसकी नौकरी से नहीं निकाला जाएगा और तालाबंदी अवधि के दौरान सभी को मालिकों द्वारा वेतन या उनकी मजदूरी का भुगतान किया जाएगा। केंद्रीय श्रम सचिव और गृह सचिव ने राज्य सरकारों को आधिकारिक रूप से पत्र भेजकर स्पष्ट रूप से इस आशय की सलाह दी थी। प्रधानमंत्री ने स्वयं इस 'बात’ को दोहराया था। इस सब के बाद भी, ऐसा नहीं हुआ और रोजगार को भी बड़ी तादाद में खत्म कर दिया गया है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि सरकार ने मजदूरों और कर्मचारियों को भूख और विनाश की भट्टी से बचाने के लिए किसी भी तरह के उपायों की घोषणा नहीं की है, जिसका परिणाम यह है कि बेरोज़गारी इस कद्र बढ़ गई है।

तो, यहाँ अरब डॉलर का सवाल है: सबसे अधिक महत्वपूर्ण क्या है? एक अनिश्चित लॉकडाउन जिसके बारे में अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह कोरोनावायरस को रोकने में मददगार है या नहीं, या फिर इस अनिश्चित उपाय यानि लॉकडाउन के कारण लाखों लोगों की जान को खतरे में डाल दिया जाए? यह सवाल तब और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा जब लॉकडाउन हटाए जाने के बाद वायरस संक्रमन का खतरा बढ़ने लगेगा, क्योंकि अधिकांश विशेषज्ञ इस तरह की भविष्यवाणी कर रहे हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

COVID-19: Every Fourth Person Jobless as Lockdown Continues

COVID-19
novel coronavirus
Narendra modi
Nationwide Lockdown
unemployment
Joblessness rate
Centre for Monitoring Indian Economy

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

मनरेगा: ग्रामीण विकास मंत्रालय की उदासीनता का दंश झेलते मज़दूर, रुकी 4060 करोड़ की मज़दूरी

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

ग्राउंड रिपोर्टः डीज़ल-पेट्रोल की महंगी डोज से मुश्किल में पूर्वांचल के किसानों की ज़िंदगी

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • Privatisation
    अजय कुमार
    महाशय आप गलत हैं! सुधार का मतलब केवल प्राइवेटाइजेशन नहीं होता!
    12 Dec 2021
    भारत के नीतिगत संसार में सुधार का नाम आने पर प्राइवेटाइजेशन को खड़ा कर दिया जाता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत की बीहड़ परेशानियां प्राइवेटाइजेशन की वजह से खड़ी हुई गरीबी की वजह से जस की तस बनी…
  • god and man
    शंभूनाथ शुक्ल
    ईश्वर और इंसान: एक नाना और नाती की बातचीत
    12 Dec 2021
    मैंने अगला प्रश्न किया, कि क्या तुम मानते हो कि दुनिया में कोई ईश्वर है? अब वह थोड़ा झिझका और बोला, ‘कोई है तो जो हम सब को बनाता है’। मैंने एक जिज्ञासा उठाई, कि मनुष्य का पैदा होना एक बायोलॉजिकल…
  • unemployment
    रूबी सरकार
    ‘काम नहीं तो वोट नहीं’ के नारों के साथ शिक्षित युवा रोज़गार गारंटी बिल की उठाई मांग
    12 Dec 2021
    युवाओं का कहना है कि पढ़ाई पूरी करने के 3 माह के भीतर सरकार को नौकरी मुहैया कराना चाहिए अथवा जब तक शिक्षित को नौकरी न मिले, तब तक सरकार की ओर से स्किल्ड लेबर की न्यूनतम मजदूरी के बराबर करीब साढ़े नौ…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    खुशहाली की बजाय बेहाली,संविधान से उलट राजसत्ता और यूपी का रिकार्ड
    11 Dec 2021
    वैश्विक असमानता रिपोर्ट के नये तथ्य और आंकड़े भारत की सामाजिक आर्थिक स्थिति की भयावह तस्वीर पेश करते हैं. आखिर आजादी के इन चौहत्तर वर्षो में हमारे समाज में इस कदर असमानता और दुर्दशा क्यों बढ़ी है?…
  • kisan andolan
    राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष: किसानो, कुछ तो रहम करो...लिहाज करो!
    11 Dec 2021
    मनाएं, किसान अपनी जीत का जश्न। बस, सरकार को हराने का शोर नहीं मचाएं। इस शोर से दुनिया भर में छप्पन इंच की छाती वालों की बदनामी होगी सो होगी, देश में मजदूरों-वजदूरों और न जाने किस-किस को कैसा गलत…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License